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Saturday 18 Nov 2017

अतीत की यात्रा : पाकिस्तान का सफर

बलराज साहनी
गाड़ी रुकी तो उतरने से पहले मैंने खिडक़ी से झांककर लाहौर स्टेशन की बुर्जियों की ओर देखा। मुझे लाहौर कभी भी ज्यादा याद नहीं आता था। अधिकतर रावलपिंडी के लिए ही जी तड़पता था। इसके कई कारण थे। एक तो मैं बचपन से वहां के पहाड़ देखने का आदी था। जब पिंडी छोडक़र गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर के न्यू होस्टल में पहुंचा तो उसकी छत पर से किसी ओर भी कोई पर्वत-श्रृंखला न देखकर मुझे ऐसा लगा था जैसे प्रकृति के किसी बहुत बड़े नियम का उल्लंघन हो गया हो।
फिर पिंडी एक छोटा शहर था। वहां अंग्रेजी राज्य की कुटिल-नीतियां लोक-जीवन पर पूरी तरह से हावी नहीं हुई थीं। मुहल्ले-दारियां और बिरादरी के मेल-मिलाप प्रचलित थे, दोस्तियों में स्निग्धता और मिठास थी। शरा$फत की $कद्र की जाती थी। $िफरकापरस्ती का जहरीला पौधा अवश्य बढ़ रहा था पर मजबूत अभी नहीं हो सका था। पर लाहौर केन्द्रीय शहर होने के कारण नये फैशन ‘सभ्यता’ के रंग में रंग चुका था। यहां पैसे और असर-रसूख के आदर्शों ने पुराने ढंग के रिवाज एकदम खत्म कर दिए थे। जैसे भी हो आगे बढऩे के लिए हर प्रकार के हीले, अच्छे या बुरे, जायज प्रमाणित किए जा चुके थे। और इसीलिए मैं लाहौर को कभी भी अपना नहीं कह सका। पर आज लाहौर स्टेशन के बुर्ज देखकर पता नहीं मुझे क्या हो गया। ऐसा लगा जैसे उनके लिए मेरी आत्मा युग-युग से तरस रही थी। भीतर के किसी ढंके सोते में से प्यार और आदर फूट पड़ा। फुटबोर्ड से नीचे पैर रखने से पहले मैंने हाथ से धरती को प्रणाम किया।
डॉ. नजीर अहमद (गवर्नमेंट कॉलेज के प्रिंसिपल) मुझे लेने के लिए यूनिवर्सिटी की एक आवश्यक मीटिंग से उठकर आ गए थे। उनके रसूख ने कस्टम, पासपोर्ट आदि की कठिन घाटियां मिनटों में पार करवा दीं; यही नहीं अ$फसरों ने बड़े आदर से मुझे चाय भी पिलाई। डॉ. नजीर अहमद बड़े संतुष्ट थे कि उनके पाहुन को सामान वगैरा खोलने का कष्ट नहीं उठाना पड़ा, पर मैं इस उतावली से जरा भी संतुष्ट नहीं था। मेरा दिल एक बार फिर प्लेट-फार्म पर जाकर घूमने को मचल रहा था।
शाम के चार बजे हैं। मैं काफी देर तक सो चुका हूं। बदन में ताजगी आ गई है। जी चाहता है अभी सडक़ों पर निकल पड़ूं। गवर्नमेंट कॉलेज के टावर की वही पुरानी घड़ी टन-टन करती है। शायद ग्यारह बजाय हैं उसने। वही पुरानी बेपरवाही उसकी, जिसके बारे में तरह-तरह के लती$फे गढ़े जाते थे। अजीब-सी झनझनाहट होती है उसकी टन-टन सुनकर। कोई भी याद स्पष्ट नहीं हो रही थी- केवल एक गहरा एहसान, एक सांत्वना-सी, जैसे तेज कडक़ड़ाती धूप में दूर-दूर तक उड़ानें भरकर लौटा हुआ भूखा-प्यासा पक्षी घोंसलें का आनंद ले रहा हो। दूर से टांगों की घंटियां, कॉलेज के सामने फल बेचने वालों की आवाजें।
