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Tuesday 21 Nov 2017

परिकथा सा सुन्दर, गंगाजल सा निर्मल : गोवा

वन्दना अवस्थी दुबे
मुख्तयार गंज. सतना, मप्र
मो. 9993912823
सो गोवा यात्रा सम्पन्न कर सतना लौट तो आई, लेकिन मन वहीं कहीं हरियाली के बीच छूट गया। इतना सुन्दर राज्य। हालांकि मुझे बताने की ज़रूरत नहीं है, सब जानते हैं, गोवा के बारे में। सतना से गोवा की ओर जाने पर मध्यप्रदेश की सीमा खंडवा से समाप्त हो जाती है, और समाप्त हो जाता है तमाम वृक्ष-विहीन इलाका। महाराषट्र राज्य के शुरु होते ही हरियाली भी शुरु हो जाती है। भुसावल में केले के बड़े-बड़े बगीचे, तो नासिक में अंगूर के बगीचे!!! नारियल के पेड़ तो हैं ही। पनवेल से ट्रेन गोवा की ओर मुखातिब हो जाती है, और शुरु होता है कोंकण का खूबसूरत हरा-भरा इलाका। पानी से लबालब भरी नदियां और फलों से लदे वृक्ष।
सडक़-मार्ग पर दोनों ओर आम, इमली और नीम जैसे बड़े वृक्ष मुसाफिऱों को भरपूर छाया देते हैं। पर्यावरण को प्रदूषित होने से तो बचाते ही हैं। क्या मध्यप्रदेश शासन सडक़-मार्ग को भी वृक्षों से आच्छादित नहीं कर सकता? ज़मीन इतनी बंजर पड़ी है कि देख के तकलीफ़ होती है। नियम तो हर जगह बने होते हैं लेकिन उनका पालन सख्ती से नहीं करवाया जाता  लोग डस्टबिन तक जाने की ज़हमत नहीं उठाते, लेकिन गोवा या पॉन्डिचेरी जैसी जगहों पर जाते हैं तो सभी नियमों का पालन करते हैं।
पिछले कई सालों से इस्मत (शेफ़ा कजगांववी) गोवा आने का आग्रह कर रही थीं और हम हर बार आने का आश्वासन दे रहे थे। लेकिन इस बार उन्होंने धमकाते हुए पूछा-  गोवा पहुंचने की तारीख बताओ हम डर गये। कहा- कल ही रिज़र्वेशन करवाते हैं और तुम्हें तारीख बताते हैं।
आनन-फानन रिज़र्वेशन हुआ और इस्मत को खबर की गई कि हम आठ मई को सतना से रवाना होंगे और दस मई को गोवा पहुंच जायेंगे। इस्मत, ज़हूर भाई, आश्ती और मुशीर सब प्रसन्न। यहां हम अपनी खरीदारी में व्यस्त हो गये। तैयारियां अपने शबाव पर थीं कि एक रात इस्मत का फोन आया- अत्यंत आवश्यक कार्यवश मुझे बाहर जाना पड़ रहा है, कम से कम एक महीने के लिये। खबर सुनते ही अपनी गोवा-यात्रा रद्द होने के शोक में हमारे चेहरे लटक गये। लेकिन उधर इस्मत और ज़हूर भाई दोनों का आग्रह था कि किसी प्रकार हमारा कार्यक्रम बना है, लिहाजा इसे रद्द न करें और नियत समय पर गोवा पहुंचे। खैर हमने उनके आग्रह का मान रखा और आठ मई को अपनी यात्रा पटना-वास्कोडिगामा सुपर फ़ास्ट ट्रेन से रात ग्यारह बजे शुरु की।
सतना से लेकर खंडवा तक केवल वीरान, सूखे जंगल और बंजर ज़मीन के दर्शन हुए। लेकिन भुसावल के बाद मन प्रसन्न हो गया। चारों ओर हरियाली का साम्राज्य। ट्रेन जब कोंकण क्षेत्र में पहुंची तब तो हम विस्मित हो गये। लगा इसे ही तो स्वर्ग कहते हैं!
