Monthly Magzine
Wednesday 22 Nov 2017

यूनान देश : आंखों देखा हाल

डॉ. इन्दिरा मिश्र
37 मौलश्री विहार, अपोजिट
होटल, बेबीलोन, वीआईपी रोड,
पुरैना, छ.ग.492006
बेटी अमृता के सद्प्रयासों से इसी वर्ष 2016 के मई मास में मैंने और पतिदेव ने उसके साथ एथेन्स प्रस्थान किया। बेटा सौम्य और बहू महिमा न्यूयार्क से वहाँ आ गये थे। हमने एथेन्स के पिरायस बन्दरगाह से एक चार-दिनी समुद्री यात्रा भी की। पहले दो दिन शिप (सेलेस्टियल ओलिम्पिया) ने दो नये द्वीप दिखाये। आज तीसरा दिन है। रात भर हमारा शिप चलकर सबेरे ‘कुसादासी’ द्वीप पर पहुंचा। यह क्षेत्र तुर्की प्रशासन का है। इस तरह से हमने एक नये देश तुर्की का एक हिस्सा भी देख लिया।
यहां उतरे, तो समय देखा। सबेरे 7 बजे का समय है और द्वीप पर खुशनुमा धूप छाई है। कुछ आगे बढक़र पाया, कि वहां टैक्सियां मौजूद हैं। अमृता ने बढक़र एक टैक्सी लेना निर्धारित किया, जिसके चालक का नाम था इस्माइल। उसे कामचलाऊ अंग्रेजी आती थी, और वह काफी चतुर था। उसने टैक्सी चलने के 5 ही मिनिट में बता दिया - तुम लोग भारतीय हो, बहुत अच्छे हो, बहुत समझदार हो, तुम्हें मैं बढिय़ा जगह ले चलूंगा, एफेसस सभ्यता के अवशेष, आडिटोरियम, लाइब्रेरी, महल व पुराने पूजा स्थल (प्रथम शताब्दि के) दिखलाऊंगा। एफेसस के खंडहरों की बस्ती सचमुच बहुत सी कहानियों से भरी पड़ी थी। यहां मशहूर रोमन साम्राज्ञी क्लियोपेट्रा का बहन रहती थी। यहां के लोग क्लियोपेट्रा से नाराज थे। चूंकि उसने इस सभ्यता की होते हुए भी रोम के बादशाह जूलियस सीजर से विवाह किया था। एक जगह मन्दिर था, एक जगह राजमहल, और एक और जगह खेल-खिलाडिय़ों के लिये स्टेडियम। परन्तु सबसे पहले पड़ाव था रंगमंच। पहले समय में नाटक के अभिनेता सब पुरूष ही होते थे। उनकी आवाजें लोगों तक पहुंचे, इस लिहाज से रंगमंच पर विशेष डिजाइन की दीवारेें निर्मित की जाती थीं। अब इस्माइल हमें कुसादासी के वर्जिन मेरी के चर्च की ओर ले जा रहा था। यहां वर्जिन मेरी ने कुछ दिन निवास किया था। हमारी गाड़ी ने एक मैदान और उसके बाद जंगल का रास्ता पार किया। जंगल बहुत ही सुन्दर था। उस स्थल की निर्जनता अनुपम थी। ऐसा लग रहा था मानो यह स्थल धरती की शुरूआत से अब तक अनछुआ यों ही खड़ा है। वर्जिन मेरी हाऊस के अपनत्व भरे गंभीर पवित्र और सौम्य वातावरण में अपनी मौन प्रार्थनाएं अर्पित करने के बाद जब हम बाहर निकले, तो सौम्य ने एक मोरपंखी के हरे पेड़ की ताजग़ी की ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया। उस मौन खड़े जंगल का वह एक राजकुमार-सा लग रहा था, जिसे देखते हुए आंखें भर ही नहीं रही थीं। कैसा ताजा उसका हरा रंग था। आगे चले तो एक नोटिस लगा था पुलिस की ओर से। और पुलिस का तुर्की नाम? जनधर्म! इसी