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Tuesday 21 Nov 2017

(मणिपुर यात्रा के अंतिम दिनों की डायरी के कुछ पृष्ठ) इंफाल विश्वविद्यालय गेस्ट हाउस

प्रेम कुमार
कृष्णाधाम कॉलोनी, आगरा
रोड, अलीगढ़ (उ.प्र.)
आंखें खुलते ही आज के यहां से चले जाने का ध्यान आया। पक्षियों की आवाजों का आना जारी है। आने के दिन से ही सुन रहा हूं इन्हें। इनमें एक आवाज है जो रोज सुबह पांच बजे के आसपास सुनाई देती है। तो क्या यह आवाज इन दिनों ही है अथवा इस चिडिय़ा का यह रोज का अपना एक निश्चित क्रम है। क्या यूं ही अपनी धुन में कोई गीत गाती है या कि कोई प्रार्थना-आरती करती है इतनी सुबह-सुबह?
आंख मूंदे बिस्तर पड़ा बड़े ध्यान से सुन रहा हूं। उसकी इस अप्रतिम अभिव्यक्ति को। मालूम है कि आज के बाद भी यह रोज आएगी-गाएगी- पर मैं इसका आना-गाना नहीं जान-सुन पाऊंगा।
बिस्तर छोडऩे के साथ ही जल्दी तैयार होने की हड़बड़ी हावी होने लगी। एयरपोर्ट तक पहुचाने के लिए सुरेश प्रो. श्रीवास्तव जी की गाड़ी लेकर दस-तीस तक यहां आ जाएंगे। पांच-पैंतालीस हुए हैं। बाल्कनी में कुछ देर तेज-तेज चलकर आज का टहलना पूरा कर लेना चाहा है। देखते-देखते आसमान में हल्के काले बादल घिर आए हैं। चारों तरफ। और दो-चार मिनट में ही चुपचाप ऊपर से पानी का टपकना शुरू। ऐसे जैसे किसी ने जलपात्र को लुढ़ा भर दिया हो और फिर पानी स्वयं ही समतल किसी जगह पर धीमे-धीमे संभल-संभलकर अपना रास्ता तलाशने-बनाने लगा। तैयार होकर फिर बालक्नी में आ खड़ा हुआ हूं। अब जरा देर बाद ही सोना बिखराती-सी खूब खुली-खिली-सी धूप। चारों ओर- सब तरफ। दूर सामने की ये पहाडिय़ां एकदम से गौरांग हो गई हैं। एकदम धुले-पुछे से पेड़-पत्ते।
गेस्ट हाउस के गेट पर पहुंचा तो दिखा माताप्रसाद जी मुझसे पहले वहां हाजिर हैं। अभिवादन का उत्तर देते-देते घड़ी देखी- ‘‘अभी तो सात-आठ मिनट  बाकी हैं। आ ही रहे होंगे वे लोग। तीन-चार मिनट बाद ही वे लोग गाड़ी लेकर आ गए थे। प्रो. सुरेशचंद्र और उनके वो ए.एफ.ओ. मित्र जिनके घर आज नौ बजे चाय पर पहुंचना था माताप्रसाद जी के साथ हम लोगों को। सुरेश जल्दी से जाकर उमेश कुमार सिंह, शंकर लाल पुरोहित और मणिपुर की दलित अकादमी से जुड़े एक सज्जन को भी  बुला लाए हैं। गाड़ी ए.एफ.