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Wednesday 22 Nov 2017

उत्कृष्ट मूर्तिशिल्पों के अनूठे संग्रहालय - एलीफेन्टा व कन्हेरी की गुफाएं

डॉ. ओमप्रकाश कादयान
1416, सेक्टर-13, हिसार (हरि.)
मो. 09416252232
यात्राएं हमें बहुत कुछ सिखाती हैं। घूमने का कारण या लक्ष्य कोई भी हो, किन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि यात्राएं हमें बहुत कुछ देती हैं, हमें तनाव रहित बनाकर नई ऊर्जा, नई स्फूर्ति प्रदान करती हैं। जो ज्ञान हमें किताबों से या सीमित दायरे में रहते हुए नहीं मिलता वो ज्ञान हमें यात्राओं से प्राप्त होता है। जिनको यात्राएं करने की आदत पड़ गई उन्हें यात्राओं में आनन्द आता है। इसी आनन्द का मैं भी आदी हो गया हूँ। जब कुछ दिन बीत जाएं तो लगता है कि कुछ खो सा गया है, उसे ढूंढने के लिए मैं बैग तैयार करके, कैमरा उठाकर चल देता हूँ, किसी पर्वतीय, जंगल, रेगिस्तान, समुन्द्र या अन्य किसी खास जगहों पर जहां कुछ नयापन लगे। वो नयापन जहां मुझे नई ऊर्जा प्राप्त हो सके।
अबकी बार जैसे ही समय मिला मैंने मुम्बई की यात्रा की योजना बनाई। मुम्बई के आसपास और मुम्बई महानगर को देखने, जानने के साथ-साथ एलीफेन्टा और कन्हेरी की गुफाएं देखने का मेरा खास मकसद था। गणेशोत्सव भी इन्हीं दिनों था। हम करीब साढ़े चार बजे सांय मुम्बई के मीरा रोड स्टेशन पहुंचे। वहां हमारे स्वागत में मेरे मित्र फिल्म समीक्षक, पत्रकार अनिल बेदाग खड़े थे। अगले दिन हमें बेदाग जी के साथ विश्व प्रसिद्ध एलीफेन्टा की गुफाएं देखने जाना था। अगली सुबह हम तैयार होकर गेटवे ऑफ इण्डिया की ओर चल दिये। एलीफेन्टा की गुफाएं अरब सागर के एक छोटे से एलीफेन्टा द्वीप पर बनी हैं। एलिफेन्टा द्वीप धरापुरी के नाम से भी जाना जाता है। एलीफेन्टा का नाम यहां से प्राप्त एक शैलकृत विशाल हाथी के कारण पड़ा जो वर्तमान में ‘वीरमाता जीजाबाई भोंसले उद्यान’ (विक्टोरिया उद्यान) मुम्बई में प्रदर्शित है। गेटवे ऑफ इण्डिया से करीब घण्टे भर का समुद्री सफर तय करके इन गुफाओं तक पहुंचा जाता है। हमने टिकट लिया तथा फेयरी में सवार हो लिए। उसमें हमारे साथ 60-70 यात्री और थे। सफर शुरू होते ही एक घोषणा की गई कि सभी यात्रियों से निवेदन है कि इस सफर के दौरान आपको समुद्र में तैनात नौसेना के सैकड़ों छोटे-बड़े जहाजों के फोटो नहीं खींचने हैं। अगर आपने ऐसा किया तो नौसेना के जवान आपके विरूद्ध कार्यवाही कर सकते हैं। वो दूरबीन से हम पर नजर रखे हुए हैं। हम थोड़ा आगे बढ़े तो देखा कि समुद्र में चारों ओर नौसेना के विशालकाय जहाज पानी पर तैर रहे थे। कई-कई मंजिले व बड़े-बड़े जहाज। ऐसे जहाज जिनमें एक दुनिया बसी हुई होती है। यात्रियों से रहा न गया तो अपने मोबाइल पर या कैमरे से ही फोटो लेने का प्रयास चलता रहा। स्टिमर