Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

हहराते समुद्र के साथ कन्याकुमारी की यात्रा


डॉ.सुमित्रा अग्रवाल

बी-604, वास्तु टावर, एवरशाइन नगर, मलाड़, मुंबई-400064,
मो. 9892138846

रात आधी बीत चुकी थी शायद। उस गंभीर गहरी रात में एक अद्भुत-सी गर्जनध्वनि ने मुझे जगा दिया। जागकर मैं ध्यान से उस ध्वनि को सुनने लगी- ओह, यह गंभीर गर्जना तो खिडक़ी के बाहर पसरे समुद्र से उठ रही है। हिन्द महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के मिलनबिंदु पर भारतभूमि के अंतिम छोर पर स्थित कन्याकुमारी के ‘होटल सीशोर’ के कमरे में लेटी मैं इस गर्जना की ध्वनि को विभोर हो सुनने लगी। कानों से पीने लगी।
सोचा एसी चल रहा है, खिड़कियां बंद है तब तो यह गर्जना इतनी गंभीर है तो समुंदर के किनारे खड़े होने पर यह ध्वनि कैसी होगी?
इसी के साथ याद आई सोमनाथ प्रवास की वह अद्भुत रात। आधी रात को जब हम समुद्र के किनारे जा खड़े हुए थे उसके फुफकारते तड़पते अशांत प्रवाह से मिलने तब एक उल्लास, एक रोमांच, एक भय नस-नस में दौड़ आया था। अब तो जीवन आगे बढ़ चुका है पर वह स्मृति अब भी सिहरा देती है। ऊपर तारों भरा चमकीला आकाश और नीचे उस अथाह जलराशि में टूटते तारे, चारों तरफ निर्जनता पसरी हुई थी। हमारे अलावा और कोई भी वहां उपस्थित नहीं था। वैसा साहस वैसी सामथ्र्य कब कहां है? बाद में पता चला सोमनाथ मंदिर भूमि के जिस छोर पर अवस्थित है उसके बाद सीधे दक्षिणी ध्रुवप्रदेश की भूमि ही है, बीच में है केवल और केवल हहराता समुद्र। अब तो कमरे में लेटे-लेटे उस घोष को सुनते-सुनते ही उसे देखना भी था। दो-ढाई घंटे तक चले ज्वार के समुद्र की गर्जना निरंतर अमृत की बूंदें कानों में टपकाती रही। उन्हीं जीवन्त क्षणों में सोई हुई स्मृति बचपन में पढ़ी कविता के रूप में जाग उठी-
खारा-खारा उस जेवा
आघा-आघा तेल
पोणी दुनिया उपर ऐना
पाणी रेलमछेल।
आरो के ओवारो नहीं
पाळ के पळतारो नहीं
सामो तो किनारो नहीं
पसराया ए जलभंंडार समेरमेर्या
महासागर तो महासागर।
फिर अनायास ही वह गर्जना मझे सालों पीछे खींच वहां ले गई जहां एक और मीठी स्मृति मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी। उस समय तेरह वर्ष की किशोरी मैं खार के घर में रहने गई ही थी। सामने फैला था खार-डांग की जुहू का वह समुद्र जिसे खिडक़ी में खड़े-खड़़े मैं अपलक निहारती रहती थी। लहरों पर लहर और उनसे निकला मधुर संगीत। दूर किनारे पर झुके खड़े नारियल के वृक्ष भी मानो इन लहरों की ताल पर झूमते-झूमते मस्त हो और भी झुक जाते। चांदनी रातों में उस सुनसान परिवेश पर मानो चांदी बिखर जाती। सब कुछ इतना शांत, इतना सुंदर, इतना अलौकिक लगता वह सारा का सारा समां एक जादुई नींद में मदहोश डूबा है- आंखों में रंगबिरंगे सपने भी। उतने ही चांदी से चमकीले सपने मेरी आंखें में भी भरे थे। तब याद हो आई थी भारती जी की यह कविता-
रात आधी बीतने के बाद
चांद डूब जाता है
और एक जादुई फूल खिलता है
अंधेरे का!
कन्याकुमारी सुंदर है, अद्भुत है- जानती थी, सम्मोहित भी थी, पर वह इतना सुंदर है नहीं जानती थी। उस खारे समुद्र ने अपना कुछ नमक मुझमें भी भर दिया। और मैं लौट गई वर्षों पीछे- उस घर में जहां मैं प्रकृति के ठीक बीच में खड़ी उसका स्पर्श महसूस कर रही थी।
उस घर की स्मृतियों के साथ-साथ जुड़ी चली आई मां की मीठी स्मृतियां। घर से बाहर कम ही निकलने वाली मां। हमेशा किसी न किसी काम में डूबी रहने वाली मां, जिसके घर की खिडक़ी के बाहर ऐसा समद्र पसरा हो वह बाहर न भी जाए तो क्या? स्मृतियों के सहारे उस घर में पहुंचते ही मैं मां के स्पर्श की ऊष्मा में लिपट गई। उसका मुस्कुराता प्रसन्न चेहरा मन के आकाश पर छा गया। कन्याकुमारी की यात्रा अपनी मां के सानिध्य में उस परिचित प्रिय घर के साथ ही सम्पन्न हुई। वे दोनों रातें अधसोते, अधजागते उस गंभीर गर्जना को सुनते-सुनते बीती। वही था कन्याकुमारी से मेरा वास्तविक साक्षात। क्या कभी फिर जा पाऊंगी वहां?