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Saturday 18 Nov 2017

आस्था और रोमांच की यात्रा

पवन चौहान
गांव व डा. महादेव, तहसील
सुन्दर नगर, जिला मण्डी
(हि प्र)- 175018
मो. 98054 02242  
हिमाचल में यात्राओं का अपना ही रोमांच है। पूरे साल भर अपने उफान में रहने वाली इन यात्राओं में कुछ एक ऐसी यात्राएं हैं जिन्हें तय कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं है। ऐसी ही कठिन धार्मिक यात्राओं में से एक है किन्नर कैलाश यात्रा। वर्ष 2005 में मैंने रिकांगपिओ स्थित हमारे स्कूल के स्टाफ  व आई टी आई के लडक़ों के साथ इस यात्रा को तय करने का निश्चय किया। यात्रा में आने वाले हर क्षेत्र को जानने के लिहाज से मैंने स्थानीय लडक़े विकी नेगी को अपने साथ ले लिया।
इस यात्रा में हम उस शिवलिंग के दर्शन करते हैं जो 35-40 फुट ऊंचा है। 6500 मी. की ऊंचाई पर स्थित यह हिमाचल का सबसे ऊंचा धार्मिक स्थल है।  किन्नर कैलाश अर्थात किन्नौर वासियों का कैलाश। यह स्थान शिव के पौराणिक स्थानों में से एक माना गया है। लोगों के कथनानुसार इस स्थान पर शिव के आदेशानुसार सतलुज नदी को मानसरोवर से किन्नौर लाए थे। ताकि उस जहरीली नदी को फिर से इस्तेमाल योग्य बनाया जा सके जिसे पड़ोसी राज्य के शासक ने ढेर सारा जहर मिलाकर जहरीली बना दिया था। हिमाचल प्रदेश के जिला किन्नौर के मुख्यालय रिकांगपिओ से लगभग 5 कि मी नीचे सतलुज की ओर राष्ट्रीय उच्च मार्ग-22 पर स्थित पोवारी नामक स्थान से हम इस यात्रा की शुरुआत करते हैं। पोवारी से हमें उस चट्टान की गुफा तक पहुंचना था जहां रात को यात्री ठहरते हैं। यह चट्टान पोवारी से लगभग 12 किमी की दूरी पर किन्नर कैलाश की आधी ऊंचाई पर है। इसके बाद पार्वती कुंड आता है जो गुफा से लगभग डेढ़ किमी की दूरी पर है। पार्वती कुंड से किन्नर कैलाश शिवलिंग की दूरी लगभग अढ़ाई किमी है।
पोवारी से हमने उफनती सतलुज नदी को झूले की सहायता से पार किया। बस! यहीं से ही इस यात्रा का रोमांच शुरु हो जाता है। झूले ने हमें तंगलिंग गांव की सरहद तक पहुंचाया। अब पुल का निर्माण भी हो चुका है। तंगलिंग गांव किन्नर कैलाश पर्वत श्रृंखला की तलहटी पर बसा एक सुंदर गांव है। सेब, चूली, खुमानी, बादाम, न्योजे आदि फलों से भरपूर इस गांव से होते हुए जब हम थोड़ा ऊपर पहुंचे तो सांस यहीं से फूलने लग गई। घर वापिस आने को मन करने लगा। लेकिन अटूट आस्था ने हमारे कदमों को विराम नहीं लगने दिया। तंगलिंग गांव के आगे और कोई गांव या घर नहीं आता। आगे की यात्रा हमें सुनसान जंगल से होकर तय करनी पड़ी। जहां गांव की सीमा समाप्त होती है वहीं से दूसरी खड़ी पहाड़ी शुरु हो जाती है जिससे होकर हम किन्नर कैलाश पहुंचते हैं। इसी पहाड़ी की तलहटी से होकर एक छोटा-सा नाला बहता है जो किन्नर कैलाश की आस-पास की पहाडिय़ों से बर्फ  पिघलने के कारण वर्ष भर बहता रहता है। इस नाले से हमने अपने साथ पीने का पानी अपने साथ लिया क्योंकि आगे की