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Monday 20 Nov 2017

चांदनी रात में शाही मोहब्बत की गवाही


मनीष वैद्य

11  मुखर्जी नगर
पायोनीयर स्कूल चौराहा,  
देवास (मप्र) 455001
मो. 9826013806   
रविवार की सुबह, हल्की फुहारों के साथ दिन की शुरुआत हुई थी। सावन का सुहाना मौसम था, चारों ओर हरियाली ही हरियाली। पेड़-पौधे मंद मदमाती हवा के झोंको के साथ लहलहाते तो खेतों में खड़ी फसल हरहरा उठती। जैसे किसी चित्रकार ने धरती पर हरा रंग बिछा दिया हो। एक तरफ  आसमान से मिलने को आतुर पहाडिय़ों के शिखर तो नीचे नीम अंधेरी खाइयां। आसमान में घुमड़ते काले बादल और इन्हीं मोहक पलों के बीच हमारी गाड़ी के पहिए दौड़ रहे थे बारिश के पानी से धुली हुई काली चारकोल की सडक़ पर।
गाड़ी जब पहाडिय़ों से नीचे उतरती तो जैसे कोई लैंडस्केप हमारी आँखों के सामने फैल जाता। मन मोह लेने को आतुर दूर-दूर तक फैली प्रकृति के अद्भुत रंगों से सजी कोई जलरंग चित्रकृति। हम बढ़ रहे थे मध्यप्रदेश में इंदौर के आगे इच्छापुर हाईवे पर महाराष्ट्र की सीमा की ओर। 160 किमी की दूरी पार कर हम पहुंचते हैं मुगल सल्तनत के दिनों के गुलजार रहने वाले शहर बुरहानपुर। यहाँ की मुगल शैली की बसाहट और इमारतें हमें उन दिनों के वैभव से रूबरू कराती हैं। यहाँ से हम अपने साथी शाहरिक अख्तर को साथ लेते हैं और सफर शुरू होता है अमरावती जाने वाली सडक से गुल आरा गांव की ओर।
 शाहरिक हमें बताते हैं कि बुरहानपुर मुगल काल के दौरान मुगलिया सल्तनत की गतिविधियों का एक बड़ा केंद्र रहा है। सन 1599 में अकबर ने इसे अपने अधिकार में ले लिया था और तब से ही यह खान देश की राजधानी के रूप में अपनी खासी पहचान कायम कर चुका था। यहीं शाहजहाँ की प्रेयसी मुमताज महल की कब्र भी है और उसकी याद में काले पत्थरों से बना हुआ पहला ताजमहल भी। आगरे के ताजमहल को तो आज विश्व विरासत में गिना जाता है पर बहुत कम लोग जानते हैं कि मुमताज महल की मौत बुरहानपुर में ही 17 जून 1631 को अपनी 14वीं संतान को जन्म देते समय हुई थी। गाड़ी एकल सडक़ के ट्रेक पर है और आसपास छोटे-छोटे गाँव और खेत तेजी से पीछे छूटते जा रहे हैं। शाहरिक की बातें सुनते हुए हम गाड़ी के शीशे से बाहर प्रकृति के बीच बसे आदिवासी जनजीवन और उनकी संघर्षशीलता को भी देखते चलते हैं। 21 किमी चलने के बाद छोटे से गाँव सिंहखेडा से अंदर मुडक़र हम पहुंच गए हैं। आगे तेजी से बहती हुई उतावली नदी है और उसके पार गुल आरा गांव। मैं नदी को दूर तक बहते हुए देखता हूँ, उसकी कल-कल को शिद्दत से सुनता हूँ। फिर सोचता हूँ तब से अब तक उतावली नदी में न जाने कितना पानी बह चुका होगा लेकिन इसकी तासीर में ऐसा कुछ है कि यह आज भी 400 साल पहले इसके तट पर पनपी एक शाही प्रेम कहानी को बयान करती रहती है। जी हाँ, सुनने में यह भले ही अजीब लगे पर यह सौ फीसदी सही है। सुनी हुई कहानियां लोगों ने भुला दी, कागजों पर लिखी कई इश्किया अफसानों की इबारतें समय के साथ मिट गई होंगी पर पानी पर लिखा यह अफसाना लंबे वक्त के बाद भी महफूज है।