के कर्मचारियों के बार-बार मना करने पर ही वो माने। समुद्री पानी को चीरता हुए स्टिमर आगे बढ़ रहा था, लहरों से जूझता हुआ। बीच-बीच में हिचकोले भरता हुआ। हवा हमारी विपरीत दिशा में बह रही थी। इसलिए स्टिमर अपनी गति से थोड़ा धीरे चल रहा था। अन्य स्टिमर भी यात्रियों से भरे आ-जा रहे थे। हम विशाल अरब सागर-देह की लहरों पर तैर रहे थे। यहां आकर यह भी आभास हो जाता है कि सागर के सामने मनुष्य का अस्तित्व क्या है? फिर भी मनुष्य ने अपनी सोच व हौसलों से थल, जल व नभ की काफी हद तक विजय पाई है। समुद्र की लहरों पर तैरते या जगह-जगह खड़े नौसेना के भव्य जलयान मनुष्य के आविष्कारों का ही सुपरिणाम है।
करीब पौने घण्टे के सफर के बाद हम उस द्वीप पर थे, जहां एलीफेन्टा की गुफाएं बनी हैं। द्वीप पर उतरते ही हमें एक लघु रेल मिल गई जिसने 10 रू. में करीब दो किलोमीटर आगे छोड़ दिया। यहीं से गुफाओं के लिए चढ़ाई आरम्भ हो जाती है। नीचे से गुफाओं तक दोनों तरफ कलात्मक वस्तुएं खरीदने के लिए दुकानें बनी हैं। करीब 10 मिनट की चढ़ाई के बाद गुफाएं आरम्भ होती हैं। यहां प्रवेश शुल्क देकर अन्दर जाने की इजाजत है। हमने गुफाओं का अवलोकन किया तो आश्चर्यचकित रह गए। इतने विशाल पर्वत की कठोर देह को किस तरह से काट-काट कर गुफाएं ही नहीं बल्कि अद्भुत सुन्दर व कलात्मक मूर्तिशिल्पों की एक नगरी ही बना दी। अब जबकि मनुष्य ने 21वीं सदी में चमत्कारिक आविष्कार किये हैं। एक से बढक़र एक अत्याध्ुनिक हथियार बना लिए फिर भी अजन्ता, एलोरा, कन्हेरी या एलीफेन्टा जैसी गुफाएं नहीं बना सका या जरूरत महसूस नहीं हुई। और आज से हजारों वर्ष पूर्व मनुष्य ने इस तरह की अनेक गुफाएं व हजारों मूर्तिशिल्प बना दिए जो उत्कृष्ट कला का सुन्दर उदाहरण हैं।
इन प्रतिमाओं से दैवी शक्ति, प्रेम, आध्यात्मिक शांति जैसे भाव स्पष्ट दिखाई देते हैं। मुख्य गुफा के बाहरी हिस्से में स्तंभों पर टिका 30 फुट चौड़ा एक बरामदा है, जिसमें हाथी की प्रतिमाएँ हैं। गुफा की दीवारों से उभरे स्तंभ दीवारों के पास खड़े द्वारपाल के रूप में बनाए गए हैं। इन गुफाओं में त्रिमूर्ति, नटराज, अर्धनारीश्वर, शिव-पार्वती, शिव की जटाओं से बहती हुई गंगा तथा शिव का योगीश्वर रूप दिखाया गया है। एक प्रतिमा में शिव को अंधक दैत्य को मारते हुए उग्र रूप में दिखाया गया है। अन्य प्रतिमाओं में शिव-पार्वती के विवाह की प्रतिमा, कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास करते हुए रावण की प्रतिमा तथा अन्य देवी-देवताओं की छोटी-छोटी प्रतिमाएं हैं। शिव के विभिन्न रूपों से सटी ये गुफाएं उन दिनों के लोगों की महादेव शिव के प्रति आस्था को सुदृढ़ रूप में प्रकट करती हैं। यह स्थान हिन्दुओं के लिए ही नहीं, बल्कि कला के क्षेत्र में देश-विदेश के हर धर्म के लोगों के लिए आकर्षक और रोमांचक है।