ओ. ही ड्राइव कर रहे हैं। एकदम युवा-विनम्र और शिष्ट। अल्पभाषी। सुरेश जी उनके कर्मठ, ईमानदार और बहादुर होने के कुछ प्रसंग सुना रहे हैं। अपनी दोस्ती की वजह और मजबूती की बाबत् बता रहे हैं। सामने के शीशे से बाहर दिखता विश्वविद्यालय का खूब खुला-लम्बा परिसर। उसमें बने प्रशासनिक व अध्ययन-अध्यापन खंड-विभाग। इन विभागों से जरा फासले पर परिसर में कई जगह अध्यापकों-कर्मचारियों के लिए बनवाए गए दुमंजिले-तिमंजिले फ्लैट्स-क्वार्टर। गाड़ी ग्राउंड फ्लोर के जिस घर के सामने रखी है, उसके दरवाजे पर, सीढिय़ों के ठीक साथ नन्हीं, परी-सी एक बच्ची खड़ी है। पीठ पर बस्ता लदा है। नातिन गेया का ध्यान हो आया। जरा-जरा से ये  बच्चे। उनकी पीठ पर इतना  भरा-भारी ये बस्ता। इस रूप में इन बच्चों को देखने पर कोई अंतर नहीं कर सकता कि यह इंफाल का बच्चा है या फिर अलीगढ़, नोएडा, दिल्ली या देश के किसी अन्य हिस्से का। हम सबने उसके सिर को सहला-सहलाकर प्यार दर्शाने वाले कई-कई शब्द कहे हैं। अंदर के कमरे में प्रवेश के साथ ही दिखा कि सुदर्शन-सी एक युवती खनकती हंसी के साथ गर्दन झुका-झुकाकर सबको प्रमाण बोल रही है। हाथों के इशारे से स्वागत करती-सी सभी से अंदर आने का निवेदन कर रही है। गजब की तेजी-चुस्ती-फुर्ती। अभी हमारे साथ-सामने, अगले ही पल अंदर रसोई में। बार-बार जल्दी-जल्दी उसका आना-जाना। हंसी तो जैसे इन मणिपुरवासियों के होठों की स्थायी निवासिन है। पति-पत्नी दोनों अंदर से चाय और खाद्य पदार्थों की प्लेट्स लाने में जुट गए हैं। इस बीच बातचीत लगातार जारी थी। वे लोग हिन्दी में ही बात कर रहे थे। हिन्दी भी ऐसी ही काम चलाऊ नहीं- अच्छी, धाराप्रवाह, शालीन। पति संकोच के साथ बता रहे हैं- ‘दो ही साल हुए हैं अभी यहां आए इसलिए घर में ठीक से कुछ भी नहीं हो पाया है। उनके कहने पर ध्यान गया- बड़े से उस कमरे में केवल एक सोफा था। उसके साथ बैठने के लिए एक चटाई बिछा दी गई थी। हम तीन लोग चटाई पर बैठ गए थे। घर की उस साधारणता ने पति-पत्नी की विनम्रता और आत्मीयता को जैसे और अधिक दमका बढ़ा दिया था। घर की उस सादगी और ईमानदारी ने हम सबका ध्यान खींचा था। वरना आज तो जरा-जरा सी नौकरी वाले लाखों-लाख के फ्लैट्स में रहते हैं और रहने से पहले उसकी सज्जा में लाखों-लाख लगा देते हैं।
इन लोगों के सत्कार भाव से गद्गद पति-पत्नी को धन्यवाद देकर हम लोग चलने को उठ खड़े हुए थे। ए.एफ.ओ. की पत्नी हम लोगों के आने को लेकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त किए जा रही थीं। मणिपुर वेश में, उस प्रसन्नता में वह बेहद सौम्य-आकर्षक लग रही तीं। सुदेश जी से मैंने ए.एफ.ओ. का नाम जानना चाहा। उन्होंने मेरे हाथ में लगे लिफाफे पर श्री बसंता लिख दिया। बसंता जी की पत्नी से उनका नाम पूछा। लजाते-से बताया- मेमा! मैंने उसकी अंग्रेजी वर्तनी जाननी चाही- एमई, एमएए। मैंने पूछा- ‘इसका अर्थ क्या है?’ बसंता जी ने रसोई की तरफ जाते-जाते कहा- ‘स्माल गर्ल।’ ठीक ही था उनकी पत्नी का वह नाम और उस नाम का वह अर्थ ! सचमुच मेमा हम लोगों की उपस्थिति में बिल्कुल एक नन्हीं-सी बच्ची की तरह इधर से उधर नृत्य-सा करती घूमती-दौड़ती रही थी पूरे समय। बिलकुल अपनी उस नन्हीं परी-सी बेटी की तरह। रास्ते में अपने घर परिवार की बातें करते-बताते आए थे बसंता जी। गेस्टहाउस से ज्यादा दूरी पर नहीं थे तब हम लोग। बसंता जी अपनी बगल की सीट पर बैठे माता प्रसाद जी से मुखातिब थे। खास एक रौ में खुश-खुश बताए जा रहे थे- ‘सर, ये कार बाईस साल पहले की है। इतनी अच्छी, मजबूत कहां आती हैं अब कारें! पर यह बाईस साल पहले खरीदी थी पिताजी ने- और आज भी एकदम फिट।... जी, प्रिंसीपल थे वे।’ आवाज में भी खुशी पता नहीं कहां तिरोहित हो गई है एक साथ। आवाज में  भारीपन आ मिला है अचानक। हर शब्द के साथ जैसे घना-गाढ़ा कोई दर्द चिपका चला आ रहा हैा अंदर से- ‘पर आप जानते हैं कि कैसा क्या होता रहता है यहां। पता ही नहीं कि कब क्या हो जाए किसी के साथ।’ देर तक कोई आवाज नहीं! जैसे-तैसे बोल सकने की कुछ ताकत जुटा ली हो जैसे- ‘मैं इसे ले आया...।’ ...जी, उनकी हत्या कर दी थी।’ सब जैसे सकते में आ गए थे यकायक। सुना सबने था, पर बोल कोई कुछ नहीं पा रहा था। कुछ देर तो वह भी नहीं जिसने इस घटना की बात हम सबको बताई थी। वजनी होता जा रहा-सा वह मौन! गेस्ट हाउस का गेट बिल्कुल सामने था। घाड़ी से उतरते-उतरते सुना था बसंता जी का वह वाक्य- ‘जी, उसके बाद मैं इसे ले आया।’ सुन लिया- आगे कुछ भी पूछने को हिम्मत नहीं हुई। कमाल है! हत्या- वह भी एक शिक्षक-प्रिंसीपल की हत्या! आखिर कब, क्यों, कहां? अब तक बाहर से मणिपुर आए लोगों के डर और आतंक की बाबत् काफी कुछ सुना था, लेकिन बसंता के पिता...? बसंता तो यहीं के हैं। उनके पिता यहीं के थे। ...
यशवंत को चार बजे आना था। चार बीस होने को हैं। इंतजार के बोझिल से क्षणों में अचानक लगा कि आज अकेले-खाली होने के साथ ही यहां आने के पहले-दूसरे दिन वाले आकर्षण और उल्लास में कमी आ रही है। शोर-शराबे और भीड़ में रहने के आदी मैदानी लोगों के साथ यह होता ही है। पहाड़ी शांति उन्हें कुछ दिन मोहती-भाती है और कुछ दिन बाद वहां से उनका मन उचटने-उखडऩे लगता है। यशवंत के घर अपनी तरफ जैसा कुछ खाने को मिल जाने का लोभ जैसी एक उम्मीद न होती तो शायद मैं जाने के लिए हां ही न करता! मां ने दो दिन पहले ही जन्माष्टमी के व्रत की याद दिलाई थी। वो खुश होती हैं इसलिए कुछ व्रत रख लेता हूं। यशवंत ने बताया था कि उनके घर जन्माष्टमी आज की है इसलिए आज शाम उनके घर जाना तय कर लिया था। यशवंत और उनकी पत्नी आगरे की तरफ के हैं इसलिए मान लिया कि उनके यहां का फलाहार यहां से अलग तो होगा ही। ।