जिस बंगले में मैं ठहरा था, पुराने वक़्तों में वह जी.डी. सौंधी साहब की रिहाइशगाह थी। वही हल्की-हल्की रोशनीवाले ठंडे-ठंडे कमरे, जालीदार दरवाजे और गुसलखाने में तौलिया फैलाने वाला रैक। यह सब कुछ ‘भवानी जंक्शन’ $िफल्म में बड़ी यथार्थतापूर्वक दिखलाया गया था। वैसे $िफल्म बड़ी घटिया थी, फिर भी बम्बई के सिनेमा हॉल में बैठा-बैठा आज से दस साल पहले, मैं लाहौर के लिए तड़प उठा था।
हमारे समय में इन बंगलों में घुसते हुए टांगे कांपने लगती थीं। प्रोफेसरों का बड़ा धमाकेदार ‘अंग्रेजी डर’ होता था। पर आजकल यह बात नहीं रही। बाहर से घंटी बजते ही डॉ. नजीर अहमद खुद दौडक़र बाहर जाते हैं, कोई दरबान नहीं है, कोई वर्दीवाला पहरेदार नहीं है। नजीर साहब ने मुझे अपना सोनेवाला कमरा दे दिया  है। उसमें कपड़ों की आलमारी न होने का उन्हें खेद था। कहने लगे, ‘‘यार, मेरे पास वार्डरोब नहीं है, तुम्हें तकलीफ होगी। दरअसल मेरे पास इतने कपड़े ही नहीं है। अगर तुझे जरूरत हो तो तकल्लुफ मत करना मैं मंगवा दूंगा।’’ कितना अच्छा लगा था मुझे यह सुनकर। मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था कि गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर का प्रिंसीपल ऐसा हो सकता है।
डॉ. नजीर कमरे में आए और कहा, ‘‘आओ, बाहर लॉन पर बैठकर चाय पिएं।’’ उनके कहने के अंदाज में कोई विशेषता नहीं है, फिर भी ऐसा लगा जैसे मेरी इच्छाओं को मेरे बिना कहे ही समझते हों। और शायद इसीलिए चाय के बाद मुझे मोटर में बिठाकर घुमाने निकल पड़े। जिला कचहरीवाले मोड़ पर से हम रावी रोड पर मुड़ें। गवर्नमेंट कॉलेज के फाटक के पास एक मील-पत्थर हुआ करता था। न्यू होस्टल  से सडक़ पार करके कॉलेज जाते हुए मैं अक्सर उस पर निगाह फेंककर जाया करता था : ‘रावलपिंडी- 178 मील, गुजरांवाला-39 मील, जेहरलम- 118 मील...’ अब इस मील के पत्थर का शरीर बढक़र चौगुना हो गया है, और उस पर कितनी ही और दूरियों का विवरण लिखा हुआ है : ‘करांची- 897 मील, मुलतान- 263...।’ यह निकल गई सेंट्रल ट्रेनिंग कॉलेज की ओर जाने वाली सडक़ ! इसी ओर रैटीगन रोड और मेरे फूफाजी का घर था। उनके पास ही प्रोफसर रुचिराम रहते थे। शायद पारसियों का एक मंदिर भी था; जिसके बगल की गली में से होकर प्रोफेसर गुलबहारसिंह और प्रोफेसर मदनगोपाल सिंह के यहां जाया करते थे। यह भाटी की ओर से आनेवाली सडक़ मिल गई। यह ‘गुरुदत्त भवन’ गया। देखूं तो सही, अब यहां क्या बोर्ड लगा है? ... ड्राइवर मोटर इतनी तेज क्यों भगाए लिए जा रहे है?
