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Wednesday 22 Nov 2017

भारत का वेनिस - अल्लप्पी

 

 पूनम मिश्रा

डी - 39, सीरी कॉलोनी,
पिलानी (राज.) 333031
मो. 09829338092

चालीस घंटे, एक सौ पांच नदियां, संतानबे गुफाएं और कई मनोरम पर्वत श्रृंखलाओं को पार करती हुई तिरुअनंतपुरम् राजधानी को तिरूअनंतपुरम् में विराम मिलना था। लेकिन कथा में पेंच अभी बाकी था। चेतावनी पहुंची - साइक्लोन केरल की ओर बढ़ रहा है। कोंकण रेलवे की इस अविस्मरणीय-रोमांचकारी यात्रा में हमारा सहयात्री मुरली कृष्णन हंसने लगा- ‘‘सुनामी ने इंडिया को लेफ्ट, राईट से हिट किया पर केरल को टच भी नहीं किया...क्योंकि केरल देवभूमि है, जहां विष्णु (पद्मनाभ स्वामी) अनंत शयन निद्रा में लीन हैं।’’
सात फुट लंबे, राष्ट्रीय बास्केट बाल टीम के खिलाड़ी मुरली कृष्णन के लिये ये सब कहना आसान था क्योंकि वह अल्लप्पी वासी है। लेकिन हम रेगिस्तानी जिनके लिये ढाई इंच बरसात बाढ़ का सबब हुआ करती है, को मुरली अल्लप्पी उतरने की सलाह दे रहा था, वो भी साईक्लोन में। मुरली के लिये अपने घर पहुँचने से ज्यादा बड़ा लक्ष्य था हम रेगिस्तानियों को वहाँ पहुँचाना, जो कल्पना से परे है, शब्दातीत, अवर्णनीय...। अल्लप्पी का असली नाम है ‘अलप्पुषा’ ष, ज़ और ड़ का संयुक्ताक्षर। इसे लिखना संभव नहीं मात्र उच्चारित कर सकते हैं। सही ढंग से उच्चारित करने की विवशता के कारण ही फिरंगी संभवत: इसे ‘अल्प्पी’ कहते होंगे। ‘अलप्पुषा’ नाम का कारण यहां की विशिष्ट भौगोलिकता है। ‘अलप्पुषा’ यानी ‘इन बिटवीन लैण्ड’ समुद्र और नदियों के क्रिस-क्रॉस से बनी ज़मीन। अक्टूबर में बारिश? ‘‘यहां साल भर बारिश होती है’’ मुरली कहता है, ‘‘बारिश तो धरती को लिखा प्रेम-पत्र है...बारिश से कैसा डर?’’ बारिश ने वाक़ई मौसम सुहाना बना दिया था। सँवलाया आकाश, भीगी सुबह और बादलों को कोहनी मारता नटखट सूरज। अल्लप्पी स्टेशन पर प्रीपेड वाहन की सुविधा है। पांच मिनट बाद हम ऐसे लोक में खड़े थे, जिसे शब्दों में बांध पाना मेरे लिये कभी संभव न होगा। नदियों-झीलों-नहरों और भूखंडों में आईस-पाईस का खेल चल रहा हो, या यूँ कहें जल-थल समवेत उत्सव मना रहे हों। कई नहरें, 44  नदियां, तीन झीलें और अनंत तक पसरा अरब सागर, सतत् प्रवाहमयी दुनिया। अपने अस्तित्व की मर्यादा में, परस्पर समर्पित। नदी-झील और सागर की ऐसी जुगलबंदी जिसमें कोई अतिक्रमण नहीं, एक दूसरे में आवाजाही दिखती है... वो भी सम पर, न कोई बेसुरा, न बेताला। वाहनों का प्रदूषण जल सोख ले, पानी का कचरा किनारे समेटें। कोई भूखा नहीं...न पंछी, न मछली, न मनुष्य। एक दूसरे पर निर्भर, एक दूसरे के लिये। संतुलित ईको सिस्टम...आदर्श जीवन पद्धति का नायाब नमूना।
नहरें नदी में, नदियाँ झीलों में, अनेक संगम एक साथ। जल और थल, प्रकृति और पर्यावरण में आपसी लेन-देन। मैं तुम में समा जाऊँ, तुम मुझ में समा जाओ सा। एकात्मबोध। पानी में सैकड़ों जलचर प्रजातियाँ। वहीं तट पर आम-काजू-कटहल के दरख्तों पर प्रवासी पंछियों के कलरव। केले-नारियल, लौंग-इलायची, दालचीनी-काली मिर्च के सुवासित वृक्ष। मुंह से अनायास निकल पड़ा ‘क्या ये हिंदुस्तान है?’ ऐसे ही भाव उठे होंगे वॉयसराय लॉर्ड कर्जन के मन में जब सन् 1910 में अलप्पुषा आए और ऐसे रीझे कि उन्होंने कोच्चि से 62 कि.मी., त्रिवेंद्रम से 155 कि.मी. दूर इस ‘अलप्पुषा’ को ‘वेनिस ऑफ ईस्ट’ की संज्ञा दे दी। जल पर तैरते नगरों में चर्चित है वेनिस और हॉलैण्ड। वेनिस पत्थरों से बना अत्याधुनिक शहर है। हॉलैण्ड (यानी नीदरलैण्ड अर्थात् नीचे की ज़मीन) उत्तरी सागर के पानी को उलीच कर समुद्र तट से 29 मीटर नीचे बसाया गया देश है। लेकिन अल्लप्पी में न समुद्र उलीचा गया, न पानी भरा। यह अरब सागर के तल से नीचे है, जहाँ चारों दिशाओं से मीठे पानी के स्रोत एकत्रित होते हैं। अल्लप्पी के अलावा कंबोडिया और म्यांमार में भी बैक वॉटर हैं। टोनले सैप, यनगांव और मंडले। तीनों में सबसे आकर्षक है अल्लप्पी। क्योंकि अल्लप्पी 1,414 वर्ग किलोमीटर की परिधि में फैला विश्व का सबसे बड़ा, मीठे पानी का ‘बैक वाटर लगून’ है। ‘बैक वाटर’ - जहां नदियों में करेंट नहीं होता और ‘लगून’ जहां समुद्र और भूमि में पार्थक्य हो।
सन् 1762 में राजा केशवदासन् जो तत्कालीन त्रावणकोर साम्राज्य के दीवान थे, को सर्वप्रथम इसे खोजने का श्रेय जाता है। चेरा साम्राज्य में 9 वीं से 12 वीं सदी के अंत तक इस क्षेत्र का सांस्कृतिक उत्थान हो चुका था। त्रावणकोर साम्राज्य से लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी तक यह क्षेत्र रेशम, मसाले, जूट के लिये वाणिज्य-व्यापारिक केन्द्र रहा। बारिश की रिमझिम फुहारों के बीच हम जिस भूलोक में खड़े थे, वहां सृष्टि बहती है, और लहरों पर संग लिये चलती है तीन जिलों को। जहाँ पहुँचते ही वाणी मूक, अभिव्यक्ति कुंद पड़ जाए...स्वर्ग को शब्दों में बांध सका है कोई? पानी में तैरता शहर या शहर में पानी? जल-थल एक दूसरे में गुंथे, गड्-मड्, कैसे समझाऊं? जैसे बाढ़ का ढीठ पानी शहर में घुस आया हो और कहे कि जाओ...नहीं निकलता। जमीन पर सामान्य जनजीवन, और जलडमरू में जलचरों सा। भू-खंड उगे हुए, टापुओं से। जिन पर मकान हैं, दरख्त और दफ्तर भी। आँखों पर दूरबीन लगाए हम देखते रहे, जमीन पर वाहन भाग रहे हैं। वहीं क्षितिज तक पसरे जल को, जिसमें स्टीमर-बोट हाऊस, फेरी, नाव, डोंगियाँ हैं। स्थानीय लोगों के लिये सरकारी बसें हैं, वहीं पानी में यातायात के लिये केरल टूरिज्म के फेरी-जेटी भी।
अल्लप्पी का सुरूर किसी पर न पड़े, असंभव है, पर चर्चित लोगों के सुरूर यहाँ के इतिहास में दर्ज हो गए। इस तिलिस्मी अलप्पुषा का इतिहास भी कम रोचक और रूमानी नहीं। लॉर्ड कजऱ्न से लेकर अंतिम वॉयसराय लॉर्ड माऊंटबेटन तक। पंडित नेहरू से लेकर लेडी एडविना तक। सभी अल्लप्पी की रूमानियत के मुरीद रहे। किसी समय में यह अंग्रेजों का आरामगाह हुआ करता था। इसकी प्राकृतिक सुंदरता, संस्कृति और जनजीवन से प्रभावित होकर पंडित जवाहर लाल नेहरू, वॉयसराय माऊंबेटन और लेडी माऊंटबेटन के साथ प्रति वर्ष ‘ओणम’ पर आयोजित नौकायन देखने आया करते थे। पंडित नेहरू इस बोट रेस से इतने प्रभावित हुए कि प्रति वर्ष विजेता टीम को पुरस्कृत करने की घोषणा की। तभी से ‘ओणम’ पर आयोजित नौका प्रतियोगिता पर ‘नेहरू ट्रॉफी’ देने की परंपरा चली आ है।