एलीफेन्टा गुफा समूह के अन्र्तगत सात गुफाएं हैं। इनमें पांच पश्चिम पहाड़ की ओर तथा दो गुफाएं पूर्वी पहाड़ी में बनी हैं। पश्चिमी पहाड़ी की गुफा एक ‘शिव’ के विभिन्न रूपों को दक्षता से उकेरा गया है कि ये उत्कृष्ट मूर्तिशिल्पों का अनूठा उदाहरण हैं। इनकी श्रेष्ठता देखते हुए ही ये गुफाएं विश्व प्रसिद्ध हो सकी हैं। एक जगह मेघों का अंकन है। भगवान शिव को यहां योगीश्वर, नटराज, शिव-पार्वती के साथ, अर्धनारीश्वर, गंगाधर, अन्धकासुर वध, कल्याण सुन्दर, रावणानुगृह दृश्यों में दिखाया गया है। ‘महेश मूर्ति’ दक्षिण दीवार के मध्य में उत्कीर्ण है जिसमें शिव के तीन रूपों सृष्टिकत्र्ता, संरक्षक व संहारक दिखाया है। ये गुप्त चालुत्य कला की उत्कृष्ट कृति है। प्रांगण में नन्दी तथा पाश्र्ववर्ती गुफा में एक छोटे मन्दिर में कार्तिकेय व गणेश हैं। यहां प्राप्त अन्य पुरावशेषों में पूर्ण पहाड़ी के शीर्ष में तीसरी शताब्दी ई. पूर्व का एक विशाल स्तूप, चौथी शती ई. पूर्व क्षत्रप सिक्के तथा कुछ मूर्तियां मिली हैं जिनमें महिषासुर-मर्दिनी, चतुर्मुखी ब्रह्मा, विष्णु व गरूड़ की प्रमुख मूर्तियां हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग के अन्तर्गत आने वाली इन गुफाओं के महत्व को देखते हुए 1987 में इन्हें ‘यूनेस्को’ द्वारा विश्व स्मारकों में शामिल किया गया।
यद्यपि इस टापू पर अभी भी लोग ज्यादा संख्या में नहीं रहते और यह मुख्य रूप से पर्वतीय तथा निर्जन वन क्षेत्र ही है, फिर भी इस टापू पर मानव जाति के छठी शताब्दी ई. में ही पहुँच जाने के प्रमाण मिल गए थे। पहाड़ी में उस काल की कुछ गुफाएं पाई गई हैं, जो देवी-देवताओं की शिला प्रतिमाओं से भरी हुई हैं। यह तो निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि कला के क्षेत्र में इनका निर्माण किसने करवाया, परंतु यह निश्चित है कि इन गुफाओं का शिल्प कौशल एक लंबी परम्परा का परिणाम है, जो देश में इनके निर्माण से 1000 वर्ष पहले से चली आ रही थी। यह क्षेत्र गुप्तकाल के शिल्पियों का हस्त कौशल और कालिदास जैसे सांस्कृतिक कवि की चेतनता को हृदयंगम वेग कर चुका था। निश्चय ही इन दोनों के मेल से एलीफेन्टा गुफाओं का जन्म हुआ। शाही संरक्षण के बिना इनका निर्माण नहीं हो सकता था और तत्कालीन हिंदू राजाओं ने इस नवसृजन को पूरा प्रोत्साहन दिया। इन गुफाओं में शिव और उनसे सम्बन्धित प्रतिमाएं अधिक होने से लगता है कि इनका निर्माण उस समय हुआ होगा, जब इस क्षेत्र में शैव धर्म का प्रचार जोरों पर था और जब इसे राजशाही समर्थन भी मिल रहा होगा। सोलहवीं शताब्दी में पुर्तगालियों ने इनमें से बहुत सी प्रतिमाओं को नष्ट कर दिया था, परंतु ये आज भी उस काल के लोगों के हस्त कौशल, भाव प्रवणता, विषय की गहरी जानकारी और धर्म के प्रति आस्था तथा लगन को पूरी तरह प्रकट करने में सक्षम हैं।
