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Saturday 25 Nov 2017

सिक्किम की मनुर्भव: संस्कृति

डॉ. श्यामबाबू शर्मा
85/1, अंजलि काम्पलेक्स
शिलांग (मेघालय)- 793001
मो. 9863531572
‘समकालीन साहित्य की प्रवृत्तियां : मुद्दे एवं  परिप्रेक्ष्य’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में 29 से 31 मई 2015 में समकालीन मुद्दों पर व्याख्यान हेतु सिक्किम विश्वविद्यालय द्वारा प्राप्त आमंत्रण पर शीघ्र निर्णय हो गया कि प्रकृति की गोद में बसे इस प्रांत के विज्ञजनों के बीच कुछ बात करनी है। यह सही है कि पिछले नौ वर्षों से मेघालय की राजधानी में रहने का मौका मिला तथापि सिक्किम देखने का लोभ संवरण रुका नहीं।
न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन देश के सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा है। राजधानी एक्सप्रेस की सुलभता के साथ। यहां से गंगटोक तक जाने के लिए रिजर्व टैक्सियां या शेयर्ड गाड़ी की सुविधा है। सुबह 9 बजे के आसपास यात्रा प्रारंभ हुई। राष्ट्रीय राजमार्ग 31 ए सिलीगुड़ी को गंगटोक से जोड़ता है। यह एक सर्व ऋतु मार्ग है तथा सिक्किम में रंगपो पर प्रवेश के पश्चात तीस्ता नदी के समांतर चलता है। अद्भुत, अकल्पनीय लगता नहीं कि यह रास्ता धरती पर है। नदी का किनारा घने वृक्ष और किनारे चलते वाहन। शाल, सागौन अश्वपत्र, आम, नीम आदि उष्ण कटिबंधीय वृक्षों के तनों पर स्पीफाइट (उपरिरोही) फर्न (पुष्पहीन वनस्पति) पायल या बाजूबंद की तरह पले हुए थे और कहीं-कहीं भव्य रंग-रूप वाले आर्किड शोभायमान थे। शाल का जंगल घना होता है। यह अपने आसपास बेलों, झाडिय़ों और लताओं को पनपने नहीं देता। एक तरफ तीस्ता का प्रवाहमान शुद्धजल मन को आह्लादित करता है और दूसरी ओर वृक्षों की हरीतिमा प्रकृति के साथ मन को जोड़ देती है। कुछ देर चलने पर एक रास्ता कलिम्पोंग की ओर कट जाता है। कलिम्पोंग अपने फूलों के लिए विख्यात है। शीतलता मन को शांत कर रही थी। चालक से पूछा कि नाश्ता-पानी होगा क्या? सहज-सरल जवाब ‘थोड़ा सबर करो साहब। रंगपो आने वाला है।’ कतार में लगी गाडिय़ां और यात्रियों के आर्डर लेता बहादुर। शिलांग में नाश्ता-दोपहर का भोजन-रात्रि का भोजन सबमें भात। यहां रोटी, वह भी गुदार। बढिय़ा गरम रोटियां और सब्जी। साहब, आगे रास्ता ज्यादा घुमावदार है सो डटकर कर न खाने की हिदायत। तीसरी रोटी के पश्चात बिसमिल्ला और घर के लड्डुओं से तृप्ति भाव का प्राकट्य। रंगपो के पश्चात निश्चित ही घुमाव बढ़ गए और यहां की वनस्पति अब समशीतोष्ण कटिबंधीय हो गई। शाल और सागौन आदि के स्थान पर बलूत, देवदारू आदि शुरू हो गए। अब ट्रैफिक भी कम हो गया तथा गांवों के पास भी लोगों की संख्या कम दिखाई देने लगी। आंखें फटी जा रही थीं और कैमरा बंद करने की इच्छा न हो रही थी। लगभग दस किलोमीटर तक शहर में चलते हुए विश्वविद्यालय के अतिथिगृह में पहुंच गया। तीन दिन की संगोष्ठी में अनेक बौद्धिक लोगों से बात करने का अवसर मिला। चूंकि यह आयोजन हिन्दी, अंग्रेजी और नेपाली विभाग के संयुक्त तत्वावधान में था अत: ज्यादा लोगों से सिक्किम और इसकी सांस्कृतिक समृद्धि पर चर्चा हो सकी।