गेस्ट  हाउस से यूनिवर्सिटी के गोल चक्कर तक का रास्ता मेरा जाना-पहचाना था। लेकिन गोल चक्कर के जरा आगे से जब यशवंत मुख्य मार्ग से बायीं ओर मुड़े तो मैं चौंका। एकदम बदल गया-सा बहुत कुछ। पहाड़ के किसी गांव के जैसा संकरा-पतला, मोड़दार कच्चा रास्ता। यहां-वहां छोटे-बड़े गड्ढे भी। पानी के बहाव से जगह-जगह बन गईं। कुछ खंदकें, कुछ नालियां। रास्ते के दोनों ओर टीलेनुमा छोटी-छोटी पहाडिय़ां। घाटी में बसे किसी छोटे गांव जैसा रास्ता। कई तरह के पेड़-पौधे। दोनों तरफ खूब घनी-ऊंची-ऊंची झाडिय़ां। उनमें से होकर आती बेहद तेज-पैनी आवाज। सुमित्रानंदन पंत का ध्यान हो आया। उनकी कविताओं वाली सूने सन्नाटे व प्रशांति को चीर-भेदकर और अधिक गंभीर बना देने वाली झींगुरों की तीव्र-प्रखर आवाजों की याद हो आई। बचपन में छत पर का सोना, झींगुरों का मंजीरों की तरह बजना, जुगनुओं का चमकना-बुझना-न जाने कितना कुछ याद आता गया। जरा दूर बिजली चमकी तो दिखा कि आसमान काले-काले बादलों से भरा-घिरा हुआ है। लेकिन वह आवाज थी कि ध्यान को खुद से हटने ही नहीं दे रही थी। लगा कि इस अंधेरे एकांत में कोई सामूहिक गीत गा रहे हैं ये सब। या फिर कोई संध्या-वंदन या प्रार्थना गीत है यह इनका। तयशुदा-सी एक लय, मजा-संवारा-सा संगीता। क्या ये मणिपुरी में गा रहे हैं अथवा हिन्दी में- या फिर ऐसी उस भाषा में जिसमें समझने का कोई झंझट ही नहीं, कोई दिक्कत नहीं। उस आवाज के जादू के घेरे में मेरे आने का यशवंत ने भांप लिया है- ‘जी सर, झींगुर हैं। यहां एक लोककथा है, उसमें एक कीट-हारी का जिक्र आता है। लोक विश्वास है कि कोई एक लडक़ी थी। उसकी सौतेली मां ने किसी बात पर उसे करछुल मार दिया। उसने कहा कि अब मैं जीवित नहीं रहूंगी। कीट बनकर घरों के छप्परों पर बैठकर निड निड किया करेगी मेरी आत्मा। इन दिनों में कुछ समय के लिए इन झाडिय़ों-झुरमुटों में निड निड करती घूमती रहती है। यह सुनते ही झट से उस आवाज का असर और अर्थ ही बदल गए। अब उस आवाज में शापित किसी लडक़ी का दर्द भी आ मिला है। लगा कि जैसे ये निडनड अतीत में हुए एक अत्याचार को इकट्ठे होकर याद कर रहे हैं, औरों को उसका स्मरण करा रहे हैं। बड़ी संख्या में मिलकर कोई शोकगीत गा रहे हैं। सचमुच दर्द से जुडक़र कोई भी अभिव्यक्ति कितनी मार्मिक-सम्मोहक हो जाती है।