दौरान हमें एक सभ्यता जो ईसा की पहली शताब्दि में पल्लवित हुई थी से परिचय मिला। उस परिचय पट्टों पर लिखा था कि कैसे उन्नीसवीं शताब्दि में एक अंग्रेज की खोजी प्रवृत्ति की वजह से इस जगह की खोज व अनुसंधान संभव हुआ। फिर पुरातत्व विभाग ने उसका पुनर्निर्माण/जीर्णोद्धार करना शुरू किया, जो 78-80 वर्ष बाद तक, यानी अभी भी जारी है। एफिसस के राजकुमारों और राजाओं के जीवन से जुड़े प्रथम शताब्दि के किस्से सचमुच उस लगभग एक-डेढ़ मील के फैलाव की एक सडक़ की यात्रा में हमें सदियों पीछे ले जाते थे। उसके दोनों ओर भवन बने थे। उन पहले के लोगों के शौक भी इने-गिने थे -मदिरा बनाना, और पीना, पुस्तकालय जाना (पुस्तकालय और वेश्यालय आमने-सामने हैं), खेल-खिलाडिय़ों के प्रदर्शन और प्रतिद्वन्द्विताएं, पुजारी और मन्दिर, स्टेडियम और रंगमंच नाटकों के लिये। कभी यह गली या कहिये सडक़, महफिलों की स्थली रही होगी, ‘खंडहर बता रहे हैं, इमारत बुलन्द थी।’ इन्हीं खंडहरों के बीच एक पेड़ अपने हरे-हरे फलों से लदा खड़ा था। बताने पर विश्वास नहीं हुआ, कि इस पेड़ पर ये सब अंजीरें लगी थीं। मेरे कदमों से धैर्य चुक गया था। पता नहीं कैसे - मेरे सामने एक अन्य पर्यटक दल आ गया और उनकी आगवानी करती एक महिला की कमेन्ट्री में मुझे रस आने लगा और कुछ समय मैं उनके साथ आगे बढ़ती रही। पर इसका नुकसान यह हुआ, कि मैं अपने परिवार से बिछुड़ गई। उन ऊबड़-खाबड़ पत्थरों में से किन के पीछे मेरा परिवार क्या ढूंढ रहा था, मैं जान ही नहीं पाई। मैंने 5-10 बार घूमकर उधर देखा, पर उन्हें कहीं नहीं पा सकी। टैक्सी ड्राइवर इस्माइल ने हमें इस सडक़ के मुहाने पर छोडऩे के बाद कहा था, कि वह उस क्षेत्र के परले सिरे पर पुन: हमें मिलेगा, चूंकि यह क्षेत्र गाडिय़ों के लिये निषिद्ध है, अर्थात् एक डेढ़ मील अकेले चलने पर तो वह मिलेगा ही और साथ ही मेरा परिवार भी देर-सबेर तो मुझे मिलेगा ही। मैं अब अपने अकेलेपन से परेशान थी। यहां क्या देखूं। फिर भी एक रंगमंच और एक हमाम स्थल यहां मिल ही गया - एक हैरतअंगेज सौष्ठव के साथ ये कहां छुपे रह गये - इतनी सदियों! आगे, एक पुलिया पार करके रास्ता दाहिनी ओर मुड़ता है। रास्ते पर बड़े-बड़े पेड़ हैं। मैं तेजी से उधर आती हूं तो देखती हूं एक आदमी शिरस्त्राण, ढाल तलवार लेकर मुझे देखकर खड़ा हो जाता है। मैं स्तब्ध होकर डर जाती हूं। डरते-डरते तेज कदमों से चलने की कोशिश करती हूँ। अब मैं क्या करूँगी? लेकिन वह मेरे तेज कदमों से निकल जाने के बाद निढाल होकर बैठ जाता है। मैं अब निकासी गेट पर पहुंच जाती हूं और इस्माइल को वहीं देखकर मुझे लगता है, मानो मैं अपने परिवार से ही मिल रही हूं। एथेन्स की कई इमारतों की छोटी-छोटी अनुकृतियां, रंगीन चित्रकारी वाली