भारत का यह राज्य मैदानी जनों में आज भी अपरिचित सा है। उन्हें लगता है कि यह जैसे कोई विदेशी राज्य हो। सिक्किम पूर्व में भूटान, पश्चिम में नेपाल तथा दक्षिण में पश्चिम बंगाल से घिरा है जिसका विस्तार 7096 वर्ग किलोमीटर है। वास्तव में यह नामग्याल राजतंत्र द्वारा शासित एक स्वतंत्र राज्य था, परंतु प्रशासनिक समस्याओं के चलते तथा भारत से विलय के जनमत के कारण 1975 में एक जनमत संग्रह के अनुसार भारत में विलीन हो गया। सिक्किम शब्द लिम्बू भाषा के शब्दों सु (यानी नवीन) तथा ख्यिम (अर्थात् महल अथवा घर) को जोडक़र बना है। तिब्बती भाषा में इसका अर्थ ‘चावल की घाटी’ है।
इस छोटे से प्रदेश में पूरे हिन्दुस्तान की झांकी देखी जा सकती है। धर्म, जाति, भाषा, संस्कृति के रंग-बिरंगे रूप की झलक यहां पाई जा सकती है। लेप्चा, भूरिया और नेपाली यहां निवास करते हैं। भूरिया लोग इसे डेनजांग कहते हैं जिसका अर्थ होता है ‘सुखी घर’ या ‘नया महल’ तथा लेप्चा में ‘नाईमाईल’ जिसका अर्थ ‘स्वर्ग’ से है। इन नामों से पता चलता है कि सिक्किम और उसके आसपास के सारे लोग इसके सौंदर्य को बहुत पहले से समझते आए हैं। पहाड़ों का जीवन सरल नहीं होता। रिक्शे की सवारी गांठने वाले जब यहां ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर करते हैं तो एक ही भाव निकलता है कि ‘भाई बड़ा कठिन है?’
लेप्चा लोक कथाओं में इनका बाहर से आने का जिक्र नहीं मिलता इसलिए इन्हें यहां का सबसे पुराना निवासी माना जाता हैा। लेप्चा भाषा को रीङरीङ कहा जाता है। लेप्चा प्रकृतिपूजक होते हैं साथ ही अपने पितरों के प्रति श्रद्धा का भाव रखते हैं। तिब्बत और भूटान से सिक्किम प्रांत में बस जाने वाले को भूटिया कहा जाता है। इनकी भाषा को भूटिया ही कहते हैं। नेपालियों का आगमन सिक्किम में 19वीं सदी में शुरू होता है। यद्यपि नेपाली बहुतायत से हिन्दू होते हैं, किन्तु नेपाली हिन्दू और बौद्धों की संस्कृति में और भी अधिक समानता पाई जाती है। चूंकि हिन्दू और बौद्ध तथा भूरिया और लेप्चा बौद्ध लोगों में आपस में शांति और प्रेम संबंध हैं।
एंचेयमठ बहुत ही पवित्र और सुंदर स्थान है। साल 1909 में सिक्किम की राजधानी में स्थापित इस मठ से कंचनजंगा पहाड़ी के दृश्यों के देखा जा सकता है। यहां के लामा ने बताया कि यह मठ बौद्ध धर्म के वज्रयान न्यिन्गमा समाज के अंतर्गत आता है। इस पर लामा द्रुपथेब का आशीर्वाद रहता है। एंचेयमठ का मतलब है एकांत मठ। इसके एक कोने में धूप जलाते हैं। यहां झंडे फहरा रहे थे। इन झंडों का आकार एक बहुत चपटे आयत के समान होता है। इन झंडों पर बौद्ध धर्म के मंत्र लिखे रहते हैं। इनके प्रभाव से पाप एवं दुष्ट प्रभाव दूर हो जाते हैं। शहर के ऊपरी भाग में प्रथम पूज्य श्रीगणेश का मंदिर गणेशटोक है।
रूमटेक मठ पेमयांची के बाद सिक्किम का सबसे प्रसिद्ध मठ है। यद्यपि सिक्किम में बौद्ध धर्म की निंगमा शाखा सर्वाधिक प्रचलित है तथा कर्माशाखा भी अपना महत्व रखती है और रूमटेक मठ इसी शाखा का प्रधान मठ है। यहां गंगटोक से 30 किमी की दूरी पर एक छोटी सी पहाड़ी को पृष्ठभूमि में लेकर बनाया गया है। इसमें लामाओं का शिक्षण बड़े पैमाने पर होता है। लामाओं में अपने गुरु के प्रति जो आदर एवं अनुशासन का भाव होता है वह किसी कानून के भय से नहीं संस्कार के उदात्त रूप का प्रतिफल है। मठ की दीवारों पर बुद्ध और पद्मसंभव आदि के सुंदर और आकर्षक चित्र बने हुए थे। केसरिया रंग लामाओं के प्रिय रंग हैं और इसके भिन्न-भिन्न रूप किसी में लालिमा ज्यादा, किसी में स्वर्णिम की प्रखरता। इन रंगों में सूर्य और अग्नि का तेज झलकता है।
