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Saturday 18 Nov 2017

सारंडा की गोद में : एक सुखद संसार

मोतीलाल
  बिजली लोको शेड, बंडामुंडा, राउरकेला – 770032
  मो. 09931346271
‘जहाँ न पहुंचे रवि, वहाँ पहुंचे कवि’ की तर्ज पर यह कहा जा सकता है कि ‘सारंडा पहुंचे सभी, रवि न पहुंचे कभी’। जी हाँ सात सौ पहाडिय़ों से घिरा यह वन क्षेत्र इतना घना है कि कहीं-कहीं इसकी जमीन को सूर्य की किरणें भी नहीं छू पाती है। जब इस बीहड़ जंगल भ्रमण का अवसर मिला तो इसे कैसे छोड़ा जा सकता है, जबकि कई वर्षो से शहर के कंक्रीट के जंगलों में रहते हुए और धकमपेल और भागदौड़ की जिन्दगी जीते हुए जिन्दगी जैसे रसविहीन हो गई थी।
 मन में यह तमन्ना भी थी कि आदिवासी संस्कृति और उन लोगों की दुरूह जिंदगी जीने की कला से वाकिफ होने का मौका मुझे जो मिल रहा है, इसे पूरी समग्रता के साथ एक बार भरपूर जिया जाये।    मेरे दो पत्रकार मित्र हैं, उन्होंने मुझसे कहा कि हमें ‘सारंडा’ पर कुछ रिपोर्ट तैयार करना है तुम भी साथ चलो। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा, मैंने कहा कि उसी क्षेत्र में मेरा एक मित्र मनोहरपुर में रहता है, उसे सभी जानकारी है इसलिए उसे भी साथ लेकर चलते हैं। यह 1990 की बात है। बात तय हो गई। मेरे मित्र ने चाईबासा के वनविभाग के मुख्यालय से सारंडा के बीच बने ‘थोलकोबाद वन विश्रामगृह’ की तीन दिनों की बुकिंग कर ली। हम तीनों सारंडा के प्रवेशद्वार कहे जाने वाले मनोहरपुर के लिए प्रस्थान किये। वह अक्टूबर महीने की एक खुशनुमा सुबह थी जब हम तीनों मित्र मनोहरपुर पहुंचे, जिसके आँचल में सारंडा जंगल महकता है। मित्र ने बड़ी गर्मजोशी से हमलोगों का स्वागत किया। कुछ देर आराम करने के बाद यह कार्यक्रम बना कि आज मनोहरपुर घूमा जाये। हमारा पहला गंतव्य था ‘वन देवी मंदिर’ जो मनोहरपुर से 04 किमी दूरी पर मनोहरपुर-रांची सडक़ मार्ग पर अवस्थित है। मनोहरपुर, सारंडा से घिरा वह स्थान है जहाँ ‘दक्षिणी कोयल’ नदी के संग सारंडा की 02 नदियाँ ‘कारो’ और ‘कोयना’ नदी मिलती है। वन देवी मंदिर जाने के क्रम में ‘दक्षिणी कोयल’ और ‘कोयना’ नदी का संगम देखने को मिला। बड़ा ही अदभुत दृश्य था। हमने देखा कि दक्षिणी कोयल नदी का पानी शीशे सा साफ है और वहीं कोयना नदी का पानी खूब गहरा और मटमैला। मित्र ने बताया कि यह कोयना नदी सारंडा जंगल का भ्रमण करती हुई साथ ही लौह अयस्क के खदानों से बहती हुई आती है। इसलिए इसके पानी का रंग मटमैला होता है। लोग इसे लाल नदी भी पुकारते हैं। हम तीनों मित्रों का मन प्रकृति के इस मेल को देखकर बाग-बाग हो उठा। हम बढ़ चले ‘वन देवी मंदिर’ की ओर। लोगों का कहना है कि इस सारंडा में अन्दर जाने से पहले इनका दर्शन जरुरी है, नहीं तो जंगल में कुछ भी अनिष्ट हो सकता है। यह मंदिर एक छोटी सी पहाड़ी पर बसा बहुत ही मनोरम है। पेड़, पौधों और झाडिय़ों से घिरा सन्नाटों के बीच एक सुकून पसरा था।। एक बरगद और पीपल के बीच छोटा सा मंदिर, चारों ओर घना जंगल और उनके बीच से चिडियों का कलरव, बड़ा मनोरम लग रहा था। इसके बाद हम