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Tuesday 21 Nov 2017

केसर की क्यारियों वाला काश्मीर

निर्मला डोसी
 ए-5, ओरियन, सेक्टर-1,
चारकोप, कांदिवली (प.),
मुंबई-400067
मो. 9322496620
27अक्टूबर, 2013 की खुशनुमा सुबह। पिछले कई दिन इस दिन की प्रतीक्षा में बीते थे। दरअसल यह यात्रा बिल्कुल अप्रत्याशित थी। सपरिवार 10-12 दिन घूमने निकलने का अवसर पहला था और दोनों बच्चों के खिले चेहरे देख कर विश्वास हो गया कि यह सफर यादगार होने वाला है। हमारी बुकिंग श्रीनगर की नगीन झील पर गुरखा के हाऊस बोट पर थी, विमानतल से बाहर हाथ में तख्ती लिये उनका ड्राइवर खड़ा था। खुली आंखों से अब हम श्रीनगर शहर का जायजा ले रहे थे। कुछ समय बाद नगीन झील के किनारे गाड़ी खड़ी हुई।

सामने खड़े शिकारे में गाड़ी से सामान उतार कर रखा गया। 10-15 मिनट में ही हम हाउसबोट के सामने थे। विशाल झील की छाती पर पंक्तिबद्ध हाउसबोट खड़े थे। अब तक ऐसा दृश्य पत्र-पत्रिकाओं या फिर फिल्मों में देखा था। हल्का जलपान करके नगीन झील की सैर करने फिर से शिकारे पर बैठे। पर्यटकों को लुभाने के लिए शिकारों को भी खूब सजा कर रखा जाता है।  श्रीनगर की सबसे बड़ी डल झील है उसके बाद नगीन झील है जो लालचौक से 8 कि.मी. है और डल झील से जुड़ी हुई भी है।  अक्टूबर जा रहा था और नवंबर आने को है। इस समय यहां पतझड़ का मौसम रहता है जो अपनी तरह का अछूता होता है। ‘कश्मीर घाटी को पतझड़ भी दर्शनीय बना देता है।’ और यह सुनी बात अब हमें आंखों से देखनी थी।
सूरज का लाल गोला झील में छुप गया चारों तरफ  अपना सुरमई जादू जगाकर। मेरी पोती का नाम भी सुरमई है उससे मैंने कहा तो मुस्कुरा पड़ी वो। बीच में एक जगह कहवा पीने के लिए शिकारे से उतरे। ‘कहवा’ यहां का विशेष पेय है। इस पेय से कश्मीर की हाड़ कंपाने वाली ठंड में जरा-सी गर्मी का संचार होता है। वापस हाउसबोट पहुंच कर आराम किया और शाम का खाना खाया। पहले से गर्म किये बिस्तरों में दुबक लिये, सुबह जल्दी उठने की सोच कर। शहरों में सूरज उगने से पहले का सौंदर्य शायद ही कोई देख पाता हो। मेरी आँख जैसी ही खुली, झट उठी, गर्म कपड़े चढ़ाए।शामों की खूबसूरती व रातों की नीरवता की बातें साहित्य व संगीत में खूब होती है, किंतु सूर्योदय से पहले समूची कायनात में जो रूहानियत तारी हो जाया करती है उसकी कोई मिसाल नहीं दी जा सकती है। दिन में सोनमर्ग के लिए निकले। सोनमर्ग श्रीनगर से 80-85 कि.मि. दूरी पर लेहमार्ग पर है। आसमान को छूते विशाल पहाड़ों से घिरा सोनमर्ग पर्यटकों को मोह लेता है। झेलम के किनारे-किनारे हमारी गाड़ी बढ़ती जा रही थी। माजिद ने बताया कि यहां सिंधु नदी है जो पाकिस्तान तक चली जाती है।  