Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

बहुत कुछ कहती है घाटी चिनारों की

उर्मिला शुक्ल
ए-21, स्टील सिटी,
अवंति विहार, रायपुर (छ.ग.)
मो. 098932-94248

मरकर स्वर्ग जाने की तमन्ना तो कभी थी नहीं, मगर जीते जी स्वर्ग जाने की इच्छा तब से थी, जब से मन ने सौन्दर्यबोध को जाना। बार-बार मन होता कि धरती के उस स्वर्ग को देखा जाय, जिसे अब तक मैनें सिर्फ  फिल्मों में ही देखा था और उसके सपने बुने थे। और कहते हैं न जहाँ चाह होती है, वहाँ राह भी मिलती है मुझे भी राह मिल गयी । अवसर था हिन्दी भाषा संगम इलाहाबाद और कश्मीरी भाषा संगम की संगोष्ठी का। यह संगोष्ठी भारतीय संत परम्परा पर केन्द्रित थी। जम्मू पहुंचकर श्रीनगर की उड़ान भरी। एक नवीन और अनुपम सौन्दर्य मेरी आँखों में उतरने लगा था।
    हमारे रुकने की व्यवस्था, हमारी सुरक्षा के दृष्टिकोण से राजभवन के पास एक अतिथि गृह में की गयी थी। संगोष्ठी स्थल तो सुरक्षा के घेरे में था। मगर शहर में लगातार घटनायें हो रही थीं। लाल चौक में किसी दिन एक, तो किसी दिन एक से अधिक लोगों के मारे जाने की खबरें आ ही जाती थीं। इसी दिन निशांत बाग में जुबिन मेहता का कार्यक्रम था, जिसके विरोध का स्वर भी उठ रहा था, अजीब सा माहौल था एक ओर तो हम सब साहित्य और मानवता की बातें कर रहे थे और दूसरी ओर मनुष्यों की हत्या हो रही थी।
    अगले दिन सुबह-सुबह पहलगाम जाने का कार्यक्रम था, मगर निकलते-निकलते बारह बज गये थे। श्रीनगर से कुछ आगे बढ़ते ही पहाड़ पीछे छूट चले थे। धान के बड़े-बड़े खेत नजर आ रहे थे, मक्के के खेत भी थे। कहीं-कहीं खाली जमीन भी नजर आ रही थी । बस चालक मोहम्मद आरिफ ने बताया कि ये केसर के खेत हैं, मौसम में यहाँ केसर की खेती होती है। फिर कुछ आगे जाकर मक्के और धान के खेत पीछे छूट चले और हिमालय की ऊँची-ऊँची चोटियाँ फिर पास आने लगीं। मगर हम सब की चाहत थी, सेब का बगीचा। यह सेब का मौसम भी था। मोहम्मद आरिफ  ने बताया था कि पहलगाम के रास्ते में सेब के असंख्य बगीचे मिलेंगे, हमें उसी का इंतजार था और फिर सेब के पेड़ नजर आने लगे। जी भरकर सेब खाकर हमारा काफिला आगे बढ़ चला। अब हमारी बस अखरोट और अंजीर के जंगल से गुजर रही थी। सडक़ के किनारे-किनारे अखरोट के पेड़ और उसमें फले हुए हरे-हरे अखरोट। पहले अखरोट और अंजीर के जंगल, फिर उससे ऊपर चीड़ के और सबसे ऊपर देवदार के जंगल। हम जैसे-जैसे ऊँचाइयों पर जा रहे थे, देवदार के वन और सघन हो रहे थे।
