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Tuesday 21 Nov 2017

गाजीपुर, लार्ड कार्नवालिस और विवेकी राय

डॉ.सेराज खान बातिश

3-बी, बंगाली शाह वारसी लेन, दूसरा तल्ला, फ्लैट न.4, खिदिरपर, कोलकाता-700023, मो.9339847198

वर्षों से तमन्ना थी कि गाजीपुर शहर देखूं, पर वह अवसर प्राप्त नहीं होता रहा। किशोरावस्था में कलकत्ता आ गया और यह महानगर ही अपना डेरा-ठीहा हो गया। स्कूल में बाबू बालमुकुंद गुप्त का एक निबंध पढ़ा था ‘पीछे मत फेंकिये’ जिसमें निबंधकार ने बड़े व्यंग्यात्मक ढंग से भारतवासियों के संघर्ष, कर्मठता और जिजीविषा का बयान किया है। उसी निबंध से पता चलता था कि गाजी पुर में भारत के गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस का मकबरा है, उसे देखने की मन में बराबर उत्कंठा बनी रही। मगर जब भी गांव गया तो गाजी पुर शहर न जा सका।
कहने को तो हम उत्तरप्रदेश के जिला गाजी पुर के रहने वाले हैं मगर चढ़ते-उतरते हैं, बिहार के बक्सर से। बक्सर उतरकर हम गंगा पार करते हैं, हां-हां वही गंगा जहां शेरशाह और हुमायंू का निर्णायक युद्ध हुआ था और सूरवंश ने दिल्ली की हुकूमत पर कब्ज कर लिया था। कहा जा सकता है कि हम बंगाल से चलकर कई संस्कृतियों से होते हुए उत्तरप्रदेश के एक अति कडिय़ल गांव जिसे करइल क्षेत्र भी कहा जाता है, में आते हैं। इस क्षेत्र के पठानों की लाठी, चिकनी करइल माटी और मसूर की दाल प्रसिद्ध है।
लेकिन इस बार मैंने ठान लिया था कि किसी तरह भी गाजीपुर शहर जाऊंगा और लार्ड कार्नवालिस का मकबरा देखूंगा। हां सोनामाटी के लेखक डॉ. विवेकी राय से भी मिलूंगा। मई का महीना था। मुगलसराय से भतीजे लड्डन के साथ सुबह मुंह अंधियारे हम निकल पड़े। भतीजा गंवई चाल ढाल का है। इसमें उसका अलग ही वैभव है। रेलवे कॉलोनी से निकलकर शार्टकट पहुंचने के चक्कर में खड़ी मालगाड़ी से खुद गुजरते हुए लड्डन- मुझसे भी कमर टेढ़ीकर सरक आने कहते हुए उस पार हो गया। मुझे अजीब लग रहा था। लेकिन मजबूरी थी। उसके अधीन था। बड़ी मुश्किल से मालगाड़ी पार करके मुगल सराय रेलवे स्टेशन पहुंच मैं टिकिट के लिए लाइन में लग गया। लाइन लम्बी थी, इस गाड़ी में, जिसे लोग ‘गाजी पुरहिया’ लोकल कहते हैं, बड़ी भीड़ होती है। भतीजे लड्डन ने मुझे लाइन से खींचते हुए  बोला- चलिए गाजी पुरहिया में टिकट लीजिए...। चलिए, निकलिए देर हो जाएगी, हम हंै न...
