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Tuesday 21 Nov 2017

अक्षर पर्व अप्रैल-16 अंक मिला। ललित सुरजन की प्रस्तावना में नीरजा फिल्म के निमित्त से ऐसी तमाम फिल्मों का बेहतरनी आकलन उन्होंने कर दिया निश्चय ही उनकी हर प्रस्तावना में श्रम व अध्ययन टपकता है।

हितेश व्यास, 6-ए/705, कल्पतरू सेरेनिटी
नवरत्न मंगल कार्यालय के सामने, महादेव नगर, मांजरी-पुणे-412307 (महाराष्ट्र), मो. 09730987500, 09460853736
अक्षर पर्व अप्रैल-16 अंक मिला। ललित सुरजन की प्रस्तावना में नीरजा फिल्म के निमित्त से ऐसी तमाम फिल्मों का बेहतरनी आकलन उन्होंने कर दिया निश्चय ही उनकी हर प्रस्तावना में श्रम व अध्ययन टपकता है। महेन्द्र राजा जैन का लंबा पत्र उनकी प्रस्तावना की प्रतिक्रिया में ही है। वर्धा के निरर्थक कोष पर यह सार्थक पत्र है। पत्र में उतना श्रम व अध्ययन है जितना ललित सुरजन की प्रस्तावना में रहता है। अंक की सभी कहानियां साधारण लगीं, बल्कि मन में एक विचार आया कि अक्षर पर्व को पढ़ा तो जाए पर उसकी कहानियां नहीं। बरखा ने अजीजुन निसा पर लिखकर एक अल्पज्ञात पृष्ठ को कोलकर इतिहास की झलक दिखलाई है। भावना मासीवाल का जाति प्रथा पर शोधालेख परिश्रम व प्रतिभा का संगम है। डॉ. जीवन सिंह से डॉ. शिबन कृष्णा रैणा ने जो बातचीत की है वह जीवन सिंह के उत्तरों से एक संपूर्णता का आकार पा र्गि है। प्रेमशंकर रघुवंशी की स्मृति में सारंग उपाध्याय का स्मरण अकादमिक से ज्यादा आत्मीयता लिए हुए हैं। पुन:पाठ में बसंत त्रिपाठी की कहानी ‘फंदा’ किसानों की आत्महत्या का बहुराष्ट्रीय पाठ है। डॉ. पल्लव का विवेचन कोई अंतिम वचन नहीं है, इसकी अनन्त संभावनाएं हैं, सर्वमित्रा सुरजन का भारत माता की जय पर उपसंहार साहसिक और प्रगतिशील है।