गंगटोक से लगभग 15 किलोमीटर पर विशाल ऑर्किडेरियम है। इसमें अमूमन 300 जातियों के ऑर्किड हैं और कुछ उष्णकटिबंधीय आर्किडों के लिए उष्ण गृह भी हैं। सेमतांग के पहाड़ों पर चाय के बागान बहुत हैं। यहां से सूर्यास्त का मनोरम दृश्य देखा जा सकता है। चाय बागान को दूर से देखने पर हरे गलीचे का आभास होता है। गंगटोक से उत्तर जाने वाले राजमार्ग से लगभग दस किलोमीटर हटकर जोंगु है। तीस्ता नदी के किनारे तथा पहाड़ों से घिरा यह बड़ा रमणीक स्थान है। जोंगु घूमते हुए देखा कि तीस्ता के किनारे-किनारे बड़ी इलाचयी के बड़े-बड़े खेत थे।
चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के साथ जोडऩे वाला नाथूला दर्रा गंगटोक से लगभग 50 किलोमीटर पूर्व में स्थित है। गंगटोक में पूर्व अनुमति के आधार पर यहां पाया जाया जा सकता है। यहां एक भारतीय युद्ध स्मारक भी है। ‘नाथू’ शब्द का अर्थ है- सुनते हुए कान और ‘ला’ तिब्बती भाषा में पास का द्योतक है। नाथूला दर्रा चीन और भारत के बीच तीन खुली व्यापार चौकियों में से एक है। वर्ष 1962 में इस दर्रे को सील कर दिया गया था परंतु साल 2006 से इसे फिर खोल दिया गया। सर्दियों में यह बंद रहता है। इस क्षेत्र की सडक़ का रखरखाव सीमा सडक़ संगठन के जिम्मे है।
स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत देखना है तो गंगटोक का महात्मा गांधी मार्ग मिसाल है, 2014 से नहीं, अपने अस्तित्व से। यह देश की अकेली थूक और कूड़े मुक्त लेन है। इसमें किसी भी वाहन के आने की अनुमति नहीं है। आकर्षक मार्ग के दोनों ओर बैठने की बेंचें और अपनी ओर खींचने वाली सिक्किम कला की दुकानें हैं। टाइटैनिक पार्क में दर्शकों, पर्यटकों के बैठने, सुनने और आराम करने के लिए संगीत बजाया जाता हैा।
बड़ी इलायची, अदरक और हल्दी के साथ-साथ नारंगी के सुंदर बगीचे शारीरिक मानसिक ज्वर को कम कर देते हैं। मोमो, चाउमीन, थुक्पा, थान्तुक, फाख्तु यहां के परंपरागत भोजन हैं। भाप से पका मोमो उत्तर भारत की गुझिया का रूप लिए रहता है। टमाटर की झाल (कड़ू) चटनी के साथ सिक्किम की महक से सराबोर कर देता है। यहां के आवास देहाती हैं। जो मुख्यत: कड़े बांस के ढांचे पर लचीले बांस का खोल डालकर बनाए जाते हैं। ऊष्मा शोषण के लिए ऊपर गाय का गोबर लीपा जाता है।
प्रकृति के सीधे सान्निध्य ने सिक्किम को स्वच्छ, सरल रखा है। मनुष्य बनने का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण और कहां देखने को मिलेगा? चश्मा बदलने की जरूरत है। असंस्कृत, असभ्य संज्ञापित करने वालों से कहते नहीं बनता कि इस देवभूमि में आकर तो देखें कुछ कलुष जरूर धुलेगा। हमारे पड़ोसी देश ने सिक्किम को कितना अपना माना इस पर विचार से पूर्व यह चिंतन का विषय है कि हमने इसे अपना कितना समझा।