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Tuesday 21 Nov 2017

शेर के साथ आंखें चार


राधा बोस

बूढ़ापारा शिशु शिक्षा केन्द्र के पास, गोपाल मंदिर वाली गली
बूढ़ापारा, रायपुर (छ.ग.)

शेर के साथ आंखें चार
उस दिन भोजन अवकाश में शेर का प्रसंग जाने कैसे उठ आया, दीदी की आकस्मिक मृत्यु के बाद हमारा और आलोक का परिवार दोनों पहली बार एकत्रित हुए थे। उद्देश्य था उस दुखद-गमगीन परिस्थिति से बाहर आना, जीजा जी को भी स्वाभाविक जीवन यात्रा में ले आना था। सभी चाह रहे थे कुछ दिनों के लिए बाहर सैर कर आते- मन हल्का हो जाता, अब इतने कम समय के लिए आखिर जाएं तो कहां जाएं, मां ने कहा- पहाड़ जंगल है ऐसे प्राकृतिक सौंदर्यमय परिवेश में चलना अच्छा लगेगा, जो नजदीक भी हो- सुन्दर भी हो-रोमांचकारी भी हो
 ऐसी जगह तो बस कान्हा-किसली ही है- बुबुन ने कहा। बस फिर क्या था- सब चलने के लिए एक पैर पर खड़े हो गए। अंदाज ऐसा कि अभी चल पड़े। बुबुन, आलोक होटल छत्तीसगढ़ रवाना हो गए, बुकिंग इत्यादि महत्वपूर्ण कार्य निपटा लिए गये। गहन जंगल के बीच तीन ‘लॉगहट्स’ बुक किए गए थे। सैर-सपाटे में होने वाले खर्च को सबने नजरअंदाज किया, दोनों परिवारों ने अपना-अपना कार्यभार संभाला, एक सुमो गाड़ी बुक की गई, चार दिनों के लिए। जनवरी का अंत हो रहा था- कड़ाके की ठंड पड़ रही थी, रातभर शायद ही कोई झपकी ले पाया, तडक़े ही निकल पड़े- मां ने ठाकुर जी को प्रणाम किया यात्रा सफल हो भगवन्!  सूर्योदय की लालिमा फैल रही थी, भोर की ठंडी हवा सरसराती मृदु ध्वनि को चीरते हुए गाड़ी आगे बढ़ रही थी, हम भिलाई रोड पर थे, गोंदिया होते हुए बालाघाट की ओर जा रहे थे- अपना गंतव्य स्थल वहीं से पास पड़ता, बीच में एक ढाबे में रुके, पूर्णिमा सैण्डविच लाई थी- चाय नाश्ता बढिय़ा रहा, थोड़ा विश्राम जरूरी था, मां-जीजा जी जैसे बुजुर्ग लोग साथ थे। गाड़ी फिर से दौड़ पड़ी- बालाघाट की ओर। दोपहर लगने से पहले ही हम कान्हा-जंगल के गेट तक पहुंच गये, लेकिन यह क्या? कुछ बन्दूकधारी प्रहरी हमारे आगे रोड़ा बनकर खड़े हो गए। डीजा लचलित गाड़ी जाने की सख्त मनाही है, इसकी गंध से जंगली पशु-पक्षियों को नुकसान पहुंचेगा। अब उपाय? उपाय भी उन्हीं लोगों ने सुझाया, और चालीस किलोमीटर घूमकर जबलपुर रोड से बिछिया गांव के पास से जंगल में प्रवेश किया जा सकता है, गेट से ही बड़े-बड़े होटल-लॉज दिखाई दे रहे थे। आखिर यहां यात्रियों को कैसे प्रवेश मिल रहा होगा ! खैर हमें तो घोर जंगल के बीच बने ‘लॉगहट्स’ में जाना है अत: हम बिछिया गांव की ओर बढ़े, आखिरकार घूमते-भटकते वन कर्मचारियों की मदद से उस सघन वनराशि के समक्ष पहुंचकर मन थरथरा उठा- जाने क्या रहस्य छिपा है इसके अंतराल में?