पहाड़ी पर गुफाओं के पास ही एमटीडीसी का टूरिस्ट लॉज है। गुफा के पास खाने-पीने की अच्छी व्यवस्था है और कलात्मक वस्तुओं की दुकानें हैं। फोटो खींचने वाले अनेक फोटोग्राफर तथा गाइड भी मिल जाते हैं। यहां वर्ष भर 18 डिग्री से 33 डिग्री से. के मध्य तापमान रहने के कारण वर्ष भर सामान्य मौसम रहता है और यहां कभी भी जाया जा सकता है। महाराष्ट्र पर्यटन विभाग यहाँ फरवरी में रात्रिकालीन शास्त्रीय संगीत, गीत तथा नृत्य महोत्सव आयोजित करता है।
एलिफेन्टा की गुफाओं का अवलोकन कर, कुछ घण्टे यहां बिता कर हम वापिस अपनी नौका की ओर चल पड़े। पहले हमने चाय पी, कुछ खाया फिर लघु ट्रेन से नौका तक पहुंचे। नौका (स्टिमर) भरने में मुश्किल से दस मिनट लगे होंगे। भरते ही फिर वही समुद्री सफर आरम्भ हुआ। अब हवा हमारे खिलाफ नहीं बल्कि हमारी दिशा में बह रही थी। इसलिए शायद स्टिमर की गति तेज थी। सामने सूरज अपनी चमक से रजत कण स्रोत लुटा रहा था। कुछ देर बाद सूर्यास्त के संकेत मिलने लगे तो भास्कर की रजत रश्मियां, स्वर्णिम आभा में बदलने लगी। देखते-ही-देखते चांदी जैसा सूरज स्वर्णिम गोले में तबदील हो गया। जैसे किसी स्वर्णकार ने चांदी के घोल पर सोने का घोल लगा दिया हो। सूरज की ताकत का एक अन्दाजा हमें तब भी लगा जब अत्यधिक दूरी के कारण छोटे से दिखने वाले सूरज ने पूरे अरब सागर के जल को अपने रंग में रंग लिया। सूरज ने नीचे झुककर बड़े विनम्रतापूर्वक अपनी भव्य पोटली के रंगों को जैसे सागर की लहरों पर उढेल दिया हो तथा लहरों ने इस सुनहरी रंग को अपने नृत्य के साथ धीरे-धीरे समस्त जल में घोल दिया हो। अब सूरज के साथ अरब सागर भी सोने जैसा चमकीला लगने लगा। अब हमारा स्टिमर नीले पानी पर न चलकर स्वर्णिम जल भण्डार पर तैर रहा था। नेवी की नौकाएं इधर-उधर दौड़ रही थी तो बड़े जहाज अपने स्थान पर खड़े थे। सूरज जैसे-जैसे क्षितिज में प्रवेश कर डूबता गया, लालिमा अपने रंग दिखाती गई। फिर धीरे-धीरे स्वर्णिम रंग आसमान, बादल और अरब सागर से गायब होता गया। अन्धेरा होने से पूर्व हम गेटवे ऑफ इण्डिया पहुंच गए। गेटवे ऑफ इण्डिया रात को रंग-बिरंगी रोशनी में खूबसूरत लगता है। यहां रात को भी पर्यटकों का जमघट लगा रहता है। हम यहां से सीधे जहांगीर आर्ट गैलरी में गए जहां देश के विभिन्न भागों से आए 5-6 नामी कलाकारों का काम प्रदर्शित था। चार चित्रकार तथा दो शिल्पी थे। हमने उनका कार्य देखा, बातचीत की तथा लोकल ट्रेन में धक्का-मुक्की से सवार होकर भंयकर भीड़ से जूझते हुए मीरागेट स्टेशन उतर लिए, अपने मित्र के घर जाने के लिए। अगले दिन हमें बोरीवाली के पास नेशनल पार्क तथा कन्हेरी की बौद्ध गुफाएं देखने जाना था। क्योंकि नेशनल पार्क जाने के लिए खुद का वाहन न हो तो सारा दिन