पहाड़ी नदी उतावली। पहला सवाल मन में उठा कि इस नदी का नाम उतावली क्यों पड़ा होगा, गाँव के लोग बताते हैं, इसलिए कि इसमें बहुत जल्दी बाढ़ आ जाती है। पहाड़ों से सीधे ढलान में होने से पानी का वेग बहुत तेज रहता है और इसी वजह से थोड़ी-सी बारिश में भी इसमें आनन-फानन में बाढ़ आ जाती है। उतावली मतलब जल्दी और हड़बड़ी में बहने वाली। यहाँ का नजारा इतना सुंदर है कि जो कभी एक बार यहां आता है, वह बार-बार आने की इच्छा करता है। वे बताते हैं कि खास तौर पर उजली पूनम की रात में तो यह जगह इतनी मनोरम हो जाती है कि देखते ही बनता है। इसे यह स्वरूप मुगलकाल के दौरान सन 1600 के बाद शाहजहाँ के कार्यकाल में खुद बादशाह शाहजहाँ ने रुचि लेकर दिया था। उसे इस जगह से बहुत लगाव था और उसने तब की अभियांत्रिकी का सहारा लेते हुए इसकी प्राकृतिक सुन्दरता को कई गुना बढ़ा दिया। यह संरचना आज भी पूरी शानो-शौकत से खड़ी उन दिनों के वैभव की कहानी सुनाती है और शाहजहाँ तथा गुलआरा की प्रेम कहानी भी।
 बात करीब 1600 के शुरूआती दशक के दिनों की है। मुगल बादशाह राजकाज के सिलसिले में अक्सर यहाँ आते रहते थे। ऐसे ही एक बार बादशाह जहांगीर ने किसी जरूरी काम से अपने बेटे शाहजहाँ को बुरहानपुर भेजा। बुरहानपुर का उन दिनों प्राकृतिक सौन्दर्य और मुगलिया शानो-शौकत देखते ही बनती थी। तब यहाँ का मौसम भी सुकूनदेह और माकूल हुआ करता था। कई मुगलिया लेखकों ने यहां की शब ए मालवा का जिक्र भी किया है। यहाँ गर्मियों के दिनों में भी रातें बेहद ठंडी रहा करती थी। इसी से थोड़ी दूरी पर मालवा की राजधानी मांडू को तो इसीलिए शादियाबाद यानी आनंद की नगरी कहा जाता रहा है। शाहजहां की उम्र तब किशोरावस्था की थी, उन्होंने पहली बार इसे देखा तो बुरहानपुर का सौन्दर्य देखकर मुग्ध हो गए, लेकिन उनके दिल लगने की असली कहानी अभी बाकी है।
वे हर दिन आसपास के जंगलों में निकल जाते और या तो शिकार खेलते या वहाँ की वैविध्यपूर्ण प्रकृति का आनंद लेते। ऐसे ही एक चांदनी रात वे उतावली नदी के तट पर वहां के अप्रतिम प्राकृतिक सौन्दर्य में खोये हुए थे, उनकी नजरें चांदनी रात में दूध की तरह बहते पानी की चंचलता को निहार रही थी और यहां मिट्टी के बने बाँध से पानी के नीचे गिरने की मधुर कल-कल पर उनके कान लगे हुए थे, तभी वहीं पास के गांव में रहने वाली एक किशोरी गायिका गुल आरा के कंठ से निकले सुरों ने उनके दिल पर कुछ ऐसी दस्तक दी कि वे फिर कभी जिन्दगी भर इस जगह को भूल नहीं सके। जी हाँ, इसी नदी के तट पर तब उम्र में किशोर शाहजहाँ ने सबसे पहले गुल आरा को गाते हुए सुना था। शाहजहाँ उस पर इस कदर मोहित हो गया कि उसने उसे हमेशा के लिए अपनी बेगम बना लिया और अपने साथ बाद में आगरा भी ले गया। गुल आरा के नाम पर ही इस गांव का नाम भी तभी करारा से बदलकर गुल आरा कर दिया गया और आज भी इसी नाम से पहचाना जाता है। खूबसूरत गुल आरा की आवाज और उसकी पाकीजगी भरी नफासत पर शाहजहाँ इतना मोहित हो गया कि उसने यहीं नदी के दोनों किनारों पर दो सुंदर महल बनवाए, जहां वह ठंडी चांदनी रातों में अक्सर गुल आरा की पुरनम आवाज में खो जाया करता था। उसने यहां नदी को रोककर उसके रास्ते पर करीब तीन सौ फीट की लाल पत्थरों से 30 फीट चौड़ी मजबूत दीवार बनाकर बाँध बनवाया है। यह आज भी उसी अंदाज में खड़ा है। इससे यहाँ बारहों महीने निर्मल जल भरा रहता है और नदी का पानी बाँध की दीवार से किसी झरने की तरह उफनता रहता है। बारिश के दिनों में यह प्रपात कल-कल, छल-छल का मधुर संगीत सुनाता है।