कॉलेज के जमाने में रावी रोड की सैर साइकिल पर, टांगे पर किया करते थे। आज यह मोटर बेरहमी से दिमाग में जुगरा$िफया बदलती जा रही है। जो स्थान मेरी कल्पना में दूर-दूर थे अब वे चप्पे-चप्पे के अंतर पर आ गए थे। पलक झपकने में जामा मस्जिद के आलीशान गुम्बद दीख गए फिर मिंटो पार्क- इसे अब मुहम्मद इकबाल पार्क कहते हैं। लाहौर की तस्वीर एकदम सरल और संक्षिप्त हो गई है। गोल बाग की गोलाई बड़े नुमाइशी ढंग से शहर के गिर्द घूम रही थी। गुरु अर्जुनदेव की समाधि, महाराजा रणजीत सिंह की समाधि, पुराना किला, सारे स्थानों के चित्र फिर से दिमाग में जड़े। भला विद्यार्थी-जीवन में इस ओर आता ही कब था? तब मैं साहब बहादुर था। गोरों की तरह सोला हैट लगाए माल रोड और मैक्लोड रोड को ही नापा करता था। बहुत हुआ तो कभी निसबत रोड का राउंड मार लिया। पर अब के एकदम देशी आदमी बनकर लाहौर की गलियों के चक्कर लगाऊंगा!... शहर की त$फसील में ऊंची-सी ढेंंकी पर एक पुराना दरवाजा दिखाई पड़ा (नाम भूल गया!... काबली दरवाजा?) मुझे शहर की ओर ललचाई नजरें फेंकते देखकर डॉ. नजीर ने तजवीज पेश की कि इस दरवाजे के पीछे एक तंग गली में, उनका पुश्तैनी मकान है, चलकर एक रात वहां रहा जाए। कितना खुश हुआ मैं इस बात पर! पाकिस्तान आने का सबसे बड़ा लोभ ही मुझे यही था। (जी भरकर) अपनी पंजाबी बोली सुनना- माझी, लहिंदी, पोठोहारी, मेरी अपनी मातृबोलियां जिनसे मैंने अपनी आयु का इतना बड़ा भाग विमुख रहकर बिता दिया था। कितना बड़ा गुनाह किया था मैंने। पर फिर भी उन्होंने मुझे नहीं बिसराया। मुझे पछताते और अपनी ओर लौट के आते देखकर उन्होंने बांहें फैलाकर मुझे गले से लगा लिया। मुट्ठियां भर-भर के अनमोल रत्न मेरी जेबों में भरने शुरू कर दिए, वैसे बचपन में मेरी मां रेवडिय़ों, पिन्नियों और चिलगोजों से मेरी जेबें भरा करती थीं। कितनी प्यारी है लाहौर-वालों की बोली। यहां यह इतनी ताजी और निखरी-निखरी सी लगती है, जैसे खेतों में लहलहाती सुनहरी सरसों, जैसे झरनों से बहता पानी! बम्बई में मेरे अनेकों मित्र यही बोली बोलते हैं, पर वहां यह कानों को कुछ बासी-बासी सी लगती है।
तागांनुमा रेहडिय़ों में बांके घोड़े जोतकर शाम को सैर के लिए निकलना छैलों का खास शौक है। मलमल का स$फेद कुर्ता या फुतूई, तहमद और हाथों में फूलों के $गजरे। कितने हसीन गोरे-गोरे और शोहदे-से चेहरे हैं इनके। यूं पलक-झपकने में निकल जाते हैं। (दोस्त की मोटर  है नहीं तो अभी गाली दे देता!) वह निकल गया! कितना खूबसूरत जवान था! इतना खूबसूरत आदमी तो दुनिया में कम ही देखने को मिलेगा।
वारिसशाह की बात याद आ गई :
नाजां पालिआ दूध माइयां वे।1...