आगे बढ़े, जल्द ही दक्षिणी कोयल नदी के किनारे पहुँच गए। इस नदी के उस पार आश्रम है और इधर एक पहाड़ी पर बसा आश्रम द्वारा संचालित एक हनुमान जी का मंदिर है, हम इसी ओर बढ़ चले, पहाड़ी चढऩे की कठिनाई झेलते हुए जब हम ऊपर पहुंचे तो खुशी का ठिकाना न रहा। चारों ओर हरियाली और पेड़ों से आच्छदित एक शांति का अनुभव हुआ। नदी किनारे आये तो पता चला कि उस पार आश्रम में जाने के लिए एक मात्र रास्ता बांस की पुलिया है जिससे नदी पार किया जा सकता है। जीप इसी पार छोडक़र हम प्रत्येक व्यक्ति पांच रुपये देकर पुलिया पर चढ़ तो गए किन्तु नीचे बहती जलधारा देखकर और हिलती डुलती पुलिया की हालत देखकर हम मन ही मन भीतर से भयभीत तो थे लेकिन कम रोमांचित भी नहीं थे। उस ओर काली-कोकिला का संगम स्थान है। हमने सबसे पहले यहाँ स्नान किये। यह संगम आश्रम का पांव धोते हुए बहती है। चौड़े पाट में फैली नदी, जंगल में घूमती-घामती ‘कारो’ नदी अपनी स्वछंदता के साथ बलुवाई नदी कोयल के संग बांहों में झूल जाती है। यहाँ कारो नदी में मछली पकडऩे की कला से वाकिफ हुआ। सुना-पढ़ा तो था लेकिन डांग की सहायता से मछली पकडऩे की चाहत लिए कई स्थानीय के साथ-साथ सैलानियों को भी देखा जा सकता है। संध्या होने को था और सूर्य कोयल नदी के उस पार अस्त होने को व्याकुल और हम उसी बांस की पुलिया से वापस हो लिए। मित्र के घर पहुंचे और भोजन आदि कर नींद के आगोश में खो गए। बहुत दिनों बाद एक अच्छी नींद ली। सुबह सारंडा की ह्र्द्यस्थ्ली थोलकोबाद जो जाना था। मित्र के मना करने के बावजूद हमने इस सुबह कोयना नदी में नहाया और ताजादम होकर, सुबह का नाश्ता कर सफर की तैयारी करने लगे। जीप में खाने की वस्तु के अलावा गर्म कपड़े और एक बोरी नमक रखा गया। नमक की जरुरत का बखान बाद में। यह एक सुहानी सुबह थी। गहरा कोहरा छाया हुआ था। हम चल पड़े। यहाँ से 32 किमी। दूर घने जंगलों के बीच जाना था। कहीं भी पक्की सडक़ न थी। अगर कुछ था तो स्वच्छ आक्सीजन और साल, सागवान, शीशम, अर्जुन, महुआ, आम, पीपल, जामुन, बेर, कटहल इत्यादि पेड़ों से आच्छादित वन। जैसे-जैसे आगे बढ़ते गए जंगल गहरा होता गया। हमारे साथ-साथ बगल से कोयना नदी भी चल रही थी। रास्ते में बन्दर, गिलहरी और अनेक तरह के चिडिय़ों ने हमारा स्वागत किया। अभी 24 किमी जंगल में थे कि हमें रुकना पड़ा। ड्राइवर ने कहा कि आगे खतरा है और हम आगे नहीं जा सकते। स्थानीय ड्राइवर को इस जंगल की बहुत सारी जानकारी थी। उसने कहा कि आगे हाथियों से सामना हो सकता है। उसका आभास हो रहा है क्योंकि रास्ते में हाथियों का ताजा गोबर पड़ा हुआ है। हमारी हालत पतली हो गई, जंगली हाथी से सामना हो जाये तो पता नहीं क्या कुछ घटित हो सकता है। इसके बावजूद हममे एक उतावलापन भी था कि खुले जंगल में कहीं हाथी दिख जाये तो मजा आ जाये। अक्सर इन रास्तों में वे दिख ही जाते हैं। हमने ड्राइवर से कहा कि धीरे-धीरे गाड़ी आगे बढ़ाते रहो। उसने कुछ दूर गाड़ी आगे बढ़ायी तो क्या देखते हैं कि सात हाथी और एक बच्चा हाथी अपने मस्त चाल से सडक़ पर आगे की ओर चला जा रहा है। हम रुक गए। मन में यह भय था कि यदि ये पलट कर हमारी ओर आ जाये तो फिर क्या होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कुछ दूर जाने के बाद वे हाथी नदी की ओर मुड़ गए। हमने राहत की सांसे ली। शायद वे हाथी स्नान करने के लिए ही जा रहे थे। हम आगे बढ़ चले। मित्र ने कहा, इस जंगल में हाथी की भरमार है, इसके अलावा भालू और बाघ भी है।