    पहलगाम। हिमालय की ऊँची-ऊँची चोटियों से घिरा लिद्दर नदी के संग बहता सुन्दर शहर। हमारे पहुँचते ही घोड़े वालों के हुजूम ने हमें आ घेरा। हर कोई चाह रहा था कि सवारियाँ उसके साथ चलें। सभी मिनी स्विट्जरलैंड दिखाने की बात कर रहे थे, मगर वहाँ का किराया अधिक था। हमारे पास समय भी कम था सिर्फ  आधे घंटे, सो अधिकांश लोगों ने नीचे नीलकंठ मंदिर और लिद्दर के किनारे घूमने का फैसला किया। मगर मैंने और नलिनी जी ने उस मिनी स्विट्जरलैंड को देखने का फैसला किया। हमने घोड़े ले लिये। हमें लगा था कि हमारे साथ दो घोड़े वाले चलेंगे, मगर एक ही व्यक्ति दोनों घोड़ों को नियंत्रित कर रहा था। हमें डर लगा और हमने माँग की कि वो किसी और को भी अपने साथ ले ले । मैडम जी आप डरो नई। ये अमारा रोज का काम है। आप घोड़े को नइ, नजारा देखो, तो डर नइ लगेगा। और मैंने देखा कि मेरे दोनों ओर अपार सौन्दर्य बिखरा पड़ा था और मैं अपने भय में ही डूबी थी। अब मैंने उसकी बात मान ली थी। अब हम और ऊपर की ओर बढ़ रहे थे और अब रास्ता बहुत ही संकरा हो चला था। इतना कि उधर से लौटती सवारियाँ सामने आतीं, तो लगता कि अब घोड़े जरुर टकरा जायेंगे। मगर घोड़े वाले के टूह-टूह कहते ही घोड़े सधी चाल से, जरा हट कर राह बदल कर आगे बढ़ जाते। मैंने घोड़े वाले से पूछा कि ऐसे आमने-सामने आ जाने पर ये आपस में लड़ते नहीं हैं। नई मेडम जी। ये इंसान थोड़े न हैं। और उसकी बात मन में गहरे तक उतर गयी थी। कुछ देर बाद हम मिनी स्विट्जरलैंड में थे। उसने घोड़े को रोका और हमें बड़ी सहजता से उतारा। हमारे नजरों की सीमा तक चारों ओर आकाश छूती चोटियाँ थीं, देवदार के जंगल थे और बीच में था हरा भरा घास का मैदान। ऊपरी चोटियों की बर्फ  पिघल चुकी थी, मगर उनके बीच-बीच में अटके बादल बर्फ  का आभास दे रहे थे। लौटकर हम बस स्टैण्ड पर आए, जहां हमारी बसें पार्क थीं।  यहाँ से हमें मटन जाना था। नाम सुनकर अजीब लगा। पूछा भी मगर कोई इस नाम का कारण नहीं बता पाया। अब रास्ते के दोनों ओर गहरा अंधेरा था। बीच-बीच में छोटे -छोटे गाँव आते, तो रोशनी की झलक सी मिलती। मटन आते-आते सात बज चुके थे। मंदिर परिसर में प्रवेश करते हुए एक जलकुंड नजर आया, वहाँ हाथ-पैर धोकर हम आगे बढ़े, तो आगे दूसरा कुंड था। यह पहले कुंड से कुछ बड़ा था। और आगे बढऩे पर एक और कुंड था, जो चारों ओर दीवारों से घिरा था, और दीवार पर लिखा था - यहाँ अपने पितरों का श्राद्ध करें। कुछ सीढिय़ों के पार ऊँचाई पर सूर्य मंदिर था। श्वेत घोड़ों से जुता रथ, हमें नीचे से ही नजर आ रहा था। यानि मार्तण्ड मंदिर और मन में मटन का अर्थ खुलने लगा। मार्तण्ड से मतंड और फिर होते होते मटन हुआ होगा। भाषा विज्ञान इसे ही मुख सुख कहता है। मंदिर से होकर हम गुरूद्वारे पहुँचे। उस समय वहाँ लंगर में चाय और मठरी मिल रही थी। अब तक सभी को चाय की तलब भी हो आयी थी, सो चाय और मठरी का आस्वाद लेकर हम फिर चल पड़े श्रीनगर की ओर। अगले दिन फिर नाश्ते के बाद हमें गुलमर्ग और फिर बाबा ऋषि जाना था। लगभग तीन बजे हम गुलमर्ग पहुँचे। हम आज फिर घोड़े वालों से घिरे थे। मगर एक घंटे में पैदल जाकर घूमना संभव नहीं था सो घोड़े लिये। आज हम सभी घोड़े पर थे, नलिनी जी, विद्या बिन्दुजी, और मैं।  