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Friday 24 Nov 2017

कोंकण के प्रवेश द्वार पर

विनोद साव
 मुक्तनगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़ -491001
मो. 9009884014
शहर की ऊंचाई-निचाई से हम दूर होते जा रहे थे पर शहर की चारों दिशाओं में हल्की, हरी नर्म सी पहाडिय़ां दिख रहीं थीं। सडक़ों की दोनों बाजुओं से निकल रही थीं वे तो पहाडिय़ां थीं ही, जो दूर से दूरतम और निकट से निकटतम होती जा रही थीं वे भी पहाडिय़ां थीं। सागर की तरह पहाड़ों का छोर भी अंतहीन हो उठता है और इन पहाड़-पहाडिय़ों के बीच में कहीं कोहरों का ढेर वैसे ही ऊपर उठ रहा होता है जैसे सागर में उछाल मारती हुई लहरें हों।
सूर्यास्त के समय लाल पीले होते सूरज की किरणें इन पहाडिय़ों को फोकस कर रहीं थीं जैसे लाइट एंड साउंड का कोई शो चल रहा हो। उसी में अपने सौंदर्य की झलक दिखलाती हुई चली जा रहीं थीं ये पहाडिय़ां निरंतर पीछे की ओर। हर पहाड़ी का अपना एक खास शो-आइटम था, जिन्हें दिखाने को वे आतुर थीं और अपनी बारी का इंतजार कर रही थीं। पास आते ही उनकी हरीतिमाओं के भीतर से किसी रोशनी युक्त दुर्लभ सौंदर्य का प्रस्फुटन होता और वे इसे पलक झपकते ही दिखला जाती थीं। हमें इसका भान ही नहीं हो पाता था कि हम जिस पहाड़ी को देख रहे होते थे थोड़ी देर बाद उस पहाड़ी पर बनी सडक़ पर द्रुतगति से भाग रहे होते थे। पहाड़ों की हर चुनौती को मनुष्य स्वीकार लेता है वे चाहे कितने ही दुर्गम हों आदमी वहां रास्ता निकालकर अपना मकान बना लेता है और घर बसा लेता है।
अँधेरे में पहाड़ गहन गंभीर लगते हैं। तपस्या में बैठे किसी साधु की तरह, समाधिस्थ हो जाने वाले साधक की तरह। उनकी नुकीली चोटियाँ ऋषि-मुनि की जटाजूट की तरह दिखाई देती हैं। इनमें कोई जूडामहामंडल लगते हैं और उनके मौनधारण की गहनता पूरे वातावरण में व्याप्त होती है। उनकी चोटियों के पीछे से झांकता हुआ चाँद राहगीरों का मार्ग प्रशस्त करते चलता है। वही उनकी रात्रिकालीन साधना का न केवल प्रत्यक्षदर्शी होता है बल्कि राहगीरों को उनकी साधना से साक्षात्कार भी करवा रहा होता है। चाँद के कई रूप हैं वह केवल रोमान के नहीं आध्यात्म की ऊंचाई तक भी ले जाता है जैसे भक्ति और आसक्ति के बीच बह रही धारा में वह खुद भी बह रहा हो।
हम भी बह रहे थे पिछले चार घंटे से ऐसी ही किसी धारा में श्रीवर्धन के मार्ग पर और इस नाम के अनुकूल हमारा निरंतर श्रीवर्धन हो रहा था। हम अँधेरे के सौंदर्य को भांप रहे थे जो उजाले के सौंदर्य से सर्वथा भिन्न था। बाहर अँधेरा था पर हमारे भीतर उजाला था। अँधेरे के साम्राज्य में हमारे मन का कोना आलोकमय था। यह किसी भी सौंदर्य का रचनात्मक उजला पक्ष है कि वह मन को किसी भी अँधेरे कोने में डूबने से बचा लेता है। फिर यह आगे नगर श्रीवर्धन था तो भला कोई श्रीहीन कैसे होता, किसी की श्रीहति कैसे होती!
