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Monday 20 Nov 2017

यात्रा : देश और राज्य का विशेष कोण दिल्ली (जुलाई, अंतिम सप्ताह / बुधवार)

इला कुमार
सी- 1235,गौड ग्रीन एवन्यू
अभय खण्ड -2
इंदिरापुरम,गाजियाबाद (उप्र)
मो. 8527227336
नागपुर जाने का कार्यक्रम पिछले दो महीने से बन रहा था , टल रहा था। यात्रा को टालने का मुख्य कारण था कि नागपुर में बहुत गर्मी होगी। मई जून के महीने में। खैर, नागपुर की गर्मी और वहां के लोगों के ठंडक भरे व्यवहार का कोई जोड़ है विश्व में? शायद नहीं! तो इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए हम आज चल पड़े हैं नागपुर की ओर। ए.पी.एक्सप्रेस का सफर हमेशा से मुझे लुभाता है, चाहे नागपुर से दिल्ली जाना हो या दिल्ली से नागपुर।
ए.पी.एक्सप्रेस का नाम अब बदलकर तेलंगाना एक्सप्रेस हो गया है, लेकिन मेरे मन में इस ट्रेन का यही नाम दर्ज है। ऊपरी तौर पर लगता है जैसे यह कोई खास यात्रा नहीं लेकिन आजमाया हुआ सत्य है कि हर यात्रा अपने-आप में खास होती है, यह वह विशिष्ट समय होता है जब हम नए लोगों के संपर्क में आते हैं, अलग तरह के वातावरण को महसूसते हैं ,कई अच्छे-बुरे अनुभवों से गुजरते हैं। ए.पी.एक्सप्रेस में बैठते ही कितनी ही पुरानी यात्राओं की परछाहीं नजदीक आकर खड़ी हो जातीं हैं, खास कर सन तिरानबे-चौरानबे (1993-94) से लेकर निन्यानबे (1999) तक की गईं यात्राएं। नागपुर से दिल्ली, कुछ दिनों के अंतराल पर फिर दिल्ली से नागपुर ! वे सभी यात्राएँ पिलानी की ओर उन्मुख रहा करतीं थीं, जहाँ के स्कूल में हमारे बच्चे पढ़ते थे। दिल्ली पहुंचकर अगले दिन हम लोग लुहारू के लिए ट्रेन पकड़ते थे। अनजाने स्टेशन सरायरोहिल्ला में मुँह अँधेरे पहुंचकर बीकानेर एक्सप्रेस पकडऩा काफी मशक्कत का काम हुआ करता था। वैसे उस ट्रेन का फस्र्ट क्लास का सफर इस मतलब में अच्छा होता था कि वर्दीवाला बेयरा टी-पॉट वाली चाय, ब्रेड-ऑमलेट बड़े ढंग से ट्रे में लगाकर लाता था, खाने के वक्त कटोरियों लगी बड़ी थाली में सब्जी, कढ़ी, रोटी, दाल, दही, अचार वगैरह भी।
नागपुर-दिल्ली लाईन पर कभी भी चलने पर वे सभी पुरानी यात्राएं स्वयं ही अपने समस्त बिम्बों के संग नजदीक आ जातीं हैं।
यात्राओं के बारे में कहा जाता है की वे आपको शिक्षित करती चलती हैं, अभी कुछ ही देर पहले एक अलग किस्म की शिक्षा प्लेटफार्म पर मेरी प्रतीक्षा में प्रतीक्षित थी। जनरल बोगी में चढऩे के लिए प्रतीक्षारत विद्यार्थियों, मजदूरों की लम्बी पंक्ति दिखी, जो आर्थिक रूप से कमजोर यात्रियों की लम्बी लाइन थी, ट्रेन में चढऩे के लिए प्रतीक्षारत। उस पंक्ति में खड़े लोगों के चेहरों पर छाए हुए असमंजस और बेबसी के कारण, पूरे भारत की गरीबी के साथ-साथ प्रशासन की गहरी बेरूखी के दर्शन बड़े ही निर्मम ढंग से होते हैं। पहले के समय में यह तथ्य समझ में शायद इसलिए नहीं आता था, क्योंकि जनरल बोगी, ट्रेन में सबसे पीछे लगायी जाती थी या फिर बीच में, लेकिन पिछली कई यात्राओं के बीच देखती हूँ कि जनरल बोगी, ए.