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Saturday 25 Nov 2017

आपने अक्षर पर्व को जो संस्कार दिए, जो सौंदर्य दिया, जो व्यवस्था दी उसके लिए आपकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है।

अरविंद अवस्थी, मिरजापुर
आपने अक्षर पर्व को जो संस्कार दिए, जो सौंदर्य दिया, जो व्यवस्था दी उसके लिए आपकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। प्रस्तावना में ललित सुरजन का चिंतन बहुआयामी होता है। प्रासंगिक और ज्ञानवर्धक भी। अप्रैल 2016 के अंक में ‘नीरजा’ फिल्म पर उनकी विवेचना अद्भुत है। गणेशचंद्र राही की कविता ‘अस्सी चुटकी नब्बे ताल’ जनसरोकार का प्रत्यक्षीकरण है। एकता का बेमिसाल उदाहरण है। बड़ी गहराई तक कवि ने प्रवेश किया है। के.पी. सक्सेना ‘दूसरे’ की कहानी ‘किस मुंह से’ आज के ग्रामीण परिवारों का यथार्थ बयां करती है। शहरों में सब अपने-अपने हो जाते हैं किन्तु गांव के बाहर से एकता और अंदर बिखराव होता है। छोटा भाई मझले का पैसा चुराकर ही सही बाप को अस्पताल तो ले जाता है। ‘लॉटरी’ कहानी गांव वालों की लालची प्रवृत्ति को उजागर करती है। हालांकि गांव में सब ऐसे नहीं होते। ‘भारत माता की जय’ बोलने के विवाद पर आपकी टिप्पणी माकूल है।