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Wednesday 22 Nov 2017

अफ्रीका, मेरा दूसरा घर

श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी
द्वीपान्तर, ला.ब., शास्त्री मार्ग,
फतेहपुर (उ.प्र.) 212601
दूरभाष- 05180-22828
मुझे बचपन से ही पढऩे का बहुत शौक था। पुस्तकें पढ़ते-पढ़ते उनमें वर्णित प्रदेशों, देशों, विशिष्ट स्थानों आदि को और निकट से जानने की उत्सुकता बढ़ी, जो बड़े होने के साथ-साथ बढ़ती ही गई। मन के अंदर बराबर बनी रही लगन तब फलवती हुई जब भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने अपने आईटीईसी कार्यक्रम के अंतर्गत सोमालिया में गणित पढ़ाने के लिए मेरा चयन कर लिया और मैं 10 जुलाई 1966 को मुंबई (तब मुंबई) हवाई अड्डे से उडक़र अदन पहुंच गया और उसके अगले दिन सोमालिया के दूसरे बड़े नगर हरगीसा। पढ़ाने का काम शुरू हुआ और नए-नए अनुभवों को कविता, कहानी आदि में ढालने का भी।
वहां ग्रीष्मावकाश 30 जून से 15 सितम्बर तक होता है। योजना बनाई कि समुद्री जहाज से स्वेज नहर होते हुए अफ्रीका महाद्वीप का ही चक्कर लगा लिया जाए और अफ्रीका का नक्शा देख-देखकर कार्यक्रम बनाने लगा। पर जब काम नहीं होना होता तो नहीं ही होता। 30 जून से अवकाश होना था पर उसके पहले ही 25 जून को मध्य-पूर्व में अरब-इजरायल युद्ध प्रारंभ हो गया और मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासिर ने स्वेज नहर बंद कर दी, मेरे दुर्भाग्य से मेरे वहां रहते तक स्वेज नहर बंद ही रही। अब दूसरा कुछ सोचा जाने लगा। रमजान के महीने में वहां रोजों के कारण लगभग चार सप्ताह का अवकाश रहता है। उसका उपयोग करने की योजना बनी तो गुजराती व्यापारियों की सहायता से फलवती होने की आशा बंधी। सोमालिया में रेलवे लाइन नहीं थी और बसें भी कहीं-कहीं ही चलती थीं। इस कारण लम्बी यात्रा करनी हो तो ट्रकों का ही सहारा लेना पड़ता था। गुजराती भाइयों का सामान लेकर एक ट्रक हरगीसा में देश की राजधानी मोगादिशू जा रहा था। उसमें ही मुझे भी समंजित किया गया। रोजो के कारण ट्रक शाम को रोजा खुलने के बाद चला उसमें मैं अकेला भारतीय था। (अन्यों को ऐसे ‘अनुपयोगी’ कार्यों में कोई रुचि नहीं थी) और पन्द्रह बीस सोमाली थे। वहां शाकाहारी भोजन की कोई व्यवस्था न होने के कारण रास्ते के लिए मैंने सूखे मेवे और कण्डेंस्ड मिल्क के डिब्बे ले लिए। पर वहां सबसे बड़ी समस्या पानी की थी। पीने का पानी मिलना कठिन था फिर नहाने-धोने को पानी कहां मिले! मैं बिना नहाए कुछ खाता-पीता नहीं इससे जहां भी ट्रक रुकता, मेरे लिए पानी की खोज की जाती। पानी मिल भी जाता तो नहाते कहां। उन स्थानों में जाने वाला, वह भी भारतीय वेशभूषा में, संभवत: मैं पहला भारतीय था, सो भीड़ घेर लेती थी और जहां भी जाओ पीछा करती थी। अब भीड़ में कैसे नहाओ? बेचारे ट्रक वाले कोई न कोई स्थान खोज लेते-किसी नाई के सैलून का पिछवाड़ा, कोई कार्यालय या कोई और रिक्त स्थान। एक बार तो मुझे थाने ले गए। वहां का थानेदार उसी जगह का था, जहां मैं पढ़ा रहा था, वह बड़ी आत्मीयता से मुझसे मिला और पूछा कि क्या सेवा करुं। मैंने कहा, सवेरे से कुछ खाया नहींहै, स्नान न करने के कारण। आप एक बाल्टी पानी की व्यवस्था कर दें, तो मैं भी रोजा तोड़ूं। एक बाल्टी पानी? उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि इतना पानी मिलना वहां कठिन था। खैर बेचारों ने एक बाल्टी पानी की व्यवस्था करके मेरी समस्या का हल कर दी। ट्रक चलने को हुआ तो थानेदार जी ने उससे पूछा, इस ट्रक में क्या है? वहां ट्रकों की सघन जांच होती है और ट्रकों को घंटो खड़ा रहना पड़ता है। मैंने ऐसे ही कह दिया, ‘सामान्य वस्तुएं हैं, कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं है।’ ‘आप कह रहे हैं तो छोड़ देता हूं।’ कहकर उन्होंने हमें विदा किया। इस अप्रत्याशित घटना से हम बड़े प्रसन्न हुए क्योंकि उनका बहुत सा समय और परेशानी बच गई थी। चालक ने कहा- ‘आप बहुत अच्छे आदमी हैं। अगली बार आएं तो हमारे ही ट्रक में आना।’