गाड़ी खड़ी कर हम उतरे थे नीचे। पत्थरों पर बैठकर नदी के जल का आचमन किया था। रोमांच हो आया था। पत्थरों से टकराती, कल-कल करती मंथर गति से बहती सिंधु से साक्षात्कार का वह ऐतिहासिक पल था। समूची घाटी चीड़ चिनार के पेड़ों से घिरी है। गहरे हरे रंग के चीड़ के साथ सूखते चिनारों का पीला भूरा केसरी रंग, कमाल का कन्ट्रास्ट रचते हैं। माजिद ने बताया कि अगले महीने चिनार अपने पीले केसरी वस्त्र उतार बर्फ की धवल चादर ओढ़ लेंगे। मलबरी के पेड़ भी खूब हैं घाटी में जिन पर कीड़े पलते हैं और जिनसे रेशम प्राप्त किया जाता है। कश्मीरी जुबां की शीरी चाशनी में पगा माजिद हमें लगातार कुछ न कुछ बताता जा रहा था। पूरे रास्ते में बादाम अखरोट के पेड़ लगे थे। बीच-बीच में छोटे-छोटे झरने आते जा रहे थे। सोनमर्ग 8000 फुट ऊपर है। छोटी-छोटी पगडंडियों, नुकीले पत्थरों पर पांव धरते थोड़े सीधी चढ़ाई चढ़ रहे थे घोड़े अपने ऊपर सैलानियों का बोझ लादे। ऊपर पहुंच कर घोड़े से उतरे। बीचों बीच बर्फ की दुधिया चादर ओढ़े अमरनाथ की तरफ की भव्य चोटियां और दूसरी तरफ  भूरे सलेटी पहाड़ों की हाजरी में खड़े पाईन के पेड़ों की पंक्तिबद्ध कतारें जैसे फौज के सिपाही सीधे सतर खड़े होकर सलामी दे रहे हों। सोनमर्ग के रास्ते में कुछ अखरा था। रडक़ा था मन में और किरकिराने लगा था। उत्तराखंड की त्रासदी हुए ज्यादा वक्त नहीं बीता था। हमने उससे कुछ नहीं सीखा। सोनमर्ग के रास्ते पर दो-तीन जगह गुमटियों पर चाय, कहवा, कॉफी के साथ चिप्स, मैगी वगैरह मिल रहे थे। उस जलपान का हासिल यह कि चारों तरफ  सर्वनाशी प्लास्टिक का कचरा बिखरा पड़ा था। घाटी पर चढ़ते ही एक बोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में चेतावनी नत्थी थी कि कोई किसी प्रकार का कचरा ऊपर न छोड़े। ऐसी चेतावनियों से डरनेवाले हम थे ही कब? यदि होते तो क्या प्रकृति को बार-बार रौद्र रूप धर कर चेताने आना पड़ता।
माजिद... वही हमारा ड्राइवर आर.डी. बर्मन का गहरा शैदायी है। उन्हीं के गाने रास्ते भर बज रहे थे। साथ वो फिल्मों की कश्मीर में हुई शूटिंग की दास्तान भी बताता जा रहा था। बड़े फख्र से बोला कि एक बार हमारी ही गाड़ी में बर्मन साहब और आशाजी बैठ कर यहां आए थे। माजिद ने ही बताया कि पिछले बाईस वर्षों से यहां श्रीनगर में थियेटर बंद करवा दिये हैं आतंकवादियों ने। खौफनाक विडंबना है यह... रात को घर-घर में टी.वी. पर हिन्दी फिल्में देखते हैं- किंतु, थियेटर आज भी बंद ही है। अब बच्चे स्कूल जा रहे हैं किंतु बीच के 10-15 वर्ष में सब कुछ बंद था। एक पूरी पीढ़ी ऐसे ही रह गई ज्ञान की रोशनी से महरूम, भय की संगीनों के साये में बड़ी हुई थी। सोनमर्ग से हाउस बोट पर लौटे शाम ढलने के बाद। सुबह जल्दी उठ कर गुलमर्ग जाने का तय हुआ था।