मन में पलटा खाया, ‘छोड़ भी यार, ये तो मुसलमान हैं, गैर-मुल्की हैं! कितने हिन्दू मार चुके हैं, कितनी आग लगाई है, कितनी औरतों की आबरू लूटी है, कैसे भूल गया वे सब बातें?...’
अच्छा, ठीक है! अब मैं इनको गैर समझ के ही देखूंगा... पर हाय, करूं तो क्या करूं? ये फिर भी मुसलमान नहीं दिखते, गैर नहीं लगते- जो कुकर्म जिसने किए हैं स्वयं ही उनका हिसाब देगा, मुझे तो किसी ने न्यायाधीश नहीं बनाया?
बागवानपुरे में अच्छी-खासी नई आबादी है। बढिय़ा-बढिय़ा और पक्के-पक्के बंगले हैं, आवागमन भी बहुत है। पर पुराने डिजाइन के लाहौरी तांगे नजर नहीं आ रहे। ड्राइवर ने बताया कि अब हर जगह पेशावरी तांगों का चलन हो गया है। पिंडी में केवल तीन सवारियां बैठती थीं, यहां अब भी चार ही का दस्तूर है। हम पिंडी-वाले लाहौरी टांगों को ‘ढिचकू-ढिचकू’ कहकर मजाक किया करते थे। आखिर पिंडी की जीत हुई न! बड़ी खुशी हुई सोच के। पर दूसरे दिन मन में वही विचार उठ पड़े... ‘पिंडी और लाहौर से तुझे क्या लेना? खाहमखा पराई छाछ पर मूंछे मुंड़वा रहा है।’
‘चलो जी, मैं बेगाना तो बेगान सही। पर पिंडी और लाहौर को, यहां के तांगों को जी भर के देखने की तो छूट है न मुझे! सदा सलामत रहें ये। इन्हें कभी गर्म हवा न लगे। इनकी मुरादें पूरी हों। इनके बच्चे जिएं...’
यह सिख नेशनल कॉलेज की इमारत थी। इस हिसाब से वह हुई नहर की तरफ से आने वाली सडक़... हां, ठीक ही तो है... यहीं पास में पीर मियां मीर की मजार है, जिसने अमृतसर में सिखों के सोने के हरि-मंदिर की नींव का पत्थर रखा था। दाराशिकोह का गुरु था वह। दाराशिकोह, जिसने उपनिषदों के अनुवाद $फारसी में करवाए थे। पर अब ऐसी ऐतिहासिक घटनाओं का कोई अर्थ नहीं निकलता...
शालीमार बाग जा पहुंचे, जहां पच्चीस साल पहले मैंने सिगरेट पी थी, और खांसते-खांसते मेरा बुरा हाल हो गया था। मैं और मेरा एक प्यारा दोस्त साइकिलों पर सवार होते और यूं ही बेमतलब शालीमार की ओर निकल पड़ते थे। दिल में कुछ इस तरह के दबी-दबी आशाएं हुआ करती थीं कि आज जरूर कोई हसीना मिलेगी, मेरी ओर मद-भरी नजरों से देखेगी, फिर हमारी दोस्ती हो जाएगी और जीवन में कोई उन्माद-भरी लहर आएगी। पर शाम तक हमारे सारे महल ढह जाते थे। सिवाय बेमतलब चक्कर लगाने के, फटी-फटी नजरों से चारों और देखने के, और सिगरेट फूंक-फूंककर जंटलमैनी दिखाने के और कुछ हाथ नहीं लगता था। हां, बारह मील साइकिल पर पैर मारने से भूख जरूर तेज हो जाती थी, जिसे शांत करने के लिए कभी ‘स्टिफल्ज’ और कभी ‘लॉरैंग’ जा पहुंचते थे। वहां पहुंचते-पहुंचते सोई हुई हसरतों के नाग फिर चौंक पड़ते थे। शायद रेस्तरां में ही कोई सुन्दरी प्रतीक्षा कर रही हो!
