Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

लेक जेनेवा

उर्मिला जैन
‘सन्दर्भ’ 8ए,  बंद रोड, एलेनगंज  इलाहाबाद 211002                                                                                                                               मो. 9415347351
जेनेवा झील का सम्मोहन मुझे बार-बार वहां ले जाता रहा है। लन्दन से स्विट्जरलैंड जाना वैसे भी अब पहले से बहुत आसान होता जा रहा है। इस बार जब मैं वहां पहुंची तो होटल की परिचारिका ने आर्द्र और धुंधले मौसम के लिए दु:ख प्रकट करते हुए मुझे कमरे की चाबी थमाई, तो मैंने कहा कि मौसम की परवाह नहीं। ऐसा कहना मेरी विनम्रता ही नहीं थी, वरन जेनेवा पहुँचने पर ऐसा मौसम मुझे सचमुच ही भाता था।
दूसरे दिन आसमान साफ था। चमचमाते सूर्य-प्रकाश में स्विट्जरलैंड की सबसे बड़ी झील बेहद खूबसूरत और आकर्षक तो लगाती ही है, लेकिन जब पर्वत शिखरों से उतरा धुंध झील पर कलाबाजी दिखाने लगता है और वायु जल पर ‘कोड़ा’ चलाने लगाती है, तब यह उच्छृंखल जगह ट्रेवल एजेंटों द्वारा पर्यटकों के लिए तैयार किये गए ब्रोशरों में दिखने वाले चित्रों से भी अधिक कौतूहलजनक हो उठती है। अंग्रेज कवि बायरन और शेली इस विशाल झील में अचानक आए तूफान में डूबते-डूबते बचे थे और तभी इसके बारे में कई कविताएं लिखी थीं। मुझे अब आभास हुआ कि ऐसे अवसर क्यों उन्हें काव्य रचना के लिए प्रेरित करते थे। मैं पहली बार लगभग 36 वर्ष पहले स्विट्जरलैंड घूमने गई थी और तभी यह विशाल झील देखी थी। तब से अब तक कई बार वहां गई हूँ और मौसम चाहे जैसा भी हो, यह झील देख कर सम्मोहित हो उठती हूँ।  मैं निष्पंद हो उठती हूँ। लगभग 9 मील चौड़ी और 45 मील लम्बी यह झील पश्चिमी यूरोप की सबसे बड़ी झील है। पर मात्र इसकी विशालता ही इसे इतना जीवंत नहीं बनाती, वरन चारों ओर हरी-भरी पहाडिय़ों से घिरी हिमाच्छादित चोटियाँ इसे ऐसी मोहकता प्रदान करती हैं। यही कारण है कि स्विट्जरलैंड के प्राकृतिक दृश्यों के सबसे बड़े चित्रकार हाडलर द्वारा इस झील का चित्रांकन स्तब्ध कर देता है। लेकिन वे भी इसके झंझावात तथा रहस्यमय सौन्दर्य का सही चित्रण नहीं  कर पाए। संभवत: यही कारण था कि वे मृत्युपर्यंतबार-बार इसका चित्रण करते रहे।
लेक जेनेवा सैलानियों, विशेषकर अंग्रेजों की पसंदीदा सैरगाह रही है। 1816 में ब्रिटिश पत्रकारों से बचने के लिए लार्ड बायरन यहाँ आए थे (उन दिनों कामातुर ख्यात लोगों की आलोचना करने से सम्बद्ध कोई कानून नहीं था)। यहाँ उनके साथ परसी बिशी शेली अपनी पत्नी और बच्चों से छिप कर अपनी किशोरी प्रियतमा मेरी गाडविन के साथ आ पहुंचे थे। इन दोनों कवियों ने लेक जेनेवा के सम्बन्ध में ऐसी कविताएं लिखीं कि यह जगह अंग्रेजों का प्रिय सैरगाह बन गयी। उनकी कविताओं की पुस्तकें लिए वे यहाँ आ पहुंचते थे। यहीं पर मेरी शेली ने 1816 में अपना विख्यात उपन्यास ‘फ्रेंकेस्टाइन’ लिखा था। यह उपन्यास पढऩे में जितना रोचक है उतनी ही भयावह उस पर बनी फिल्में भी हैं।
