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Thursday 23 Nov 2017

जब द्वीप ही लक्ष्य हो

डॉ रेशमी पांडा मुखर्जी
2-ए, उत्तरपल्ली, सोदपुर,कोलकाता-700110
मो. 09433675671
हावड़ा स्टेशन की भीड़ को हल्का करने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने वहां से पांच किलोमीटर की दूरी पर शालीमार नामक स्टेशन निर्मित किया है, जहां से दक्षिण-पूर्व की ओर जाने वाली गाडिय़ां छूटती हैं। रात के ग्यारह बजे शालीमार स्टेशन से नागेरकोविल जाने वाली गुरुदेव एक्सप्रेस में हम सपरिवार सवार हुए। लक्षद्वीप जाने के लिए हमने तीन महीने पहले से इस ट्रेन में सीटें आरक्षित कर लीं थीं।
चाहे भाषा हो या पहनावा, भारत का हर प्रांत अपनी विशिष्टता को बनाए हुए है। ज्यों-ज्यों ट्रेन दक्षिण भारतीय राज्यों से गुजऱने लगी, इडली, डोसा, सांभर, दालवड़े की महक से वातावरण गमकने लगा। चालीस घंटे तक सफर करते हुए हम थक तो चुके थे पर केरल में प्रवेश करने के साथ-साथ रेलगाड़ी दोनों तरफ  नारियल और केले के हज़ार-हज़ार पेड़ों को पीछे छोड़ती हुई आगे बढऩे लगी। खेतों में घुटने तक साड़ी को उठाई हुई महिलाएं एक मन से श्रमरत थीं। इस राज्य में मीलों तक फैली हुई हरितिमा आंखों को सुकून और मन को चैन देती है। अपने हरे आंचल के कारण यह प्रदेश भारत का गौरव बना हुआ है। अक्तूबर 2014 में आई हुई प्रलयकारी आंधी और तूफान के तांडव की छोड़ी हुई निशानियों को देखकर मन बैठ गया। विशालकाय वृक्ष जड़ समेत उखड़ चुके थे, घरों के ध्वंसावशेष बिखरे पड़े थे, उजड़े हुए खेत उस प्रलय की निष्ठुर स्मृतियों को ताज़े कर रहे थे। इन्हें देखकर महसूस होता है कि सचमुच आज भी मनुष्य प्रकृति के समक्ष कितना विवश है और प्राकृतिक संपदाओं पर किए जाने वाले शोषण की कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। एर्नाकुलम टाउन स्टेशन पर उतरकर हमने पास में ही होटल में  कमरा ले लिया। अगले दिन सुबह प्री-पेड ऑटो से हम एएफ सी ग्राउंड स्थित लक्षद्वीप पर्यटन केंद्र के ऑफिस पहुंचे। हमने अपनी टिकटें कलकत्ता में ही भारत सरकार के एस पी ओ आर टी एस की प्राधिकृत एजेंसी से बुक करवाईं थीं। इस कार्यालय में पूरी जांच के बाद हमें अपने बोर्डिंग पास दिए गए। सारे यात्री एक बस में सवार हो गए और भारी सामान एक मेटाडोर में रखवाया गया। इस बस से हमें एक विशाल जहाज के पास लाया गया। जहाज का नाम एम वी करवत्ती था। जहाज के प्रथम दर्शन से ही रोम-रोम रोमांचित हो गया। जहाज में चढऩे पर हमें अपने-अपने केबिन में भेज दिया गया। प्रत्येक केबिन अपनी अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस एक सुंदर जगत का छोटा संस्करण था। हर केबिन में दो व्यक्तियों के रहने की व्यवस्था थी। साफ-सुथरे बिछौने, एक कपबोर्ड, तीन दराजों वाला एक टेबल, दो कुर्सियां और एक अत्यंत परिष्कृत शौचालय था। हर बिछौने के साथ पढऩे के लिए लैंप की व्यवस्था थी। जहाज में एक विशालकाय भोजनकक्ष था जहां निरामिष व आमिष भोजन ग्रहण करने वालों के बैठने की अलग-अलग व्यवस्था थी। पूरा जहाज वातानुकूलित था। एक मनोरंजन कक्ष भी था जहां खेल के कुछ उपकरण व दो बड़े आकार के टी वी रखे हुए थे। जहाज की किसी भी खिडक़ी से बाहर झांकने पर दूर-दूर तक जल का असीमित अंबार आंखों को नए भावों से भर देता।