कुछ गहन घोर वनांचल में सूरज की रोशनी पीछे छूट गई, सकरी पगडंडी की रेखा मात्र बड़े टार्च के प्रकाश में ही दिखाई दे रही थी, हमारा अंगरक्षक-सहायक-गाइड न होता तो किसी भी कठोर वृक्ष के तने से टकराकर हम आहत हो गए होते। गिरते पड़ते हम गाइड के इशारे से रुके, सामने था हमारे सपनों का ‘लॉगहट्स’ ओ मां! यह तो मोटे मोटे वृक्षों के तने को काटकर बनाई हुई कुटिया सी लग रही थी, शेर जैसे पराक्रमी वन्य प्राणी के एक-दो पंजों के वार से ही यह कांप उठेंगे, कांस से बने दरवाजे पर कलाकृति का नमूना रंग-बिखेर रहा था, मोटे से भारी भरकम मखमली पर्दे को हटाते ही हम अवाक रह गए, अंदर विशिष्ट होटल के कमरे की सुसज्जित छवि थी, वहां ऐशो आराम की हर वस्तु मौजूद थी, सबसे अच्छा लगा गरम पानी की भरपूर व्यवस्था। गाइड ने कहा इसी कक्ष में प्रिंस चाल्र्स अपने भारत भ्रमण के दरम्यान कान्हा दर्शन हेतु ठहरे थे, सब खुशी से फूल उठे- आखिर हम राज-कक्ष के मेहमान थे। गाइड ने बार-बार चेतावनी दी कि हम कोई भी भोजन बाहर जंगल में न डालें- कक्ष में रखी कचरे की टोकरी में ही डालें। मां घर से दालपूरी-आलूदम आदि ले आई थी, लेकिन खाते नहीं बना। ठंड इतनी ज्यादा थी कि सारा भोजन एकदम लकड़ी की तरह सख्त हो चुका था, गाइड ने बताया कि यहीं एक किलोमीटर दूर एक कैफे है वहां गरमा-गरम खाना मिल सकता है, फिर क्या था उस कंपकंपाती ठंड में गरम खाने का लालच भला कौन त्याग सकता था। हम गाइड के साथ चल पड़े, इसी बीच पता नहीं कब माताजी ने सारा भोजन थोड़ी दूर जंगल में बड़ी सफाई के साथ फेंक दिया, आखिर रातभर कमरे में बदबू फैलती। वाकई उस घोर जंगल के कैफे में गरमागरम खाने का जायका सदा याद रहेगा, यह हमारी कल्पना का अतिरिक्त पुरस्कार था। सब प्रसन्न मन से वापस चल पड़े। पूर्णिमा का चांद खिला था, चांदनी से जंगल की भयावहता सभी के मन से जाती रही, मस्ती में हम गुनगुना उठे ‘‘आज ज्योत्सना रातें सबाई गेचे वने, आज ज्योत्सना राते ऽऽऽ’’ अचानक मेघ गर्जना से हम वहीं थम गये, आसमान की ओर देखा- नहीं तो- निर्मल स्वच्छ-सुन्दर, फिर? गाइड ने कान के पास फुसफुसाया- ‘‘शेर, खान- शेर-खान’’ शिकार को निकले हैं, हम एकजुट होकर भयभीत कांप रहे थे, अरे! ये कौन लोग हैं? हिरण-हिरण, एक झुंड- हमसे सटा खड़ा था, शेर की गर्जना से- मानव और वन्य प्राणी साथ-साथ पास-पास एक-दूसरे से सटकर थर-थर कांप रहे थे। काफी देर बाद गाइड के इशारा करने पर हम भागकर अपने-अपने डेरों में छुप गए। नरम-गरम कम्बलों के नीचे इस तरह दुबक गये कि शेर तो शेर उसकी अम्मा भी हमें ढूंढ नहीं सकेगी, थोड़ी ही देर में पता चल गया कि हमारी यह चेष्टा कितनी हास्यास्पद थी, रातभर हम शेर की दहाड़ सुनते रहे फिर पता नहीं निद्रादेवी ने कब हमें अपनी गोद में समेट लिया।
