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Saturday 25 Nov 2017

‘टूटी हुई जमीन’के बहाने : बरेली

 

हरदर्शन सहगल
5 ईजी ‘संवाद’ , डुप्लेक्स कॉलोनी
बीकानेर (राजस्थान) 33400
फोन- 0151-252906
बेशक लेखक ने कई पर्यटन स्थलों यथा नेपाल, धनुषकोडी, रामेश्वरम, मद्रास, कलकत्ता, जम्मू, उधमपुर, अजमेर, कोटद्वार आदि की जगहों की यात्राएं की हैं, जो अपने आप में अति सुन्दर, रमणीय, धार्मिक ऐतिहासिक स्थल है। लेकिन लेखक का व्यक्तिगत स्तर पर मानना है कि उक्त सभी शहरों, कस्बों से बढक़र हमारे हृदय में रचे-बसे वे पर्यटन स्थल हैं, जो हरदम हमारे व्यक्तित्व की रग-रग में समाए रहते हैं।
 कुछ मित्रों की मुझसे शिकायत है कि अतीत में बार-बार लौटने का मुझे कैसा रोग लगा है। मैं नहीं समझता कि कोई मनुष्य अपनी जड़ों की तलाश में न जाता हो। मेरे मन में बार-बार यही ध्वनि बजती रही कि कुंदिया, करोड़ लालीसन, लायलपुर, पेशावर, $िकला, शेखपुरा तो मैं जा नहीं सकता, बरेली तो जाया ही जा सकता है, जहां विभाजनोपरांत कई-कई जगहों से भटकते, धक्के खाते 1947 में छोटी-सी उम्र में पहुंचा था और होश संभाला था।
वापस बरेली पहुंचने की कुलबुलाहट उपन्यास ‘टूटी हुई जमीन’ लिखने के दौरान, मुझे बराबर होती रही थी, जिसे (इस भावना को) अधिक तीव्र किया था श्रीमती रश्मि श्रीवास्तव ने और लेखक मित्र रतन श्रीवास्तव ने। दोनों पति-पत्नी बरेली से स्थानांतरित होकर बीकानेर आए थे। उनके साथ घंटों, बरेली-वार्तालाप होता रहता। बरेली कॉलेज। बरेली स्कूल। बरेली के मुहल्ले। बरेली की गलियां, बाजार, सिनेमा। मोटे तौर पर यह सब किसी भी शहर की मामूली चीजेँ होती हैं। लेकिन जहां पर आपने होश संभाला हो। जहां आपके छोटी उम्र के दोस्त रहे हों। मास्टरों, प्रोफेसरों, चाचा-चााचियों मौसियों की शक्लें आपके विभाग में कौंधती हो। गलियों, पार्कों, मंदिरों, में आपके खून ने लय पकड़ी हो;  पसीना बहा  हो, मैं वहां के पाकड़, इमली, जंगल जलेबी के पेड़ों को वापस पा लेना चाहता था। सो, श्रीवास्तव दंपति के साथ बरेली जा पहुंचा।
जैसे कोई पुनर्जन्म में विचरता है। यहां यह था। हां। यह जगह ऐसी थी। विक्टोरिया रेलवे स्कूल, बड़ी दीवारों, इमारतों से ढंक गया है। बीच में विक्टोरिया महारानी उठकर चली गई हैं। वहां हायर सेकेेंडरी आ बसा है। कुछ था, कुछ है। कुछ  बदला-बदला। कल्लू हलवाई कहां चला गया। राजेश शर्मा- नया समीक्षक, मधुरेश जी का शिष्य- मुझे प्रो. रामेश्वर दयालु अग्रवाल के मकान, कटरा मान राय ले गए। मैं प्रो. साहब का प्रिय शिष्य था। उनके जीवन के अंतिम दिनों तक उनसे मेरठ के पते पर पत्राचार चलता रहा था। मुझे पता था, अब वे न तो बरेली में थे, न मेरठ में, किन्तु उनकी स्मृति रोम-रोम में बसी हुई थी। मकान के सामने चंद लम्हे, खड़ा रहना चाहता था, लेकिन अब वहां खण्डहर था। जानकारी देने वाले अजनबी, हर कहीं मेरे साथ भावुक होते रहे। चाय पी लेने का इसरार करते रहे। बाजारों को नाप आया। शायद झुमका ढूंढ रहा था।
सुभाष नगर के मोड़ पर आते ही कौल नामक खूबसूरत गोरा सहपाठी स्मृति में कौंध गया। आसपास के लोग बड़े अदब से बता रहे थे- हां कौल साहब यहीं रहते हैं। कमिश्नर के पद से रिटायर हुए हैं। आश्चर्य यह कि विजय कुमार कौल पचास वर्ष बाद फौरन मुझे पहचान गए और कितनी ही देर तक गले लगाए रखा। हम बचपन की, स्कूल की घटनाओं, स्थितियों और दूसरे सहपाठियों में लौटते-खोते रहे। राजकुमार उसकी बहन राजकुमारी, भूत, चीनू, मंगलू, चपरासी के चित्र उभरते रहे। श्रीमती कौल भी हमारी अंतर्गता से भावुक होकर खिलाती पिलाती रहीं।
ऐसी कुछ और बातें  कुछ और यादें...। उपभोक्तावाद युग में, यदि ऐसा कुछ आप पा लेते हैं, तो यह बड़ा ‘हासिल’ है। लगता है, कुछ बचा है। बरेली जाने का एक दूसरा कारण मधुरेश जी भी थे। मालूम हुआ था कि आज के ख्याति प्राप्त समालोचक मधुरेश जी ने भी बरेली कॉलेज में उसी वर्ष प्रवेश लिया था, जिस वर्ष मैंने। लम्बे पत्राचार के माध्यम से आत्मीयता बढ़ चली थी। उनका भी आग्रह था कि कभी आओ तो पुराने रास्तों की तलाश की जाए। रात बरेली पहुंचते ही मैंने मधुरेश जी को फोन किया कि मैं अपने पुराने शहर से बोल रहा  हूं...। शब्द उत्साह से भरपूर थे।
दूसरे रोज रतन श्रीवास्तव के साथ जाकर उनसे मुलाकात की। एक बार और भी मिला। खूब-खूब बातें हुईं। लेकिन पुराने रास्ते तलाश करने वे मेरे साथ नहीं जा पाए (वे तो वहीं करते हैं)।
ऐसे ही कुछ और परिचितों, पुराने गली कूचों से नई ऊर्जा लेकर बीकानेर लौटा हूं। भावुकता छाई है।
रगों में (ही) दौड़ते-फिरने के हम नहीं कायल
जब आंख ही से न टपका, तो फिर लहू क्या है।
इसी क्रम में पिछले वर्ष सादतपुर भी हो आया था, जहां मेरी प्रथम नियुक्ति हुई थी।