लग सकता है। इसलिये अगले दिन मेरे मित्र शशिपाल हमें अपनी गाड़ी में घुमाने ले गए। नेशनल पार्क में पहले जंगली जानवरों को देखने की इच्छा हुई। जंगल में पर्यटकों को घुमाने के लिए संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान की अपनी खुद की बसें हैं और दो रूट हैं। उन दो रूटों पर घुमाते हैं। इस उद्यान में अगर आपकी किस्मत अच्छी हो तो शेर, चीते, बाघों से रास्ते में मुलाकात हो सकती है। यहां पर प्रकृति में रूचि रखने वालों के लिए तरह-तरह के कीट, भांति-भांति के सुन्दर पक्षी, कई तरह की वनस्पतियां देखने व फोटोग्राफी के लिए मिल जाएंगे। हमने बड़े उत्साह से यात्रा शुरू की तथा मैंने अपने कैमरे सम्भाल लिये ताकि कोई भी शेर या अन्य जानवर आए तुरन्त क्लिक कर दूं। किन्तु ये हमारी बदकिस्मती ही थी कि इस यात्रा में हमें कोई शेर या बाघ दिखाई नहीं दिया। जबकि हमसे अगले ही दिन अमिताभ बच्चन यहां आए तो एक बाघ करीब 8 किलोमीटर तक उनकी गाड़ी के पीछे-पीछे चलता रहा। बच्चन जी के साथ कई अच्छे फोटो भी खींचे गए। इसके बाद हम इसी नेशनल पार्क के अन्तिम छोर पर स्थित पहाड़ी पर बनी विश्व प्रसिद्ध कन्हेरी की गुफाएं गए।
कन्हेरी की गुफाएं बोरीवली (मुम्बई) स्थित नेशनल पार्क में अन्तिम छोर पर पहाडिय़ों पर बनी हुई हैं जो बोरीवली से करीब आठ कि.मी. दूर है। कन्हेरी की गुफाओं को देखकर कोई भी सुखद आश्चर्य प्रकट कर सकता है। बौद्ध धर्म को समर्पित कन्हेरी की गुफाएं मूर्तिशिल्पों की कला कौशलता में एलीफेन्टा से चाहे बेशक थोड़ी कम हों लेकिन गुफाओं और मूर्तियों की संख्या यहां कहीं अधिक है। यहां 100 ई.पू. से 50 ई. तक बनाई गई 100 गुफाएं हैं तथा इनमें बौद्ध धर्म के लेख पाए गए हैं। ये गुफाएं प्रारम्भिक बौद्ध काल की हैं। वैसे पुरातत्ववेता बताते हैं कि ये गुफाएं दूसरी से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच विकसित की गई हैं। ये स्थान हीनयान व महायान सम्प्रदायों से सम्बन्धित कला स्थापत्य एवं तत्कालीन अभिलेखीय जानकारी देता है। गुफा नं. 3  के चैत्य हाल में बुद्ध की एक प्रतिमा पाँचवी शताब्दी की है। इस गुफा के बरामदे में बुद्ध की 23 फुट ऊंची दो प्रतिमाएँ हैं। गुफा नं. 10 का प्रयोग सभाओं के लिए किया जाता था।
ये गुफाएं बड़ी योजना व सूझ-बूझ के साथ बनाई हैं। निर्माण के वक्त रोशनी, पानी, धूप, छांव व अन्य सुविधओं का पूरा ध्यान रखा गया है। गुफाओं के साथ पानी की आन्तरिक टंकियां बनाई गई हैं जिनमें वर्षा का जल अपने आप भरता रहे। छोटी-छोटी नालियों द्वारा गर्भगृह, बरामदे व सीढिय़ों की सुनियोजित व्यवस्था है। यहां बसने वाले बौद्ध भिक्षुओं ने 2000 वर्ष पहले पानी की किल्लत दूर करने के लिए नायाब तरीका निकाला। उन्होंने पूरे पहाड़ को पानी संरक्षण का अद्भुत माध्यम बना लिया। पानी की एक-एक बूँद की वो कीमत जानते थे। गुफाओं में बैठने की बेहतर व्यवस्था है। इन गुफाओं में गुफा नं. 