सुबह-सुबह गाइड की आवाज सुनकर जाग पड़े। जल्दी-जल्दी तैयार होकर कैफे में चाय, बिस्किट लेकर वन विभाग द्वारा भेजी गई दो खुली गाड़ी में सवार हुए। गाड़ी ठीक 6 बजे रवाना होगी। हम प्रतीक्षा कर रहे थे, चारों ओर देखा तो दूर-दूर तक कुछ लॉग-हट्स काफी फासले में फैले हुए थे। पास के हट्स से एक नवदम्पत्ति टैक्सी पर सामान रखवा रहे थे- शायद चलने की तैयारी थी। हमने इशारे से पूछा जा रहे हैं? वे पास आ गये, दुखभरी आवाज में बोले- कल ही आए थे आज वापस जाना पड़ रहा है, क्यों भला? मत-पूछिये रातभर लेपर्ड (चीता) हमारे दरवाजे को नोंचता रहा, गुर्राता रहा, गाइड ने कहा- यहां किसी ने खाना फेंका था- जिसे खाने ये चीते शोर मचाते रहे, आखिर मना करने के बाद भी लोग समझते नहीं हैं। और कोई समझे न समझे हम समझ गये थे कि हमने कितनी बड़ी भूल की है। बेचारे नवीन दम्पत्ति अपना हनीमून अधूरा छोडक़र भयभीत से वापस चले गये, और हमें पछताने के के सिवा कोई चारा नहीं था, मां ने कहा- देखा, मेरी दालपूरी-आलूदम का स्वाद चखने शेर चीते भी लाइन लगाते हैं, ‘‘बस-बस चुप रहो’’- सबने एक स्वर में मां को डांटा, बेचारी चुप रह गई।
जिप्सी पगडंडी की संकरी रेखाओं पर धीरे-धीरे चल रही थी। बोलना मना था हम नि:शब्द वन राशि की शोभा देखते हुए चले। गाइड के इशारे से कभी वन भैंसा, चीतल, बारासिंगा, भालू, जाने-अनजाने पंछियों के झुंड को देखा, लेकिन शेर खान का कहीं पता नहीं था, राह चलते कई यात्री भरी गाडिय़ां आपस में मिलती- सबकी जिज्ञासा शेर पर ही थी, किसी ने उसके पदचिन्हों को देखा तो किसी ने उसके मल-मूत्र को- लेकिन उन्हुं-उन्होंने दर्शन नहीं दिया, वापस लौट आए। डेरों के आसपास का नजारा देखा तो चकित रह गए। चारों तरफ छोटे-बड़े ढेर सारे हिरन यूं निडर होकर घास चर रहे थे जैसे गाय-बकरी। अरे यह क्या? मां हमारे साथ नहीं निकली थी, वह सीढ़ी पर बैठी एक नन्हें से हिरण-छौने को जो शायद सद्यजात रहा होगा- कोमल दूब खिला रही थी। हंसकर बोली सोचती हूं इसे घर ले जाऊं। बुबुन चिल्लाया- नहीं- हमें सलमान खान जैसे जेल यात्रा कदापि नहीं करना है, छोड़ों उसे, छौना भी मां की गोद में ऐसे दुबक रहा था जैसे वह मेरी मां की नहीं- उसकी मां की गोद हो।