गुलमर्ग श्रीनगर से 60 कि.मी. दूरी पर है। फूलों की घाटी के नाम से जाना जाने वाला यह खूबसूरत पर्वतीय स्थल जहां गोल्फ के सर्वश्रेष्ठ मैदान हैं। कहते हैं, शिव की पत्नी गौरी के नाम पर इसका नाम गौरीमार्ग पड़ा था। फिर 1581 में युसुफशाह द्वारा गौरीमार्ग को गुलमर्ग कर दिया गया। युसुफशाह जहांगीर के साले थे। शीतकालीन खेलों का आनंद यहां खूब लिया जाता है। श्रीनगर से गुलमर्ग का सफर प्रकृति के खजाने से लुट रही नायाब अशर्फियों को बटोर कर अपनी स्मृति की तिजोरियों में भरने का था। ऊंचाई पर चढ़ते हुए घुमावदार रास्तों पर दूर-दूर तक घने पेड़ों का गहरा हरा रंग उससे ऊपर चोटियों पर दिख रहे थी बर्फ  की धवल नवल परतें। बिल्कुल शांत वातावरण जहां गूंज रहा था नैसर्गिक सुंदरता का, मौन किंतु मुखर संगीत...। बातें करने का जरा भी मन नहीं करता यहां...। लगता है इस प्रकृति के तप में, ध्यान साधने में व्यवधान डाल रहे हैं। गुलमर्ग पहुंचते पहुंचते तीन बज गए। पहाड़ी पर बना होटल खैबर हमारा अगला पड़ाव था। खैबर असल में पाकिस्तान व अफगानिस्तान की पहाडिय़ों के बीच के एक दर्रे का नाम है। होटल का नाम खैबर क्यों रखा यह तो पता नहीं किंतु यह जरूर था कि उसकी सज्जा में सज्जाकार ने अपनी पूरी अर्हता का उपयोग किया था।  सुबह उठ कर बरामदे के भारी पर्दे हटाए तो समझ आया कि क्यों फिरदौस ने कश्मीर को स्वर्ग कहा होगा। ऊंची बर्फ  से ढकी चोटियों पर उगता सूरज सोना बरसा रहा था। दुग्ध धवल हिम आच्छादित पहाडिय़ों के साथ पाईन के ऊंचे दरख्त किसी तपस्यारत संत से खड़े थे।
गुलमर्ग से गंडोला में खिलनमर्ग जाने के लिए निकले। गंडोला तीन फेज में चलती है। अंतिम फेज कारगिल की चोटी तक जाती है। इस वक्त सिर्फ  एक फेज ही खुला था। टिकट कटवा कर हम छ: लोग गंडोला में बैठे। डर जरा-सा भी नहीं था। चारों तरफ  से बंद व सुरक्षित। कश्मीर घाटी दूर से देखने पर जितनी खूबसूरत दिखती है पास से देखें तो उससे भी ज्यादा भव्य और अद्भुत।  गंडोला का सफर 15 मिनट का था। वहां ऊपर उतर कर पैदल या घोड़े लेकर खिलनमर्ग तथा एक झरना है उसे देखने निकल पड़े। आज आसमान का रंग पल-पल बदल रहा था। धूप खिल रही थी तो दूसरे ही पल बादलों की मटमैली चादर तन जाती। हल्की बरसात और यह क्या बूंदों के साथ रूई के फाहों सी बरफ  भी बरसने लगी। ये सब क्या योजनाबद्ध था कि दर्शक आने पर प्रकृति ने अपना सतरंगा कार्यक्रम प्रारंभ कर दिया। बर्फ  गिरने व मौसम खराब की सूचना की घोषणा होने लगी कि गंडोला यात्री तुरंत आ जाए। गंडोला से उतर कर हमने पैदल गुलमर्ग बाजार की सैर की। वहीं बैठ कर गर्म कहवा व पालक प्याज के पकौड़े खाए। वापस होटल आए। बरसात तेज व साथ बर्फ भी गिरने लगी। रात के खाने के वक्त सब कह रहे थे कि इस बार बर्फ जल्दी आ गई। उसे तो आना ही था आखिर जो बड़ी दूर से हम जैसे आए वे बिना बरफ  देखे कैसे लौट जाते।