पक्की सडक़ पर घोड़ों की टाप एक अलग सा समा बाँध रही थी। हमें एक स्थान पर उतरना था, जहाँ से घाटी की सुन्दरता देखी जा सकती थी। मगर हममें से कोई नहीं उतरता। आगे चलकर मंकी हिल आया, जहाँ घने जंगल के बीच बने कॉटेज बहुत सुन्दर लग रहे थे। मैंने अपने घोड़े वाले से पूछा - इसे मंकी हिल क्यों कहते हैं? क्या यहां बहुत बन्दर हैं? नइ मेेमसाब । जिन्दा बन्दर तो नइ है। पर वो देखो उधर, और उसने जंगल की तरफ  इशारा किया- इसीलिए इसे मंकी हिल कहते हैं। और मेरी नजरों ने उस इशारे का पीछा किया, तो देवदारों के जंगल से नीचे एक चट्टान थी जिसका आकार बंदर जैसा था। ऐसा लग रहा था मानो कोई बंदर बैठकर इत्मीनान से नीचे का दृश्य निहार रहा हो। लौटते समय मैंने घोड़े वाले से सवाल किया-  इसका नाम तो गुलमर्ग है, मगर गुल का तो यहां नामोनिशान नहीं है? गुल होता है मेमसाब। जून-जुलाई में खूब होता। ये सारा मैदान गुल से भरा रहता है - उसने सडक़ के किनारे निचले हिस्से की ओर इशारा किया। मैंने देखा सड़क़ के दोनों ओर खाली और उजाड़ सी जगह थी। लग ही नहीं रहा था कि वहां फूल भी खिलते होंगे। मगर खिल भी सकते हैं, फूलों की घाटी की तरह।
अब हम एक ऊँचे टीले पर चढ़ रहे थे। अपने आप को साधे, पीछे की ओर तने हुए। टीले पर बहुत सी हरी हरी घास उगी थी और कई घोड़े चर रहे थे। मेरा घोड़ा बादल भी घास चरने की इच्छा से रूका, मगर घोड़े वाले ने टूह टूह कहकर एक छड़ी मारी और वह अपनी राह पर चल पड़ा। मैंने नबी से कहा- थोड़ी देर चर लेने दो बेचारे को। मेमसाहब अभी घास चरेगा तो क्या कमाई करेगा।
    कितनी कमायी हो जाती है? - मैंने नबी से पूछा।
    सीजन में तो एक दिन में दो-तीन हजार कमाता।
    बस।
    इदर बहुत घोड़े वाले हैं मेमसाब। बहुत मशक्कत करने के बाद सवारी मिलती है।
    अब तो लोग इधर आते भी कम हैं न। - कहकर मैंने उसे देखा। उसके चेहरे पर उदासी सी आ गयी थी। फिर एक आक्रोश की लहर सी उठी और ..।
    मेमसाब सब पालिटिक्स है। ये नेता लोग का खेल है। इनके कारण से अम परेशान होता। आपको मालूम हय, इदर जब भी सांति होता, ये इंडिया वाले फिर से गदर करवा देते हैं। गदर करने वाले इनके अपने लोग हैं मेमसाब। इनको तो अपना फायदा चाहिये। बस। कहते हुए वह कुछ देर को उत्तेजित हो उठा था और मेरे कानों में एक वाक्य अटक गया -वो इंडिया वाले ..