इस पहाड़ी की 5-6 घंटे की कठिन यात्रा के दौरान हमें कहीं भी पानी नसीब नहीं होना था। यह बात हमें हमारे गाइड विकी नेगी ने बताई। न्योजे और देवदार के जंगल के बीच से इस खड़ी चढ़ाई को तय करने के उपरांत जब हम पहाड़ी के शीर्ष पर पहुंचे तो हमें धूप की झाडिय़ों का दीदार हुआ जो हमें किसी अफ्रीकन के सिर पर छोटे-छोटे घुंघराले बाल की तरह प्रतीत हो रही थी। इस पूरी पहाड़ी को ‘दर्शन पार्क’ के नाम से जाना जाता है। इस पहाड़ी के शीर्ष से थोड़ा दूसरी तरफ  ढलान की ओर जब हमने रुख किया तो हमें भोजपत्र के पेड़ों के छोटे से जंगल के दर्शन हुए। इस ऊंचाई से जिला मुख्यालय रिकांगपिओ और कल्पा बौने से नजर आ रहे थे। अभी हमारी आधी यात्रा भी तय नहीं हुई थी। अंधेरा हो चुका था। हम अब आगे पत्थर की गुफा तक नहीं पहुंच सकते थे। इसलिए हमने पूरी रात इसी गंजी पहाड़ी पर धूप की झाडिय़ों को जलाकर गुजारी। गर्मी के इस मौसम में पूरी रात भर हम ठंड से ठिठुरते रहे। इस यात्रा के दौरान हमें कुछ बातों का विशेष ख्याल रखना चाहिए। जितने दिन आप अपनी यात्रा में लगाते हैं उतने दिन का खाने का सामान अपने साथ ले जाएं तो बेहतर रहेगा। क्योंकि यहां आपको आगे ऐसी कोई व्यवस्था नहीं मिलेगी कि जहां से आप यात्रा के दौरान कोई वस्तु खरीद सकें। दूसरी बात गर्म कपड़े तो आपको अपने साथ रखने ही होंगे। यहां का मौसम वर्ष भर ठंडा ही रहता है। पानी की बोतल को पर्वत से आने वाली धारा से भरते रहें क्योंकि इस बेहद थका देने वाली यात्रा में आपको पानी की हर कदम पर जरुरत महसूस होती रहेगी। बेशक, पिछले तीन-चार वर्षों से यहां पर किन्नर कैलाश कमेटी द्वारा लंगर व मेडीकल सुविधा के साथ पुलिस हेल्पलाइन की सुविधा भी प्रदान की जा रही है। लेकिन लंगर की व्यवस्था यात्रा के सबसे निचले पायदान अर्थात यात्रा के शुरु में ही रहती है। आगे नहीं।
सुबह हम जल्दी ही उठ चुके थे। आगे की यात्रा हमने साढ़े चार बजे आरंभ कर दी थी। जब काफी उजाला हुआ तो हमें उन दुर्लभ जड़ी-बूटियों के दर्शन हुए जो कि बर्फ  पिघलने के उपरांत धरती से प्रस्फुटित होती है। गंजी पहाडिय़ों पर हमें अजीब किस्म के सुंदर व रंग-बिरंगे तरह-तरह के फूलों की चादर बिछी नजर आई। इस ऊंचाई और इन्हीं खूबसूरत फूलों के बीच हमें उस पवित्र ‘ब्रह्म कमल’ का भी दीदार हुआ जिसे यहां के लोग इतनी ऊंचाई पर जाकर विशेष तौर पर लाते हैं ताकि वे इस कमल को अपने गांव में लगने वाले मेले के दौरान या फिर मंदिर में ही अपने देवी-देवता के चरणों में चढ़ा सकें।
नीचे की ओर ढलानदार रास्ता तय करने के उपरांत हम फिर उसी नाले के पास पहुंच गए थे जिसका पानी हम पिछली पहाड़ी की तलहट्टी से अपने साथ लेकर चले थे। बर्फीले पानी की तेज धार के साथ हमें जुलाई-अगस्त के गर्म महीने में भी नाले के साथ बर्फ  जमी नजर आई। आगे की यात्रा के लिए हमने इसी नाले से पानी भरा और फिर से चढ़ाई शुरु कर दी। जिसने हमें उस विशालकाय चट्टान के नीचे बनी उस गुफा के पास पहुंचा