सुबह उठते ही हमारी सुरमई पर्दा हटा कर खुशी से चीख पड़ी। देखो... देखो बरफ...। चारों तरफ  मखमली सफेद कालीन बिछा था। पेड़ों पर, होटल की टेरेस पर पड़े फर्नीचर पर, दूर-दूर तक सफेद और हरे रंग का खूबसूरत समां था। बच्चे बर्फ  के गोले बना कर एक दूसरे पर फेंक रहे थे। सुरमई बोली, यहां शर्बत की बोतलें ले आते तो रोज ‘गोले’ बना कर खाते। मुंबई जैसे महानगर में बच्चों को बरजना पड़ता है। अशुद्ध पानी व रंगों से बने शर्बत के गोले गला पकड़ लेते हैं। यहां तो खुद विधाता महीन मुलायम बर्फ  भेज रहा था। आज बाहर निकलने का दिन नहीं था, बस होटल से ही गिरती बर्फ  का आनंद लेते रहे।
अगले दिन मौसम साफ था। गुलमर्ग से पहलगांव की तरफ  रवाना हुए। पूरे रास्ते में सीधे सतर लंबे लंबे विलो के पेड़ लगे थे। जिनकी लकड़ी बेहद उम्दा तथा हलकी होती है। क्रिकेट के बल्ले इसी लकड़ी से बनते हैं। लकड़ी को छील कर ऊपर के छिलकों से सेब की पेटियां बनती हैं। कश्मीर से भारत भर में क्रिकेट के बैट भेजे जाते हैं। स्थानीय लोगों को इस कारण अच्छा रोजगार मिल जाता है। रास्ते में पड़ा ‘पंपोर’ जो विश्वभर में बेहतरीन किस्म की केसर के उत्पादन के लिए विख्यात है। केसर उत्पादन का सही वक्त नवंबर ही होता है। हम गाड़ी से उतरे और रास्ते से लगे केसर के बागान में पहुंचे। केसर की क्यारियों में छोटे-छोटे पौधे और उन पर लगे थे बेंजनी रंग के नाजुक फूल। फूल के बीचों बीच पीला परागण और उससे निकले तीन केसर के रेशे। चारों तरफ जाफरान की भीनी-भीनी महक थी। माजिद ने बताया कि केसर उपजाने वाली जमीन समूची कश्मीर घाटी में सबसे ज्यादा महंगी है और उस पर कोई भी दूसरा काम या भवन निर्माण नहीं किया जा सकता। खेतों की रखवाली करने वाले ने 2-3 फूल तोड़ कर हमारे हाथ में रखे और केसर की फसल की जानकारी भी दी। लिद्दर नदी के किनारे पहलगांव बसा है। हल्की बूंदाबांदी होने लगी थी। सर्दी गजब ढा रही थी। पूरे रास्ते एक दिन पहले गिरी बर्फ  पिघल कर रास्ते के दोनों तरफ सफेद बाउंड्री की तरह जमा हो गई थी। शाम होने को थी। काफी पहले बने होटल पाइन एंड पीक के आगे गाड़ी रोकी गई जहां हमारा आरक्षण था।
‘नौसीन’ पढ़ते वक्त मैंने खाने के अनेक कश्मीरी व्यंजनों के नाम पढ़े थे। यहां कमलनाल से कई व्यंजन बनाए जाते हैं। जिसे नदड़मोज या नदडू कहा जाता है। हॉक का जिक्र भी आता है। आज खाने में पालक जैसी पत्ती वाली हॉक की सब्जी थी। कश्मीरी चावल की एक बेहतरीन किस्म को मुश्कबुद कहा जाता है। उन चावलों की खुशबू लाजवाब होती है। गुच्छियां रिस्ता, बाकरखानियां, कतलम्बें, डलगेट के नदडूकड़म के अनेक नाम जिनमें कुछ पकवान गोश्त से बनते हैं। ‘पाइन एंड पीक’ में नाश्ते व रात के खाने के वक्त, मैं वहां के कर्मचारियों से कश्मीरी व्यंजनों के बारे में पूछती रहती थी। संभवत: उन्हें थोड़ा अजीब तो लगता ही होगा, किंतु किसी ने जाहिर नहीं होने दिया। बड़ी विनम्रता से बताते रहे। इस यात्रा में मैंने नोट किया कि यहां के लोग स्वभावत: बहुत विनम्र व तहजीबयाफ्ता हैं। मीठी बोली के साथ गठीली कदकाठी, लंबा कद व रूपरंग भगवान ने खुले हाथ से दिया है। तीखे नैन नक्श और गोरा गुलाबी रंग खूब है कि मामूली फिरन व सलवार पहन कर भी बड़े आकर्षक लगते हैं।