    कल भी जब हम पहलगाम पहुॅँचे थे, तब घोड़े वाले आपस में बातें कर रहे थे - इंडियन सवारी हैं। यानि इंडिया एक अलग देश है इनके लिए। मन में कुछ चुभा मगर मैंने कुछ कहा नहीं। मन देर तक परेशान रहा। अब हम बस स्टॉप पर पहुँच गये थे। कहवा पीकर हम भी चल पड़े थे। हमें बाबा ऋषि होते हुए लौटना था। वहाँ भी सीढिय़ाँ थी। लगभग पचास-साठ सीढिय़ों के बाद ऊपर बाबा ऋषि की दरगाह थी, जहाँ हर दरगाह की तरह मन्नत के तमाम धागे बँधे हुए थे। कहीं-कहीं चूडिय़ाँ भी बंधी थीं। वहाँ बाबा के प्रसाद के रूप में अगरबत्ती की भभूत मिली। और बताया गया कि यहाँ इसी परिसर में मिट्टी का चूल्हा है, जिसमें बाबा खाना पकाया करते थे। उसकी मिट्टी आप लोग जरूर लीजिए। सारे दु:ख और चर्मरोग दूर हो जायेंगे। हममें से कुछ ने वहाँ से मिट्टी ली और कुछ ने उस चूल्हे को हर कोण से देखा-परखा। यह आस्था का मामला था। जहाँ कोई तर्क काम नहीं करता।
अगले दिन श्रीनगर और उसके आस पास घूमने का कार्यक्रम था।  तय हुआ कि सुबह छ: बजे शंकराचार्य की तपस्थली चला जाय। बादलों के बीच से गुजरती बस अब और ऊपर जा रही थी। फिर बस ने तपस्थली से कुछ पहले ही हमें उतार दिया, वहाँ से पैदल चलकर हमें ऊपर जाना था, यहाँ से 1 कि.मी. पैदल चलकर फिर सीढिय़ाँ चढऩी थी। खड़ी चढ़ाई की सीढिय़ाँ थीं, वो भी आठ दस नहीं, दो सौ मगर जाना तो था ही। सीढिय़ों के नीचे भारतीय सेना तैनात थी। महिला सैनिक के द्वारा गहन तलाशी के बाद ही ऊपर जाने की इजाजत मिली। पहली सीढ़ी पर कदम रखते ही मैंने ऊपर देखा, तो लगा कि ऊपर तक पहुंचना संभव नहीं हो पायेगा क्योंकि मेरे पैरों में मोच थी मगर अपने साथियों को देखा उनमें से अधिकांश साठ के पार थे, विद्या बिन्दु जी तो सबसे बड़ी लगभग 65 वर्ष की थीं, मगर वे सीढिय़ां चढऩे को तत्पर थीं। सो मेरा भी हौसला बढ़ा और कदम भी। अब बादल नीचे और हम ऊपर थे। इन सीढिय़ों की खासियत यह थी कि हर आठ-दस सीढ़ी के बाद एक चौड़ी सीढ़ी थी और वहाँ पत्थरों से बनी रेलिंग भी इतनी चौड़ी थी कि उस पर आसानी से बैठा जा सके। और वहाँ से ऊपर जंगल और नीचे घाटी का दृश्य तो क्या कहना। हम बादलों के बीच में चल रहे थे । सो रूक-रूक कर, ठहर- ठहरकर बादलों में डूबते उतराते हम शंकराचार्य की चोटी पर पहुँच गये थे, वहाँ से श्रीनगर बहुत सुन्दर लग रहा था। बादलों की रजाई ओढ़े श्रीनगर को मैं देर तक निहारती रही। मगर शंकराचार्य की तपस्थली के लिए अभी और सीढिय़ाँ चढऩी थीं। एकदम खड़ी और ऊंँची-ऊँची लगभग तीस सीढिय़ाँ चढऩी थीं। मगर हमारे पहुॅंचते ही बादल जरा सा सरक कर बगल हो जाते वैसे ही जैसे हम किसी अपने को राह देते हैं। मेरे लिए वह दृश्य अनुपम और अविस्मरणीय है। और वहाँ पहुँच कर तो सारी थकान ही चली गयी थी। यहाँ से श्रीनगर का सौन्दर्य, अनुपम और अकथनीय था।