गहराते बादलों ने अपना गर्जन-तर्जन कुछ बढ़ा दिया है। बादल अब जैसे बरसने को आतुर-व्याकुल हो उठे हैं। हम दोनों की चाल अपने आप तेज हो गई है। रास्ते के बायीं ओर बड़ा-सा एक मैदान है। उसमें कुछ तम्बू तने हैं। तंबुओं के आसपास छोटी-छोटी क्यारियां हैं। यशवंत ने बताया है- ‘ये नागाओं के तंबू हैं। आसपास की खाली जगह में कुछ फल-सब्जियां बो-उगा लेते हैं वे। ये सब गरीब तबके के लोग हैं। यहां मेहनत-मजदूरी करके, घरों में काम करके अपना गुजारा कर लेते हैं। वैसे भी यहां मणिपुरियों और नागाओं में तनातनी चलती रहती है।  तब से तो और भी ज्यादा जब से इन्होंने वृहत नागालैंड की मांग की है।’
यशवंत झटके के साथ खुद तो रुके ही, मेरा हाथ पकडक़र मुझे भी आगे बढऩे से रोका- रुकिए सर, आगे ब्लॉकेड है। ब्लॉकेड डरी-चौंकी आवाज में मैंने पूछा। यशवंत हंसे। टार्च जलाई- ‘ये तो कुछ नहीं है। कई बार तो झुंड के झुंड एक साथ पार करते दिखते जाते हैं ऐसे इन रास्तों पर। आदमी को रुककर इंतजार करना ही पड़ता है इनके निकल जाने का। टॉर्च की रोशनी में देखा- चार-छह कदम पर एक के पीछे एक रास्ता पार करते दस-बारह मेंढक। कुदक्कड़ी भरते-से, सडक़ पार करने की सामूहिक एक कोशिश में ! कुछ ज्यादा ही हृष्ट-पुष्ट। रंग भी खूब चटकीला- हरा-पीला। काली-कत्थई-सी धारियां। चमचमाती-सी उनकी त्वचा। पीले वृत्त के अंदर अंधेरे में और तेज चमकती गोल-गोल आंखें। अभीत, निश्ंिचत, मस्त-मस्त-सी उनकी चाल। यशवंत को मैंने उनकी चाल दिखानी चाही- ‘देख रहे हो यशवंत, इनके रंग-आकार में ही नहीं, चलने के अंदाज में भी अंतर है। होना भी चाहिए- आखिर ये भी तो अशांत क्षेत्र के ही निवासी हैं न!’ हम दोनों साथ-साथ हंसे हैं। इस बीच एक और अंतर का ध्यान आया- ‘आपको मालूम है यशवंत कि अब आपके शांत क्षेत्र में पहले की तरह मेंढक दिखाई नहीं देते। न जगह-जगह उनकी आवाजें ही सुनाईं देती हैं। पोखर, तालाब, कुएं- जब गांव वालों ने ही दबा-पचा लिए तो भला शहर में उन्हें कौन छोड़ देता। यहां अब भी ये पोखरें हैं, तालाब-जलाशय हैं, इसी वजह से ये मेंढक भी हैं उनके ये अंदाज और समूह गान भी हैं।’
यशवंत के घर ले जाने वाली उन सीढिय़ों के पास पहुंचे तो जीने के पास बनी बड़ी-सी एक सीमेंटिड टंकी दिखी। सोचा कुछ बोने-उगाने के लिए पानी इकट्ठा कर लेते होंगे इसमें। यह भी ख्याल आया कि शायद ऊपर की मंजिल पर रहने वालों के लिए भरवा लिया जाता होगा इस टंकी में पानी। इधर-उधर देखा- न कोई हैंडपाइप था, न कोई पाइप लाइन।
-‘क्यों यशवंत, पानी की कोई दिक्कत है क्या यहां?