आज हमारी यात्रा का अंतिम दिन था, सब उदास चुप्पी साध गाड़ी में बैठे थे। जब शेर ही नहीं देखा तो कान्हा क्या घूमा! अचानक गाड़ी हिली-डुली- चालक ताली बजाया, गाइड उछल पड़ा, हमने सोचा जरूर शेर-चीता कुछ होगा, लेकिन नहीं, एक गाड़ी तेज रफ्तार से जा रही थी- उस पर एक फोल्डिंग सीढ़ी रखी हुई थी, इस पर इतना हर्षोल्लास क्यों, थोड़ी देर में इस रहस्य का पर्दाफाश हुआ, गाइड कार्यालय के पास रुका, सबके नाम टिकिट खरीदी गई, और एक भारी भरकम विशालकाय हथिनी के पास हम जा पहुंचे। उसकी पीठ पर हौदा कसा हुआ था, आखिर हमें हौदे पर चढ़ बैठने के लिए सीढ़ी की जरूरत तो होगी ही। हम हाथी की सवारी किए व्याघ्रराज से मिलने जा रहे थे, अपनी गजगामिनी चाल से हमें लगभग झूला झुलाते हुए वह अपने खंभो जैसे पैरों को संभल-संभल कर रखते बांस के जंगल को चीरते-राह बनाते हुए कभी टहनियों को सूंड से तोड़-तोडक़र पत्ती की तरह चबाते हुए आगे बढ़ी। कुछ दूर जाकर चाल धीमी होकर लगभग रुक-सी गई। एक सड़ी दुर्गन्ध नाक में पड़ते ही गाइड ने इशारा किया। हम बांस की झाडिय़ों के पीछे थे, हथिनी खड़ी हो गई, तो यहां हो शेर महाराज! अपने सड़े गले आधा बचा हुआ शिकार की निगरानी करते निर्लिप्त भाव से पीत-श्याम छवि काले डोरों के बीच बिखरती धूप की किरणों में अपना मखमली तन अलसाये यूं पसरे हुए थे कि जैसे हम सबकी उपस्थिति उसके आगे कोई मायने नहीं रखती। मेरे मन में एक जिद जगह ले रही थी। तीन दिनों तक तुमने हमें चकमा दे-देकर यूं भटकाया- और अब ऐसे भाव दिखा रहे हो कि हमें दर्शन की भीख क्या दी कोई एहसान किया हो- अपनी इनायत भरी एक नजर भी हम पर डालना मुनासिब नहीं समझा, हमें भी मनाना आता है। गाइड की सख्त निषेध की अवज्ञा करते हुए मैंने हौदे पर पटककर अपनी चूडिय़ां जोर से खनकाई, पलभर में जैसे प्रलय का संकेत हुआ, दो तेज विद्युत पुंजों के वार से हमारी आंखें चौंधिया गई- सतर्क खड़े दो कान- सूखे पत्तों पर विशाल अजगर सी पूंछ को तेजी से पटकते आंखों से रोषभरी अग्निवर्षा करते हुए मेरी आंखों में आंखें डालकर कहा- खबरदार-होशियार, मेरे साथ मजाक की जुर्रत भी न करना, मैं सहमकर हौदे में छिपने लगी। लगा- अब झपटा तब झपटा, हथिनी ने सूंड़ हिलाकर जाने क्या इशारा किया कि उसका क्रोध शांत हुआ। एक करुणाभरी दया दृष्टि मुझ पर डालकर अपने विशाल जबड़ों को फाडक़र एक लम्बी जम्भाई ली। उसके पौने दांत-लपलपाती लाल जीभ देखकर लगा उसके हांडी जैसे मुख में मेरा सर अनायास समा सकता है। मैंने आंखें भींच ली, तब तक नहीं खोली जब तक सुरक्षित अपने डेरे में पहुंच नहीं गई, अभी भी सपने में कभी-कभार शेर से आंखें चार हो जाती हंै- बस समझो कि वही डर हावी होने लगता है। हां एक बात मैं अवश्य समझ गई थी कि ये शेर-वेर प्यार मोहब्बत नहीं समझते इनसे आंखें चार करना याने आफत मोल लेना है।