    शंकराचार्य की तपस्थली । एक बहुत छोटी सी गुफा। छोटा सा गुफा द्वार था जिसमें झुककर प्रवेश करना था। मगर भीतर एक छोटे कमरे जैसी जगह थी। शंकराचार्य की रूद्राक्ष की माला, त्रिशूल, डमरू उनके आराध्य शिव का प्रतिरूप शिव लिंग और साथ में तबला, हारमोनियम और वीणा। सब कुछ इतना साफ सुथरा और करीने से सजा हुआ जैसे तपस्या से निवृत्त होकर वे अभी अभी गुफा से बाहर गये हों। वहाँ से लौटकर हम नाश्ते के लिए एकत्र हुए।
आज हमारा अंतिम दिन था और हमें श्रीनगर और उसके आसपास - खीर भवानी, मुगल गार्डन, निशात बाग चश्मे शाही और चार चिनार जाना था। नाश्ते के बाद हम सबसे पहले खीर भवानी गये, देवी का प्राचीन मंदिर और शक्ति पीठ। यहाँ देवी को उनके नाम के अनुरूप दूध चढ़ाया जाता है और वहाँ मंदिर की ओर से खीर का प्रसाद वितरित होता है। यहाँ परिसर में स्थित भोजनालय में हमने दोपहर का खाना भी खाया। दाल, चावल, बैंगन की सब्जी और कडम का अचार। इस अचार के विषय में पूछने पर पता चला कि यह गाँठ गोभी का अचार था। कश्मीर में यहाँ के मौसम के चलते आम तो होता ही नहीं, इसीलिए यहां आम के अचार का चलन नहीं है। शायद इसीलिए इतने दिनों से खाने या नाश्ते में कभी अचार नहीं परोसा गया था। उसी होटल में हमें गाँठ गोभी के पत्तों का साग भी परोसा गया। साग तो वैसा ही था, जैसा हमारे यहाँ बनता है, बस उसे रसदार रखा गया था। कश्मीरियों का प्रिय साग और अचार था यह। इसलिए सब उसकी तारीफ  कर रहे थे। उन्हें क्या मालूम था कि हमारे छत्तीसगढ़ में कितने तरह के साग होते हैं। कितने तरीकों से उन्हें बनाया जाता हैं। मैंने अपने यहाँ की भाजियों का जिक्र किया और छत्तीसगढ़ की लाल भाजी और बोहार भाजी की विशेषताऐं बतायीं, तो लोग चकित रह गये।
    खाना खाकर हम मुगल गार्डन के लिए निकले । मुगल गार्डन ! चारों ओर पहाडिय़ों से घिरा और फूलों से भरा-भरा एक बहुत सुन्दर बगीचा। और उसके बीचोंबीच पूरे मुगल गार्डन को दो भागों में बाँटती फव्वारे की एक लम्बी कतार। हम देर तक वहाँ घूमते रहे, मगर पूरा गार्डन घूम नहीं पाये, क्योंकि समय आज भी कम था। इसके बाद निशात बाग। नीचे से सीढिय़ां, फिर सुन्दर सा गार्डन, फिर कृत्रिम झरना, फिर गार्डन इसी तरह उसके हर एक पायदान पर उसकी ऊँचाई और बढ़ती जा रही थी। इसके तीन ओर पहाडिय़ाँ है और सामने की ओर डल झील। सचमुच बहुत ही शांत सौंदर्य है इसका। चश्मेशाही जाते-जाते शाम हो चली थी। अभी चार-चिनार और डल में शिकारों की सैर भी करनी थी। एक बहुत खूबसूरत बगीचा है चश्मेशाही। निशात बाग और मुगल गार्डन