इस कृत्रिम प्रपात के पूर्व और पश्चिम दिशा में दो सुंदर महल बनाये गए हैं जो मुगल स्थापत्य कला के नायाब नमूने हैं और आज भी उसी स्वरूप में मौजूद हैं। इन्हें अब महल गुलआरा कहा जाता है। ये दोनों ही उन दिनों प्रचलित ईंट, चूने और पत्थरों से बने हुए हैं। इनमें बड़े-बड़े कक्ष हैं और महल की छत पर पहुंचने के लिए करीने से सीढिय़ां भी बनी हुई है। दोनों महल मजबूत स्तम्भों पर टिके हैं और पानी जब अधिक होता है तो इन्हीं स्तम्भों की कमानों से होकर भी प्रपात की तरह बहता है। एक से दूसरे महल तक जाने के लिए सुंदर कारीगरी से सीढ़ीनुमा रास्ता बनाया गया है। इनमें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर अष्टकोणीय सुंदर चबूतरे बनाये गए हैं। इनसे प्रपात तथा नदी के सरोवर को निहारना बहुत अच्छा लगता है। आज भी ऐसे ही पूरे चाँद की रात है। हमारे लिए चांदनी रात में यहाँ से पानी को बहते हुए देखना और निस्तब्ध वातावरण में पानी को सुनना अपने आप में अद्भुत नजारा और एक कभी न भूलने वाला अनुभव है। महल की छत से हमें दूर-दूर का दृश्य साफ-साफ नजर आता है। इनकी ऊंचाई बहुत अधिक होने से यहाँ से दूर तक फैले हरे-भरे खेत, पहाड़ और नदी का बहुत बड़े फलक का हिस्सा नजर आता है।   मैं सोचता हूँ, उन दिनों चांदनी रातों में इन्हीं सीढिय़ों से छत पर पहुंचकर यहां संगीत और प्रकृति की जुगलबंदी हुआ करती होंगी।
जब भी शाहजहाँ यहां होता था तो वह अक्सर अपनी रातें इसी जगह बीताता था। वह यहां घंटों बैठकर गुल आरा से संगीत सुनता था। तब के लेखकों ने भी इस जगह का वर्णन अपनी किताबों में किया है। शाहजहां के दौर की कई किताबों में इसका जिक्र आता है। बादशाहनामा के लेखक अब्दुल हामिद लहोरिन ने इसे ताजगी ए हयात यानी जीवन की ताजगी कहा है तो शाहजहांनामा के लेखक ने इसे कश्मीर कहा है। फारसी के कवि मुहिब अली ने इसे महान स्वर्ग तथा सूफी संत मोहम्मद हाशम काशमी ने फारसी में लिखा है कि, जलप्रपात आखिर तुझे किस बात का दु:ख है कि तू मेरी तरह तमाम रात अपने सर को पत्थर पर पटक-पटक कर रो रहा था। मुझे लगता है कि इसे उस दौर की जल अभियांत्रिकी और स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नायब उदाहरण ही कहेंगे कि चार सौ सालों तक लगातार पानी में खड़ा रहने और बरसात तथा बाढ़ झेलने के बाद भी अब तक यह उसी स्वरूप में मौजूद है। आज तक न तो इन महलों में या न ही बाँध में किसी तरह की कोई क्षति पहुंच सकी है। उन दिनों यहां से पानी नहरों के जरिये करीब 25 किमी दूर आहुखाना तक जाता था, जहां इसका उपयोग शाहजहां की बेटी शहजादी आलम आरा के नाम पर बने बाग ए आलम आरा में पौधों को पानी देने के लिए किया जाता था।
शाहरिक बताते है कि शाहजहां के समय में यहां आसपास सुंदर उद्यान भी लगाये गए थे, जो बाद में उजड़ गए, बरसात की चांदनी रातों में इसका लुत्फ लेने के लिए बहुत से लोग यहां आते हैं और प्रपात की कल-कल छल-छल में खो जाते हैं। निस्तब्ध रात में पानी की दूर-दूर तक गूंजती अकेली आवाज बहुत कर्णप्रिय लगती है। लोग अपने निजी तनाव भूलकर प्रकृति के नजदीक तो आते ही हैं, शाहजहां और गुल आरा के अफसाने को भी शिद्दत से याद करते हैं। इस तरह एक पहाड़ी नदी और उसके पानी पर बनी यह संरचना सैकड़ों साल बाद आज भी इस प्रेम कहानी को जिन्दा रखे हुए है।
देर रात करीब एक बजे हम लौट रहे हैं बुरहानपुर की ओर। गाड़ी के भागते हुए चक्कों से गुल आरा छूटता जा रहा है और उसकी कर्णप्रिय आवाज भी कहीं गुम हो चुकी है पर मन.. मन तो जैसे अभी भी वहीं कहीं छूट गया है, शायद अब भी वहीं रम रहा है, उसी आवाज में खोया है और मैं उसे लौटाना भी नहीं चाहता।