पानी से लबालब भरी नदियां, नारियल, आम और भी कई तरह के वृक्षों से अटे पड़े जंगल!! केवल हरियाली और पानी। ऊंची-ऊंची पहाडिय़ां, घने पेड़ों से आच्छादित। दूर से हरे-हरे पहाड़ दिखाई दिखाई दे रहे थे, जैसे कोई चित्र देख रहे हों। दस मई की सुबह हमारी ट्रेन अपने निर्धारित समय से पहले ही गोवा के करमली स्टेशन पहुंच गई। इस स्टेशन पर बने बांस के खूबसूरत यात्री पैदल पुल को देख कर तो हम आश्चर्य में पड़ गये। पुल को पार कर के जब हम एक नम्बर प्लेटफ़ॉर्म पर पहुंचे तो तय नहीं कर पा रहे थे, कि हम स्टेशन पर हैं या किसी पार्क में? हमें तो कचरे से अटे, पान की पीक से रंगे स्टेशन की आदत है, सो कदम-कदम पर चकित हो रहे थे।
दस मिनट के अन्दर ही ज़हूर भाई हमें लेने स्टेशन पर आ गये। सामान गाड़ी में लादा और हम भी साथ में लद लिये। गाड़ी ओल्ड-गोवा से होती हुई पणजी में प्रविष्ठ हुई , जहां से हमारा घर दस मिनट की दूरी पर था, तभी हमें याद आया कि हम अपना पर्स, जिसमें पांच हज़ार रुपये, मेरे सारे एटीएम कार्ड्स, पैन-कार्ड, पत्रकार संघ का आई कार्ड, मतदाता पहचान-पत्र, घर की सारी चाबियां, पूरे लगेज की चाबियां साथ में वापसी के टिकट और मेरे सोने के दो कंगन थे, स्टेशन के बगीचे की फ़ेंस पर ही छोड़ आये हैं। ज़हूर भाई ने बिना कुछ कहे, गाड़ी मोड़ी और हम वापस स्टेशन चल दिये। हमारी गाड़ी ने जैसे ही स्टेशन में प्रवेश किया, हमारे उतरने के पहले ही, वहां टैक्सी स्टैंड पर खड़े टैक्सी ड्राइवर आवाज़ दे के कहने लगे, मैम आपका पर्स यहां छूट गया था, हमने अन्दर जमा करवा दिया है। दो-तीन टैक्सी-ड्राइवर हमारे साथ अन्दर गये, और स्टेशन मास्टर व्यंक्टेश को बताया कि हमारा ही पर्स उन्होंने जमा करवाया है, तब एक एप्लीकेशन लेने के बाद पर्स हमें दे दिया गया, हमने देखा, पूरा सामान ज्यों का त्यों था। विकी नाम के जिस टैक्सी ड्राइवर को पर्स मिला, उसने कहा कि- मैंने पहले पर्स खोल के देखा, कि यदि कोई फोन नम्बर मिल जाये तो हम खबर कर दें, लेकिन जब नम्बर नहीं मिला तो हमने जमा कर दिया। एक बार फिर हमारे चकित होने की बारी थी। यदि कोई और जगह होती तो क्या पर्स मिलता? छूटा हुआ रूमाल तो मिलता नहीं......नतमस्तक थी गोवावासियों की ईमानदारी पर। तो ये थी मेरी पहली मुलाकात गोवा से। इस पहली मुलाकात ने ही अभिभूत कर दिया।
दस तारीख को हम नहा-धो के ओल्ड-गोवा की सैर के लिये निकल पड़े। ओल्ड गोवा पुरानी इमारतों से समृद्ध इलाका है। यहां सेंट ज़ेवियर चर्च के नाम से मशहूर बेसिलिका ऑफ़ बॉम जीसस चर्च गये। यह कैथोलिक चर्च भारत में बारोक-वास्तुकला का सर्वोत्तम उदाहरण माना जाता है। बेसिलिका में सेंट फ्रान्सिस ज़ेवियर के पवित्र अवशेष रखे हैं जो गोवा के संरक्षक संत थे।
