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Sunday 19 Nov 2017

मेरा गांव-मेरा देस


सुरेश शॉ

8,पॉटरी रोड,
कोलकाता-700015
मो. 09163707510

जब मैं छोटा था, साथ खेलने वाले मुहल्ले के लडक़े मुझसे पूछते थे, ‘तोर देश कोथाय ?’ मैं समझ जाता कि ‘देश’ मतलब हमारे बंगाली बंधु, मेरा गांव कहाँ है, यह जानना चाहते हैं। मैं कहता- जहाँ खड़ा हूँ, वही मेरा देश है। जो तुम लोग कह रहे हो, वह तो मेरा गाँव है ! पाँच-छह वर्ष का रहा होऊँगा, जब मैं कलकत्ता महानगर का हिस्सा बना। तब से असंख्य बार दुर्गा पूजा-काली पूजा में घूमने-फिरने का आनंद उठा चुका हूँ । लेकिन पूजा की सादगी अब कहाँ ! अब सादगी को फैशन ने हथिया लिया है और भक्ति को व्यापार ने।
बंगाल का दशहरा बहुत देखा-सुना। हे मन ! इस बार (2007 की बात है) चलो उस भूमि पर जो ‘मेरा गाँव-मेरा देस’ है और जहाँ की ‘बंसवारी’ में मेरी ‘नाल’ आज भी गड़ी पड़ी है।’  बकौल गाँधी जी- ‘सच्चे भारत को देखना हो, तो रेल गाड़ी से यात्रा करो।’ मुझे ‘सियालदह-बलिया एक्सप्रेस’ में खिडक़ी वाली सीट मिल गई थी और इस रूट से की गई बचपन की रेल यात्रा में मैं पूरी तरह खो गया था। बर्दवान का मेहीदाना, दुर्गापुर का इस्पात कारखाना, आसनसोल का कोलफिल्ड, चित्तरंजन का लोकोमोटिव, जसीडीह का बाबा धाम, सिमलतला की लाल माटी, झाझा का ठंडा पानी, किऊल का रेलवे जंक्शन, ‘दिनकर’ का सिमरिया घाट, मोकामा का पुल, बरौनी तेल शोधक फैक्ट्री, हाजीपुर का चिनिया केला, सोनपुर का हरिहर छतर मेला पार करते हुए तडक़े पहुंच गया छपरा कचहरी टीसन। ‘छपरा’, कभी जिला हुआ करता था। लोग जाने-अनजाने आज भी इसे यही मान बैठते हैं; लेकिन अब जिला ‘सारण’ है, छपरा ‘जिला मुख्यालय’। और बाबू राजेंद्र प्रसाद, लोकनायक जयप्रकाश नारायण और विदेसिया नाटक के प्रणेता स्व भिखारी ठाकुर का नाम भी इसी छपरा से जुड़ता है। सुबह चार बजे बस पड़ाव पहुंचा। खलासी अपनी खालिस आवाज में हाँक लगा रहा था—नगरा-गौरा- इसुआपुर। मेरा गाँव इसुआपुर के पहले पड़ता है, इसलिए मैं जीप की दूसरी पंक्ति में जा डटा। पर यात्रियों के डट जाने भर से क्या होना था; यहाँ के वाहन चालक-संचालक टेम को नेम भला कब मानते हैं ! गाड़ी के ओवर लोड होने जैसी संतुष्टि का भान होने पर ही ये हिलते हैं अपनी जगह से। गाँव की बूढ़ी आँखों ने जो अपनी खोई हुई संतान को अचानक देखा, तो अनायास वे गीली हो आईं। दु:ख से सुख की तासीर ज्यादा कारगर जो होती है। कुछ ही दिन पहले यहाँ जमकर बारिश हुई थी। इसकी यादें अब भी ताजा थीं। जिधर देखो पानी का भंडार अपनी स्थिर स्थिति में पतली-पतली तरंगों को समेटे था। धान के पौधों को तो, मानो क्वार की बयार ने अपनी बाँहों में जकडक़र