कोंकण के अँधेरे में कोई पहाड़ी गांव बिजली की लट्टुओं से चमकता दिख जाता। शांत और महानगरीय चकाचौंध से निर्लिप्त गांव। कभी किसी घाटी पर तो कभी किसी टेकरी पर। अपने नन्हे चौराहों और गुमठियों पर, अपनी रोजमर्रा की जरूरतों की लेनदेन करते हुए। पहाड़ों के संघर्षमय और अभाव भरे जीवन में अपनी आवश्यक सामग्रियों को अनायास प्राप्त कर लेने का अपना सुख है। सुख की असली अनुभूति अभाव में ही होती है। भरापूरा संसार तो कई बार बजबजाती जिन्दगी को जीने जैसा लगता है। भौतिक संसाधनों के जंजाल में फंसा आदमी उस सूअर के समान हो जाता है जो कीचड़ में सुखों को खोजता रहता है और पा जाने पर उस दलदल को ही अपना सुखमय संसार मान बैठता है।
शिशिर अपनी फाक्सवैगन को वैसे ही ड्राइव कर रहा था जैसे वह अँधेरे में वाहन चालन कर लेने में सिद्ध हो। उसकी बगल में बैठा था मैं और मेरी गोद में अब सो गया था दो साल का रिधान। जिसे दिन भर डे-केयर में रखने के बाद उसे वहीं से उठाकर हम सब पुणे से दो सौ किलोमीटर दूर की इस रात्रिकालीन यात्रा में निकल पड़े थे कोंकण की पहाडिय़ों में बनी सडक़ों पर। सफेद गोरेपन से दमकता रिधान चाँद के बारे में कई सवाल करते हुए सो गया था। अब हमारे पास दो चाँद थे एक पहाडिय़ों में हमें रास्ता बताता चल रहा था और दूसरा मेरी गोद में सोते हुए अपने रास्ते तय कर रहा था। पीछे सीट पर बैठी चंद्रा और शैली- माँ बेटी दोनों बतिया-बतिया कर थक गई थीं और पीछे से उनकी आवाज आनी बंद हो गई थीं। शिशिर और उसकी फाक्सवेगन निरंतर गतिमान थे। अँधेरे में घाटियों और उसके उतारचढ़ाव में। वह एक जागृत यात्री था और जिसके चालन कौशल का हर पल साक्षी सहयात्री था मैं। उसने गेयर के पास अपने मोबाइल-इंटरनेट में पुणे से श्रीवर्धन तक सडक़ ट्रैकिंग के लिए ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम यानि जी.पी.एस. सेट करके रख दिया था। जिसमें कार के नीचे सरपट आगे से पीछे जाती हुई सडक़ का चित्र स्पष्ट था अपने हर मोड़ को दर्शाते हुए। वरना जंगल के इस घुप्प अँधेरे में भला कौन रास्ता बताता? नई पीढ़ी आगे बढऩे के लिए अपना अलग रास्ता खोज लेती है।
ऊपर पहाड़ी से नीचे चकाचौंध रोशनीयुक्त इलाका दिख रहा था। यह विले भगत एम.आई.डी.सी. (मुंबई इंडस्ट्रियल कारिडोर डेवलपमेंट कार्पोरेशन) कहलाता है। आज की विकासयात्रा में भूमि अधिग्रहण करने और निर्माण करवाने वाले बिल्डर्स का जबरदस्त हस्तक्षेप है। यह वही चकाचौंध थी जिसमें उद्योग, व्यवसाय लगाने, कृषि करने, रिहायशी प्लाट बेचने और आलीशान कालोनियों का निर्माण करने के लिए घोषित क्षेत्र है। रायगढ़ जिले के रोहा और महाद तालुका में स्थित हजारों एकड़ का यह विशाल परिक्षेत्र