Monthly Magzine
Wednesday 22 Nov 2017

कोलकाता में दो दिन : एक साहित्यिकी

डॉ. सुधेश
314, सरल अपार्टमेंट, द्वारिका, सेक्टर-10, दिल्ली-73
लगभग साढ़े19 वर्षों बाद मैं 29 मार्च 2007 को दुबारा कोलकाता पहुंचा। सोचता रहा कि विगत दो दशकों में कलकत्ता कितना बदल गया होगा? कलकत्ता कोलकाता हो गया। वहां पहुंचकर देखा कि कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है। वही गर्मी है और वही लोगों की भीड़ है, बल्कि भीड़ पहले से ज्यादा बढ़ गई है। हवाई अड्डे से टैक्सी लेकर 17 कि.मी. की दूरी पर हावड़ा रेलवे स्टेशन पहुंचा, क्योंकि उसी दिन मुझे शांति निकेतन जाना था। वहां से 31 मार्च को लौटकर मुझे फिर कोलकाता आना था।
 टेलीफोन पर स्वदेश भारती से बातचीत हुई। उन्होंने परामर्श दिया कि हावड़ा स्टेशन की बगल में यात्री निवास है। उसमें अपने लिए पेशगी आरक्षण करा ले।  मैंने यात्री निवास में जाकर पूछा तो बताया गया कि आरक्षण वही यात्री करा सकता है, जिसके पास रेल टिकट हो। मेरे पास हवाई यात्रा का टिकट था, पर मैं यात्री निवास में ठहरने की अर्हता तभी प्राप्त कर सकता था, जबकि मेरे पास आगामी रेलयात्रा का टिकट होता। अजीब शर्त है। कोई भी व्यक्ति यात्री हो सकता है। चाहे वह यात्रा से लौटकर आया हो अथवा यात्रा पर जाने वाला हो और विचारक तो कहते हैं कि जीवन भी एक यात्रा है। पर ये बातें यात्री निवास का क्लर्क नहीं सुनता।  मैंने कहा- ‘मुझे एक पलंग वाला कमरा चाहिए।’उसने बताया- ‘यही है। यहां अब कमरे पलंग वाले हैं और किराया 350 रुपए प्रतिदिन है, यह भी वातानुकूलन रहित कमरे का।’ मेरा उत्साह भंग हो गया। मन में सोचा कि यात्री निवासी भी होटल बना हुआ है।
31 मार्च को शांति निकेतन से लौटकर मैं फिर हावड़ा पहुंचा और दो दिनों तक कोलकाता में रहा। स्वदेश भारती से शाम को मिलना निश्चित हुआ। कुछ मित्रों से मिलने के लिए ही मैं कोलकाता मैं ठहरा था। स्टेशन के टेलीफोन बूथ से कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग का टेलीपोन नम्बर लेकर मैंने हिन्दी विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष जगदीश्वर चतुर्वेदी से बात करने की कोशिश की, पर सफलता नहीं मिली। टेलीफोन की घंटी बजती रही, पर रिसीवर किसी ने नहीं उठाया। जगदीश्वर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मेरे शिष्य रहे हैं।
स्टेशन से भारतीय भाषा परिषद के निदेशक इन्द्रनाथ चौधरी को फोन किया। उन्होंने बताया कि परिषद के अतिथिगृह में एक कमरा मेरे लिए आरक्षित कर दिया गया है। चौधरी जी को तब से जानता हूं जब वे साहित्य अकादमी के सचिव थे। एक दो बार वे मेरे शिष्यों के शोध प्रबंधों के परीक्षक रहे और उनकी मौखिक परीक्षा लेने जेएनयू में आए।
कोलकाता जैसे महानगर में अपरिचित रास्तों पर भटकना मेरे लिए दुष्कर था। इसलिए कुछ लेखकों को टेलीफोन करके उनसे मिलने की इच्छा व्यक्त की। उनमें वहां के आलोचक श्रीनिवास शर्मा, हिन्दी और बंगला की लेखिका जलज भादुड़ी, हिन्दी की कथाकार सुकीर्ति गुप्ता, कवि स्वदेश भारती, संपादक और कवि एकान्त श्रीवास्तव, आलोचक कृष्णबिहारी मिश्र के नाम उल्लेखनीय हैं। शाम को डॉ. श्रीनिवास शर्मा मुझसे मिलने परिषद में आए। स्थूल शरीर वाले 74 वर्षीय शर्मा जी बड़े सक्रिय हैं। वे मुख्य रूप से आलोचना लिखते हैं, पर उनकी कहानियों का संग्रह भी छपने वाला है। उन्होंने बताया- ‘‘मूलत: मैं बिहार का हूं, वहां के एक गांव का। आठवीं कक्षा पास करके पिताजी के साथ कलकत्ता आ गया था। यहीं शिक्षा पाई। पहले स्कूल में शिक्षक रहा। फिर बैंक में हिन्दी अधिकारी हो गया। वहीं से मैं सेवानिवृत्त हुआ।’’ शर्मा जी से अनेक विषयों पर चर्चा हुई। पता चला कि वे जनवादी लेखक संघ में सक्रिय हैं और आजकल उसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं। कोलकाता की एक साहित्यिक संस्था ‘प्रतिध्वनि’ के शर्मा जी अध्यक्ष हैं। वहां के साहित्यिक जगत में वे काफी सक्रिय हैं। पिछले अनेक वर्षों से श्रीनिवास शर्मा ‘छपते-छपते’ हिन्दी दैनिक के दीवाली विशेषांक का सम्पादन करते आ रहे हैं। उसकी एक प्रति उन्होंने मुझे भेंट की। मैंने अपने खण्डकाव्य ‘बरगद’ की प्रति उन्हें उपहार रूप में दी। ‘छपते-छपते’ का विशेषांक वस्तुत: संग्रहणीय है।
लगभग छह बजे मैंने शर्मा जी से कहा- ‘हम दोनों स्वदेश भारती के घर चलें तो कैसा रहेगा। उनसे शाम को मिलना निश्चित हुआ।’ वे चलने को तैयार नहीं हुए। अकेले दूर जाना मेरे वश का नहीं था। मैंने भारती के घर जाना टाला। शर्मा जी इन्द्रनाथ चौधरी से मिले। मैं भी उनके साथ था। उनके बीच घनिष्ठता का आभास मिला। शर्मा जी चले गए। मैं सोचने लगा कि मेरी शाम कैसे कटे। विचार आया कि शेक्सपीयर सरणी पर निकट ही जलज भादुड़ी रहती हैं। उनसे मेरा परिचय उन दिनों हुआ था जब मैं सहज कविता त्रैमासिक पत्रिका निकाल रहा था (सन् 1994 से 1996 के बीच)। तब उनका पत्र आया था और साथ में कोई रचना भी। मैंने उनके घर पर टेलीफोन किया और बताया कि उनके पड़ोस में ठहरा हूं। वे प्रसन्न हुईं और मुझे अपने मकान पर बुलाया। चाय पीते हुए उनसे अनेक विषयों पर बातें हुईं। उन्होंने बताया- मैं बंगला और हिन्दी में समान रूप से लिखती हूं। दोनों भाषाओं में मेरी पुस्तक छपी हैं। मेरे पिताजी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उपकुलपति थे। मैं हिन्दी में एम.ए. हूं और विश्वभारती से संगीत में पीएचडी डिग्री पाई।
यह सुनकर अच्छा लगा कि जलज भादुड़ी ने बंगला में कुछ कहानियां लिखीं हैं। जलज ने हिन्दी, बंगला और संगीत के ज्ञान का खूब सदुपयोग किया। उनके पति श्री भादुड़ी कोलकाता के नामी वकील थे। पर वे दस वर्ष पहले लकवाग्रस्त हो गए। मैं उनसे भी मिला पर वे बोल नहीं सकते। देखते रहते हैं, शायद दूसरे की बात सुनते और समझते हैं, और इशारों में कुछ कहते हैं। जलज उनकी सेवा में संलग्न हैं। जलज भादुड़ी अब नानी हैं और दादी भी हैं। उन्होंने अपनी कुछ पुस्तकें मुझे भेंट की। उनमें से एक पुस्तक में रवीन्द्रनाथ टैगोर के बंगला गीतों का हिन्दी में काव्यात्मक संगीतात्मक अनुवाद हैं जिसमें उन्हें गाने के लिए स्वरलिपि भी दी गई है। यह अद्भुत पुस्तक है। रवीन्द्र के गीतों के अनेक अनुवाद हुए, पर हिन्दी में जो अनुवाद जलज भादुडी़ ने किया वह काव्यात्मक है, संगीतमय है। दूसरी पुस्तक में अनेक भारतीय भाषाओं की अनेक विधाओं की रचनाओं के हिन्दी में अनुवाद हैं। इसमें अनेक अनुवादकों का सहयोग लिया गया है। वे एक महत्वाकांक्षिणी नारी हैं। उन्होंने पारिजात प्रकाशन नामक प्रकाशन खोला, जिसके अंतर्गत कई पुस्तकें प्रकाशित हुई। उत्तरप्रदेश के हिन्दी संस्थान से उन्हें एक लाख रुपयों का पुरस्कार मिला था, जिसे उन्होंने पारिजात प्रकाशन में लगा दिया। उनसे बातें कर बड़ी प्रसन्नता हुई। लगभग एक डेढ़ घंटे बाद मैंने उनसे विदा ली। 