हम पहलगांव पहुंचे उस दिन धनतरेस थी। इस दिन खूब खरीददारी करने का चलन है। मैं तो इस तरह के नियम की पाबंद कभी नहीं रही, पर हां आज हमने रास्ते में केसर व सूखे मेवे तो जरूर खरीदे थे। पीले केसरिया चिनारों से सजा पहलगांव रोशनियों से सजे शहरों से कहीं ज्यादा भव्य लग रहा था। पहलगांव सुंदर बाग-बगीचों की जगह है। होटल के पिछवाड़े का बाग बिल्कुल लिद्दर नदी से लगा था इसलिए नदी का सुरम्य संगीत हर वक्त सुना जा सकता था। मैं सुबह उठ कर नीचे बाग में जा बैठी। गुनगुनी धूप भी थी और बर्फीली हवाएं भी साथ चल रही थी। बगीचे में काम कर रहे माली मोहम्मद खान से बातें हुई। घंटे डेढ़ घंटे वे बिना रूके बोलते रहे। कश्मीर के गुजरे खौफनाक वक्त पर, कश्मीरी हिंदुओं पर, और तब से वहां जमी फौजों पर। लगभग पूरे कश्मीर में रहवासियों के मन में फौजों के लिए अच्छी भावनाएं नहीं दिखी। यकीनन कुछ वारदातों ने कश्मीरियों के घावों पर मरहम लगाने की जगह नश्तर चुभाए होंगे। उनकी बेबसी का दोहन तो चारों तरफ  से हुआ ही है। राजनीति के खेल निराले हैं। हिंसा व उग्रवाद से प्रभावित जम्मू व कश्मीर तथा पूर्वोतर राज्यों में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून, अशांत क्षेत्र कानून और जनसुरक्षा जैसे कानूनों का बड़े पैमाने पर दुरूपयोग हो रहा है और उसका मुआवजा इन क्षेत्रों की निर्दोष जनता को चुकाना पड़ रहा है। खुशगवार यात्रा वृत्तांत लिखने के दौरान ये तमाम अप्रिय बातें खुद-ब-खुद चली आयी हैं सायास लाने की इच्छी नहीं थी मेरी पर यह तो हो नहीं सकता कि ‘मीठा-मीठा गप्प और खारा-खारा थू’। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए आलीशान होटल तथा बेहतरीन सुविधा उपलब्ध कराने के प्रयास जरूर हुए हैं, किंतु घाटी के अंदरूनी हालात जो कि आतंक के साये में बद से बदतर हो गए थे उन्हें बेहतर बनाने के लिए कोई काम नहीं हुआ दिखता है। यह बात मन को खिन्न कर गई। हम यहां आएं लुत्फ  उठाएं किंतु यहां के लोगों के दर्द को समझे बिना ही लौट जाएं यह तो संवेदनशून्यता की हद होती है। बड़ी बारीकी से देखें तो स्थायी उदासी पसरी है वहां के लोगों के चेहरों पर।