चौथे दिन मोगादिशू एक सौ किमी दूर रह गया था और सबेरे के आठ बजे थे। सडक़ बहुत अच्छी थी तो प्रसन्नता हुई कि दो-तीन घंटे का ही सफर बचा है। पर रास्ते में ही सैनिकों ने ट्रक रुकवाया और वे भी उस पर सवार हो गए। उन्हें ड्यूटी पर ठीक पर हाजिर होना था सो वे जल्दी चलाने और चालक को धमकाने लगे। चालक अपनी ही चाल चलता रहा तो वे उग्र हो उठे, ‘समय पर नहीं पहुंचे तो हम गोली मार देंगे। ये कर देंगे, वो कर देंगे।’... तो चालक ने बिना कुछ कहे ट्रक को सडक़ के नीचे उतारकर खड़ा कर दिया और अपने कुछ औजार लेकर नीचे उतरकर खट-खुट करने लगा। सैनिकों ने और धमकाया तो बड़े शांत स्वर में बोला- ‘ट्रक खराब हो गया है। देखो, ठीक हो जाए तो करता हूं।’ सैनिक और उग्र हुए तो उसने औजार वहीं छोड़े और पास हीलेट गया। कुछ समझ में नहीं आ रहा है। कुछ देर आराम करूं तो शायद समझ में आए। सैनिक खिसियाते रहे और हारकर किसी और ट्रक से चले गए। तब तक बारह बज गए थे। अचानक चालक हड़बड़ाकर उठा और ट्रक स्टार्ट करके चल पड़ा। लगा जैसे ट्रक को कुछ नहीं हुआ था, वह बस सैनिकों को अपना स्वाभिमान दिखाना चाहता था।
एक हजार कि.मी. की यात्रा सौ घंटे में पूरी करके ट्रक ने हमें चार बजे मोगादिशू पहुंचाया। चालक ने व्यापारियों का माल उतारा और उन्हें पत्र दिए तो उन लोगों ने मेरे रहने की व्यवस्था एक अच्छे होटल में करा दी और बोले कि भोजन साथ ही करेंगे। होटल में पहुंचकर बड़ी शांति मिली और कई दिन बाद ठीक से स्नान कर लेने के विचार से साबुन-तेल लेकर स्नानागार में घुसा और फौव्वारा खोल दिया। पर पानी पड़ते ही बाल चिकट गए क्योंकि समुद्र तटवर्ती नगर हाने के कारण पानी खारा था। किसी तरह तेल मल-मलकर बाल ठीक किए। मोगादिशू में तीन-चार दिन रहा और नगर तथा आसपास के क्षेत्रों का भ्रमण किया। गन्ने के एक खेत के पास खड़े थे तो एक नवयुवक भागा-भागा आया और उसने ‘हैलो टीचर’ कहकर मेरा अभिवादन किया तो साथ के भारतीय मित्र अचरज से देखने लगे। उन्होंने कहा ‘मैंने आपको दो किमी से पहचान लिया था, आपके वस्त्रों के कारण। आपने मुझे हरगीसा में पढ़ाया था।’ उससे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई।
उसके बाद ईस्ट अफ्रीकन एयरवेज से केन्या की राजधानी नैरोबी पहुंचा क्योंकि यहां से सडक़ मार्ग बंद था। सीमावर्ती क्षेत्र एन.एफ.डी. पर सोमालिया के दावे और शिफ्ताओं के आतंक के कारण। रात को नौ बजे के लगभग एयरवेज की बस ने नैरोबी के चौक पर उतार दिया मैं कोई धर्मशाला खोजने लगा तो भारतीयों की एक कार पास आकर रुकी। उनके पूछने पर मैंने बतलाया तो बोले, ‘पास में ही भारतीयों का ग्रीन होटल है। वहीं चले जाओ। रात में ऐसे मत घूमो नहीं तो कोई काला सामान छीनकर ले जाएगा और कहो मारकर ही फेंक दें।’ मुझे ‘काला’ शब्द अच्छा नहीं लगा पर उनसे क्या बहस करता। उनकी बात मानकर ग्रीन होटल चला गया। अच्छा साफ-सुथरा होटल था। वहां जाने से एक बड़ा लाभ यह मिला कि वहां एयरवेज और रेलवे आदि के टाइम टेबल मिल गए। उनसे मुझे आगे का कार्यक्रम बनाने में बड़ी सहायता मिली और अगले दिन ईस्ट अफ्रीका रेलवे से मैं मोम्बासा पहुंच गया। वहां गाड़ी बदलनी थी तो मैंने एक टैक्सी लेकर मोम्बासा का भ्रमण किया। शाखा वाले ताड़ के वृक्ष भी देखे। उसके बाद तो रेल और बसों से तंजानिया के दारेस्सलाम, टैबोरा, म्वांजा, किगोमा और उगांडा के कम्पाला, कसेसे आदि की यात्राएं कीं। कांगो नदी के तट पर पहुंचा तो मन किया कि नाव द्वारा नदी पार करके कांगो (किन्सासा) भी हो आऊं पर लोगों ने कहा- ‘आप चले तो जाओगे पर लौट नहीं पाओगे।’ ‘क्यों?’ मुझे आश्चर्य हुआ। ‘क्योंकि उस पार नरभक्षी लोग रहते हैं वे आपको देखते ही मारकर खा जाएंगे।’ अकारण ही मौत के मुंह में जाने को अच्छा न मानकर मैंने वापस होने का मन बनाया। संसार में मीठे पानी की इकलौती झील विक्टोरिया को पानी के जहाज से पार करके केन्या के किसूमू तट पर उतरा। उसके पहले रात में विक्टोरिया झील के एक द्वीप की कुछ सहयात्रियों के साथ सैर की। जहाज के कप्तान ने मेरे पास आकर कहा, ‘आपकी प्रतीक्षा हो रही है।’ तो मुझे आश्चर्य हुआ कि इस अनजान स्थान पर मेरी कैसी प्रतीक्षा हो रही है? बाहर आया तो एक गुजराती भद्र पुरुष ने अभिवादन करके मेरा सामान लिया और अपनी गाड़ी में रख लिया तथा मुझे लेकर चल दिए। रास्ते में मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि म्वां•ाा से श्री शांतिलाल तन्ना (वहां के अत्यंत सम्मान्य भारतीय जो सांसद भी रहे थे) ने फोन करके आपका कार्यक्रम बताया था और कहा था कि मेरी व्यवस्था कर दें और मुझे आसपास का क्षेत्र घुमा दें। उनके घर पहुंचा तो घर के सभी सदस्यों का सत्कार-भाव देखकर अभिभूत हो गया। नाश्ते में एक बड़े थाल में अनेक प्रकार की मिठाइयां आई तो आश्चर्य हुआ कि यहां मिठाई कैसे आ गई क्योंकि उसके पहले दो साल हम मिठाई को तरस गए थे। पूछा तो बतलाया गया कि मिठाइयों की अच्छी खपत होने के कारण वहां हलवाइयों ने भी दुकानें खोल रखी हैं। एक अच्छा, अविस्मरणीय समय जोबनपुत्रा परिवार के साथ बीता। वहां से नैरोबी आया और फिर मोगादिशू। वहां से हरगीसा की यात्रा एक जीप से हुई।  1971 में भारत लौट आया और लगभग दस वर्ष यहां रहा, पर मन घूमने का ही होता रहा। अत: फिर विज्ञापन देख-देखकर आवेदन पत्र भेजने लगा। इथियोपिया के शिक्षा विभाग ने नियुक्ति दे दी तो 1982 के प्रारंभ में इथियोपिया पहुंच गया। वहां बोडिटी और अवासा में पढ़ाया। वहां एक सुखद घटना घटी : भारत से चला था तो मित्रों ने गेंदे के फूलों की मालाएं पहनाकर विदाई दी थी। वे मालायें मैं साथ लेता गया और जब उसके फूल सूख गए तो मैंने बीजों को बो दिया। फूल खिले तो अपना घर बहुत सुंदर दिखने लगा और बड़े-बड़े फूल लोगों को इतना आकृष्ट करने लगे कि कुछ तो बाहर से ही बाड़ में हाथ घुसेडक़र तोड़ लेते थे और भले लोग मांग कर ले जाते थे। फिर उन्होंने भी बीज बोए और दूर-दूर तक गेंदा फैलता चला गया। नाम न पता होने के कारण लोग उसे ‘हिन्द अबेबा’ (भारतीय फूल) कहने लगे। अवासा में कोई सरकारी आवास न मिलने के कारण एक स्थानीय सहकर्मी आसेफा डेसालेन का किराएदार बन गया। मेरे वहां रहते उनके यहां एक पुत्री का जन्म हुआ। उनका पूरा परिवार मेरा बहुत सम्मान करता था इतना कि मेरे वहां से आने के कोई 16 वर्ष बाद एक हवाई पत्र आया जिसमें प्रेषक का नाम लिओन आसेफा लिखा था। मैंने उत्सुकता से पत्र खोला तो परिचय दिया गया था- ‘अपने घर के एक कमरे को सब लोग ‘अबेबा बेत’ कहते हैं। मैंने उसका कारण पूछा तो पिताजी ने बतलाया कि उस कमरे में आप रहते थे। अत: आपके बारे में उत्सुकता हुई।’ अबेबा याने फूल (व्यंजना से संभ्रांत पुरुष) और बेत याने घर- ‘संभ्रांत पुरुष का आवास।’
अफ्रीका से संपर्क हुए 50 वर्ष बीत गए पर यहां बिताए हुए जीवन के बहुमूल्य पन्द्रह वर्षों की स्मृतियां मन में कौंधती रहती है और सपनों में तो मैं प्राय: अपने दूसरे घर में ही रहता हूं।