3, 11, 34, 41, 67, 77 व 90 कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं। जालियों, रोशनदान, स्तम्भों का निर्माण तरीके से हुआ है। इन गुफाओं में बुद्ध की प्रतिमाएं भिन्न-भिन्न मुद्राओं में अंकित हैं। कई गुफाओं में मूर्तियों की संख्या देखकर कहा जा सकता है कि ये गुफाएं उत्कृष्ट मूर्तिशिल्पों का एक बहुत बड़ा संग्रहालय है। कई जगह पूरी-पूरी लम्बी-चौड़ी दीवारें मूर्तिशिल्पों से भरी हुई हैं। यहां बुद्ध को प्रतीकात्मक स्वरूप स्तूप, बोधी वृक्ष, पद चिह्न में दर्शाया गया है। बुद्ध की मुख्य प्रतिमाओं में स्थानक बुद्ध, मानुषी बुद्ध, बोधिसत्व के संग तथा तारा के साथ प्रदर्शित किया है। अन्य प्रतिमाओं में सर्वानन्द अवलोकितेश्वर, बोधिसत्व व मुचलिन्द को भी दर्शाया गया है। यहां के अभिलेखों में दानदाताओं व आश्रयदाताओं जिनमें बौद्ध भिक्षु, सुतार, व्यापारी, राजनीति व प्रशासनिक व्यक्तियों के नामों को दर्शाया गया है। गुफा संख्या पांच में वशिष्ठ पुत्र शातकर्णा, यजशातकर्णा (गुफा तीन), मथारी पुत्र शकसेन (गुफा 74), छुटकुलनन्द (गुफा 66) के नामों का उल्लेख है। गुफा संख्या 34 में भित्ति चित्र उत्तर अजन्ता शैली में चित्रित हैं। इन गुफाओं को 1909 ई. में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया था।
कन्हेरी के दरीगृह लेख से ज्ञात होता है कि एक सातवाहन राजा वासिष्ठीपुत्र शिवश्री शातकर्णी (159-166) ने रूद्रक पुत्री का विवाह महाक्षत्रप से किया था। यहां उसके उत्तराधिकारी यज्ञश्री शातकर्णी का लेख भी पाया गया। नासिक की गुफाओं में बुद्ध की मूर्तियाँ नहीं पाई गई हैं, बल्कि उसके धर्म के प्रतीक पाए गए हैं। कन्हेरी में महाराष्ट्र के चूटुकुल राजाओं के लेख भी मिले हैं। गुफा पहाडिय़ों से नेशनल पार्क के जंगल का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। कन्हेरी की गुफाएं इतनी हैं कि इन्हें ध्यान से देखते-देखते पूरा दिन लग सकता है। नीचे से लेकर ऊपर तक गुफाओं का जाल सा बिछा पड़ा है। लगता है गुफाओं का यहां पूरा नगर बसा हुआ है। कन्हेरी में ठहरने के लिए पास ही के कृष्णगिरि उपवन में एक टूरिस्ट बंगला है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि एलीफेन्टा व कन्हेरी की ये गुफाएं हमारी महत्वपूर्ण अमूल्य सांस्कृतिक, धर्मिक, ऐतिहासिक व कलात्मक धरोहर हैं, किन्तु इन दोनों ही गुफाओं की शृंखलाओं में बनी बहुत सी मूर्तियों का पत्थर भुर रहा है तथा एलीफेन्टा की मूर्तियां खण्डित मूर्तियां देखने में भले मजबूत लगती हों, किन्तु कई जगह पहाड़ों से रस रहा बरसात का पानी इन गुफाओं व मूर्तियों को कमजोर बना रहा है। पुरातत्व विभाग को इस तरफ ध्यान देना चाहिए।