बहरहाल पहलगांव से चंदनबाड़ी के लिए गाड़ी से निकले। 9500 फुट की ऊंचाई पर यह एक सुंदर पिकनिक स्थल है। यहीं से अमरनाथ की यात्रा शुरू होती है। बेहद घुमावदार रास्ते व खूबसूरत नजारें पसरे पड़े थे। चारों तरफ  खरगोशों की तरह नरम मुलायम श्वेत बर्फ बिखरी थी।  लौटते वक्त रास्ते में बेताब वैली पर गाड़ी रुकी। इसका नाम पहले हगुनवैली था। बेताब फिल्म की शूटिंग के बाद नाम बदल गया। चारों तरफ  ऊंचे पहाड़ों और लंबे विलो के पेड़ों से घिरा मैदानी इलाका। बीच में एक अभ्यारण्य भी था, जहां हिरणों का झुंड दिखा। अरुवेली अगला स्थान था जहां की प्राकृतिक संपदा को देख कर कहना पड़ा कि ऊपरवाले के अकूत खजाने की थाह लेना संभव ही नहीं है। सोनमर्ग से ज्यादा सौंदर्य गुलमर्ग में और गुलमर्ग से ज्यादा दिखा पहलगांव में।
आज दिवाली है। जीवन की सबसे अलग दिवाली। घर से कोसों दूर... कश्मीर की हसीन वादियों में। त्यौहार का अर्थ क्या है - और घर का भी तो, कि जब सब एक साथ हों तो वही घर और त्यौहार हो जाता है। नाश्ता कर पैदल ही निकले पहलगांव के बाग बगीचे देखने। पोशवान कश्मीरी में फूल को कहा जाता है। पोशवान पार्क का रखरखाव व तराशे गए पेड़ पौधे के साथ चीड़ चिनार के घने हरे पेड़ों से लदा था बाग। गुलाब, गेंदा, गुलदाउदी दिखे जरूर पर मौसम न होने के कारण उन पर बहार नहीं थी। आगे एक मंदिर दिखा। आज दिवाली का दिन था, सहज से मंदिर दर्शन हो गये। बताया गया कि इसी स्थान पर नंदी को छोड़ शिव अमरनाथ की तरफ  चले गए थे। शाम को सब ने मिल कर टेबिल पर लक्ष्मीपूजन किया। कल सुबह वापस श्रीनगर रवानगी थी। यात्रा का अंतिम आयाम।
 सारी कायनात की खूबसूरती आंखों में भरकर पहलगाम को अलविदा कहा, लिद्दर नदी के पास गई... लगा नहीं कि उसकी और मेरी पहचान कुल जमा 2-3 दिन पहले की है। माजिद गाड़ी ले आया था। हमेशा उसी की गाड़ी में घूम रहे थे सो वह काफी परिचित हो गया। बच्चे अंकल-अंकल कहने लगे। चॉकलेट टाफी लेने की जिद करते। उसने भी एक जगह रास्ते में बढिय़ा कहवा पिलाया और पैसे नहीं देने दिए। ‘साहब जी यह माजिद की तरफ  से है।’ इस रास्ते पर सेबों से लदे बगान थे। सारा इलाका सेबों की मनभावन खुशबू से मह-मह कर रहा था। एक बगान पर गाड़ी रोकी। पेड़ों से तोड़े सेब का स्वाद पहली बार चखा। बगान मालिक ने वहां खड़े-खड़े 5-6 सेब काटे और हमें एक-एक फांक देते हुए पूरा ब्यौरा देता रहा और बड़े प्रेम से खिलाता रहा।
अनंतनाग, श्रीनगर नेशनल हाइवे पर अंवतिपुर एक गांव है, वहां हम रुके। श्रीनगर से 29 कि.मी. पर अंवतिपुर का विष्णु मंदिर है। उसके थोड़ी दूरी पर एक शिव मंदिर भी है। अंवतिपुर के राजा अवंतिवर्मन ने नौंवी शताब्दी में भगवान विष्णु का विशाल मंदिर बनवाया जो उस वक्त के विकसित स्थापत्य कला की मुंह बोलती कहानी प्रतीत होता है। साथ ही इतने वर्षों बाद भी पुरातत्व अन्वेषकों के लिए विशेष शोध का विषय भी, कि किस तरह बिना चूना, मिट्टी, लकड़ी, लोहे के प्रयोग के सिर्फ  पत्थरों से इतनी ऊंचाई पर ऐसा शाहकार कैसे रचा गया होगा। पत्थर में गोल गढ़ा करके उसके ऊपर विशालकाय स्तंभ ठहरा दिये जाते थे जो प्रकृति के भीषण थपेड़े खाने पर भी हिलते तक नहीं थे। ये दोनों मंदिर खंडहर भले बन गए हों किंतु भूगर्भवेताओं तथा स्थापत्य के जानकारों को भी विस्मय विमुग्ध किये दे रहे थे। वहां के गाइड ने बताया कि मंदिर बनने के वर्षों बाद सर्वनाशी भूकंप के प्रकोप से पूरा इलाका धरती की गोद में समा गया था। पास में नदी बहती रही और उसकी लहरों से इन अवशेषों पर मिट्टी की परत दर परत चढ़ती गई। 