दिया जहां यात्री रात्रि विश्राम करते हैं। इस पूरी पेड़-पौधों रहित, खुली, नंगी जगह पर यह चट्टान एक सराय से कम नहीं है। गुफा पर पहुंचते ही हमारी किन्नर कैलाश की आधी यात्रा तय हो गई थी। इसी गुफा के साथ तीन-चार छोटी गुफाएं और भी थीं जिसमें एक दो गुफाओं पर पुआलों ने इस मौसम में अपनी भेड़- बकरियों के साथ डेरा जमाया हुआ था। यहां से जब हमने नीचे पहाड़ी के धरातल पर नजर दौड़ाई तो उठते बादलों के कारण हमने पल में ही खुद को धुंध से घिरा पाया। चारों तरफ  बादलों की सुंदर परिकल्पनाएं मन को मोह रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे हम आकाश में विचरण कर रहे हों। इस पूरे इलाके को ‘गणेश पार्क’ की संज्ञा से नवाजा जाता है। यदि किस्मत अच्छी हुई तो हमें इस इलाके में उन दुर्लभ जड़ी-बूटियों के दर्शन भी नसीब हो सकते हैं जिनसे कभी-कभी प्रकाश फूटता है। गुफा से आगे किन्नर कैलाश तक पहुंचने के लिए अभी लगभग छ: घंटे की और यात्रा शेष थी। लेकिन आगे की यह यात्रा पिछले दिन की यात्रा के मुकाबले ज्यादा कठिन और जोखिम भरी थी। आगे का रास्ता हमें बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच में से होकर तय करना था। थोड़ा सा भी मौसम खराब हुआ नहीं कि हमें अपनी आगे की यात्रा स्थगित करनी पड़ सकती थी। वैसे यहां बारिश नाममात्र की होती है लेकिन यदि थोड़ी सी भी बूंदा-बांदी हुई तो समझो आपकी जान को खतरा है। पहाड़ी से पत्थरों का सैलाब आप पर बरस सकता है। आक्सीजन की कमी तो यहां साफ  समझ आ रही थी। दस कदम चलने पर हमारी सांस फूल रही थी। धडक़न धौंकनी की तरह चल रही थी। गुफा के आगे लगभग एक-डेढ़ घंटे की इस कठिन खड़ी डगर पर चलने के उपरांत हमने एक चौड़े, विस्तृत व समतल से नजर आने वाले मैदान का सामना किया जो बड़ी-बड़ी चट्टानों के जंगल से भरा पड़ा था। ये चट्टानें आस-पास की पहाडिय़ों से टूट कर इस क्षेत्र में जमा हुई हैं। इन्हीं चट्टानों के बीच में से होकर हमें आगे का रास्ता तय करना था। इन बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच से रास्ते का पता हमें वे छोटे-छोटे पत्थर दे रहे थे जो कुछ कदम पर किसी न किसी आगे आने वाली चट्टान पर तीन से पांच तक की संख्या में एक के ऊपर एक चिनाई किए हुए थे। यह कार्य हमसे पहले यात्रा पर गए यात्रियों ने अन्य यात्रियों की सुविधा के लिए किया था।
यात्रा का यह हिस्सा हमें और ज्यादा रोमांच से भर रहा था। यह हमें प्रकृति के एक अन्य रुप से रुबरु करवा रहा था। इस स्थान पर पहुंचते-पहुंचते जैसे हमारी हिम्मत ही जबाब देने लग गई थी। लेकिन अगाढ़ श्रद्धा का जोश हमारा हौसला पस्त नहीं होने दे रहा था। चट्टानों पर छलांगे मार-मार कर आगे का रास्ता नापते हुए हमें इन चट्टानों के बीच एक छोटे से ताल के दर्शन हुए। विकी ने बताया यह ‘पार्वती कुंड’ है। यहां पूजा-अर्चना करने के उपरांत हमारे कदम एक बार फिर किन्नर कैलाश की ओर बढ़ चले थे।