-‘नहीं, कोई दिक्कत नहीं। ये नीचे टैंक है। सुबह पानी की गाड़ी आती है। इसे भर जाती है। पंप से हम लोग ऊपर ले लेते हैं। इमरजेंसी के लिए एक काफी बड़ी टंकी ऊपर भी है। लेकिन पिछले एक सवा साल से उसमें से पानी लेने की कभी जरूरत नहीं पड़ी।’
घर में प्रवेश के साथ सबसे पहले सामने की दीवार के सहारे खड़ी छत से जरा नीचे तक की लम्बाई वाली वह टंकी दिखी। यशवंत ने ढक्कन खोलकर टंकी के पानी को हथेली में भर लिया है। बार-बार दिखा रहे हैं- ‘देखिए इसे आप! एकदम साफ जैसे गंगा जल को कहा जाता है उसमें कीड़े नहीं पड़ते, ऐसे ही इसमें भी कुछ नहीं होता। आज भी एकदम उतना ही साफ है जितना भरने के समय था। पता है आपको कितने महीने हो गए इसके भरे हुए? सात से कुछ ज्यादा ही। जनवरी में भरा था और अब सितम्बर है।’
संक्षिप्त से परिचयात्मक संवाद के बाद यशवंत की पत्नी रसोई में जा जुटी हैं। पुत्र को मणिपुरी लोककथाओं पर कराए गए एक डि•ार्टेशन की फोटो स्टेट कॉपी कराने भेज दिया गया है। यशवंत अपने कम्प्यूटर के खोलने-चलाने में व्यस्त हो गए हैं। मैंने यूं ही उनका रूटीन पूछ लिया है। हथेली में दबा माउस इधर से उधर हो रहा है। दृष्टि स्क्रीन पर टिकी है- ‘रुटीन-वुटीन क्या सर- सोशल लाइफ तो जो जितनी है वह केवल डिपार्टमेंट में है। बाकी के सारे समय अपने घर में। सर, एक बात बताऊं, यहां आने से पहले पढऩे की कोई खास आदत नहीं थी, लेकिन यहां इसके अलावा अब और किया भी क्या जा सकता है। बस, यह टी.वी., यह कम्प्यूटर, ये किताबें।’ जो दिखाना चाह रहे हैं, वह शायद मिल गया है उन्हें- ‘सर, आप इधर इस कुर्सी पर आ जाइए। देखिए- मणिपुर का लोक है यह कुछ गांवों के, प्राकृतिक स्थलों के, धार्मिक स्थानों के चित्र। पशुओं-पक्षियों, जीव-जंतुओं के चित्र। जी- ये यहां का स्टेट एनीमल है- केवल यहीं मिलता है। यह हिरन-सरई। यह तो वनस्पति है जिसके बारे में उस दिन बताया था मैंने- जी- चिङघी। इसमें चावल का मांड़ मिलाकर दानों को गर्म करते हैं पहले और फिर उसे बालों पर लगा लेते हैं। थोड़ी देर बाद धो लेते हैं बालों को। ये देखिए- फिदुप-फनेक की वैरायटी। इन्हें पहनने के अलग-अलग रंग और ढंग। ये महिलाओं द्वारा अलग-अलग तरह से लगाए गए चंदन के तिलक।... एक गांव में गए थे हम लोग। वहां से बहुत सारे चित्र लाए थे- ये बर्तन हैं कुछ- ये घड़ा, खाना बनाने में ये काम आते हैं... यह लोहे का तिपाया है। उसके ऊपर लोहे या एल्यूमीनियम का बटूला और पकडऩे को लोहे की यह संडासी... और यह चलाने को करछुल- ये चमचा! ...