सी बोगी के एकदम पास लगी हुई है और उस पर चढऩे वाले लोगों के द्वारा प्लेटफार्म पर लगाई गई लम्बी लाइन एकदम सामने दिख पड़ती है। कंधे पर एक बैग लटकाए हुए या हाथ में झोला पकड़े हुए निरीह मुद्रा वाले लोगों के बीच कई चेहरों पर घोर उद्दंडता भी परिलक्षित होती है। पूछताछ करने पर पता चलता है कि ये सभी जनरल बोगी से जाने वाले यात्री हैं। जनरल बोगी का मतलब आम जनता का बोगी है, साधारण हैसियत वालों का डिब्बा यानि कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों डिब्बा, जिसमें वे दस बीस रुपए का टिकट लेकर चढ़ जाते हैं और दो तीन सौ किलोमीटर की दूरी का सफर ट्रेन द्वारा कर लेते हैं।
इस तरह की यात्रा के बारे में हमारे कार ड्राइवर लडक़े (अशोक) ने जब-न-तब चर्चा की है, वह बताता रहता है अपनी घर जानेवाली यात्राओं के बारे में, अपनी हरदोई-यात्रा का वर्णन करता रहता है ...और उस वर्णन ने मेरे सामने किसी अलग दुनिया की खिडक़ी खोल दी है, जहाँ से हमारे अपने देश भारत का अलग सा चेहरा दीखता है और वह चेहरा पूरे देश के हर राज्य, हर शहर में दीख पडऩे वाला चेहरा है, जहाँ भी रेल की पटरियां जाती हैं, सवारी गाड़ी पहुंचती है।
आम व्यक्ति का यह चेहरा और इस प्रकार के चेहरों की भीड़ कैसी है आखिर, जिसके बारे में मैंने इतने वर्षों के बाद जाना है? वास्तव में वह ऐसे कमजोर वर्ग का चेहरा है जिसके पास स्लीपर क्लास के टिकट खरीदने की भी कूव्वत नहीं है। आर्थिक रूप से कमजोर इस पंगत में हर किस्म के लोग हैं, इसमें जाति, राज्य या प्रदेश का बंधन नहीं है। स्टेशन कोई भी हो, किसी भी राज्य का, वहां किसी भी रंगरूप या जाति का व्यक्ति जनरल बोगी के सामने लगी लाइन में लगा दीख सकता है। जनरल बोगी में चढऩेवाले यात्रियों के चेहरे पर एक ही जैसा भाव अंकित रहा करता है कि... क्या पता अंदर घुस पाएंगे या नहीं, आज जा पाएंगे या नहीं, कहीं पुलिस वाला भगा तो नहीं देगा...वगैरह ,वगैरह।
बैतूल (बृहस्पतिवार / सुबह )
दिल्ली-मुंबई रूट पर स्थित एक साधारण से कद का स्टेशन, जहाँ से सुपरफास्ट गाडिय़ाँ सर्र से गुजर जाती हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि मध्यम आकार के इस शहर के अन्दर छिपा हुआ एक आश्चर्य है। होता कुछ ऐसा है कि इस जगह की सडक़ों पर से गुजरते हुए, भागते हुए कार के पहिये अचानक ठिठकने लगते हैं जब एक छोटा हवाई जहाज किसी गृह के सामने खड़ा दीख पड़ता है। एकबारगी विश्वास नहीं होता कि हमने सच देखा है। मुझे दो दशक पहले की याद आती है जब भोपाल से हमलोग मारुति कार से लौट रहे थे और पहाड़ों की अच्छी श्रृंखला को पार कर आगे बढ़े थे तो खूब बड़ी झील पहाड़ों के बीच दीख पड़ी थी, शहर में घुसने पर एक घर के सामने छोटे से हवाई जहाज को खड़ा देखकर हम दंग रह गए थे। थोड़ा ठहरकर ध्यान से विचार करने पर यह समझ में आता है कि एक ही देश भारत का अलग-अलग चेहरा है यह, इसमें संदेह नहीं कि अपने देश में कई लोगों के पास अफरात पैसा है, लेकिन हाँ, कुछ ही लोगों के पास। ज्यादातर लोग तो बस जनरल बोगी में सफर करनेवाले लोग हैं, आर्थिक रूप से कमजोर, प्रशासन की मेहरबानी तले दबे हुए, पिसते हुए।