जबरन बॉल डांस करवाया था, जिससे उन्हें थककर अपनी बाल-बालियों सहित खेतों में लेट जाने को बाध्य होना पड़ा था। हम परदेसी इस गँवई पीड़ा को भले न समझ पाते हों, परंतु अपनी जमीन से जुड़े किसान और गृहस्थ को इससे कितना नुकसान उठाना पड़ता होगा !! यह एक चिंतनीय विषय है। घोर वार्धक्य की जिंदगी जी रही एक अवर्ण महिला मेरी मौसी हुआ करती हैं। मेरी मां का नैहर बनौरा है, जबकि यह मौसी पीपरा की हैं। पीपरा- बनौरा एक फर्लांग से भी कम फासले पर हैं, लेकिन मेरी माँ और इस दुसाध जाति की स्त्री के प्रेम की दूरी हमेशा-हमेशा इससे भी कम रही है। मौसी ने जब सुना कि मैं शहर से आया हूं, तो अपने पास बुलाकर भूली-बिसरी बातों का बड़े मन से जिक्र किया और जब चलने को हुआ तो उन्होंने दिल खोलकर मेरे पूरे परिवार को आशीर्वाद भी दिया। इसुआपुर का आधुनिक विकास व फैलाव, सुना है, खूब हुआ है। आज यहाँ जमीन का मोल लाखों में आंका जाता है। ब्लॉक ऑफिस, डाक घर, पुलिस चौकी, लाल बाबा की मठिया, मंदिर-मस्जिद और प्राय: हर तरह की वस्तु-प्राप्ति की असंख्य दुकानें आज यहाँ खुल चुकी हैं। खैर, इस खेप में इस बाजार का दीदार नहीं हो पाया। कारण भी साफ था—अपने गांव से कूच कर भकुरा, भि_ी, बंगरा, सुम्हा, सलिमापुर और आटा-अंवारी के रास्ते मढौरा जा पहुंचा। यहां से समवयस्क भानजे दारोगा प्रसाद की योजना के मुताबिक हम एक मोटर साइकिल पर सवार होकर देहातों को ‘चालने’ निकल पड़े। यहां ‘चालने’ शब्द के प्रयोग करने का मेरा उद्देश्य यह बताना है कि एक बार मेवा बाबा (यहाँ के एक धनी आदमी) के भतीजे अलुआ (शकरकंद) माटी से खोदकर निकाल चुके थे। तब मैं उनके पीछे-पीछे खुरपी से मिट्टी को पुन: ‘कुरेद-कुरेदकर’ शकरकंदों को बटोर लाया था। यह घटना मेरे बचपन की है। उन दिनों बाबू मेवालाल साह के बदमाश भतीजों को शहर से बुलाकर गाँव पर रहकर खेतों में काम करने की सजा दी गई थी। फिर भी उनका अल्हड़पन कम न हो पाया था और यह उसी का नतीजा था कि वे बड़े बेमन से अलुआ ‘कोड़ते’ गए थे, लेकिन मैं बड़े मन से उन्हें ‘चाल-चालकर’ टोकरी में बटोरता गया था। राहीपुर, विक्रमपुर, भावलपुर, अमनौर, पचरौर, तरैया, पंचभिंडा, डेहुरी, धेनुकी, मढौरा, शिल्हौरी, शिवगंज, तेजपुरवां, मिर्जापुर, गौरा, हरपुर जैसे गाँव- बाजारों को हमने यूँ ही ‘चाला’। यहाँ मनोज राय का नाम न लेना उसके प्रति कृतघ्नता होगी। हँसमुख चेहरा गंभीर स्वभाव, पर तनिक अबोध इस बलिष्ठ युवक की जो क्षमता और ड्राइविंग-कुशलता मैंने देखी, वह शायद ही किसी ‘पायलट’ में मिले, क्योंकि मनोज, मैंने और दारोगा ने एक ही दुपहिया पर बड़े आराम से जितनी दूरी तय की वह किसी हवाई-यात्रा से कम सुखद और आरामदेह नहीं था। इस यात्रा में