महाराष्ट्र शासन द्वारा आर्या बिल्डकान को आबंटित है। यह कंपनी भूमि व सम्पत्ति विकास के क्षेत्र में अपनी साख बना चुकी है। कंपनी द्वारा यहाँ राज्य का सबसे बड़ा स्टील प्लांट, पावर प्लांट लगाने की भी योजना है। इसके विकसित भू-खंड को रात की चकाचक रोशनी में भी देखा खरीदा जा सकता है। रात बारह बज रहे थे। श्रीवर्धन में देर हो जाने से पता नहीं खाना मिले या ना मिले हमने विले भगत एम.आई.डी.सी. के मेनगेट के सामने एक रेस्तरां में खाना खा लिया था।
जी.पी.एस.पूरे रेसॉर्ट तक का रास्ता दर्शा रहा था। हम गेट के सामने खड़े हो गए थे। गेट बंद था। शिशिर ने मोबाइल लगाकर उसके सहायक को सूचना दे दी थी। थोड़ी देर में गेट खुल गया और हम भीतर आ गए थे। रेसॉर्ट में ग्रामीण वातारण था। इसका नाम भी गांव की लडक़ी के समान ‘सांवली’ था, सांवली रेसॉर्ट। मालिक कोई मराठी मुसलमान था और उसका सहायक हिंदू। धोती को लूंगी की तरह लपेट कर उसने सफेद बंडी पहन रखी थी और उसके हावभाव में ग्राम्यपन था। उसने मराठी ढंग की हिंदी में बताया कि ‘दूध वाला सबेरे सात बजे आएगा तो चाय काफी मिलेगा। नाश्ते में पोहा मिलेगा।’ जब कमरे में प्रवेश किया तो लगा कि गांव के घर का कोई कमरा हो, मटमैले रंग का मानो छूही-चूने से पोता गया हो। बिस्तर के चादरों का रंग भी कुछ गांव की पसंद का था। कमरे में समुद्र की नमी से भरी गर्मी थी जो वातानुकूलन से ठंडा हो गया था।
जब हम सबेरे उठकर कमरे से बाहर चाय पी रहे थे तब ऐसा लगा जैसे हम गांव के घर के आंगन में बैठकर चाय पी रहे हैं। यह खपरैलों वाला रेसॉर्ट था जमींदारों के मकानों जैसा बड़ा। हर कमरे के दरवाजे खिड़कियों का आकार गांव के घरों जैसा था। आंगन से लगी बारी-बखरी थी जिसमें सुपारी, आम, केले और नारियल के पेड़ थे। इनमें पानी पलोने के लिए कुआँ था जिससे मिट्टी में खुदी नालियों के द्वारा पानी पहुँचता था। कई किसम के फूल पत्तों वाले पौधे थे उनके बीच घूमते समय हमारे भीतर भी ग्रामीण सहजता आ गई थी। रिधान के लिए यह एक सुन्दर कुंज था और वह इसमें दौड़ लगाने लगा। मैं उसके पीछे भाग रहा था। दो पेड़ों के बीच में जालीनुमा झूले को बांध दिया गया था जिसमें हम नाना और नाती झूलने लगे थे।
श्रीवर्धन महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले का तालुका है। पैंतालीस किलोमीटर दूर मझगांव इसका रेलवे स्टेशन है। फिलहाल एक कस्बा है पर अपनी समृद्ध पृष्ठभूमि में यह पेशवाओं का बसाया नगर है। बालाजी विश्वनाथ यहाँ के देशमुख थे जिन्हें शिवाजी के पोते छत्रपति शाहू ने मराठा साम्राज्य का पहला पेशवा नियुक्त कर पेशवा युग की शुरुआत कर दी थी। आगे चलकर इनके बेटे बाजीराव पेशवा ने पुणे में रहकर अनेक युद्धों में विजय प्राप्त की और अपने शौर्य व प्रेमगाथा का एक अलग इतिहास रचा जिस पर ‘बाजीराव मस्तानी’ नाम से एक सफल फिल्म बनी है।