500 वर्षों से ज्यादा भूमि में दबे रहे फिर अंग्रेजों ने सन् 1923 में यहां खुदायी करवाई और ये बाहर आए। मुहावरों की तह में जाएं तो ‘चूलें हिलना’ चूलियां उतर जाना या चूलें चढ़ाना प्रचलित है। इसका अर्थ इन मंदिरों में आकर स्पष्ट हुआ दिखा। शिव मंदिर तो और भी प्राचीन है लेकिन बेहद समृद्ध सभ्यता का प्रतीक भी। कुछ पत्थरों पर एक लिपि मिली जिसे अब तक नहीं पढ़ा जा सका है। जम्मू-कश्मीर ऐसा राज्य है जिसके चप्पे-चप्पे में वहां का इतिहास पढ़ा जा सकता है। क्षेत्र स्थापत्य का हो या कलाओं का, राजनीति हालात हो या जन-जीवन का परिवेश सब कुछ दिखता है। लाख उलट-फेर के बावजूद अब तक कायम है तो उसकी भी खास वजह है। रूहानियत इस भूमि के चप्पे-चप्पे में रची बसी है। जरूरत है संवेदनशीलता के साथ उसे पहचानने व अहसास करने की।  शाम 4 बजे श्रीनगर पहुंचे। इस बार हम शहर के बीचों-बीच रामबाग में झेलम के किनारे लगभग सौ वर्ष पुराने एक डाक बंगले में रुके। ‘डाक हरमिटेज’ नाम भी खूब और उसकी सज्जा भी पारंपरिक ढंग से की गई है। इसके मालिक दानिशभाई गोल्फ  के बेहतरीन खिलाड़ी रह चुके हैं। शीशे की अलमारियां उन्हें मिली ट्राफियों से भरी पड़ी थी। साथ ही कश्मीरी हस्त शिल्प की सज्जा भी की गई थी। पहली रात जब बत्ती जलबुझ कर रही थी, तब बंगले का केयर-टेकर इरफान एक टांग पर खड़ा हमें सारी सुविधाएं उपलब्ध करवाने मुस्तैद था। दानिशभाई के भव्य व्यक्तित्व और इरफान की तत्परता ने हमें कायल कर दिया बेहद सुलझा हुआ व शांत परिवार है दानिशभाई का। उनके यहां रुकने पर घर जैसा अहसास ही तो करना था हमें।
सुबह श्रीनगर भ्रमण पर निकले। सबसे पहले शंकराचार्य मंदिर गए। लाल चौक से 2 कि.मी. की दूरी पर श्रीनगर शहर से 1000 फीट की ऊंचाई पर बना है यह मंदिर जिसका पहले नाम तख्ते सुलेमान था। अद्वैत सिद्धांत के परिपोषक विख्यात दार्शनिक आदिगुरु शंकराचार्य कश्मीर आए और इस स्थान पर ठहरे। तब से इस स्थान को भगवान शिव को समर्पित करके नाम धरा शंकराचार्य। 250 सीढिय़ां चढ़ कर पहुंचे ऊपर। गुफा में शंकराचार्य का तपस्यास्थल, गौरी कुंड और सबसे ऊपर विराजा था विशाल शिवलिंग। पंजाब के महाराजा रणजीत सिंहजी ने अपने शासन के दौरान इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। वहां से डल झील, हजरत बल, बाग बगीचे, पीर पंजाब की पहाडिय़ां सब कुछ दिख रहे थे। वहां से पहुंचे परीमहल जो लाल चौक से 11 कि.