सुबह का समय था। इतना सुन्दर और खुला हुआ साफ वातावरण शहर में कहां नसीब होता है। इस प्राकृतिक उपहार से हम शहरवासी प्राय: वंचित ही रहते हैं। ‘गाजीपुरिया लोकल’ खुल गई थी। मुझे भतीजे ने जबरन एक व्यक्ति को उठाकर बैठा दिया। वह भी बिना प्रतिवाद किए एक कोने में सरक गया। मैं अपनी ठाठ और ठसक से बैठा उन मजदूर, किसान लोगों में ‘साहब’ सा लग रहा था, वे लोग मुझे $गौर से देख रहे थे। शायद वे मुझे कोई बड़ा अधिकारी समझ रहे थे। मैं उनकी भंगिमा पढ़ कुछ और बन बैठा था। दिलदार नगर आ गया था। कई तरह के लोग चढ़े-उतरे थे पर वो भतीजा न जाने कहां बैठा था। गाड़ी सरकने लगी थी तो देखा लड्डन गुटका हाथ में लिए प्लेटफार्म पर दौड़ रहा है। मुझे लगा कि वह छूट गया, पर देखा कि गेट में चढ़ आया है और गुटका फाडक़र मुंह में डाल रहा है। मुझे उसकी इस हरकत पर बड़ा गुस्सा आया। मुंह में गुटका के कारण वह मुझसे छुपता रहा। मैंने देखा दूर टीटी अपने दो सहयोगियों के साथ टिकट चेक करते हुए चला आ रहा है। मेरे तो होश उड़ गये। लड्डन पता नहीं कहां फिर गुम हो गया था। जो रौब और बाबूगिरी चेहरे पर बनाने बोला था उस चेहरे पर हवाइयां उडऩे लगी थी। मैं आजू-बाजू देखने लगा। टीटी करीब आ गया था और बगल वाले से टिकट तलाश करने लगा था। वह अपना पॉकेट तलाशते हुए अपना पर्स निकालने लगा था। इधर मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो रही थी-‘‘कहां फंस गया। यह कितनी बड़ी बेइज्जती है। मुझे लड्डन पर क्रोध आने लगा मेरे चेहरे का रंग उड़ता जा रहा था।’’ टी.टी. ने मुड़ते ही मुझसे टिकट मांगा। मैं कुछ  बोलता कि पीछे से लड्डन टी.टी. से बोला कि ‘‘सर ये मेरे चाचा हैं।’’ टी.टी. जा चुका था और मैं अपनी सारी योग्यताओं, शैक्षणिक डिग्रियों के साथ भावविहीन हो उसे देखता ही रह गया...। यह मेरे जीवन का पहला अनुभव था कि इस महान देश में बहुत कुछ संभव है। योग्यता, कौशल और शिक्षा ही जरूरी नहीं है... कुछ झलक तो हम राजनीति में देखते ही हैं...ताड़ीघाट आ गया था। यह नाम शुद्ध रूप से मेरे किसी कौतुहल का कारण रहा है। गाजी पुरी कुछ लेखकों ने ताड़ीघाट पर कुछ कहानियां भी लिखी हैं, पर मेरी समझ में वहां ‘ताड़ी’- देशी शराब, जिसे बिहार के कुछ नेता शराब न कहकर ताड़ का रस-जूस कहते हैं और इस पर प्रतिबंध का घोर विरोध करते हुए आम जनता को पीने का आह्वान कहते हैं। वे कहते हैं कि ‘यह स्वास्थ्य के लिए अमृत है...’। खैर ‘नौका डूबी’ उपन्यास में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने गाजी पुर घाट पर ‘फेनिल ताड़ी’ उतारने की बात कही है। इससे ही इसकी प्रासंगिकता स्पष्ट हो जाती है। ताड़ीघाट गाजी पुर का एक पुराने रेलवे स्टेशन है जो $गाजीपुर घाट के नाम से जाना जाता है। उसके बाद ही गाजीपुर सिटी स्टेशन आता है। लड्डन को अपने किसी केस के सिलसिले में कोर्ट जाना था, वह वहां से विदा हो गया। मैंने राहत की सांस ली।
मैं नजरें भर-भरकर उस ऐतिहासिक गाजीपुर को देख रहा था जहां करीब तीन सौ वर्ष पहले भारत के गवर्नर जनरल आए थे और वहीं उन्होंने अंतिम सांसें ली थी। मैं कौतुहल से भरा था। वैसे तो गाजीपुर अपने ऐतिहासिक और मिथकीय संरचना में कई सहज भाव समेटे हुए हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे ‘लहुरी’ काशी कहा है। यह ‘लहुरी’ शब्द भी अपने आपमें बड़ा रोमांचित करने वाला है। हमारे यहां ‘जेठरी’ (बड़ी) और ‘लहुरी’ (छोटी) बड़ा प्रचलित है। काशी से मात्र पचहत्तर कि.मी. की दूरी पर बसा यह शहर कई अर्थों में महत्वपूर्ण है। कभी गुलाबों का शहर हुआ करता था गाजीपुर। यहां का सुगंधित अतर दूर देशों तक मशहूर था। अफीम की फैक्ट्री, कोट वाले हनुमान जी का मंदिर, नवाब का फाटक, प्याला का बारी, एक ताख की माजिद, हिजड़ों की मस्जिद, पहाड़ खां का पोखरा, पवहारी बाबा का समाधि स्थल, वाला शहर आज बहुत बदल गया है।