1 अप्रैल को काफी व्यस्तता रही। जगदीश्वर से टेलीफोन पर बात हुई। मेरा नाम सुनकर वे प्रसन्न हुए। और मझसे मिलने के लिए भारतीय भाषा परिषद में साढ़े बारह बजे आने का वादा किया। उनकी प्रतीक्षा करते हुए मैं साढ़े ग्यारह बजे सुकीर्ति गुप्ता के घर नहीं जा सका। पर जगदीश्वर निश्चित समय पर नहीं आए। कुछ देर बाद मेरे एक शिष्य रमेश मोहन झा आ गए। उन्हें मेरे कोलकाता आगमन की सूचना श्रीनिवास शर्मा से मिली। रमेश मोहन ने मेरे निर्देशन में जेएनयू से पीएचडी की थी। बिहार में किसी कॉलेज में कुछ समय तक अध्यापन करने के बाद कोलकाता में नौकरी पा गए। उनसे अनेक बातें हुई। उन्होंने जेएनयू के अपने कई सहपाठियों की प्रगति के बारे में बताया। ढाई-तीन बजे जगदीश्वर चतुर्वेदी आ गए। कई दशकों बाद उन्हें देखा। जेएनयू में जब वे विद्यार्थी थे तो छरहरे बदन के थे। अब कुछ मोटे हो गए हैं। पर उनके गोरे रंग पर उन्मुक्त हंसी वही है, जो खूब खिलती हैं। जगदीश्वर की हंसी अपनी है और निराली है। वे ‘सर’ कहकर मुझे संबोधित कर रहे थे। मैंने टोका तो बोले- ‘आप जे.एन.यू. में मेरे गुरु रहे, तो मैं आजीवन आपका शिष्य रहूंगा। मैं अपने गुरुओं को नहीं भूलता।’
जगदीश्वर से ढेरों बातें हुई। उन्होंने बताया कि वे कोलकाता विश्वविद्यालय में लेक्चरर बनने के बाद वर्षों बाद रीडर हो गए और उसके सात वर्षों बाद प्रोफेसर हो गए अर्थात् ग्यारह वर्षों के सेवाकाल में प्रोफेसर हो गए। मेरे लिए यह संतोष एवं गर्व की बात है।  
लगभग साढ़े 5 बजे सुकीर्ति के घर पहुंच गया। अनेक वर्ष पहले उन्हें दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में अपूर्व सुन्दरी के रूप में देखा था। जब उन्हें एकदम बुझे हुए दीपक की भांति देखा, मैं दंग रह गया कि यह वही सुकीर्ति हैं। समय का अंतराल काफी हो गया था। खैर, उन्होंने मेरा स्वागत किया। मेरे लिए चाय, समोसे मंगवाए। अब उन्हें चलने-फिरने में भी कष्ट होता है। कुछ वर्षों पहले वे घर में ही गिर गई, कई महीने अस्पताल में पड़ी रहीं। पर अब भी उन्हें चलने में कष्ट होता है।  सुकीर्ति गुप्ता एक संघर्षशील नारी है, जो अपने बल पर आगे बढ़ीं, और अब अपने बल पर जीवित हैं। वे शरीर से अशक्त हो गई, पर उनका मन शक्ति का स्रोत है। उनका कहानी लेखन अब भी जारी है। मेरा संदेश टेलीफोन पर पाकर स्वदेश भारती मुझे लेने आ गए। मैं भारती की कार में बैठकर उनके घर गया। उन्होंने अपना तीन मंजिला आलीशान मकान दिखाया।जिसके तीनों तलों की बाल्कनी में गमलों की पंक्तियां सजी हुई हैं, जिनमें रंग-बिरंगे फूल मौसम के अनुसार खिलते और सुगंध बिखेरते हैं। ये भारती के प्रकृति प्रेम के साक्षी हैं। वे एक जबर्दस्त कुत्ता पालते हैं, जो उनके साथ लगा रहता है। उनके अनुसार वह कोई चीज नहीं छूता। मैंने चुटकी ली- ‘आपका जीवन तो अनुशासित है ही, आपका कुत्ता भी अनुशासित है।’ वे जोर से हंसे।
भारती मुझे अपने अध्ययन कक्ष में ले गए, जहां किसी दफ़्तर की तरह एक मेज सजी है, आसपास कुछ कुर्सियां और बीच में एक कुर्सी हैं। लगता है कि उनका दफ्तर उनके घर में भी मौजूद है। बीच की कुर्सी पर बैठकर उनके अनुसार वे रोज कविता लिखते हैं। मेरे मन ने पूछा- ‘क्या रोज कविता लिखी जा सकती है, चाहे मूड हो या न हो। भारती जी ने सन् 2007 ई. की एक डायरी मेरे सामने रख दी, और बताया कि वे रोज उसमें कविता लिखते हैं अैर उसमें कोई काटछांट नहीं होती। जो लिखते हैं वह अंतिम पाठ होता है। अपनी कुछ पुस्तकें भारती जी ने मुझे भेंट की। उन्हें भेंट करने के लिए मेरे पास कोई पुस्तक नहीं बची थी। वह शाम अच्छी बीती। कोलकाता के एक सक्रिय साहित्यकर्मी से मिलना एक सुखद अनुभव रहा। मैं भारतीय साहित्य परिषद के अतिथिगृह में आकर अपना सामान बटोरने लगा। मुझे उसी रात उड़ीसा के लिए गाड़ी पकडऩी थी। ‘वागर्थ’ के सम्पादक एकान्त श्रीवास्तव नहीं आए, यद्यपि उन्होंने मिलने का वादा किया था।