सांवली रेसॉर्ट के बाहर का दृश्य हम देखते रह गए थे। पहली बार किसी नगर की ऐसी सडक़ों को देख रहे थे जिनकी दोनों ओर केवल हरियाली थी। हरियाली का कोर्टयार्ड जो चालीस-पचास फुटों तक ऊँचा हो। ‘बेटल नट’ यानि सुपारी के पेड़ों से बने कोर्टयार्ड ने सडक़ों की शोभा बढ़ा दी है। हर मकान हरियाली की झुरपुट में था। मकानों को सुपारी, नारियल, केले और आम के वृक्षों ने हरेपन की गमगमाहट से भर दिया था। इस हरियाली के आगोश में कोंकणी के निराले लाल कवेलू वाले मकान और उनकी दीवारें गुम हो गई थीं। लगता था जैसे यहाँ इन्सान का नहीं हरीतिमा का बसेरा हो। फिर हरे चंदोवा के नीचे सबका बसेरा। वृक्षों, तनों और उनके पत्तों के बीच उपजे बेलबूटों ने हरे रंग की छतरी, मंडप और वितानों की झाँई सी सुंदरता तान दी है मानो किसी शामियाने वाले से कहकर इन्हें एक समान सजवाया गया हो। इसकी घुमावदार सडक़ों में भिन्न रूपाकार के बरगदों की छाया लोगों के लिए विश्रामस्थली बन गई हैं। चौराहों पर चारों दिशाओं से आकर हरी-भरी सडक़ें मिलती थीं। चौराहे पर समुद्र का रास्ता एक बैलगाड़ी वाले से पूछा तब उसने कहा कि ‘जहां ये वाडी खतम होगी वहाँ से समुन्दर दिखेगा।’ उसने वाडी कहा था। ये हरेभरे कोर्टयार्ड जिन्हें हमारी छत्तीसगढ़ी में ‘बारी’ कहते हैं वह कोंकणी में ‘वाडी’ है। इन वाडियो के भीतर से ठंडी हवा की फुरेरी सडक़ों तक आ रही थी। शायद यह पीछे छिपे समुद्र का काम हो।
यह एक पेनिनसुला था यानि प्रायद्वीप- जिसके तीन ओर सागर और एक ओर धरती होती है। हमारी स्थिति भी इस प्रायद्वीप जैसी थी, धरती के बदले में यहाँ अर्धांगिनी के साथ मैं था और हम तीन ओर से घिरे हुए थे-बेटी, दामाद और नाती से। शैली, शिशिर और रिधान को हम उसी तरह देख रहे थे जैसे धरती देखती होगी बार बार समुद्र की लहरों को अपनी ओर आते और अठखेलियाँ करती हुई। जननी से जने संतानों की संख्या चाहे जितनी भी हो, चाहे वे कितने भी बड़े, योग्य और क्षमतावान हो जाएँ पर जननी के सामने वे नतमस्तक हो जाते हैं। यहाँ धरती से चार गुना बड़े जलसागर की असीम शक्ति और उसकी गर्जना के क्या कहने। एकबारगी तो ऐसा लगता है कि इसके विशाल जबड़े निगल जाएँगे धरती को। सब कुछ हो जाएगा तहस-नहस, पर धरती के आंचल को छू छू कर उसकी लहरें भी टूट फूट और बिखर सी जाती हैं समुद्र का सामथ्र्य भी विनयी होकर लोटमलोट हो जाता है। आखिर उसकी अतल गहराइयों के भीतर रहकर धरती ने ही थामे रक्खा है इस विशाल सागर और उसके सामथ्र्य को।