इसके बाद हम सेंट कैथेड्रल चर्च गये। यह एशिया का सबसे बड़ा गिरजाघर है, जिसे अलेग्ज़ेन्ड्रिया के सेंट कैथोरिन को समर्पित किया गया है, लिहाजा इसे सेंट कैथेरिन चर्च भी कहते हैं। चर्च में स्थित संग्रहालय तो इतना बड़ा है, कि हम चलते-चलते थक ही गये। इस चर्च के बाहर इतना सुन्दर लॉन और बगीचा है, कि हम थोड़ी देर वहां बैठने का लोभ संवरण नहीं कर सके। सेंट कैथेड्रल चर्च के पास ही वैक्स म्यूजय़िम है, जिसे लंदन के मैडम तुसाद संग्रहालय की तर्ज़ पर बनाया गया है। ओल्ड गोवा-दर्शन के बाद उसी दिन हमने पन्जिम-चर्च भी देखा। चर्च घूमने के बाद हमारे ड्राइवर की सलाह् पर हम मंगेशी मंदिर भी उसी दिन घूम आये। सुन्दर और साफ़-सुथरा मंदिर है ये।
अगले दिन हम गोवा के समुद्री तटों पर घूमने गये। सबसे पहले हम मीरामार बीच गये जो घर के पास ही है। उसके बाद मैज़ोर्डा बीच गये। इस बीच की खासियत है कि यहां की बालू सुनहरे-सफ़ेद रंग की है। ऊंची उठती लहरें, यहां-वहां घूमते सैलानी, विदेशी पर्यटक, स्थानीय जन, लेकिन कचरे का एक तिनका भी नहीं। बहुत सुन्दर बीच है ये। बाद में हमने कोल्वा, कालन्गुट, बागाटोर, बागा और अन्जुना बीच भी देखा। ये सभी बीच बेहद सुन्दर हैं। जिस तरह हमारे यहां पान की दुकानें हैं, उसी प्रकार गोवा में शराब की दुकानें हैं। खुले आम शराब बिकती है, लेकिन मज़े की बात ये कि कोई भी नशे में झूमता नहीं मिलता। एक बात और, अपने छोटे-छोटे मन्दिरों की तरह गोवा में हर बीस कदम पर एक छोटा सा चर्च मिल जायेगा, जहां सलीब स्थापित होता है, या जीसस की छोटी सी प्रतिमा। हमारे घरों में जैसे तुलसी-चौरे होते हैं, ठीक उसी तरह गोआ के हर घर के बाहर सलीब-चौरा मिल जायेगा। शाम को इन छोटे-छोटे चर्चों के बाहर लोग जमा होते हैं और मोमबत्तियां जला के प्रार्थना करते हैं। हम जब कालन्गुट बीच जा रहे थे तब रास्ते में हमने फ़ोर्ट अक्वादा भी देखा। कोल्वा बीच जाते हुए जब हमें रास्ते में कोल्वा गांव मिला तो उस गांव के घर देख के हम चकित थे। इतने शानदार और आधुनिक डिज़ाइन के घर! हमारे यहां तो इसे बंगला कहते हैं। गोवा में कहीं भी गरीबी दिखाई ही नहीं देती। दिल्ली या मुम्बई की तरह झुग्गियां तो बिल्कुल भी नहीं। गोआ की एक और खास पहचान है, वहां की मांडवी नदी। इस नदी के चौड़े पाट पर ढेर सारे छोटे-बड़े जहाजनुमा कैसिनो हैं, जो दिन-रात लाखों की कमाई करते रहते हैं। बड़े-बड़े क्रूज़ हैं, जो आपको सैर कराते हैं। चौदह मई को हमें गोआ से निकलना था, और तेरह मई को उमेश जी के हाथ में फ्रैक्चर हो गया, अन्जुना बीच पर। लेकिन यात्रा सुखद और यादगार रही। भविष्य में मौका मिला तो एक बार फिर ज़रूर जाना चाहूंगी गोवा के खूबसूरत समुद्री-तटों पर।