शाजी नामक एक व्यक्ति ने आवाज़ दी ‘वेलकम टू अल्लप्पी...’ ओह तो मुरली ने अपना वादा निभाया। पचासों बोट हाऊस, नावों और शिकारों के बीच एक सुंदर बोट हमारा आशियाना रहेगा दिन भर के लिये। डीजल इंजन का चालीस हॉर्स पावर वाला बोट हाऊस हॉर्न देता रवाना हुआ। भीतर स्मृतियों में प्रसाद उभरे ‘ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे-धीरे...’ इसे नावघर कहें या पांच सितारा होटल? एसी, एलईडी टीवी, गलीचे, सुसज्जित डबल बेड रूम, अटैच टॉयलेट. गीजर, डायनिंग रूम, व्यक्तिगत बाल्कनी और खुला डेक। जूट की आंतरिक सजावट। राजा रवि वर्मा के तैल चित्रों की प्रतिकृतियां। सिंगल, डबल रूम के बोट हाऊस। अल्लप्पी में हिंदुस्तानी से ज्यादा सैलानी विदेशी दिखे। सात से पंद्रह हजार रुपए प्रति बोट। दो परिवार हों तो किराया बँट जाएगा। कांटिनेंटल, शाकाहारी, मांसाहारी, दक्षिण भारतीय-उत्तर भारतीय, हर किस्म का भोजन। चाय-जलपान, रिजॉर्ट में रात्रि विश्राम सब बोट वाले का सिरदर्द। आप बेफिक्र होकर पसर जाइये, प्रकृति के आगोश में। मसाज के शौकीनों के लिये तो जन्नत है। मैं शाजी के साथ अपनी डायरी लिये जम जाती हूँ। भीतर उठ रहे अनंत प्रश्नों के लिये शाजी मुकम्मल किनारा था। केरल में भी अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों की तरह भाषाई दिक्कत तो है ही, फिर भी यहाँ लोगों ने हिंदी को बड़े प्रेम से स्वीकारा है। मेरी जिज्ञासा को शाजी की हिंदी मिश्रित अंग्रेजी मिली और अंधे को लाठी का सहारा मिल गया। बोट हाऊस हॉर्न देकर शिकारे या स्टीमर के बगल से गुजऱता। मैंने शाजी से गियर की जानकारी लेते हुए स्टीयरिंग को छू दिया। मेरे बोट चलाने से उसका लायसेंस जब्त हो सकता था। जी हाँ, यहाँ पानी में यातायात के सख्त क़ानून हैं। बिना ड्राइविंग लाइसेंस, रजिस्ट्रेशन नाव चलाना जुर्म है। शराब पीकर नाव चलाना, गलत दिशा से ओवरटेक, बगैर हॉर्न दिये मुडऩा, चालीस कि.मी. प्रति घंटे से तेज़ गति या रात में बोटिंग, सब ग़ैरकानूनी हैं। यहाँ सख्ती से चालान किया जाता है, या फिर लाइसेंस रद्द। जल मार्गों में से कुछ ‘राष्ट्रीय जल मार्ग’ भी हैं।
अब तक मौसम खुल चुका था और नहर एक दीर्घ झील ‘पुन्नेमुडा लेक’ में खुल गया। ‘पुन्नेमुडा लेक’ का विशेष महत्व है क्योंकि नेहरू नौका प्रतियोगिता इसी लेक में आयोजित की जाती है। प्रति वर्ष अगस्त माह के दूसरे शनिवार को आयोजित राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध ‘नेहरू ट्रॉफी बोट रेस’ देखने हजारों पर्यटक यहाँ आते हैं, जिसमें सर्पाकार नौकाएँ भाग लेती हैं। 120 नाविकों वाले इन नावों की लंबाई लगभग 130 फीट होती है, जिसे मलयालम में ‘कली-वलांगल’ कहते हैं। इस प्रतियोगिता का महत्व अब इतना बढ़ चुका है कि प्रतिभागी टीमें महीनों पहले से अभ्यास शुरू कर देती हैं। विजेता टीम को लाखों की धनराशि मिलती है। पहले यह दौड़ राईस बोट यानी छोटे नावों से हुआ करती थी। ‘भारतीय खेल प्राधिकरण’ भवन दिखा। कुछ घंटों में हम एक संकरी नहर ‘वेलक्करम् केनाल’ में थे। दुल्हन से सजे शिकारों में गुजरते विदेशी सैलानियों ने हाय-बाय किया। शाजी ने कहा गुजऱते टूरिस्ट का अभिवादन करना यहाँ की परंपरा है। कितनी ख़ूबसूरत है यह परंपरा। काश ऐसी परंपरा महानगरों में भी होती, अंधाधुंध ट्रैफिक पर कुछ तो लगाम लगती? लहर-दर-लहर चलती दुनिया, अंतस भिगोती रही। सेंट एंड्रयूज़ बेसिलिका यहीं है, कई प्रसिद्ध मंदिर भी। आरती चल रही है, मस्जिद में अजान। सरगम-संस्कृति का मुकम्मल पोट्रेट....। संकरे से नहर के मुहाने पर विशाल नदी ‘पेल्लातुरजी’ है। प्रवेश करते ही घबराहट बढऩे लगी। शाजी ने लाईफ जैकेट दिखाया - ‘आपकी जि़ंदगी हमसे ऊपर...’ ऐसे कहा जैसे दिल पर कविता लिख दी - ‘‘मैं गोताख़ोर/ मुझे गहरे जाना होगा/तुम तट पर बैठ/लहरों की बातें किया करो’’ (स्व. आनंद मिश्र) नदी में महिलाएं छोटी नौकाएं खे रही हैं। यहां सर्वाधिक नाव, शिकारे दिखे। कई सरकारी दफ्तर और बैंक भी। बोट डिपो भी है। जहाँ जल वाहन आराम फरमाते हैं, जैसे बस डिपो में बस। पर्यटकों को शाम छ: बजे होटल-रिजॉर्ट पहुँचा कर नावों की धुलाई-पुंछाई का काम होता है। ताकि सुबह सैलानी नए रोमांचक सफर पर रवाना हो सकें। जिसे जहां नारियल का पेड़ मिले, रस्सी से नाव बांध लो। न कोई रार, न तकरार। कि तुमने नाव यहां कैसे पार्क की? मेरे ग्राहक क्यों छीने, या ओवरटेक क्यों किया? इसे पानी की ठंडी तासीर कहें या आबोहवा की रूमानियत का असर, सब कुछ गतिमान होते हुए भी उग्रता पर लगाम है। सबके चेहरे पर एक से भाव ‘चलाए जाओ जब तक चले, बहुत कुछ सब्र पर ठहरा हुआ है।’
धान की तीन फसल कटती है, तभी इसे ‘कुट्टनाड’ (धान का कटोरा) कहते हैं। बिजली बेहद सस्ती है। पनचक्की से बिजली बनाने की परंपरा है। मोबाइल बाजार। मछली, भाजी, दूध, सब नावों पर, घर के आगे आता है। स्त्रियाँ घरों से निकलीं, स्नान किया, पड़ोसन से गॉसिप के साथ बर्तन-कपड़े भी धो लिये। बगल में एक नाव रुकी, पति को टिफिन थमाया और टाटा....घंटों का काम मिनटों में। जहाँ मानव की मूलभूत आवश्यकताएं सुलभ और सस्ती हों, लहरों पर सवार सुविधाएं द्वार खड़ी हों वहाँ रार-तकरार की संभावनाओं का ग्राफ स्वत: नीचे आ जाता है।
मौसम खुलने लगा। सही कहा था मुरली ने, बारिश यहां हमेशा आती है, पर बाढ़ कभी नहीं। समुद्री हवाएँ खूब चलती हैं, पर तूफान नहीं। जहाँ पूरे साल एक सा मौसम हो, किसान को आकाश का मुंह न जोहना पड़े (क्योंकि मानसून दो आते हैं) सारे धर्म सम पर रहें, वहीं देव निवास कर सकते हैं। जगह-जगह होर्डिंग लगे हैं ‘गॉड्स फीट ऑन लैंड’ जहाँ अभाव की अनुगूंज नहीं, समृद्धि फूटकर बहती हो, उसे ‘देवभूमि’ कहना गलत नहीं।
पानी में तैरते बतख़, सांप, अबाबील हैं। तट पर गाएं चर रही हैं। ‘पैडी फील्ड’ यानी धान के अनगिनत लहलहाते खेत, मेंड़ वाले... धरती गाभिन लगती है। बत्तख़ें-बगुले ठुमक रहे हैं। उतर कर मेड़ों पर चलती हूं पैरों के नीचे पत्तों की चुरमुर ‘सड़े पत्ते, गले पत्ते/ऊंघते अनमने पत्ते/ चलो इन पर चल सको तो/ दलो इनको दल सको तो...’ भवानी प्रसाद मिश्र याद आते हैं। कॉफी की तलब उठी। एक रेस्त्रां में रुके। पहले स्थानीय केले-कटहल के चिप्स मिला करते, अब फास्ट फूड काबिज हैं। त्राहिमाम् बाजारवाद... अनुकरण की अंधी दौड़ ने हमारा सब कुछ छीन लिया? सोचती हूं क्या पश्चिमी देशों में भी हमारी भोज्य-संस्कृति को इसी आत्मीयता से अपनाया गया होगा, जितनी आत्मीयता से हमने बर्गर, पीत्जा? पेड़ों पर काजू लटक रहे हैं, दालचीनी, लौंग, और घुंघरुओं से इलायची। सर्वाधिक अचंभित किया वनीला की छाल ने। वनीला एसेंस और असली वनीला में इतना अंतर?