जब मैं पहली बार वहां गई थी, तब वहां रुकना बहुत खर्चीला नहीं था। इसी कारण तब वहां अंग्रेज भी भरे रहते थे। पर अब स्विस फ्रांक महंगा हो जाने के कारण वहां अंग्रेजों की चहल-पहल कम हो गई है, पर  नवधनाढ्य रूसी यहाँ गरमी की पूरी छुट्टियाँ बिताते हैं। फिर भी यहाँ आने पर इस बात की संतुष्टि हुई कि सप्ताहांत के दो दिन भी थोड़े में गुजारना कठिन नहीं था।
हम जब पहली बार पूरे सप्ताह के लिए स्विट्जरलैंड गए थे तब हमने लन्दन में ही स्विस टूरिस्ट आफिस से 180 पौंड में चार दिन का पास खरीद लिया था। इस पास से हम चाहे जितनी बार बस, ट्रेन, बोट तथा ट्राम द्वारा सभी जगह तो घूम ही सकते थे, वहां के अधिकांश संग्रहालयों में भी बिना टिकट खरीदे जा सकते थे। सुनने-पढऩे में यह उतना सस्ता तो नहीं लगेगा, पर इस पास से हमें सचमुच काफी बचत हुई।
इस बार स्विट्जरलैंड पहुँचने पर हम सबसे पहले मान्त्रेक्स में बहुत ऊंचाई पर बने होटल यूरिटेल में रुके। यहाँ चार सितारा होटल जैसी सारी सुविधाएं थीं और यह जेनेवा एयरपोर्ट से मात्र एक घंटे की दूरी पर है। यहाँ से फेरी टर्मिनल पैदल ही कुछ मिनटों में पहुंचा जा सकता था। इस प्रकार झील के चारों ओर नौका भ्रमण के लिए यह एक मौजूं जगह थी। लेक जेनेवा का सबसे शानदार आकर्षण है वहां का नावों का तंत्र। कुछ नावें तो पहले की पैडल मार कर चलाने वाली स्टीमर हैं जिनका अपना ही आनंद है, पर आधुनिक स्टीमर भी कम आनंददायी नहीं हैं। पर्यटकों में तो ये लोकप्रिय हैं ही, स्थानीय लोग भी इन्हें पसंद करते हैं। झील दर्शन के लिए यह बेहद अच्छा और सस्ता साधन है, साथ ही झील के आर-पार जाने के लिए सुविधाजनक भी क्योंकि ये ये छोटे-छोटे घनी झाडिय़ों वाले तीस से भी अधिक बंदरगाहों पर रुकती हैं। झील में और उसके आसपास घूमने के बाद हमने जेनेवा जाना तय किया। लोगों की धारणा है कि जेनेवा एक बहुत ही बोरिंग व्यापारिक शहर है, पर ऐसा केवल उन लोगों के लिए हो सकता है जो केवल व्यापार के सिलसिले में किसी मीटिंग में यहाँ आते हैं, नीरस से होटल में ठहरते हैं और मीटिंग के बाद लौट जाते हैं। जेनेवा वस्तुत: एक विश्व-शहर है जिसका इतिहास बहुत समृद्ध और विविधतायुक्त रहा है। यहां अच्छे-अच्छे संग्रहालय हैं जिनमें एक कला संग्रहालय भी है जिसमें हाडलर के बनाए स्विट्जरलैंड सम्बन्धी चित्रों का अच्छा, वस्तुत: दुनिया भर में सबसे बड़ा संग्रह है। इन चित्रों को देखना हमें अंतरतम तक भिगो गया। उसके बाद हम पुराने शहर में कलादीर्घाओं और एंटिक वस्तुओं का आनंद लेते रहे।