कभी कभी सामथ्र्यवान भी कितना बौना लगता है। मम्मी-पापा की गोद से छलांग लगाकर दो साल की एक बच्ची समुद्र की ओर भागे जा रही है। गिर जाती है लहरों के थपेड़े से, पर फिर उठकर वह किलक उठती है। अपनी हथेलियाँ उठाये हुए फिर से गर्जना करती लहरों की ओर भाग पड़ती है मानो पकड़ लेगी अपनी नन्ही हथेलियों में उन विकराल लहरों को। समुद्र की लहरों से जा टकराने की उसकी कोशिश जितनी बड़ी चुनौती उस बच्ची के लिए है उससे कहीं ज्यादा बड़ी चुनौती तो उस महासागर के लिए है, जो कैसे उस बच्ची के उत्साह का दमन कर उसे अपनी ओर आने से रोक सके। यदि सामने वाले को किसी अहंकारी के अहंकार का अहसास न हो तो अहंकारी का अहंकार धरा का धरा रह जाता है।
पर यहाँ अहंकार कम है क्योंकि यह श्रीवर्धन है। श्रीवर्धन का समुद्र जो किसी की श्रीहति नहीं करता। बड़े छोटे हर किसी का मान रख लेता है। सामने इसकी नगरपालिका की तख्ती लगी हुई है ‘श्रीवर्धन नगरपालिका पर्यटकांचे स्वागत करे आहे।’ साथ ही यह निर्देश भी ‘दिस एरिया इज अंडर सी सी टी वी सर्विलेंस’ समुद्र से भी बड़े आतंकी इन्सान हो गए हैं जिनकी बदनियती पर कैमरे की नजर जरूरी हो गई है।
हमने पहली बार समुद्र के सामने सीढ़ीदार गैलरी देखी थी। यहाँ इत्मीनान से बैठकर समुद्री सुंदरता को घंटों निहारा जा सकता है। डूबते हुए सूरज को देखा जा सकता है। समुद्र के अंदर घुसी पहाडिय़ों के बीच अस्ताचल का नजारा कुछ और होता है। यहाँ सूर्यास्त के समय लगभग आठ बज जाते हैं तब भी अँधेरे में जनसमुद्र समुद्र की लहरों के साथ खेलते रहता है।
पंद्रहवीं सदी में श्रीवर्धन एक जाना माना बंदरगाह था। वास्कोडिगामा के बेटे के साथ आए भारत में पुर्तगाली वायसराय जोओ-दे-कास्त्रो ने इसका वर्णन करते हुए कहा था कि ‘इसके तट पर इसका ज्वार भले ही कम दिखाई देता है पर इसके भीतरी जल में विशाल और बड़े ज्वार उठते हैं।’ लगभग तीन किलोमीटर के फैलाव वाला यहाँ समतल समुद्रतट है जो विशाल चौकोन चटाई की तरह बिछा दिखता है। यहाँ पसरी हुई रेत का रंग कुछ काला है इसलिए यह काला सागर भी है। घुटने तक लहरों में खड़े मेरे और चंद्रा के बीच हमारी बांहों में रिधान है जिसकी शिशिर ने तस्वीर ले ली थी। यह आज फेसबुक में हमारी वाल पर है। यह कुछ ऐसा आत्मीय चित्र बन पड़ा है कि लगता है इसके कारण भी मुझे फ्रेंड रिक्वेस्ट कुछ ज्यादा ही आ रहे हैं।
तट पर कुछ बग्घियाँ दौड़ रही थीं। रिधान के लायक मनोरंजन दिख गया था। सामने घोड़ा-गाड़ी आ खड़ी हुई थी। घोड़े वाले ने पूछा ‘चलेंगे भैया। खाली पचास दे देना।’ लोहे पट्टी की आकर्षक बग्घी थी। हम सभी बैठ गए थे। वह एक किलोमीटर की दूरी घुमाकर हमें ले आया था। हमारे देश में इन्सान और जानवर दोनों के श्रम का मोल कितना कम है। ये अगर थाईलैंड होता तो पचास के बदले में पांच सौ लेता। दो महीने पहले वहाँ गए थे तब हजार-दो हजार से नीचे में कुछ भी नहीं होता था।