प्लेट्स, आदि। साथ ही अनार का ताजा रस, जिसे पीते ही मैं अपनी पिछली मायूसी भूल गई। हम सब टैक्सी में सवार हो गये। वैसे इस्माइल ने अपने परिवार, अपनी पोती की फोटो हमें अपने मोबाईल पर दिखाकर, उसका नाम भी बता दिया था। साथ ही उसका नारा था, गुड पीपल, गुड मनी, गुड स्पेंडिंग। विशेषत: महिमा से यह जानकर वह बहुत उत्साहित था, कि वह और सौम्य न्यूयॉर्क से आ रहे हैं। वह मुनाफा कमाने के लिये आशान्वित था। थोड़ी देर में ये लोग भी नजऱ आ गये और अमृता ने बताया कि उसने पैसे देकर ढाल, तलवार वाली पोशाक के आदमी (ग्लैडियेटर) के साथ उसकी तलवार के पीछे मुस्कुराते हुए अपनी गर्दन रखकर फोटो खिंचवाई है। वह उसी काम को करने वहां बैठा था। फोटो के लिये उसने उससे अच्छे पैसे लिये थे। रास्ते में जानने को मिला कि जूलियस सीजर को यह जगह पसन्द थी, चूंकि सागर के मार्ग से यहां आसानी से रोम से आ-जा सकता था। अब इस्माइल ने फिर से कालीन की फैक्ट्री अथवा चमड़े की फैक्ट्री दिखाने की बात की। सौम्य ने कहा, ‘‘ओ. के. ! हमें दोनों में किसी एक जगह ले चलो।’’वह हमें चमड़े की फैक्ट्री में ले गया। फैक्ट्री के साथ-साथ एक्वेरियम भी बना था। वहां हमारा स्वागत सेव की चाय (एप्पल टी) मैनेजर द्वारा से किया गया। फिर कौन-से चमड़े के वस्त्र हैं, उसने इसकी व्यवस्था की। इस व्यक्ति ने अपने माल का नमूना पेश करने के लिये हमसे केवल 3 मिनिट का समय मांगा। फिर हम लोगों को वह एक हाल में ले गया। हॉल की बत्तियां बन्द हो गई और तेज़ म्यूजिक चल पड़ा तथा हमारे सामने रैम्प पर तीन चार मॉडल्स ने फैशन परेड की। केवल पाँच लोगों के लिये फैशन परेड, जिसमें परी-सी सुन्दर एक लडक़ी एक स्कर्ट, जैकेट या पर्स सहित आती, जैकेट को उतारती, एक युवक की सहायता से उसे रिवर्स करके पहनती, और मचलती हुई ऊँचे सैंडिलों पर झूमती चली जाती। फिर दूसरी लडक़ी आती -अपना चमड़े का पर्स झुलाती, एक दो अदायें दिखाती, फिर झूमती चली जाती। ऐसे ही कई आइटम्स उन्होंने पेश किये। विश्वास ही नहीं हो रहा था कि स्वर्ग से ये अप्सरायें कैसे यहां उतर आई है। अब लाजिमी था कि हम गंभीरता से उन चमड़े के वस्त्रों को देखते और खरीदने की कोशिश करते। पर खुशकिस्मती से किसी का सही साइज़ या पसन्द का कलर नहीं मिला, तो हमने मुक्ति पाई। भले ही वे कपड़े मखमल या साटिन जैसे फिसलते थे, पर महंगे बहुत थे। बाहर आकर महिमा बोली, 30,000/- रुपये एक जैकेट के लिये खर्चा करने की तैयारी से तो मैं यहां आई ही नहीं थी। टैक्सी में पुन: बैठने पर देखा कि इस्माइल की स्माइल (मुस्कुराहट) गायब हो गई, जो तभी लौटी, जब उसे टैक्सी भाड़े में चेंज न होने के कारण 20 यूरो (1400 रुपये) की टिप मिली। उसने अपनी पोती का हवाला देते हुए धन्यवाद दिया, कि उसके लिये अब वह कुछ खरीदकर ले जायेगा। हम लोग वापस अपने शिप पर आ गये, और लंच आदि में व्यस्त हो गये। शिप चल पड़ी थी। आज हमारा शाम का कार्यक्रम पैटमॉस द्वीप जाने का था। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार शाम 4.30 बजे हमारी शिप वहां पहुंची। हम लोग मोटरबोट में सवार होकर पैटमॉस द्वीप पहुंचे। यहां उतरकर पाया कि एक ऊँचा-सा पहाड़ हमारे सामने था, जिसकी चोटी पर एक मोनैस्ट्री (धर्मविहार) थी। उसके केथेड्रल का घंटा दूर से दिखलाई पड़ रहा था। यह सब किसी चित्र में देखे-जैसा लग रहा था। देखने में लग रहा था, कि यह पहाड़ बहुत ज्यादा दुरूह नहीं है। किन्तु यहां कुछ ही कदम चलने के बाद यह समझ में आ गया कि यहां चढ़ाई बहुत सीधी है। यह निश्चित था कि ऊपर पहुंचने के बाद कुछ भी देखने लायक शक्ति हममें नहीं रह जायेगी। अत: टैक्सी का सहारा लिया गया। पैटमॉस में किसी सेंट द्वारा स्थापित किया इसाई पूजा-स्थल (ग्रोटो) है। इसका उल्लेख बाईबिल के एपोकालिप्स में आता है। इस स्थल के मुख्य पूजा स्थल में लोग किसी दक्षिण भारतीय मंदिर के गर्भ गृह की भांति दीपक जला रहे थे। यह ग्रोटो तो अभी आधी ऊँचाई पर ही था। शेष आधी बाकी बची थी। उस तक टैक्सी से पहुंच तो गये, लेकिन पूरे दिन की मशक्कत के बाद ऊपर की मोनैस्ट्री तक चलने की हिम्मत न होने से, मैं और सुयोग्य उसे नहीं देख पाये। बच्चों ने लौटकर बताया कि वह तो अत्यन्त दर्शनीय थी - अत्यधिक सुन्दर और विविध महत्वपूर्ण सामग्रियों से परिपूर्ण। काश! हिम्मत करके हम भी उसे देख लेते। शिप पर लौटने पर संगीत, यूनानी पारंपरिक नृत्य आदि कई कार्यक्रम हमारे लिये रखे गये थे, किन्तु हम उनकी ओर तनिक भी ध्यान देने की स्थिति में नहीं थे, इतने थके थे। तीसरा दिन-रातभर शिप चलकर किसी स्थान पर आकर खड़ी हुई है। मुझे पौ फटने का अहसास हुआ है। केबिन की खिडक़ी का परदा हटाकर गुलाबी बादलों वाली धूप का दृश्य देखते ही मन खिल उठा। जल्दी से कैमरा खोलकर उसका फोटो लिया। सब इसे देखते ही ‘वाह’ कह उठेंगे। आज हम लोग हैराक्लियोन द्वीप देखने के लिये निकल पड़ेंगे। इस द्वीप में देखने को बहुत कुछ है। इस यात्रा में गुणवत्ता के बढ़े हुए क्रम में हमें विभिन्न स्थान दिखाये जा रहे हैं। यात्रा का क्रम ऐसा नहीं है कि समुद्र के एक छोर से दूसरे छोर तक जो द्वीप पहले पड़े उन्हें, दिखा दिया जाये। बल्कि ऐसा क्रम रखा गया है कि सबसे समृद्ध, सबसे सुन्दर वस्तुएं बाद में दिखाई जायें। पहले उत्सुकता जगाई जायेगी। यूनान से परिचय कराया जायेगा। तो आज हमने जो टैक्सी ली उसका चालक है नेक्टोरियस। यह एक संजीदा पुरूष है देशभक्त। इसका अंग्रेजी ज्ञान भी अच्छा है। उसकी टैक्सी से हम चल दिये हैं और कुछ ही किलोमीटर बाद शुरू होती हैं जैतून के पेड़ों की