कहा जाता है कि कविन्द्र रवीन्द्र ने अपने प्रवास के दौरान नौका-डूबी उपन्यास और मानसी काव्य की रचना $गाजीपुर में ही की थी। स्वामी विवेकानंद 1896 में स्वास्थ्य लाभ के लिए यहीं आए थे और पवहारी बाबा के दर्शन किए थे।
यह वह जिला है जहां वीर अब्दुल हमीद हुए। राही मासूम रजा , एक्टर नजीर हुसैन और युनूस परवेज हुए... और भी कई विभूतियां हुई। डॉ. विवेकी राय ने लिखा है कि हम रवीन्द्रनाथ टैगोर, विवेकानंद स्वामी, सहजानंद सरस्वती, इंदिरा गांधी, चंद्रशेखर आजाद, राजेन्द्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, अम्बेडकर और महात्मा गांधी के स्मारकों, मूर्तियों के रूप को आदर देने के साथ लॉर्ड कार्नवालिस को भी सम्मान दे रहे हैं। मगर एक भोजपुरी कवि ने गाजीपुर शहर की विसंगतियों का विस्तारपूर्वक चित्रण करते हुए अंतिम पंक्ति में यहां के लोगों की मानसिकता और विवशता पर व्यंग्य करते हुए लिखा-
‘‘इहे जानि मन सब्बुर ना
लाट साहब के कब्बुर बा’’
अर्थात् चलो यहां कल कारखाने, चिकनी सडक़ें, खूबसूरत पार्क-सुव्यवस्थित पुस्तकालय, सफाई की सुचारू व्यवस्था नहीं है तो क्या हुआ, सब्ऱ करने के लिए लाट साहब की कब्र तो है न।
गाजीपुर पूर्वी उत्तरप्रदेश का एक छोटा सा शहर है जो बनारस से लगभग 70 कि.मी. पूर्व की ओर स्थित है, जिसे कुछ लोगों ने एक उदास शहर भी कहा है। उनकी दृष्टि में यहां कुछ भी दर्शनीय नहीं है, ताड़-खजूर और मकबरों वाले शहर में। मगर आदि कवि उस्मान ने अपनी चित्रावली में गाजीपुर का यूं उल्लेख किया है-
‘‘गाजीपुर उत्तम अस्थाना, देवस्थान आदि जग जाना
गंगा मिली जमुना तहं आयी, बीच मिली गोमती सुहाई।’’
खैर ताड़ीघाट से जीप द्वारा अपने एक मित्र शम्स, मॉडल स्कूल वाले जो कलकत्ता से पढ़-लिखकर गांव में आ बसे थे और लेखक डॉ. हारुन राशिद खां के साथ गोरा बाजार स्थित लार्ड कार्नवालिस के मकबरों की ओर चल पड़े। लोक निर्माण भवन, कृषि विज्ञान केन्द्र, पोस्ट ग्रेजुएट तकनीकी महाविद्यालय, डिग्री कॉलेज से होते हुए गोरा बा•ाार पहुंचे। जावेद ने बताया कि यह पूरा क्षेत्र एक समय अंग्रेजों से भरा पड़ा रहा था। तभी तो इस क्षेत्र के नाम गोरा बाजार पड़ा था। यहां गोरे गोल्फ खेलते, गोरी-गोरी मेमे भी..., जावेद डॉ. विवेकी राय की पुस्तक का हवाला देते थे।’’ ‘‘हां, यह इमारत शहर के लिए ताजमहल जैसी ही है...!’’ डॉ. हारुन रशीद ने व्यंग्य में जैसे कहा। हम एक निर्जन विराट हवेलीनुमा स्थान पर पहुंच गये थे। सामने दो सिक्यूरिटी वाले बैठे थे। हमें देखते ही वे एटेंशन में आ गए और नाम सुनते ही नि:शुल्क प्रवेश की इजात दे दी। डेढ़ दो बीघे की भूमि के बीचोंंबीच बना वह गोलाकार स्मारक दर्शनार्थियों को अपनी दृढ़ता का संदेश दे रहा था। अंग्रेजों के वैभवपूर्ण कालखंड की निशानदेही कर रहा था। मालूम हुआ कि यह भव्य स्मारक कलकत्ते के ब्रिटिश नागरिकों के सहयोग से अपने ‘लार्ड’ की स्मृति में बनवायी गई है।