सारंडा जंगल पूरे विश्व में साल के पेड़ के लिए मशहूर है। मित्र ने बताया कि यहाँ राजा और रानी नामक साल का 300 वर्ष पुराना पेड़ अभी भी है। अक्सर वनस्पतिशास्त्र पढऩे वाले छात्र यहाँ आते रहते हैं। हम आगे की ओर बढ़ते गए। गाँव के नाम पर इस पहाड़ी पर कुछ नाममात्र के घर कुछ इस पहाड़ी पर तो कुछ उस पहाड़ी पर देखने को मिले और मिला सन्नाटे का जंगल। हम दोपहर ढले तक थोलकोबाद पहुँच गए। वाह जंगल के बीच में यह ठहरने का स्थान जो चारों ओर से लोहे की छड़ों से घेरा गया था जो जानवरों से पूरी तरह सुरक्षित था। खा पीकर कुछ देर आराम किया गया फिर तैयारी होने लगी उस जगह जाने के जहाँ हमें रात बितानी थी और हाथियों को देखना था। जीप में गर्म कपड़े, आवश्यक सामान और नमक लादा गया। हम चल पड़े उस टावर की ओर जो यहाँ से 02 किमी दूर है। पता नहीं सूर्य अस्त हुआ है या नहीं, यहाँ तो बस घना साया-साया सा है। खैर शाम ढले तक हम उस टावर में पहुंचे। जीप सामान पहुंचाकर लौट गई। अब हम लोग थे और था जंगल का सन्नाटा। एक अजीब रोमांच से हम भरे हुए थे, खतरा तो था किन्तु जीवन का अदभुत अनुभव होने वाला था। सबसे पहले इस टावर के नीचे नमक डाला गया। इसी नमक के चाव में हाथियों का झुण्ड यहाँ आता है और हमें इसी की प्रतीक्षा थी। यह एक ब्रिटिश समय का बनाया गया 32 फीट ऊँचा टावर था जो लोहे और सीमेंट से बना मजबूती के साथ अब भी खड़ा है। ऊपर तक जाने के लिए सीढिय़ाँ थी लोहे की, किन्तु कई जगह से टेढ़े-मेढ़े हो गए हैं जो हाथियों की कारस्तानी है। हम टावर पर चढ़ गए। आज की रात चांदनी रात थी और घने जंगल के बीच हम ऊपर दुबके थे और कौतुहल से भरे थे। जैसे-जैसे रात ने आँचल फैलाना शुरू किया ठंड बढऩे लगी और हमारी प्रतीक्षा भी। रात के करीब दस बजे हमें गर्जना सुनाई दी और क्या देखता हूँ कि लगभग 32 हाथी अपने मस्त चाल से इधर आ रहे हैं। उनका आना और हमारा ये सपना पूरा होना सचमुच में कभी न भूलने वाला पल था, दिल में भय जरुर था किन्तु कदाचित यह रोमांचक पल और कभी न आनेवाला था। वे यहाँ आये और पूरा दल अपने सूढ और दांतों से नमक का स्वाद लेने लगे। हम बिना हलचल के ये तमाशा देख रहे थे। उनमें कुछ बहुत बड़े हाथी थे मादा भी, कुछ बच्चे भी थे। बिना किसी भय से वे क्या मस्त खुले आसमान और जंगल के बीच बड़े आराम से चर रहे थे। उनमें से कुछ ने सीढिय़ों से अपना बदन भी खुजलाया। इस जंगली हाथी को देखकर हमें जो रोमांच हुआ उसे सिर्फ अनुभव किया जा सकता है, शब्दों में ढाला नहीं जा सकता। हमने वह कभी न भूलने वाली रात बिताई। सुबह का सूर्य शायद उदय हुआ होगा तभी तो हमें दूर कहीं से मुर्गे की बांग सुनाई दी। सामने पेड़ों पर चिडिय़ों ने अपने संगीत से एक अलग ही समां बांध दिया। ऐसी सुबह हमारी जिंदगी में फिर कभी न आयी।  