पहाडिय़ां। जैतून का पेड़ कीकर के पेड़ से बड़ा नहीं होता। यह कम ऊँचाई की पहाडिय़ों पर पंक्तियों में लगा हुआ बहुत सुन्दर लगता है। इसके पत्ते हरे-उदे (राख के) से रंग के होते हैं। इन दिनों पेड़ों पर फल नहीं आया है। इस देश में मानसून का कोई आगमन नहीं होता। जब तब (सर्दियों में) बरसात हो जाती है और शासकों को पानी को लेकर चिन्ता बनी रहती है। आज हम लोग क्रीट द्वीप पर हैं, जिसके हेराक्लियन क्षेत्र में स्थित राजा नोसस का 400 कमरों वाला महल देखेंगे जिसके अवशेष देखकर लोग कहते हैं कि पश्चिमी सभ्यता की शुरूआत यहीं से हुई है। यहां पाश्चात्य सभ्यता का पहला पाठ, जिसमें निजी और सार्वजनिक रिहाइशी क्षेत्रों का जो फर्क अहम है, समझाया गया है। अर्थात राजा के ‘राजसिंहासन’ का स्थल है (जहां एक पत्थर का सिंहासन आज भी रखा है), वह प्रजा से मिलने का स्थल है। आमोद-प्रमोद का स्थल, राजदरबारियों के रूकने व आमोद-प्रमोद के लिये स्थान, तथा अन्य मेहमानों के रुकने की पृथक-पृथक कक्षों में व्यवस्था की गई है। यहां रखे मिट्टी के भीमकाय लम्बोदरे मर्तबान दर्शाते हैं, कि राजा की दावत के लिये सामान कैसे रख सकते हैं? इसी महल में भू-गर्भ में चलती मिट्टी की बनी पानी की नालियां भी दिखलाई देती है। नेक्टोरियस ने हमें इस महल के मुहाने पर उतार दिया है और अब हम खो रहे हैं, उसी पुराने जमाने में.....। यह महल एक पहाड़ी ढलान पर है। हाँ इसके पहले, नेक्टोरियस हमें वर्जिन मेरी के एक पुराने केथेड्रल में ले गया था जहां बेहद शान्ति थी। महल में दीवारों में लगे चित्र बड़े ही जीवन्त और सुन्दर हैं। कहीं मनुष्य बैल से संघर्ष कर रहा है, कहीं मछली से। यह महल एक पहाड़ी की ढलान पर है, किन्तु फिर भी इसकी कुर्सी काफी ऊँची है। पत्थर तो मजबूत इतने हैं कि आज 2000 वर्ष बाद भी अपनी जगह मजबूती से लगे हैं। इस महल के बाहर पर्यटन विभाग का छोटा-सा बगीचा है, जिसमें अफीम (पौपी) के सुर्खलाल कोमल-कोमल फूल खिलकर हवा से मुड़ रहे हैं। महल के बाद हमारा अगला मुकाम हैराक्लियन द्वीप में बना संग्रहालय देखना। यह एक ऊंची हवादार खुशनुमा इमारत में है। नेक्टोरियस ने हमें यहां उतारकर कहा है कि अब मैं यहां से वापस जाता हूं। जब आप संग्रहालय देखकर उसके पिछले दरवाजे से बाहर निकलेंगे, तो आप अपने को, अपने जहाज के बिल्कुल निकट पायेंगे, और झट से वहां पहुंच जायेंगे। अरे यह कैसा गोलमोल रास्ता अपनाकर उसने हमें चकरा दिया है। वह अपना किराया लेकर चलता बना और हम रह गये वहीं पर।