एक अध्यापक के पिता की मृत्यु के बाद दिए गए भोज में उनके गांव गए थे हम लोग। खाने-पीने में अंतर है। ख्याल रखा जाता है कि किस अवसर का है। अब जैसे मृतक का है तो मछली नहीं बनेगी। मंदिर में है तो मछली नहीं पकेगी। पुजारी आते हैं मछली पकाने की खुशी के मौके पर। वो मछली, चावल और अन्य चीजें या शाक-सब्जी बनाते हैं। वे ही परोसते भी हैं। ये देखिए- परोसने वालों के फोटो। इनकी ड्रेस देख रहे हैं आप! नीचे सफेद धोती, सिर पर साफा, मुंह पर पट्टी- बीच का बदन खुला है। पहले पंक्ति से थालियों में खाना परोस दिया जाएगा तब आमंत्रितों से बैठने को कहा जाएगा। बीच-बीच में अन्य शाक-सब्जियां आती रहेंगी। उसमें चावल की खीर का मीठा भी होगा। सबसे अंत में नमक परोसा जाएगा। समापन का सूचक तो है ही- हाथ में लगे तैलीय पदार्थ के लिए भी लाभकर है। और ये- जी, वो यूनीवर्सिटी के मेन गेट के बाद वो जो पुराना राजमहल है न- यह वहां का चित्र है। वहां जो रासलीला होती  है उसका बहुत महत्व है। यह देखिए रास करती इन  गोपियों को- ये हैं राधा। यही राधा वाली ड्रेस शादी के समय पहनती हैं यहां लड़कियां। ’
पुत्र के फोटोस्टेट कॉपी कराकर लौट आने तक पत्नी ने खाना तैयार कर लिया था। कई दिन बाद पसंद का खाना मिलने की उम्मीद ने मुझे अधीर करना शुरू कर दिया था। इंतजार भारी लगने लगा था। यशवंत ने मेरी कुर्सी के सामने मेज लगा दी है। बेटा पानी का गिलास लाकर रख गया है। बहुत आदर भाव के साथ खाना लगी थाली लेकर पत्नी स्वयं रसोई से कमरे तक आई हैं। यशवंत की थाली के बारे में पूछा तो बताया गया कि वे लोग दोपहर में फलाहार कर चुके हैं और अब चंद्रमा को अध्र्य देने के बाद ही कुछ लेंगे। थाली में रखे बर्तनों-पदार्थों पर नजर दौड़ाई। कुछ भी वांछित-अपेक्षित-सा नजरन हीं आया। पूड़ी का रंग-रूप और आकार देखकर संदेह हुआ। पहला निवाला तोडक़र सब्जी लेने के लिए हाथ बढ़ाया तो यशवंत ने टोका- ‘नहीं, नहीं सर, सब्जी वो वाली है। इसमें यह तो खीर है। काले चावल की। इसका अलग महत्व है यहां। खीर को सब्जी समझ लेने की अपनी नासमझी पर जो जैसा लगा वो अपनी जगह, पर हां, काले चावल की खीर का नाम सुनते ही खाने की इच्छा जैसे मरने को हो आई। पिछले दिनों में झेलीं पेट की सारी दिक्$कतें एक साथ याद हो आईं। बताई गई कटोरी की तरफ हाथ बढ़ाया। सब्जी में और जो कुछ मिला था, उसे तो नहीं पहचाना पाया, पर यहां पनीर के टुकड़े अलग से दिख रहे थे। पनीर के एक टुकड़े के साथ निवाला मुंह में पहुंचाया। चबाते ही मालूम हो गया कि पूड़ी भी गेहूं के आटे की नहीं है। यशवंत से जानना चाहा- ‘ये पूडिय़ां क्या गेहूं के आटे की हैं? कुछ परेशान हुए-से दिखे यशवंत- ‘नहीं सर! वो क्या है कि यहां यूनीवर्सिटी के पास में स्टोर वाले से कह दिया था गेहूं के आटे के लिए ! वो शहर जा नहीं पाया। पहले बताया भी नहीं। बेटा लेने गया शाम, तब बताया। पहले मालूम होता तो बेटा ले आता...।’
खाने की रही-सही इच्छा का भी यह सुनकर काम तमाम हो गया। पूरे दिन का व्रत और आगे पूरी रात बाकी है। और कोई चारा न देख पनीर की सब्जी दो बार ली। चार पूड़ी खाने में जरूरत से ज्यादा देर लगी। काले चावलों की खीर को एक घूंट में गले से नीचे उतारा। जल्दी-जल्दी दो गिलास पानी के गटके। यशवंत की पत्नी को धन्यवाद दिया। खाने की तारीफ की। और फिर अंधेरे के बढऩे की कहकर चलने की इजाजत चाही।