की अपेक्षा छोटा मगर बहुत सुन्दर था। तरह तरह के फूलों से भरी लम्बी क्यारियाँ मन मोह रही थी। अब शिकारों के सैर की बारी थी। हाउस बोट देखना था। फिल्मों में देखा तो पहले भी था, मगर अब रूबरू देखने का अवसर था। लकड़ी के सुन्दर घर, सुन्दर ड्राईंगरूम, बेडरूम से सजे धजे पाँच सितारा, तीन सितारा, चारा सितारा हाऊस बोटों की अपनी निराली ही शान थी, मगर अधिकांश हाऊस बोट खाली थे और अपने मालिकों की हालत बयाँ कर रहे थे। जब हम वहाँ पहुँचे तो उनके मालिकों के चेहरों पर एक चमक कौंधी। वे हमें उत्साहपूर्वक अन्दर ले जाने लगे, मगर हकीकत जानते ही उनके चेहरे बुझ से गये। बाहर से जगमगाते इन हाउस बोटों की यही हकीकत थी। वहाँ सबसे अलग, एक छोटा सा हाउस बोट था जिसके मालिक थे, मो. अब्बास। मैंने उन बुजुर्गवार से पूछा - सीजन में तो यहां बड़ी भीड़ रहती होगी। तो वे कहने लगे - अब कहाँ सैलानी आते हैं बेटा। एक जमाना था, जब सीजन से छै महीने पहले ही हाउस बोट बुक हो जाते थे। मगर अब तो एक-एक सैलानी के पीछे दस दस लोग दौड़ते हैं। आपस में खींचतान लड़ाई, झगड़ा और कभी-कभी तो मारपीट भी । मैं तो वो सब कर नहीं पाता तो....। कहते हुए उनके चेहरे पर दर्द की असंख्य रेखायें उभर आयी थीं। मैं देर तक देखती रही उन रेखाओं को। फिर डल पर निगाह डाली, अब वह भी तो पहले जैसी नहीं रही। अपने भीतर न जाने कितना दर्द समेटे हुए डल भी तो अब घास-पात और सिवार से भर गयी है।
हमें चार चिनार भी जाना था, मगर नहीं जा पाये । कुछ लोगों ने डल लेक स्थित बाजार का रूख किया और खरीदारी की। लौटते तक दस बज चुके थे। अगले दिन सुबह सुबह हमें अपने घर के लिए निकलना था। सो खाना खाकर हम सीधे कमरे में गये। रोज की तरह आज गपशप में लगना संभव नहीं था। सुबह पाँच बजे निकलने का तय था। आते समय मजबूरी में हवाई मार्ग चुना था मगर लौटते समय सडक़ मार्ग से लौटना तय किया और उस पर अंत तक दृढ़ रही। मैं, डॉ. रामचंद्र राय, उनकी पुत्री वर्षा राय और जोधपुर विवि के चार छात्र। हम जम्मू की राह पर चल पड़े। श्रीनगर अतिथि गृह से निकलते ही बारिश हमारी हमराह हुई। श्रीनगर से लेकर जम्मू तक लगातार बारिश होती रही। अब श्रीनगर से लेकर जम्मू तक हिमालय का अपार सौंदर्य हमारे साथ था। तीखे मोड़, गहरी खाईं और ऊँची-ऊँची हरी भरी चोटियाँ और फिर उस पर रिमझिमी वर्षा। बादल तेजी से उड़ रहे थे। वे इतने सघन थे कि दो चार फुट से आगे का रास्ता ही नजर नहीं आ रहा था, मगर हमारा ड्रायवर कुशल चालक था, वर्षों का अभ्यास था उसका। इसलिए वो बहुत ही सहज था। रास्ते में जहाँ कहीं गाँव या शहर आता, वहाँ सेना के जवान तैनात मिलते। कहीं किसी टपरे जैसे होटल के पीछे तो कहीं