हमारे सामने खड़ा यह म्यूजियम भी अत्यन्त विविध सामग्रियों से भरा है। विशेष तौर पर सुन्दर लगीं कई तरह की नक्काशीदार अर्न मटकियाँ। दूसरी मज़ेदार चीज़ जो हृदय को छू गई, वह थी, कि प्रस्तर और लौह युग के लोगों के औजार और शस्त्र। वे इन औजारों से इतना प्रेम करते थे, कि उन्हें सदा अपने कोट की जेबों में रखते थे। जब वे मर जाते थे, तब उनके औजारों को भी उनके साथ ही दफऩाना पड़ता था। म्यूजियम की विविध चित्रकला तथा अन्य कृतियों से संतुष्ट होकर जब हम बाहर निकले तो पाया कि सडक़ के उस पार कोई सभा हो रही थी, जिसमें वाद्य संगीत बज रहा था। नजदीक जाने पर समझ में आया कि लोगों को आकर्षित करने के लिये संगीत बजाया जा रहा था, असली उद्देश्य तो वह था जो बड़े-बड़े बैनर्स पर लिखा था और यह इन सभी श्रमिकों की ओर से सरकार के प्रति विरोध का प्रदर्शन था। तो इस प्रकार से इन लोगों की हड़ताल भी काफी आकर्षक और कायदे की थी। कोई भूख से अधमरा होकर फर्श पर लेटा नहीं था, कोई प्यास से सूखे होंठो पर जीभ नहीं फिरा रहा था। सब एक विशाल गोल घेरे में आराम से खड़े होकर अपनी कठिनाई को गाकर और बजाकर सुना रहे थे। अब हमें पहुंचना है ‘‘सेलेस्टी’’ की ओर। सचमुच एक दो गलियों से मुडक़र चलने के बाद म्यूजियम हमने देख लिया था। कुछ ही देर में वह हमें समुद्र में खड़ी दिखाई देने लगी। ज्यादा खोजबीन नहीं करनी पड़ी। फिर भी दो किलोमीटर की पैदल चलाई तो यह थी ही। सेलेस्टी की ओर पैदल चलकर जाने में अपना ही आनन्द था। वह जहाज हमारा विशाल भवन था, घर था, होटल था। और खेद, कि कल इस समय तक वह हमारा कुछ भी नहीं रहेगा। हम इससे उतरकर एथेन्स की गलियों में घूम रहे होंगे। हम शीघ्र ही शिप पर पहुंच गये, जहां एक शानदार दावत हमारा इन्तजार कर रही थी। आज इस दावत में देखें, भोजन की सजावट वाले कलाकार ने तरबूज को दो टुकड़ों में काटकर उससे क्या आकार गढ़ा होगा। आज उस कलाकार ने बनाई है तरबूज के लाल-पीले रंग से एक चिडिय़ा। उसकी ओर प्रशंसा में नजरें उठी ही थीं कि डाइनिंग हॉल में यह घोषणा हुई कि आप सब लोग दोपहर साढ़े तीन बजे शिप की 8 वीं मंजिल के डेक पर पहुंचें। आपको समुद्र के कुछ नायाब दृश्य देखने को मिलेंगे। हम लोग साढ़े तीन बजे 8 वीं मंजिल के डेक पर पहुंचे। देखा, हमारे दाईं ओर का द्वीप एक पहाड़ था, जो एक सुप्त ज्वालामुखी था। उसकी बनावट की परतें, ऊपर काला रंग बीच में भूरा और नीचे सफेद - ये बता रहे थे कि यह निश्चित् रूप से अपने लावा उगलने वाले काल से बहुत दूर नहीं आया है। बांये पर दूसरे नीले द्वीपों की श्रृंखला थी। ये दोपहर में भी किसी सुन्दर स्वप्न में डूबे दिखलाई दे रहे थे, क्योंकि इन पर जलकणों की धुंध छाई थी। दूसरा आश्चर्य - सामने दूर दीखने वाले सैन्टोरिनी द्वीप पर नीले पहाड़ की चोटी पर सफेद-सफेद पतली झालर दीख रही थी, जो निश्चित तौर पर बर्फ से ढकी चोटियां होंगी, लेकिन नहीं। ये सब सफेद चूने से पुते, नीली छतों वाले एकसार मकान हैं। सैन्टोरिनी की विशेष पहचान। साढ़े तीन बजे के बाद 