अमनौर वाले उत्तिम साह की मिठाइयों की मिठास भी मुझे याद है। और याद है उन बाप-बेटे का सौम्य व्यवहार और उनके जलेबियां खिलाने का आग्रह। ऊपर से उन्होंने हमसे पैसे भी नहीं लिये कि मैं दारोगा का मामा हूं और कलकत्ता से देहात घूमने आया हूँ। इस यात्रा की अगली मंजिल मेरा ममहर था। ‘सवेरे वाली गाड़ी’ से हम दिघवा दुबौली स्टेशन पहुँचे। यहीं से दो साइकिलों का प्रबंध हो गया। 7 कि. मी. की दूरी जैसे पलक झपकते तय हो गई। यह मेरे ममहर जाने का उत्साह था। वहाँ की धूल के कण जैसे ही मेरी देह पर उड़ आये कि पुरानी यादें आँखों के सामने तैरने लगीं। मन प्रफुल्लित हो उठा। वापसी में दारोगा का यात्रा-अनुभव काम आया। ‘सबसे आगे वाली बोगी में चढि़ए, मामा जी ! सच में यहाँ कई लोगों के बैठने की जगह खाली पड़ी थी। ‘जी ! लोकल ट्रेनों में तो, यात्रा अपने ही अनुभव से करनी चाहिए-मैंने कहा।’ स्टेशन से ही भानजे ने भड़भूजे की दुकान से अपनी पसंद की मकई की ठिउड़ी, बड़ा बादाम और पंजाबी चना ले लिया था। नमक के साथ, मिर्चियाँ मंगनी मिली थीं। रूमाल बिछा, भूजा डला; गाड़ी अपनी रफ्तार से कतालपुर, राजापट्टी, मशरक, सामकौरिया, मढौर, पटेड़ा, खैरा स्टेशनों को पार करती रही और हम अपनी गति से भूजे-सूखे अनाजों को चबते-चबाते पहुँच गए छपरा। अचानक मैंने ही शुरू किया, मेला बाद में घूमेंगे; पहले गुदरी बाजार चलो। सुनना भर था कि दारोगा जी एक टांग पर खड़े हो गए। हम टेंपू से गुदरी बाजार पहुँच भी गए। एक-दो- तीन, कई दुकानदारों ने हमें यह तो बताया कि गुदरी बाजार यही है, पर ‘गुलाम रसूल मियां’ का मकान कहाँ है, यह बता पाना मुश्किल था। एक दर्जी महाशय से मैंने आहिस्ते से पूछा-जी, मियां गुलाम रसूल- ! कहा, दाएं मुडक़र चौराहे तक जाएं। चार-पाँच घर के बाद मस्जिद है। वहाँ आप बचनू मियां से भेंट कर लें। बचनू भाई, रसूल साहब के दामाद होते हैं। शुक्रिया, कह हम आगे बढ़े। ठीक जगह पहुँचा तो वह खुदा न खास्ता मिल ही गए। एक अनजान कलकतिया अचानक बचनू मियां से बता रहा है कि वह मुबासिरूल के स्कूल में पढ़ाता है। वही मुबासिरूल इसलाम जिसके अब्बू बांग्लादेश में रहकर व्यापार करते हैं और जिनकी दो बेटियाँ हैं। जो भी हो; बचनू मियां मूर्ख नहीं, जो इतना न समझ पाए हों कि मैं कौन हूँ !! वह तुरंत हमें बाँहों से खींचते हुए जलपान की दुकान तक घसीट ले गए। इससे हमें यही लगा, छपरा के हिंदू-मुसलमान बिल्कुल भाई-भाई हैं। वे समझदार हैं, व्यावहारिक हैं और सहज-साधारण होना इनकी विशेष पहचान है। अब छपरा के दुर्गोत्सव देखने की हमारी बारी थी। कटहरी बाग, भगवान बाजार, साहेब गंज, मौना चौक, थाना चौक के दुर्गा-पंडालों को देखा तो आँखें चौंधिया गईं। कौन कहता है कि