किसी छत पर। सडक़ के दोनों ओर चीड़ और अनार के जंगल थे। अनार इतने अधिक फले थे कि उन्हें जरा सा हाथ बढ़ाकर तोड़ा जा सकता था। मगर ड्राइवर ने हमें बताया कि ये जंगली अनार हैं, बहुत खट्टे होते हैं, इनकी चटनी बनायी जाती है। सडक़ किनारे नागो और रसभरियों के पेड़ भी थे, मगर उनका मौसम जा चुका था। अब वे पेड़ पर नहीं, बाजार में  थे। लगभग नौ बजे काजीगुण्ड आया, एक छोटा सा शहर। यहाँ हमने नाश्ता किया। यहाँ मेवों की बहुत सी दुकानें थी। हम तो श्रीनगर से बादाम और अखरोट खरीद ही चुके थे, फिर भी भाव जानने के लिए पूछा, तो चकित रह गये ! जो बादाम हमने सात सौ रूपये में खरीदा था, वह यहाँ अढ़ाई सौ रूपये किलो था और अखरोट तीन सौ रूपये किलो वाला डेढ सौ रूपये किलो। अपने यूँ ठगे जाने पर तकलीफ  हुई, क्योंकि हमारे बस ड्राइवर ने बहुत एहसानों के साथ हमें कम दाम में मेवे खरीदवाये थे। हम सभी को दु:ख हुआ मगर ......।
    यहाँ से लगभग एक घंटे का सफर तय हुआ ही था कि हमारी गाड़ी का टायर पंचर हो गया। यह एक बहुत छोटी सी जगह थी। यहाँ एक छोटा सा ढाबा था, जिसमें ग्राहक तो कोई नहीं था, बस सेना के जवान ही बैठे थे। हम भी गाड़ी से उतरकर उन्हीं के पास बैठ गये । दो फौजी छत पर ड्यटी पर तैनात थे। एके-47 से लैस बिल्कुल चौकन्ने। बाकी आराम कर रहे थे। बातचीत मेें पता चला कि सारे के सारे फौजी नीचे मैदानी भाग के रहने वाले हैं। कोई हरियाणा का था, कोई उत्तर प्रदेश का तो कोई राजस्थान का। लगभग एक घंटे के बाद हमारी गाड़ी का टायर ठीक हुआ, तो हम आगे बढ़े। अब गाड़ी अपने रफ्तार पर थी। मैं हिमालय के उस कश्मीरी सौन्दर्य को निहार रही थी, जो कभी मेरे सपनों में था। मगर अब सामने! ऊँची-ऊँची चोटियों से ऊपर उठकर बादल कभी ऊपर उठकर उन्हें आच्छादित कर लेते, तो कभी उनसे टकराकर बरस जाते। गाड़ी की गति धीमी हो चली थी। अब धारासार वर्षा हो रही थी। पहाड़ों पर वर्षा तो मैंने तो पहले भी देखी थी, मगर इस कदर सघन कि हाथ को हाथ न सूझे, खाई पहाड़ और सडक़ सब एकजई हो उठे थे। गाड़ी की हेड लाइट जलाने के बाद भी राह नजर नहीं आ रही थी, मगर ड्राइवर की अभ्यस्त आंखें उसमें भी अपनी राह देख रही थीं। अब बादलों के गुच्छे गाड़ी के भीतर घुसने की कोशिश कर रहे थे। बहुत दूर तक ऐसा ही मंजर रहा, फिर बादल बिरल होने लगे और पानी भी थम गया था। राम वन आ गया था। राम इधर भले ही न आये हों मगर उनकी सेना यहाँ आज भी मौजूद थी। सडक़ के दोनों ओर बन्दर ही बन्दर। ऊधमपुर तक रास्ते भर बन्दरों का हुजूम नजर आता रहा।