दोपहर लगभग ढाई बजे भोजन के पश्चात जहाज तट को छोडक़र समुद्र की तरफ  कूच करने लगा। जहाज के भीतर सबकुछ डोलने का अनुभव रोमांच उत्पन्न कर रहा था। बाहर डेक पर सभी पर्यटक स्वच्छंद आकाश तले अपनी शाम का आनंद लेने लगे। जहाज काफी वेग से नीले जल के असीमित अंबार को चीरते हुए अरब सागर में बसे उन टापुओं की ओर दौडऩे लगा जिन्हें लक्षद्वीप द्वीप समूह के नाम से अभिहित किया जाता है। बीच-बीच में डॉलफिन मछलियां कूद रहीं थी जिन्हें देखकर हम खुशी से झूम उठते।  अगले दिन सुबह नाश्ता करने के बाद हम सभी को बारी-बारी से एक छोटे नाव से मिनीकॉय द्वीप ले जाया गया। लक्षद्वीप केरल के तट से 220 से 440 किलोमीटर की दूरी पर स्थित 36 द्वीपों का समूह है। यह भारत का केंद्र शासित प्रदेश है। इनमें से कवरत्ती, कलपेनी, मिनीकॉय, अगत्ती, कडमट, अन्द्रोत, अमिनी, किल्टन, चेटलट और बिट्रा समेत कुल दस द्वीपों में मानव आबादी का आवास है। सभी यात्रियों के लिए लाइफ  जैकेट पहनना अनिवार्य था। हमारा जहाज समुद्र में ही खड़ा रह गया। जैसे-जैसे हम द्वीप की ओर बढ़ रहे थे, एक नवीन अनुभव हमें घेर रहा था। द्वीप को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो नारियल की माला पहनी एक सुंदरी हमारा इंतज़ार कर रही थी। द्वीप पर पहुंचने पर हमें जीप में बैठाकर लाइट हाउस ले जाया गया। चारों ओर हरियाली और केवल हरियाली। महानगर के कोलाहल और प्रदूषित वातावरण से आने वाले सैलानी इस निर्जन शांत हरितिमा को देखकर आह्लादित हो गए। हमें बताया गया कि यहां पीने के पानी की बड़ी कमी है इसलिए पेय जल नष्ट करना सख्त मना है। लाइट हाउस पहुंचने पर हमारा कच्चे मीठे रसीले नारियल पानी से स्वागत किया गया। सन 1885 में ब्रिटिश सरकार द्वारा निर्मित इस लाइट हाउस पर चढऩे पर पूरे मिनीकॉय द्वीप को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वहां से हमें समुद्र तट पर ले जाया गया जहां विशुद्ध धवल कांति बिखेरती रेत पर पैर रखते ही मन पुलकित हो उठा। पर्यटकों के लिए कयाकिंग, स्नोरकेलिंग व स्कूबा डाइविंग की व्यवस्था थी। छोटी-छोटी नावें जिन्हें कयाक कहते हैं, उन पर पर्यटक स्वयं बैठकर चला रहे थे। इतना निर्मल समुद्र देखकर दिल बाग-बाग हो गया। लगा सचमुच, भारत की प्राकृतिक संपदा की तुलना में विश्व के अधिकांश देश पिछड़ जाते हैं। दिसंबर के इस आखिरी सप्ताह में मिनीकॉय फेस्ट आयोजित किया जाता है। इसके अंतर्गत नौका-दौड़ प्रतियोगिता, मैराथन, अंतर-द्वीप रस्साकशी, तैराकी प्रतियोगिता, फैन्सी स्पोट्र्स, आहार फेस्ट आदि का आयोजन किया जाता है। दोपहर को वहीं पर भोजन की व्यवस्था की गई थी। शाम को जहाज पर हमें वापस लाया गया।
अगले दिन सुबह हम कवरत्ती द्वीप की तरफ  निकले। सारा दिन द्वीप में घूमते रहे। वहां की आर्थिक स्थिति को देखकर मन कहीं उदास हो गया। पता चला इन द्वीपों की अधिकांश जनता आर्थिक दृष्टि से निर्बल है। बच्चे केवल दसवीं तक स्कूल में पढ़ सकते हैं, आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें केरल जाना पड़ता है। नारियल के पेड़ के विभिन्न उत्पादों को बेचकर यहां की जीविका चलती है। खेत तो नहीं हैं पर लोग अपने बगीचों में शाक-सब्जी लगाते