सांवली रेसॉर्ट के सामने गुमठी थी। खाने पीने के सामान वहाँ कम थे पर जो पोहा, आमलेट का नाश्ता या चाय-काफी, भोजन मिल जाता था वह घर जैसा लगता था। गुमठी भी आखिर किसी का घर ही तो है। वहाँ एक नौजवान का परिवार था और बूढ़ी माँ थी। जब हम वहाँ खाते थे तब उनके बच्चे वहाँ खेलते रहते थे। उनकी पोसी हुई बिल्ली हमारे पैरों से सटकर बैठी होती थी। आंगन में अलफान्जो आम का पेड़ था जिसकी किस्मत में होता उसके सिर पर गिर जाता था। जब सबेरे हम चाय पीते तब वहाँ की बूढ़ी औरत हमें दोपहर या रात के खाने के लिए पूछ लेती थी कि हम क्या खायेंगे। उसने अधिकारपूर्वक कहा था कि ‘आज रात मैं तुमको भाखरी मछली खिलाउंगी।’ मैंने पूछा ‘ये क्या होता है?’ महाराष्ट्र में बड़ा हो या छोटा उसे ‘आप’ के बदले में ‘तुम’ कहते हैं। तब उसने जवाब दिया था ‘भाखरी यानि चावल की पतली रोटी और उसके साथ सुरमई मछली का झोल।’ जाहिर है यहाँ की ‘भाखरी’ गुजरात की भाखरी के दानों से भिन्न थी। रात में हम सबने इसका जायका लिया था। सुरमई मछली को मछलियों की रानी कहा जाता है। पता नहीं यह विशेषण रूप परक है या स्वाद परक पर उसका भक्षण करके एक सामंत का अंत करने का श्रेय तो ले ही लेते हैं। समुद्र किनारे गांवों में आओ और जमकर मछली खाओ। दिवेआगर जाते समय भी हमने एक और मछली खाई थी वह थी ‘पाम्फ्लेट’। हथेली के आकार की तारों के समान दिखने और चमकने वाली महँगी मछली. इसे तलकर साबूत परोसा गया था।
यह ‘पश्चिमी घाट’ (वेस्टर्न घाट) है - कच्छ से कन्याकुमारी तक सोलह सौ किलोमीटर घुमावदार पहाडिय़ों से भरा समुद्रमार्गीय है। कोंकण तट , भारत के पश्चिमी तट का पर्वतीय अनुभाग है। यह सात सौ बीस कि.मी लंबा समुद्र तट है। कोंकण में महाराष्ट्र और गोवा के तटीय जिले आते हैं। यह ढालवनों से आच्छादित है। बारिश बहुत होती है इसलिए कोई बड़ी नदी न होने के बाद भी यह क्षेत्र उपजाऊ है। इसी में मुंबई से गोवा के बीच बिछी रेल लाइन को भारतीय रेलवे इसे अपना सबसे सबसे सुहावना रेल लाइन बताकर प्रचारित करता है। इसका हरियाली भरा मार्ग झरनों, बोगदों और ढाल वनों से भरा हुआ है। इसी में कोंकण का आंचलिक मिजाज बसा है, इसकी बोली में मराठी का तडक़ा है अपनी विलक्षण नैसर्गिकता और लोकतत्वों को समेटे हुए। हम उसी कोंकण के प्रवेश क्षेत्र में घूम रहे थे जहां है श्रीवर्धन-हरिहरेश्वर-दिवेआगर की यह त्रयी जो एक दूसरे की पड़ोस में बसे कस्बे हैं। यहां गाँवों के किनारे बसे समुद्र में महानगरीय आतंक नहीं है। इसके कोमल तट अनछुए लगते हैं। इसकी गर्जना का अपना अलग संगीत है जैसे किसी लोकवाद्य का झंझनाता स्वर हो। यह संगीत इसकी पूरी फिजा में घुला हुआ है क्योंकि यहाँ हर रास्ता समुद्र की ओर जाता है। रास्ते के हर गांव के पास अपना अलग समुद्र है।