केवल कलकत्ता में ही दुर्गोत्सव की धूम होती है। यहाँ, वहाँ से कुछ भी कम नहीं था। गाँधी चौक का पूजा-पंडाल तो बाहर से एकदम ताजमहल का डुप्लीकेट था। भीड़ के कारण हम यहाँ ऐसे फंसे कि हमारी गाड़ी छूट गई। लेकिन अच्छा यह हुआ कि इसी भीड़ में दारोगा के दोस्त; संतोष, अनवर, फारूक, विप्लव, और सोनू मिल गए । वापसी की गाड़ी रात दो बजे के बाद थी। पर भूख तो कब से लगी थी। सो हम लोग म्यूनिसिपैलिटी चौक के ‘जायका’ रेस्तरां में रात के शाही भोजन पर बैठ गए। नान रोटी, पनीर, चावल, अचार,और भी न जाने क्या-क्या लाने का हुक्म हुआ। पेट भरा और जेब खाली। जब पेट में दाना गया तो हिन्दुस्तानी खुशियाँ हमारे चेहरे पर झलक आईं। हम कचहरी स्टेशन आ गए। वहाँ की सराय नीचे मच्छरों और ऊपर मौसमी कीड़ों से अंटी पड़ी थी। सात लोग आपस में कब तक देहाती चुटकुले सुनते-सुनाते ! अत: हम स्टेशन हाते के शिव मन्दिर के दालान में जा घुसे; जहाँ एक श्यामवर्ण-दंतहीन बूढ़ा- ढोल-झाल, ताल-तमाल मंडली समेत भरसक अपनी मधुर आवाज में गीतों में गीत बिरहा,पूरबी भैरवी और कजरी गाए जा रहा था- के तोरा संगवा में जाई रे भंवरा, के तोरा संगवा में जाई....
प्लेटफॉर्म पर आये राम गये राम करते हुए एकदम धीरे स्वर में सुनाई पड़ा-छपरा से चलकर खैरा-मशरक- सिधवलिया होते हुए थांवे जाने वाली सवारी गाड़ी छोटी लाइन पर आ रही है। हममें से एक टिकट कटाने के लिए बढ़ा। पर जिस गति से गया था, वह उसी गति से लौट आया। टिकट खिडक़ी में हाथ घुसाना भी मुश्किल था। वह बोला—चलिए-चलिए, ‘गाड़ी भी अपनी, रेल मंत्रालय भी अपना। मंत्री जी तो अपने हैं ही।’ याद आया-13 अक्टूबर 2007 को ही तो चेंवरा वाली जमीन पर एक रेल इंजन कारखाना बनाने के लिए लालू जी मढौरा में कोई शिलालेख टांग गए थे। दशहरा का समय हो और मढौरा की ‘गढ़ी देवी’ का स्थान सूना रहे-असंभव ! रात भर दिल्ली की अंजना आर्य व पंचभिंडा के बबलू सिंह ने जागरण गीत गा-गाकर देवी माता के साथ-साथ बच्चे-बूढ़े- बीमारों को भी जगाए रखा। मेरे इस भ्रमण का अंतिम गंतव्य रहा राजधानी पटना। बाबा रे बाबा ! पाटलिपुत्र में दुर्गोत्सव की धूम अब भी मौजूद थी। बस स्टैंड से करबीगहिया, वहाँ से राजाबाजार जाना हुआ। फिर वही भीड़, वही हुजूम। पूजा साल में एक बार आती है, तो लोगों की देह में भरपूर ऊर्जा का संचार कर जाती है। यहां अभय बाबू हमारे अन्नदाता बने। चटपटी चटनी, विशुद्ध घी, सफेद भात, हींग-छौंकी दाल, मसालेदार तरकारी खाकर जो मैं अघाया कि उनकी पत्नी को ‘दूधो नहाओ - पूतो फलो का आशीर्वाद दे डाला। अगली सुबह ‘जनशताब्दी एक्सप्रेस’ पकडक़र अपने शहर के लिए रवाना हो गया—जिसके प्रवेश द्वार पर हावड़ा का पुल अपनी दो टांगों पर आज भी खड़ा है।