वाह वह क्या खुशनुमा सुबह थी,  इस तरह की सुबह शहरों में कहाँ। तभी जीप आ गयी और हम इस यादगार पल को दिलों में समाये रेस्ट हाउस की ओर चल दिए। हमने कुछ देर आराम किया। अब दोपहर हो रही थी। खाना खाकर हम तैयार थे, इस जंगल और खजाने की तलाश में साथ ही प्रतीक्षा थी वन विभाग के अधिकारी की।  ठीक इसी समय एक जीप आयी उसमें से फोरेस्टर साहब उतरे साथ ही साथ कुछ युवक भी। फोरेस्टर ने कहा कि ये कलकत्ता से आये हैं और वनस्पतिशास्त्र के लिए इस जंगल का अध्ययन करेगें। उनके साथ कोई प्रोफेसर डाक्टर मुखर्जी थे। परिचय अच्छा रहा। चाय पीकर हम निकल पड़े। फोरेस्टर ने हमें 100 मी क्षेत्र में फैला एक प्राकृतिक दलदल दिखाया। यह दलदल पूरी तरह से पत्तों से ढंका पड़ा था। यदि कोई भूलवश इधर आ जाये तो समझो वो फिर कभी भी जीवित नहीं बच सकता। उधर ही हमें कई कंदराओं के भी दर्शन हुए, जिसमें बाघ और भालू रहते हैं। बन्दर, गिलहरी तो इधर-उधर दौड़ते-फिरते दिखे। बहुत ही अच्छा लगा कि खुले वातावरण में अपने में मस्त जी रहे हैं। उसने हमें फिर उस छोटी सी पहाड़ी पर ले गया जहाँ विश्व का सबसे पुराने साल के राजा और रानी का पेड़ था। उन्हें देखकर यही लगा वे बड़े शान से पूरी ऊंचाई से अपने पूरे जंगल की पेड़ रूपी प्रजाओं पर नजर रख रहे हैं और हमें बता रहे हैं कि हमें जीने दो। 300 वर्ष पुराने ये पेड़ अब भी अपने शानो-शौकत के साथ खड़े हैं। हम रेस्ट हाउस की ओर वापस हो लिए। शाम ढले तक यहाँ पहुंचे। हमारे संग-संग पंछियों का रेला भी अपने-अपने घोंसलों की ओर लौट रहा था।
तीसरे दिन हमने किरीबुरू की यात्रा की। कहा जाता है कि यह दक्षिण का हिल स्टेशन है। यहाँ के रेस्ट हॉउस का नाम भी मेघालय है। यह स्थान वो जगह है जहाँ से पूरे सारंडा का नजारा देखा जा सकता है। सात सौ छोटी-मोटी पहाडिय़ों से घिरा और भरपूर पेड़ों से घिरा यह क्षेत्र पूरी तरह से स्वच्छ पर्यावरण से ओत-प्रोत है। यहाँ आकर आप मेघों से अपने आपको घिरा हुआ पाएंगे, बहुत कम समय मिलता है कि रवि अपना दर्शन दे सके। इसके साथ-साथ हमने यहाँ के और मेघाहातुबुरू के लौह-अयस्क के खदानों से अच्छा परिचय किया साथ ही चिरिया लौह अयस्क खदान भी गया। कहा जाता है कि इस खदान के लौह-अयस्क से 60 प्रतिशत तक लोहा निकलता है जो विश्व विख्यात है। हम छोटानागरा भी गए जहाँ आदिम युग का नगाड़ा रखा हुआ है। इसे आज भी आदिवासी लोग पूजते हैं। यह एक अलग और दिलचस्प कहानी है। सारंडा में आदिम संस्कृति, सभ्यता और लोक संस्कार के अनमोल खजाने की बहुमूल्य जानकारी मिली।
कोयल, कोयना और कारो नदी में हमने बालू का ढेर देखा और उन बालुओं को धोते हुए लोगों को भी। ये लोग सूप जैसे लकड़ी की बनी एक बड़ी तश्तरी से बालू को धो रहे थे। मित्र ने कहा कि इन बालुओं को धोने पर अंत में उस सूप में ‘सोने का कण’ मिलता है और साँझ ढले ये लोग स्थानीय स्वर्ण व्यापारी को ये कण बेच देते हैं। इन नदियों में सारंडा के बीच से ही कहीं ऐसे स्वर्ण कर्ण बहते हुए आते हैं। स्थानीय लोगों ने इसे रोजगार का एक साधन बना लिया है।