पाण्ढूर्ना स्टेशन (बृहस्पतिवार / सुबह)
सुबह हो चुकी है, कई नदी, पहाड़ और राज्य पार करके हमारी ट्रेन अब महाराष्ट्र की धरती पर दौड़ रही है, भोपाल, इटारसी,  बैतूल, के बाद कई स्टेशन आये और गए, हम वहीं फस्र्ट ए.सी. के बी कूपे  में बैठे हुए खिडक़ी के बाहर निहारते रहे। पाण्ढूर्ना महाराष्ट्र का एक साधारण सा स्टेशन है, जिसके बारे में मेरा अनुभव कहता है कि यहाँ मौसमी फल खूब ताजे मिल जाते हैं, टोकरों में फलों की छोटी-छोटी थैली बनाकर स्त्रियाँ-बच्चे बेचते रहते हैं। कभी संतरा दीख पड़ता है तो कभी अमरुद, कभी केला तो कभी कुछ और।
नागपुर (बृहस्पतिवार / दोपहर)
गंतव्य पर आ पहुंचे हैं हम। ट्रेन समय पर कलमेश्वर, काटोल, गोधनी, आदि स्टेशनों को पार करके नागपुर स्टेशन पर आ पहुँची थी। प्लेटफार्म नंबर एक पर। विशाल पोर्टिको से निकलते बाईं ओर सामने प्रीपेड ऑटो-स्टैंड। ऑटो चालक से रूबरु होते ही नागपुरियन हाई कल्चर मन पर विशेष लहरें उकेरने लगता है। सभ्य व्यवहार का, नम्रता का, साफगोई भरे व्यवहार का। नागपुर वाकई एक दरवाजा है उत्तर भारतीय लोगों के लिए। एक सभ्य दरवाजा, जो कि भारत के उत्तर में स्थित राज्यों के मुँह पर अपनी पूरी सौम्यतापूर्वक खुल पड़ता है। मुझे लॉ कॉलेज में पढ़े गए तथ्यों की याद आती है कि...अगर कोर्ट-फी बीस रुपये है, तो भारत के नक्शे को देखते हुए आप पाएँगे कि एकदम नीचे साउथ के कोर्ट में जानेपर यह फीस मात्र बीस रुपये ही ली जाती है। लेकिन महाराष्ट्र के ऊपर नार्थ की ओर बढ़ते जाने पर यही कोर्ट-फी सौ, दो सौ या फिर चार सौ भी वसूली जा सकती है-इस बात को मत भूलना आप लोग - कैसे अद्भुत कल्चरल डिफरेंस की बात को प्रोफेसर ने अचानक ही उस क्लास में इंगित कर दिया था। इस एक सत्यात्मक तथ्य को सभी भारतवासियों को अवश्य जानना चाहिए।
मैं गणेश एन्क्लेव की पहली मंजिल की बालकनी पर झुके हुए नीम के पेड़ की डालियों को देखती हूँ और मुझे सन् 2002 में रिल्के की कविताओं के अनुवाद का समय याद आता है... इस छोटे से मगर खुले-खुले फ्लैट में रेनर मारिया रिल्के की कविताओं के अनुवाद की पंक्तियाँ रची बसी हुई हैं, ड्राइंग रूम से लेकर टैरेस-बालकनी और बाहरी दीवार तक वह कविता-समय मानो चस्पां है। रिल्के की कविता ‘लेडी इन बालकनी’  का अनुवाद मैंने हिन्दी में यहीं टैरेस पर खड़े होकर किया था  ‘छज्जे पर खड़ी स्त्री’
पूरी कविता कुछ इस तरह थी- ‘छज्जे पर खड़ी स्त्री’
अचानक वह हवाओं के बीच से जैसे
निकलकर आती हुई दीख पड़ती है
कौंधों के बीच एक अकेली चमकती हुई कौंध
जबकि, अभी, कक्ष
जो उसके पीछे था
अब, दरवाजे के पीछे गुम
धुंधले उत्कीर्णित रत्नों की जमीं
जो किनारों पर दमक उठी है
और आप सोचते हैं कि उसके रेलिंग पर आने के पहले
शाम जैसे थी ही नहीं
तनिक आगे की ओर रखे गए हाथ पूर्णत: उज्ज्वलित
मानो स्वर्गिक घरों की पंक्तियों पर से गुजरती हुई सभी वस्तुओं के बीच दोलायमान।
नीम की, करंज की डालियाँ बालकनी पर झुकी-झुकी कविता-पँक्तियों को सुनने की कोशिश तब भी करतीं थीं, अब भी करतीं हैं। यह दिन अब बीतने वाला है।