हैं। अधिकांश पुरुष या तो मर्चेंट नेवी या फिर केरल में नौकरीरत हैं जो महीनों बाद घर लौटते हैं। कोई बड़ा चिकित्सालय भी नहीं है। यहां की अधिकांश आबादी मुस्लिम है जिनकी भाषा मलयालम और माह्ल है जिस पर मालदीव की भाषा का यथेष्ट प्रभाव है। फिर शाम को हम जहाज में लौट आए। रात को जहाज समुद्र के वक्ष को चीरता हुआ अगले द्वीप की ओर पूरे वेग से बढ़ता गया और उसमें सोए हुए यात्री स्वप्न में समुद्र की हिलोरों को महसूस करते रहे। अगले दिन सुबह हमें कलपेनी द्वीप पर ले जाया गया। इस द्वीप का तट काफी कटा-फटा व पथरीला था पर अरब सागर की गहरी नीली चादर हमें घेरे हुई थी। यहां कयाकिंग के अलावा स्कूबा डाइविंग, बनाना बोट राइड, वाटर स्कीइंग, मोटर बोट राइड तथा स्नोर केलिंग की भी व्यवस्था थी। इन सभी के लिए अलग से भुगतान करना पड़ता है। स्नोरकेलिंग में आपको चेहरे पर मास्क लगाकर पानी में मुंह डुबोकर तैरना पड़ता है और एक नली पानी से बाहर छोड़ दी जाती है जिससे सांस लेने के लिए हवा आती रहे। पानी के भीतर कोरल, रंग-बिरंगी मछलियों को देखने का इतना सुंदर अवसर हाथ से गंवाया नहीं जा सकता।
स्कूबा डाइविंग के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी आपको समुद्र में काफी गहराई तक ले जाते हैं। आपके साथ ऑक्सीजन सिलिंडर रहता है तथा एक विशेष प्रकार की पोशाक आपको पहनने के लिए दी जाती है। आंखों पर भी मास्क पहनना पड़ता है। समुद्र के भीतर छिपा संसार इतना मनोरम, रंगीन व अद्भुत है कि देखने वाले के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जल की इस गहराई में पृथ्वी रहस्यों से परिपूरित है। बड़े-बड़े कछुए, छोटी मछलियों के झुंड, समुद्री सांप, कोरल व अन्य कई प्रकार के जीव आपको छू कर निकल जाते हैं। दोपहर को समुद्र तट पर बाल सुखाते हुए भोजन किया गया। इस अलसाए हुए वातावरण में चुस्ती लाने के लिए आयोजकों ने लोक गीत व नृत्य का एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। यहां की लोक भाषा जसेरी है जिसकी कोई लिपि नहीं है। दस से बारह पुरुष हाथों में डफली लिए तालियों की धुन पर लोक नृत्य प्रस्तुत करने लगे। शाम के समय हमें एक मछलीघर में ले जाया गया। वहां मछलियों, स्टारफिश, कछुए के बहुविध प्रकार देखकर पर्यटक चहक उठे। साथ में एक संग्रहालय भी था जहां नाना प्रकार के केकड़े, मछलियों, सीप व अन्य समुद्री जीव-जंतुओं के वर्षों पूर्व के अवशेष रखे हुए थे। बीच में एक विशालकाय व्हेल मछली का कंकाल रखा हुआ था। अत्यंत सूक्ष्म से लेकर बड़े-बड़े सीप के नमूने भी थे। फिर हमें नारियल का तेल निकालने वाली मिल में ले जाया गया जहां नारियल के लड्डू, चूरन व तेल बिक रहे थे। बाद में एक गंजी फैक्टरी के दर्शन भी करवाया गया।
शाम को हम जहाज में लौट आए। आज की रात इस जहाज पर हमारी आखिरी रात थी। इन चार दिनों में भारत के विभिन्न प्रांतों से आए विविध भाषा-भाषी भारतीय इतने हिल-मिल गए थे कि बिछुड़ते समय मन उदास होने लगा। अगले दिन जहाज केरल के तट पर खड़ा था। हम सब अपने-अपने गंतव्य की ओर बढ़ चले पर मन में वह हरितिमा, टटके नारियल की खुशबू, समुद्र की गहराई में तैरती हुई मछलियां, दूर-दूर तक फैले सागर की नीली चादर और जहाज का वह सफर अपनी अमिट छाप बनाए हुए था।