मी. पर बना है। सात सतहों पर बना अनोखा बाग जिसे 17वीं शताब्दी में शाहजहां के बड़े बेटे दाराशिकोह ने बनवाया था। वह बेहद जहीन, उदारमना व तालीमयाफ्ता शख्स था। जिसने वेदों, उपनिषदों, पुराणों का फारसी में अनुवाद किया था। हमारा आज का तीसरा पड़ाव था चश्मेशाही, जिसे शाहीबाग भी कहते हैं। तीन सतहों पर लगा प्राकृतिक झरना और चारों तरफ अनेक तरह के फूलों से सजा है। सन् 1632 में नूरजहां के भाई आसिफ खान ने इसे बनाया। कहा जाता है कि इसके चश्मे के पानी में दारूण रोगों को भी दूर करने की तासीर है। वहां से पहुंचे निशात बाग जो डल झील के किनारे बना है। 1634 में इसे भी आसिफ  खान ने बनवाया था। इसके बाद 1619 में बने शालीमार बाग गए। जिसे जहांगीर ने बनवाया था। वहां बड़े पैमाने पर मरम्मत का काम चल रहा था। दो विशाल बारहदारियां बनी थी जिनकी छतें, मेहराबें, कंगूरे, गोखे व दिवारें अपनी समृद्धि व इंसानी फितरत की मुंह बोलती तस्वीर पेश कर रही थी। संभवत: बारहदारियों की दिवारें स्वर्ण-रजत पच्चीकारी से सज्जित थी। निशात बाग की खूबी यह कि दस आयामों के फौव्वारों के सहारे पानी को नीचे से ऊपर ले जाया गया है जो उस वक्त के कारीगरों के कौशल, उनकी तकनीकी समझ तथा सदियों तक स्थायी रखे रहने वाली टिकाऊ स्थापत्य कला पारंगतता का हैरतंगेज जायजा देता है। आज का अंतिम पड़ाव था हजरतबल। दुग्ध धवल, संगमरमर का भव्य शाहकार। शंकराचार्य की नि:स्तब्धता और हजरत बल की शांति में अद्भुत साम्य स्पष्ट दिख रहा था। कोई फर्क नहीं, दोनों ही इबादत के स्थान। दचीगम श्रीनगर का बेजोड़ अभ्यारण्य है। वाइल्ड लाइफ सेंचूरी जहां जम्मू-कश्मीर राज्य से परमिट लेकर जाना होता है। दचीगम का कश्मीरी भाषा में अर्थ है दस गांव। पहले हम यहां गाड़ी से पहुंचे। गाड़ी को दूर छोड़ा और अभ्यारण्य में प्रवेश किया। हिमालयीन काले भालू की दुर्लभ प्रजाति जिनके गले में भूरे रंग का ‘वी’ (1) का निशान रहता है यहां दिखे। वहां से दो खुली गोल्फ कारों से हम आगे गए। दोनों तरफ  चिनार के सुनहरे पीले पत्ते हवा के साथ हम पर बरस रहे थे। फिर गाड़ी से ‘हरवन’ गए। अन्य मुगलगार्डन की तरह हरवन भी बड़ा व अनेक तरह के फूलों की रंग बिरंगी प्रजातियों से सजा बगीचा है जिसका रखरखाव बड़े करीने से किया गया है। हरवन से गए हम खीरभवानी मंदिर। मां दुर्गा का एक और रूप जो कश्मीरी राजवंश की कुलदेवी मानी जाती है। श्रीनगर से 28 कि.मी. पर संगमरमर का मंदिर जिस पर सोने का पतर चढ़ा है एक तालाब के बीच स्थित है।
रवानगी के दिन नीचे से दानिष भाई पत्नी सहित हमें विदा देने आए। विनम्रता से पूछा कि उनके यहां हमें कोई असुविधा तो नहीं हुई। उनकी सज्जनता के तो हम पहले ही कायल हो चुके थे। मोह हो गया था यहां से। जब 10-12 दिन में हम मोह का रोग लगा बैठे तो यहां रहनेवाले जब उजड़े तो उनकी मनोदशा क्या रही होगी अंदाज लगाना मुश्किल नहीं था।