जिस रास्ते से आए थे उसी से गेस्ट हाउस लौट रहे थे हम दोनों। आने के समय की अपेक्षा लौाटने के समय की हमारी चाल कहीं अधिक तेज थी। गोल चक्कर से आगे अपने अकेले चले जाने की कहकर यशवंत को वही से लौट जाने के लिए जैसे-तैसे तैयार किया था। वापसी से जरा पहले यशवंत ने सोशल लाइफ के न होने को लेकर अपना मलाल फिर व्यक्त किया था। बड़े आत्मीय भाव से मैंने उन्हें वहां के समाज में कुछ और संबंध बनाने-बढ़ाने की सलाह दी थी।
गेस्ट हाउस छोडऩे से पहले कुछ देर को बाल्कनी में आया। जहां तक दृष्टि जा सकी- वहां तक की धरती देखी, पेड़ देखे, पहाड़ देखा, इमारतों और उनके ऊपर की छतों को देखा, आसमान और उसमें उड़ान भर रहे परिंदों को देखा- अपने पूरे आसपास को देखा। उनसे विदा ली, उन्हें आशीषते-अलविदा कहते सुने। नीचे के पार्क और जलाशय का ध्यान आया। सुरेश जी के आने से पहले कुछ देर को वहां भी हो आने का मन हुआ। जल्दी-जल्दी सीढिय़ां उतरकर जलाशय के पास जा पहुंचे। शाम से बंद हुए कमलों ने खुद को अब पूरा खोला हुआ था। जलाशय के उस नीम उजले जल में खूबसूरत-रंगीन एक मछली लहराती-सी गोलाई में तेज-तेज घूमे जा रही है। ऐसे जैसे कुछ परिक्रमाएं पूरी कर रही हो- या फिर अभी तक के अनजगे जलजों को जगाने के लिए कुल खास तरह की तरंगों के पैदा करने में जुटी हो। मन के गहरे लगाव और पूरे आदर के साथ जलाशय के समग्र उस आसपास को देखा।
 पार्क की उस चादर की तरह बिछी हरी घास पर मौन खड़ा मैं। आंखें बंद किए मन-मन जैसे प्रार्थना-सी एक अभ्यर्थना किए जा रहा था- यहां की इस भूमि पर के पुष्पों, लताओं, वृक्षों, वनस्पतियों, जीव-जन्तुओं! आप सब भी इंसानों की देह की तरह ही पैदा होते हैं, बढ़ते हैं, अनित्य और चेतना सम्पन्न हैं। आप भी ग्लान, व्यथित और हर्षित होते हैं, आहार करते हैं तथा विविध अवस्थाओं को प्राप्त होते हैं। अपने आसपास के हर कृत और घटित के दृष्टा-भोक्ता एवं साक्षी होने के साथ-साथ आप उन सबकी स्मृति को संजो-संभालकर सुरक्षित रख सकने में भी समर्थ हैं। यह मामूली बात नहीं है कि तमाम तरह के विषम समय और विरोधी परिस्थितियों में, संकटकालों में धरती के हर हिस्से में आप अपनी जीवट जिजीविषा और संघर्षशीलता के साथ अपने कर्म-धर्म का निर्वाह करते रहे हैं। सजीव, स्वस्थ, हृष्ट-पुष्ट और प्राणदायी बने रहे हैं। इस सबके लिए मैं आपको नमन करता हूं... आपका वंदन करता हूं। आप सबके प्रति मैं अपनी कृतज्ञता ज्ञाप्ति करता हूं, प्रणाम निवेदित करता हूं। और हां, यहां से विदा होने के इन अद्भुत-अविस्मरणीय क्षणों में इंफाल आने के बाद सीखे-रटे मणिपुरी के दो शब्दों एवं एक वाक्य को आपके सामने एक बार फिर दोहरा रहा हूं- सादर आपको समर्पित कर रहा हूं-
-थागतचारी- धन्यवाद!
-खुरमजरी- नमस्ते!
-खुत लोनना मयाम्बु खुरमजरी- हाथ जोडक़र नमस्कार करता हूं! ’