अगले दिन हम न्योन के लिए चल पड़े जो रोमन काल में महानगर था। आजकल यह बाजारों वाला मध्यवर्गीय शहर है, क्योंकि पास ही में स्थित बड़े शहर जेनेवा की वजह से इसे छोटा माना जाना स्वाभाविक है। यहाँ हर तरफ रोमन खंडहर हैं जिन्हें देखना भी एक अलग तरह का अनुभव था। यहाँ एक भव्य पुरातात्विक संग्रहालय भी है जहां एक-से-एक बढक़र अजूबी चीजें देखने को मिलीं। यहां टूरिस्ट आफिस से मिले एक ब्रोशर से हमें शहर घूमने और वहां के दर्शनीय स्थान पहुँचाने में बड़ी आसानी हुई।
न्योन के बाद हम लुसाने पहुंचे। यहाँ तक तो झील बड़ी नहीं लगी थी पर लुसाने के रास्ते में जेनेवा झील का वृहत्तर रूप दिखने लगा। झील के किनारे बसा लुसाने शहर स्विट्जरलैंड का सबसे जीवंत शहर कहा जा सकता है। यहां बाहरी विद्यार्थियों की संख्या अधिक है जिससे यहां बराबर खूब चहल-पहल बनी रहती है। गरमी के दिन थे, इसलिए वहां की संकरी सडक़ें लोगों से भरी पड़ी थीं। सारा वातावरण भूमध्यसागरीय लग रहा था। ऊपर पहाड़ी पर अलंकृत गिरजाघर से स्तब्ध करते आल्प्स पर्वत और लहराती हुई झील को देख कर जो अनुभव हुआ, उसे लेखनी द्वारा बता पाना मुश्किल है। कुछ दृश्य ऐसे होते हैं जिन्हें केवल महसूसा जा सकता है, न तो लेखनी उनका सही वर्णन कर पाती है और न ही तूलिका द्वारा उन्हें चित्रों में उतारा जा सकता है। शायद इसे देख कर ही विक्टर ह्यूगो ने लिखा था ‘मैंने झील को छतों पर देखा, पहाड़ को झील के ऊपर, बादलों को पहाड़ के ऊपर और तारों को बादलों के ऊपर’. काश, मैं इससे अच्छा लिख पाती। वेवे पहुंच कर पहले तो लगा कि यह बड़ा ही नीरस शहर है, जहां बहुत ही कम दर्शनीय स्थल हैं, पर कुछ समय बिताने के बाद यह मेरा पसंदीदा शहर बन गया। उपन्यासकार ग्राहम ग्रीन ने अपना घर यहीं बसाया था और चार्ली चैपलिन ने भी अपना अंतिम समय शहर के किनारे स्थित अनेक महल जैसे घरों में से एक में बिताया था जिसे अब एक सुन्दर संग्रहालय का रूप दे दिया गया है। हम उस ‘होटल डू लैक’ में भी केवल काफी पीने गए जहां अनीता ब्रुकनर ने अपना इसी नाम का बुकर-पुरस्कृत उपन्यास लिखा था। आश्चर्यजनक रूप से धीर-गंभीर पर लावण्य से भरपूर वेवे के बाद हमें मौन्त्रेक्स बड़ा ही बेतुका, गड्ड-मड्ड फीका और आधुनिकता का मुलम्मा चढ़ा शहर लगा। पर इन खामियों के बावजूद मौन्त्रेक्स में उसके स्वर्ण काल के कुछ अवशेष बचे हुए हैं। रूसी उपन्यासकार नोबोकोव यहीं मौन्त्रेक्सपैलेस होटल में रहते थे। होटल के बाहर कुर्सी पर बैठी उनकी एक भव्य प्रतिमा है। तट-क्षेत्र से लगभग आधा घंटा पैदल चल कर हम शैटे द चिलौन से रूबरू हुए। कहा जाता है कि यही वह किला है जिसने बायरन को उसकी चर्चित कविता ‘ द प्रिजनर आफ चिलौन’ लिखने को प्रेरित किया था। सोचती हूँ कि काश बायरन की थोड़ी सी भी साहित्यिक प्रतिभा मुझमें भी समा जाती। कई बार लेक जेनेवा जाने पर भी अभी तक तो यह इच्छा पूरी नहीं हुई है। पर अभी भी प्रतीक्षा है।