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Monday 20 Nov 2017

अक्षर पर्व का यह उत्सव अंक यात्रा वृत्तांत पर केन्द्रित है, इसका मुझे निज संतोष है।

ललित सुरजन
अक्षर पर्व का यह उत्सव अंक यात्रा वृत्तांत पर केन्द्रित है, इसका मुझे निज संतोष है। देशबन्धु की रचना वार्षिकी के बतौर पर अक्षर पर्व का प्रकाशन होने के तीसरे ही साल इसने जब मासिक पत्रिका का रूप लिया तब से हमारी कोशिश रही है कि साहित्य की प्रचलित विधाओं याने कहानी, कविता, उपन्यास के अलावा यात्रा वृत्तांत, संस्मरण, डायरी व निबंध आदि को भी प्रोत्साहित किया जाए। यह प्रसन्नता का विषय है कि विगत वर्षों में यात्रा वृत्तांतों को साहित्यिक पत्रिकाओं में पर्याप्त स्थान मिल रहा है। हमारे जाने-माने लेखकों ने भी इस विधा की तरफ खासी दिलचस्पी दिखाई है और यात्रा साहित्य को समृद्ध किया है। फौरी तौर पर मुझे असगर वजाहत, पुरुषोत्तम अग्रवाल और विनोद साव के नाम याद आ रहे हैं।
दुनिया सिकुड़ती जा रही है, विश्वग्राम या ग्लोबल विलेज में तब्दील हो रही है ऐसे जुमले इन दिनों अक्सर सुनाई पड़ती है। संचार साधनों एवं प्रौद्योगिकी में अन्य मोर्चों पर हो रही प्रगति के साथ ऐसा होना अवश्यंभावी था। इस नए वातावरण में देश और दुनिया के लोग पहले के मुकाबले कहीं अधिक यात्राएं कर रहे हैं। जिनके पास आमदनी के पर्याप्त और सतत स्रोत हैं वे तो तीन डग में पृथ्वी नाप लेते हैं। लेकिन इन यात्रियों में अधिकतर उपभोक्ता होते हैं पर्यटक नहीं। इन्हें फोटो खींचने और हाल के दिनों में सेल्फी लेने का शौक तो होता है, लेकिन अपने अनुभवों को शब्दों में बांधने में इन्हें कोई दिलचस्पी नहीं होती। यात्राओं के उद्देश्य बहुतेरे हैं और प्रकार भी उतने ही, लेकिन घर से बाहर कदम रखने से पहले अमूमन हर पर्यटक यात्रा में सुख-सुविधा के प्रति निश्चिंत हो लेना चाहता है।
आज से चौदह सौ साल पहले जब चीनी यात्री शुआन जान (पूर्व प्रचलित नाम- ह्येन सांग) भारत यात्रा पर आया था या उसके बाद फा शियान (फाहियान) उस वक्त ऐसी सुविधाएं कहां थीं? क्या इन्होंने कभी सोचा था कि यात्रा में क्या अड़चनें आएंगी और आराम कहां मिलेगा? शताब्दियों से हर विश्वयात्री सिर्फ अपने दुस्साहस तथा नई जगह देखने व नई बातें सीखने की ललक के कारण ही यात्रा पर निकल सका था। विवेकानंद, गांधी और नेहरू ने भी देशाटन में सुख-सुविधाओं का ख्याल कब रखा था? मार्क ट्वेन भारत आए या अलेक्स द ताकविले अमेरिका यात्रा पर गए अथवा चाल्र्स डार्विन ने सुदूर द्वीपों की यात्रा की तो इनके सामने क्या लक्ष्य था? उन्होंने यात्राओं में जो देखा और पाया उसे अपनी लेखनी के माध्यम से समाज के सामने रख दिया कि आने वाली पीढिय़ां कुछ सीख सकें। आज स्थिति बदली है तो यह नवपूंजीवाद के दौर में विकसित विश्वग्राम की विडंबना ही मानी जाएगी।
इस बार की प्रस्तावना बस इतनी। आगे के पृष्ठों में मेरे द्वारा लिखित एक यात्रा वृत्तांत आप पढ़ेंगे। इससे अधिक स्थान मुझे नहीं लेना चाहिए। आप यायावर बनें, उसके रोमांच को महसूस करें, इसी शुभकामना के साथ।