इस पूंजीवादी समय में धंधेबाजों ने समुद्र को भी खरीद लिया है। कुछ दूर तक घेरा लगा दिया है और एक प्रवेशद्वार बनाकर ये तख्ती टांग दी है कि ‘यहाँ प्रवेश वर्जित- यह प्राइवेट प्रापर्टी है।’ ये प्रतिबंधित क्षेत्र धन्नासेठों द्वारा बनाए गए ऐशगाह हैं जहां शासन और प्रशासन में बैठे लोगों की भागीदारी है। यहाँ इनके साथ ठेकेदारों की फिक्सिंग और सेटिंग होती है। जो उद्यमी समुद्र को अपनी निजी मिल्कियत मानता है क्या उसकी शक्ति भी असीम है? क्या सत्ता के गलियारों में उसकी गर्जना समुद्र से अधिक भयावह है? उसकी आकांक्षाओं की ज्वालामयी लहरें क्या हमारी जरूरतों और मान्यताओं को निगल नहीं जाएँगी?
हरिहरेश्वर एक तीर्थ स्थान है। हम उस तख्ती के पास पहुँच गए थे जिस पर लिखा था ‘हरिहरेश्वर बीच रेसॉर्ट’। समुद्र किनारे उसका पार्किंग स्थल है। हमसे पार्किंग के चालीस रूपये लिए गए, बसों के लिए दो सौ है जबकि पार्किंग केवल चार घंटे के लिए है। मालिक ने तख्ती लगा रखी है ‘प्राइवेट प्रापर्टी- पार्किंग एट ओनर्स रिस्क’। ये है आज की ठेकेदारी जिसमें वह वाहन रखने का भारी शुल्क लेता है पर वाहन के गुम हो जाने या किसी क्षति हो जाने का जिम्मा नहीं लेता है।’ और उसकी ये शर्तें ‘सक्षम अधिकारी द्वारा स्वीकृत हैं’ यह भी लिखा है।
इस मलाल को दूर करने के लिए हमने खोवा का सहारा लिया जहां बेचने वाला इसे मावा कहता है। चावल और दूध के बने सारे व्यंजन मुझे अच्छे लगते हैं। सामने दीवार पर लिखा है ‘मंदिरात दर्शना करिता इथून जावे’ मंदिर के रास्ते पर खोवे की मादक गंध की गमगमाहट है। खाने की चीजें अगर देखने, सूंघने और स्वाद में अच्छी लगे तो समझो माल चोखा है। एक-एक पाव के पैकेट बने हैं खोवे के लोंदों के फकत पच्चीस पचीस रूपयों के। उन्हें केवल गोल और चौकोन काटा गया है। ज्यादा औंटाकर कुछ का रंग भूरा काला किया गया है। घी की तरावट है.. यह सब भूख बढ़ाने वाली थी फिर दोपहर के दो बज रहे थे। भूखे भजन न होए गोपाला। वाह ! हमने इसे उदरस्थ करने के लिए तत्काल भगवद दर्शन किए और बाहर आ गए। दो साल के रिधान ने हम सब की बांहों का सहारा लेकर खूब घंटा बजाया था। इस्लाम में कहते हैं कि बच्चे की नमाज जल्दी कुबूल होती है। अगर अल्लाह और ईश्वर एक हैं तो शायद यहाँ भी ऐसा कुछ हुआ होगा।