4 कब बज चुके थे, लेकिन हम लोगों का दिल, डेक के इस दृश्य से भरता ही नहीं था। हर क्षण नये कोण से दिखाई देता ज्वालामुखी, और अन्य द्वीप, और पास आता सैन्टोरिनी, जो विश्वविख्यात हो चुका है। कब हम सैन्टोरिनी पहुंचे और कब शिप से मोटरबोट और उससे जमीन पर उतरे, कुछ याद नहीं। इतना भर याद है कि सैन्टोरिनी द्वीप पर उतरते ही पाया कि अब बहुत ऊँची (हरिद्वार के मनसा देवी जैसी) ऊँची चढ़ाई चढऩी होगी या टिकट लेकर केबल कार से भी ऊपर जाया जा सकता है। सौम्य और महिमा ने पैदल ही ऊपर जाने का निर्णय किया। पैदल की अपेक्षा टट्टू की सवारी भी उपलब्ध थी। यहां पर टट्टू काफी लोकप्रिय है - और उसे ये लोग डोंकी कहते हैं। डोंकी लेने की तरफदारी नहीं की जाती, पर हां उनके उपलब्ध होने की सूचना जरूर शिप में ही दे दी गई थी। लगभग हर द्वीप पर आपके पास सैर के लिये विकल्प होते थे कि या तो आप शिप के बन्दोबस्त से सैर करें (जो काफी मंहगा था) या फिर खुद की टैक्सी करें।
हमने देखा कि उस पहाड़ पर चढऩे के लिये हम केबल कार में सवार होने के लिये लोगों के एक हुजूम के साथ, सीढिय़ां चढ़ रहे हैं। हमारे आगे दो बहुत ही सुन्दर युवक, काला चश्मे पहने और एक जैसी टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहने और जेब में वॉकी-टॉकी फोन लेकर चल रहे हैं। ये लोग बॉडीगार्ड हैं - और उनके आगे एक युवती- जो सीधी किसी परिधानों के शो-केस से निकलकर जा रही प्रतीत हो रही थी, अपने एक साथी के साथ एक औपचारिक चाल चल रही है। उसने जो सुनहरी घड़ी अपने हाथ में पहन रखी है - अकेले उसी की कीमत पचास लाख तो होगी। ऐसे लोगों के ही ‘न्यारे’ बंगले इस सैन्टोरिनी द्वीप पर होंगे। शायद ऐसे ही लोगों को ‘डॉन’ कहा जाता है। किसी धनाढ्य धार्मिक व्यक्ति ने करोड़ों खर्च करके यह केबल कार यहां लगवाई है। इसमें हम ढ़ाई मिनिट में ऊपर पहुंच जाते हैं, जबकि पैदल में 25-30 मिनिट तो कम से कम लगते ही हैं। अभी हम केबल कार से उतरे ही थे कि देखा सौम्य और महिमा पैदल रास्ते से ऊपर पहुंच रहे हैं। उन्हें इसमें कोई परेशानी नहीं हुई थी। वे काफी तेज़ी से ऊपर आ पाये थे। अब हमें यहां से कोई 27 कि.मी. के दूर के बिन्दु आइवा ग्राम जाना है, जो समुद्री कटोरे, ‘कंबल्डेरा रिम’ के ऊपरी सिरे पर बसा है। यहां बहुत से स्मारक बने हैं। इसीलिये यह स्थान कुछ पवित्र, कुछ धार्मिक माना जाता है। वर्तमान में पूरे ग्रीस में ईसाई ऑर्थोडॉक्स (पुरातन परम्परा) चर्च की मान्यता है। उसके पहले ये लोग प्रकृति तथा उसके प्रतीक देवताओं की पूजा किया करते थे। उन्हें बलिदान दिया करते थे, ताकि शुभकार्य में उनका आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हो। ओइआ ग्राम: पर्यटन का उच्चतम आकर्षण, यह एक अविस्मरणीय क्षण