भविष्य का सूर्य अब अतीत के पहाड़ों के पीछे जा छुपा था। केवल धीरे-धीरे फीकी पड़ती जा रही यादों की लाली आकाश में रह गई थी। कर लिए रोमांस जितने करने थे; खेल लिए जितने खेल खेलने थे। अब तो वह जो किसी ने कहा है-
बागीचा-ए अतफाल है दुनिया मेरे आगे,
होता है शबो-रोज तमाशा मेरे आगे।
डॉक्टर नजीर अहमद ने मुझे मेरे ख्याल पर छोड़ दिया है। चाय मंगाते हैं। चुपचाप सरू के एक पेड़ के नीचे घास पर बैठकर चुस्की लेते हैं। शाम की खामोशी की आवाजे सुनते हैं। रह-रहकर बीती बातें फुलझडिय़ों की तरह छूट-छूट पड़ती हैं, जैसे आज यहां चिरागों का मेला लगा हो।.... आखिर प्यार हुआ भी तो था एक लडक़ी से, सारी उम्र एक उसी के नाम की ही माला जपी थी। उस मेहराबदार दरवाजे के दोनों ओर बने हुए छोटे-छोटे चबूतरों पर खड़े होकर हमने बारी-बारी से एक-दूसरे के फोटो खींचे थे... उसके सारे परिवार को शालीमार की पिकनिक के लिए किस तरह एड़ी से चोटी तक का जोर लगाकर प्रेरित करता था... कितने निवेदन... कितनी राजनीति... कितनी मिन्नतें...
पूरे जोश-खरोश से इसी दरवाज़े में से होकर कभी गांव के लोग चिरागों के मेले की रौनक देखने आते होंगे। वहां, उस जगह पर बादशाह बैठता होगा। तालाब के दोनों किनारों पर बनी बारहदरियों में से चिरागों और फव्वारों की झिलमिल में अपने जरी लिबासों को गलतान करते हुए गीतकार, नर्तक और नर्तकियां चलकर हुजूर के रूबरू पेश होते होंगे और अपनी कलाएं दिखाते होंगे...!
फिर मन में वही बेतुके विचार सिर उठाने लगे। लाहौर वाला शाहजहां वास्तव में पाकिस्तानी था, आगेरवाला शाहजहां हिन्दुस्तानी था... पर नहीं। बार-बार ऐसी कसक और टीसें नहीं उठने देना चाहिए। राजनीति के दांव-पेचों से मेरा क्या वास्ता? मैं एक मेहमान हूं, डॉक्टर नजीर भी पराए हैं। पर क्यों बार-बार उनसे पूछने को जी चाहता है, ‘नजीर साहब, आपकी और मेरी मुलाकात बहुत पुरानी नहीं। पिछले साल जब आप बम्बई आए थे तभी तो पहली बार आपसे मिला था। फिर आपके पास बैठकर मुझे इतना सुकून क्यों मिलता है, जो बम्बई में मेरे लिए नायाब है?’ अभी नहीं, पर पूछूंगा अवश्य। डॉक्टर नजीर निस्संदेह एक असाधारण व्यक्ति हैं। फिर बाहर आकर मोटर में बैठते समय एक अधेड़-सी भिखारन, उंगली पकड़े एक आठ वर्ष की बच्ची, का$फी मैले, फटे-पुराने कपड़े, हाथ फैलाकर गिड़़गिड़ाई, ‘‘भइया जीते रहो, कभी तत्ती हवा न लगे। अल्लाह तेरी मुरादें पूरी करे, इकबाल बढ़ाए, तेरे बच्चे जिएं...’’
यह कमबख्त आंखेंक्यों चू-चू पड़ती है। यह औरत मेरी क्या लगती है? यह पाकिस्तानी, मैं हिन्दुस्तानी...।
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1. दूध-मलाई और नाजों से पला है।
पुस्तक  पाकिस्तान का सफर से साभार