आजकल मंदिरों में अपने ग्रह-नक्षत्र सुधरवाने की होड़ लगी रहती है। उसके काउंटर बन गए हैं। मेरे ग्रह नक्षत्र अभी बिगड़े नहीं हैं। प्रकृति दर्शन ही मेरे लिए ईश्वर दर्शन के समान है। नदी, पहाड़, जंगल समुद्र और उन्हीं में मनुष्य की जिजीविषा देख कर ही ये मन मगनमय होते रहता है। दिवेआगर श्रीवर्धन से पन्द्रह किलोमीटर दूर है। यह पूरी दूरी अपने में एक लंबी मैरिन ड्राइव है। दोपहर की चढ़ी हुई तेज धूप है। बिना हरियाली और रेत के बल्कि चट्टानी। न गांव न शहर, निर्जन और सन्नाटे से युक्त हरहराते अंतहीन समुद्र को देखना कितना रोमांचकारी है। यहाँ लहरों की चपेट में आने से चट्टानों से टकराने का खतरा है फिर भी हम लोगों ने एक स्थान पर रुककर और लहरों से यथेष्ट दूरी बनाकर तस्वीरें उतार ली थी। इस सन्नाटे में एक मजार भी दिखा था। आसपास बसे मछुवारों के गांव हैं। इनकी भीड़ उमड़ पड़ी है समुद्र के अलग अलग किनारों पर, जैसे वे मेले देखने पैदल चले जाते हैं वैसे ही समुद्र के पास आ जाते हैं। पत्नी, बच्चों, मित्रों, रिश्तेदारों के साथ। अपने-अपने समुदाय के साथ- यहीं बनाते खाते हैं और देशी खेलकूद करते हैं। ऐसे कितने ही समूह दिवेआगर की तटों पर आड़ोलित होते हैं लहरों की तरह। आरवी, शेखाड़ी, वाल्वती जैसे सुन्दर नामों वाले कितने ही तट हैं। एक तट पर भारी कलिंदर को देख बेचने वाले से भाव पूछता हूं। वह कहता है ‘तीन सौ पचास’। मैंने पूछा ‘इतना ज्यादा कैसे?’ वह कहता है कि ‘यह दस किलो का है.. पैंतीस रूपये किलो है।’ इतने भारी कलिंदर को उठाने से अच्छा उसका रस पी लेना है और हमने वही किया।
दिवेआगर विरल आबादी का एक शांत और साफ सुथरा गांव है जिसका तालुका श्रीवर्धन है। यहाँ मछली पकडऩे बेचने के कई केन्द्र हैं। लोग नारियल और सुपारी पेड़ों की खेती करने में संलग्न हैं। कोंकणी बस्तियां हैं जिनके मकान ऐसे दिखते हैं जैसे बच्चों के हाथ से बनाए गए खिलौने हों जिनमें अनगढ़ का सौंदर्य होता है। गांव की गलियां शोर व प्रदूषणमुक्त हैं। चलने फिरने वाले भी कम दिखाई देते हैं। यहाँ रेस्तराँ का मालिक कहता है ‘भोजन थाली लगाते तक आप लोग पास ही स्वर्ण गणपति हैं, उनके दर्शन कर आइये।’ महाराष्ट्र के मंदिर भव्य नहीं होते, छोटे पर कलात्मक होते हैं। यह लाल ईंट के रंग का सुन्दर मंदिर है पर भीतर मूर्ति सोने की नहीं है। मंदिर के एक स्वयंसेवी ने बताया कि ‘डेढ़ किलो सोने की मूर्ति थी जो चार साल पहले चोरी हो गई। पुलिस द्वारा चोर पकड़ लिया गया पर मूर्ति बरामद नहीं हो सकी हाथ आया केवल पिघला हुआ सोना।’ अब जब तक सोने की दूसरी मूर्ति नहीं लग जाती है तब तक के लिए यहाँ चांदी की मूर्ति की स्थापना कर दी गई है पर कहा जाता है इसे अब भी स्वर्ण गणपति।’ हम वापस आकर रेस्तराँ में कोंकण शैली का सुस्वादु भोजन पाकर कोंकण के इस प्रवेश द्वार से लौट रहे थे तब सावित्री नदी अरब सागर की ओर जा रही थी।