बता दें कि किन्नर कैलाश के प्रति अपनी आस्था प्रकट करने का एक और जरिया भी है किन्नर कैलाश की परिक्रमा। जो श्रद्धालु इस ऊंचाई को नहीं चढ़ पाते वे किन्नर कैलाश की परिक्रमा करते हैं। यदि हम रिकांगपिओ से परिक्रमा आरंभ करें तो यह पंगी, रिब्बा, रिस्पा, जंगी, मूरंग, ठंगी, लम्बर, रंगरिक टुंडमा, लालंती, छितकुल, सांगला, कड़छम से होते हुए रिकांगपिओ में समाप्त होती है। यह परिक्रमा काफी कठिन व मुश्किल भरे रास्तों से होकर गुजरती है। यात्रा के अगले हिस्से में मैदान की बड़ी-बड़ी चट्टानों को छोड़ अब हमने पत्थर के पहाड़ की ओर रुख कर लिया था। जहां से किन्नर कैलाश की यात्रा में एक नया रोमांच जुड़ गया था। गर्मी के दिनोंं में ठंड के मारे हमारा शरीर थरथरा रहा था। लेकिन शिवलिंग के दर्शन की अभिलाषा हमारे शरीर को एक अनोखी ऊर्जा से चलाएमान रख रही थी। कुछ ही पलों में हम वहां पहुंच गए थे जहां पहुंचते- पहुंचते न जाने कितनी बार हमारी हिम्मत लडख़ड़ाती रही। अब हमारे सामने था लगभग 35-40 फुट का विशालकाय शिवलिंग जो किन्नौरवासियों की अटूट आस्था व अगाढ़ श्रद्धा का प्रतीक है। किन्नर कैलाश की इस चोटी से हमें रिब्बा, जंगी आदि गांव के साथ-साथ पूह की तरफ  की उन नंगी पर्वतमालाओं के दूर-दूर तक दर्शन होते हैं जो पेड़ रहित रेत की ढेरियों की तरह नजऱ आती हैं। इसी चोटी की दूसरी तरफ  की चोटियां इन गर्मी के महीनों में भी बर्फ  से लदी थी जहां से बर्फ  के पिघलने के साथ-साथ चट्टानों का टूट कर गिरना जारी था। शिवलिंग के दर्शन करते ही हमारी सारी थकान एक पल में ही छूमंतर हो गई थी। इस पहाड़ी के शिखर पर अकेला सीधा खड़ा यह विशालकाय शिवलिंग किसी चमत्कार से कम नहीं है। शिवलिंग के आधार तक पहुंचने के लिए हमें लगभग पांच मीटर लंबी व लगभग तीन फुट चौड़ी पत्थर की पट्टिका के ऊपर से गुजरना पड़ता है। यह पट्टिका उस समय बनी होगी जब एक चपटी सीधी खड़ी चट्टान जो समय के बहाव के चलते धीरे-धीरे टूटती चली गई। इसके टूटे इस हिस्से ने पट्टिका का निर्माण किया और जो हिस्सा शेष बचा रह गया वह आज शिवलिंग के रुप में हमारे समक्ष खड़ा है। इन तथ्यों से शिवलिंग के प्रति लोगों की श्रद्धा व आस्था में जरा भी अंतर नहीं आता। वे इस श्रद्धा व रोमांच की यात्रा में हर बार शामिल होना चाहते हैं। चारों तरफ  से खुले इस क्षेत्र में हवा इतनी अधिक होती है कि आदमी को उड़ा ले जाए। व्यक्ति जरा सा भी इधर-उधर हुआ नहीं कि उसे हजारों फुट गहरी खाई का सामना करना पड़ सकता है। शिवलिंग की एक खास बात है कि यह दिन में सूर्य की स्थिति के अनुसार अपना रंग बदलता रहता है। सुबह यह शिवलिंग यदि भूरा होगा तो दोपहर को यह शिवलिंग लालिमा लिए रहता है और शाम को ग्रे रंग में परिवर्तित हो जाता है। विद्वान इस शिवलिंग को बद्रीनाथ कहकर भी पुकारते हैं। शिवलिंग पर माथा टेककर दोपहर एक बजे हम वापिस अपने ठिकानों की ओर चल दिए थे। यह यात्रा मुझे कभी नहीं भूल पाएगी। यह सदा मेरे मानसपटल पर आस्था और रोमांच का जादू बिखेरती रहेगी।