एक अंतर आगे चलकर और दिखा, नदी और नद का। पंपा और पेरियार केरल की दो प्रमुख नदियाँ हैं जो नद को परिभाषित करती हैं। संथागिरी, आयुर्वेदा, अगस्त्य, कैराली, जैसे बड़े आयुर्वेदिक पंचकर्म पद्धति केन्द्रों पर विदेशी पर्यटकों का जमावड़ा दिखा। यहीं ‘स्पाईस-ग्राम’ नामक एक गांव है, जहां विदेशी महीनों रहकर सांघातिक रोगों का उपचार करवाते हैं। हम एंटीबायोटिक खाकर बेहाल हैं, ये मालिश से रोगोपचार करवाने हजारों मील चलकर आते हैं...कैसी उलटबांसी है? अपनी विरासत की कद्र करना हम कब सीखेंगे?
सूरज की किरनों ने बादलों के तकिये से ज्यों ही सिर उठाया, जल का अनंत पाट सुनहरी रश्मियों से झिलमिला उठा। विदेशी पर्यटक यूँ बिलबिलाकर बाहर निकले जैसे चींटियों को मीठे की गंध मिली हो। सूरज के ताप को अंग-प्रत्यंग में समाहित करने विदेशी सैलानी डेक पर नंग-धड़ंग लेट गए। हंसी आती है। हम इनके मुल्कों की ओर अपेक्षामुखी होकर ताकते हैं, और ये सूरज को। सूर्य...कहते हैं सबके लिये एक है। पर महा शक्तिशाली देशों के लिये सूरज सौतेला हो गया? रामविलास शर्मा की पंक्तियां याद आने लगीं ‘पक्का रंग कंचन सा ताया हुआ/ सोना ही सोना छाया आकाश में/ पश्चिम में सोने का सूरज डूबता...’ कैसा होगा इनका देश जहाँ लोग धूप को तरसते हैं? पंपा नदी आगे चलकर ‘वेंपनाड लेक’ में मिलती है। जिसकी सीमाएँ तीन जिलों कोच्चि, कोट्टायम, अल्लप्पी को छूती हैं। इस झील को एशिया की सबसे विशाल झील माना जाता है, क्योंकि इसकी परिधि 250 किलोमीटर और गहराई अथाह है। शाम ढल रही है। संवलाया आकाश, अनंत क्षितिज। निविड़ अंधकार, नि:शब्द यामिनी...टिमटिम रौशनी जैसे पीछे छूट रही है वैसे ही कुछ समय बाद अल्लप्पी हमसे छूट जाएगा। लेकिन यहां की स्मृतियां...कभी नहीं। कहते हैं मंजिल से आकर्षक पड़ाव होता है, और इस पड़ाव ने यादों की डालियों पर इतने सुंदर जुगनू टांक दिये कि मंजिल की चाह जाती रही। भीतर कहीं बहुत गहरे अल्लप्पी जा बसा है। आज भी जब किसी भीगे दिन आकाश संवलाता है, आसमान का प्रेम पत्र धरती पढ़ती है, मन हजार पंख लिये अल्लप्पी पहुंच जाता है। तब गालिब के शेर से मन को समझाना पड़ता है -
‘वो बाद-ए-शबाना की मस्तियां कहां?
उठिये के अब लज्ज़त-ए-ख्वाब-ए सहर गई।’