हल्के गुलाबी रंग के पत्थरों से निर्मित उस स्मारक में कहीं कोई दाग, दरार, धब्बा नहीं था। सैकड़ों वर्षों बाद भी स्मारक तरोताजा लग रहा था। यह सच है कि अंग्रेजों ने हमें गुलाम बनाकर हमारे ऊपर वर्षों तक शासन किया पर उन्होंने जो कला, संस्कृति और आधुनिक संस्कार तथा वास्तुकला की विरासत छोड़ी, उसे भी हमें संजोकर रखना चाहिए। मगर कुछ अति राष्ट्रवादी लोगों की दृष्टि में ऐसी इमारतें-स्मारक उनके द्वारा किए गए शोषण, दमन और अत्याचार को दर्शाते हैं। लार्ड कार्नवालिस का धुंधलाता चित्र स्मारक के एक स्तंभ पर है, जिसके अगल-बगल हिन्दू और मुसलमान शोक मग्न खड़े हैं। बीच में कमल का फूल, बायें पाश्र्व में पत्रमाला का सूक्ष्म कलात्मक बंधन दर्शाए गए हैं। पीछे की ओर दो सिपाही बंदूक नीचे किए उदास खड़े दिखलाए गए हैं। सामने अंग्रेजी में और पीछे उर्दू में लॉर्ड कार्नवालिस के आने और दिवंगत होने की सूचनाएं दर्ज हंै। डॉ. हारुन राशिद खां ने बताया कि यहां के वासी इस स्मारक को कोई महत्व नहीं देते हैं, लोक यहां एकांत सुख के लिए आते हैं। उनकी दृष्टि में तत्कालीन भारत के गर्वनर जनरल का कोई महत्व नहीं है। दोपहर हो रही थी, हवा के चलने पर सूखे पत्ते खडख़ड़ाते हुए उड़ रहे थे। जब परिसर की दूसरी ओर दृष्टि गई तो देखा कि एक तरफ एक उपेक्षित सा मजार है, जहां कुछ सिज़दापरसत लोग बैठे कुछ गुन रहे है। पता चला कि वह कोई घोड़ाशाह का मजार है। पता नहीं कैसे भारत सरकार के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अंतर्गत आने वाले लार्ड कार्नवालिस के स्मारक परिसर में किसी बाबा का मजार वजूद में है। लार्ड कार्नवालिस दो बार भारत के गर्वनर जनरल रहे। पहली बार सितंबर 1786 से अक्टूबर1793 तक। उनका दूसरा कार्यकाल, बारह वर्ष बाद जुलाई 1805 से शुरू हुआ जो मात्र चार महीने का ही रहा। 5 अक्टूबर 1805 को गाजीपुर अंतर्गत 87 कि.मी. दूर गौसपुर में तेज बुखार के कारण रास्ते में ही उनकी मृत्यु हो गई। उस समय उनकी आयु 67 वर्ष की थी। स्मारक से पैदल ही चलकर हम बाजार तक आ गए थे। मैं कई तरह से लार्ड कार्नवालिस के विषय में सोच रहा था। सोच रहा था कि भारत के गवर्नर जनरल का इस तरह अभावों में मर जाना क्या उनकी उपेक्षा नहीं थी या संसाधनों की कमी थी, गौसपुर से उनके शव को बैलगाड़ी से गोराबाजार लाया गया था। उनकी अंत्येष्टि में ब्रिटिश राज के कौन-कौन से अधिकारी शामिल हुए होंगे। मैं कई तरह के विचारों में उलझ गया था। फिर इतिहास से निकलकर हम वर्तमान के सामने थे। अब मुझे बड़ी बाग डॉ. विवेकी राय मार्ग जाना था। जहां डॉ.विवेकी राय रहते हैं। देश में कम ऐसे साहित्यकार होंगे जो अपने जीवनकाल में अपने ही नाम की सरणी में रहे हों, लेकिन डॉ. विवेकी राय, डॉ. विवेकीराय मार्ग पर रहने वाले लेखक, कवि, निबंधकार हैं। हम कुछ दूर पैदल ही आए कि एक ऑटो टैम्पू मिल गया। उसने हमें बड़ी बाग उतार तो दिया लेकिन डॉ. विवेकी राय को वहां कोई नहीं जानता था। उदास-उदास सा गर्मी का मौसम खाली-खाली रास्ते। एक दुकान पर पूछा तो उसने बड़ी उलझन में कहा- ‘नहीं भाई यहां कोई लेखक-वेखक नहीं रहता... बताएं कि वे करते क्या  हैं, तो हम पता करें...।’ गाजीपुर के किसी पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में तीस साल अध्यापन करने के बाद लेखन कर्म से ही जुटे रहे, यह तो हम जानते थे लेकिन यह जानकर बड़ा दुख हुआ कि इतने बड़े रचनाकार को उसके आजू-बाजू के लोग नहीं जानते, जबकि मुहल्ले के कोई छुटभैया नेता या पुलिस को लोग जानते हैं और मन से सम्मान भी करते हैं। फिर मैंने एक किताब की दुकान पर डॉ. विवेकी राय मार्ग के बारे में जानना चाहा तो उसने कहा- ‘भाई जी, अब बड़ी में कोई बाग वाग तो रहा नहीं, यही एक दो पेड़ रह गए हैं... यहां कई नामों से कई लोग रहते हैं, देख लीजिए अंदर जरा पीछे कोई मार्ग हो...’ हम बहुत निराश हो रहे थे। तभी एक शिक्षक मिल गए और वे हमें गलियों से गुजारते ले गए, जहां कई घरों-दुकानों पर डॉ. विवेकीराय मार्ग लिखा हुआ था। हम एक बड़े से मकान में प्रवेश कर गए थे और हांफते-खांसते लकड़ी की कुर्सियों पर बैठ गए थे- मेरी निगाह गांवों, कस्बों, या छोटे शहरों की आवासीय सुविधा और फरागत से रहने की सहुलत पर टिक गई थी। यद्यपि शहर की बहुत सारी सुविधाओं और साधन से वे वंचित रहते हैं। हम बड़े शहरों के लोग अपनी तमाम साधन सुविधाओं के बावजूद एक-एक दो-दो कमरे में रहते हुए •िांदगी गुजार लेते हैं। थोड़ी देर बाद बढ़ी हुई दाढ़ी और गंजी-लुंगी धारण किए छ: फुट के कद काठी का एक परेशान-सा दिखने वाला व्यक्ति प्रगट हुआ हम सभी उठकर खड़े हो गए, कमर थोड़ी झुक गई थी, वे कुछ थके-थके से लग रहे थे।
मैंने अपना परिचय दिया और कहा कि कलकत्ता से आया हूं, आपसे मिलने। उन्होंने पहचानने से इंकार कर दिया। फिर मैंने उनके एक शिष्य पत्रकार मु. इसराइल अंसारी और उनके एक संबंधी कवि, चिंतक, समीक्षक डॉ. ऋषिकेश राय का हवाला दिया और बताया कि उनकी (विवेकी राय पुस्तक ‘$गाजीपुर संवाद’ (उत्तराद्र्ध) में मेरा भी उल्लेख है, तब उनकी स्मृति लौट आई, और वे मुझे थोड़ा पहचान पाए।
उम्र का बढ़ता हुआ दबाव, शरीर का टूटना, रह-रहकर स्मृतिलोप होना, एक चिंतक के लिए दारुण स्थिति होती है। सच समय सबको जर-जर कर देता है। काल के हाथों सब मजबूर हैं, राय साहब व्याकुल थे। वे असहज लग रहे थे। वे कह रहे थे- ‘इतना दिन निकल आया, दोपहर जा रहा है, अभी तक शौच नहीं किया, स्नान नहीं किया...’ कबीर कह गए थे कि-
‘देह धरे को दंड है भोगत है सब कोय।
ज्ञानी भोगे ज्ञान से, मूरख भोगे रोय।।’
‘गंवई गंध गुलाब’ भवन के स्वामी डॉ. विवेकी राय अपनी विपुल रचनात्मकता से स्वयं विस्मृत होते जा रहे हैं। साहित्य की लगभग सभी विधाओं को साधने वाले, करीब सौ पुस्तकों के रचयिता जिन पर दर्जनभर शोध हो चुके हैं, को अभी तक देश का कोई प्रतिष्ठित पुरस्कार नहीं मिला है, यह भी एक आश्चर्य और दुख की बात है। वैसे तो उन्हें भोजपुरी और उत्तरप्रदेश, बिहार की कई संस्थाओं ने पुरस्कृत व सम्मानित किया है। 19 नवम्बर 1924 में जन्मे विवेकीराय नब्बे वर्ष की आयु पार कर गए हैं, अगर कहा जाए कि वे $गा•ाीपुर जनपद के हिन्दी साहित्य के गवर्नर जनरल हैं तो गलत न  होगा। हम लौट रहे थे। कई यादें पीछे छूटी जा रही थी : गाजीपुर शहर दोपहर की गोद से सरकता जा रहा था। रिक्शावाला घंटी बजाता हुआ बड़ी तेजी से पैडिल पर पैर मार रहा था। दुकानें, रास्ते, धूल, धूप, दूर से दिखता खेत सब छूटे जा रहे थे। कई मस्जिदें थी; मंदिरें थे, मकबरे थे, तालाब थे, अपने शहर की माटी, रौनक, उदासी, सैय्यद मसूद गाजी का रौजा, सबको आंखों में बसा लेना चाह रहा था। पता नहीं कब दुबारा इस शहर में आना हो... मगर पीछे छूटते खिले लाल-टहटह गुलमुहर के फूल जैसे दुबारा आने का आह्वान कर रहे थे, पर उसी दिन मुझे बक्सर से अमृतसर मेल से कलकत्ता लौट जाना था।