    अब बनिहाल आने वाला था, मगर मुझे तो इंतजार था जवाहर सुरंग का। बहुत सुना था इसके बारे में। और फिर इंतजार खत्म हुआ। सुरंग के बाहर उसकी लम्बाई लिखी हुई थी। आने और जाने के लिए अलग-अलग सुरंग। अब हम सुरंग में प्रवेश कर रहे थे। बरसात के कारण सुरंग में पानी भर गया था और हमारी गाड़ी पानी के छींटे उड़ाती आगे बढ़ रही थी। सुरंग में बहुत अंधेरा था, इतना अंधेरा कि कुछ कुछ दूरी पर जलती लाइट की रोशनी भी कम पड़ रही थी। बहुत देर के बाद कुछ दूरी पर एक वृत्त सा उभरा अब सुरंग समाप्त होने वाली थी। हम फिर तीखे मोड़ों से गुजर रहे थे।
पटनी टॉप आने वाला था। यहाँ से हिमालय का अनूठा सौन्दर्य निहारा जा सकता है। सर्दियों में यहाँ से हिमाच्छदित वादियों का सौन्दर्य कई गुना बढ़ जाता है। पटनी टॉप तक मैं पहले भी आ चुकी थी। इसकी ऊँचाई श्रीनगर से भी अधिक है। और सर्दियों में तो यह चारों ओर हिमाच्छादित चोटियों से घिरा बर्फ  का उपवन सा प्रतीत होता है। आज हमारे पास पटनी टॉप जाने का समय नहीं था। हमारे साथ जो छात्र थे, उनकी ट्रेन छ: बजे थी ; और यहाँ से कई घंटे का रास्ता अभी शेष था। उधमपुर आ रहा था । मुझे याद आया कि वर्ष 1996 में जब मैं यहाँ आई थी, तब कई जगह हमारी गाड़ी की तलाशी ली गयी थी। इस बार ऐसा नहीं हुआ। हमें बस एक स्थान पर रोका गया। शायद पहले से अब हालात कुछ बेहतर हुए हैं। मगर आँखों में श्रीनगर के लाल चौक की घटनाएं घूम उठीं। पहलगाम और गुलमर्ग जाते समय खेतों में, पहाड़ों के निचले हिस्सों में, लोगों के घरों की छतों पर और झाडिय़ों में तैनात सेना के जवान आँखों में उभर आये थे। और साथ ही साथ उभरी थी हाउस बोट और शिकारा वालों की असंख्य मायूस आँखें । अकूत सौन्दर्य है यहाँ। प्रकृति ने अपने दोनों हाथों से संवारा है इसे। मगर आज यह सौन्दर्य मन को बाँधता नहीं, बल्कि खौफ  जगाता है।
हम कश्मीर में आठ दिनों तक रहे। हमने कश्मीर में सब देखा, जिसके लिए यह विख्यात है। मगर एक दहशत, एक भय हर वक्त तारी था हम पर। हर शख्स को हम शक की निगाह से देखते थे और वे? वे भी तो सहज नहीं थे। उनकी आँखों में वह भाव नहीं उमड़ा था, जो किसी अपने को देख कर उमड़ता है। इन्हीं विचारों के बीच जम्मू आ गया था। प्लेटफार्म नंबर एक पर जवानों से भरी ट्रेन खड़ी थी, जवान उतर रहे थे। यहाँ से इन्हें चिनारों की घाटी में जाना था। उनकी हिफाजत के लिए। क्या सचमुच अब बारूद ही, एक मात्र उपाय है? और क्या इसकी गंध से चिनारों की हरीतिमा बरकरार रह पायेगी? मैं देर तक सोचती रही और इन्हीं सोचों के बीच ही ट्रेन आ गयी थी। उसमें सवार होकर मैं लौट रही थी। जाते समय मैं अकेली थी, मगर लौटते समय मैं अकेली नहीं थी। मेरे साथ था कश्मीर का अगाध सौन्दर्य और साथ ही साथ थे कई सवाल। सवाल ! जिसके जवाब तलाशनेे हैं मुझे ! आपको! और हम सभी को ।