है, इस ग्राम में, समुद्र तल से करीब 100 मीटर ऊँचाई पर बनी सडक़ पर चलना। एक तो यह सडक़ केवल सफेद-नीले रंगों के उपयोग के कारण मानव मन में, समुद्र और आकाश के साथ छा जाती है। दूसरे इसके सौ मीटर की ढलान में पेड़, वन, पार्क आदि नहीं हैं, बल्कि लोगों के मिट्टी के घर जैसे बने हुए हैं। ये केवल घर भी नहीं हो सकते, चूंकि इनमें छोटे-छोटे तरणताल भी बने हैं और अन्य सुविधाएँ भी हैं। अत: इनमें बहुत से होटल हैं, जिनमें आप रह भी सकते हैं। शिखर पर चलती सडक़ पर कई दूकानें हैं। विशेषत: कपड़ों की। लोग निशानी के तौर पर यहां से टी-शर्ट, ब्लाऊज वगैरह खरीदते हैं। टट्टू का आकार यहां भी जहां-तहां मौजूद हैं। कहीं लकड़ी की मूर्ति के रुप में, तो कहीं टी-शर्ट की छपाई में। लगता है इस प्राणी ने मनुष्य के आवागमन की समस्या को आदिकाल से ही हल किया है, इसलिये वह इनसे सदा के लिये अविभाज्य रूप से जुड़ गया है। पर्वत शिखर पर जगह-जगह स्मारक बने हैं। समुद्र यहां गोलाकार एक कटोरे जैसा दिखाई देता है। वह लोगों के पर्यावरण, जल, भोज्य सामग्री और पर्यटन की साधन-सामग्री तथा अपने बादलों तथा जलीय सम्पदा लेकर हर जगह मौजूद है। अपने नीले सफेद स्मारकों की वजह से सैन्टोरिनी विश्व का एक सर्वप्रिय पर्यटन स्थल है। यह मन, शरीर, आत्मा, सबको तसल्ली देने वाला स्थान है। यह तो बताना रह ही गया है कि हम पांच होने के कारण शिप से, यहां तक का फासला तय करने के लिये टैक्सी में नहीं समा सकते थे। वहां हमें हैदराबाद के एक युगल मिल गये, जिनके साथ मिलकर हमने एक मिनी बस ली। तब आइवा पहुँचे। आइवा गांव घूमने के बाद हमें वापस मिनी बस में 5.00 बजे तक लौट आना तय था। अब वह युगल गायब। मिनी बस ड्राइवर घबरा रहा था शायद हमें उनके बिना ही चले जाना पड़े। तब सौम्य दौडक़र गया और बाजार से उन्हें ढँूढकर लाया, वे किसी दूकान पर अटके थे। कभी, कहीं कोई नंबर नाम, निश्चित समय भूलने की गलती यहां बेहद मंहगी पड़ती है। यदि हमने उनका नम्बर ले लिया होता, तो हमारी यह मेहनत बच जाती। अब हम पुन: सेलेस्टियल ओलिम्पिया में हैं और इसे ‘बाई’ करने में सिर्फ एक रात का सफर रह गया है। और हां, आज का डिनर और भी रंगीन और विपुल है। आज स्टाफ भी प्रसन्न नजर आ रहा है। कल से वह एक नये अतिथि दल का स्वागत करेगा। हमारी विदाई के पूर्व हमारे सामान की ढुलाई के बारे में कह दिया गया है, कि अपना नाम, कमरा नंबर लिखकर हम अपने सूटकेस रात के बारह बजे तक अपने कमरे के बाहर रख दें। केवल सबेरे पहनने के कपड़े छोडक़र। वह सामान हमको एथेन्स के पिरेयस बन्दरगाह पर पहुँचने पर मिल जायेगा। हमारी इस यात्रा का यह चरण इस तरह पूरा हुआ। अब सौम्य व महिमा के साथ पार्थेनोन का पहाड़, समुद्र और फ्ली मार्केट देखे जाने की प्रतीक्षा है।