Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

रचना वार्षिकी में अधिकांश पढ़े का सार है कि कुछ लोग माक्र्सवाद को इसलिए बुरा मानते हैं

निशांत, पीलीबंगा, मो. 8104473191

रचना वार्षिकी में अधिकांश पढ़े का सार है कि कुछ लोग माक्र्सवाद को इसलिए बुरा मानते हैं कि यह भारतीय जनता के विश्वासों के अनुकूल नहीं है। इनको मानना चाहिए कि जैसे धर्म में सब अच्छा नहीं है वैसे ही माक्र्सवाद या वास्तविकता में सब बुरा नहीं है। माक्र्सवाद में धर्म को न मानते हुए भी मानवीय मूल्यों की रक्षा की जाती है। यह धर्म से इस मायने में भी बेहतर है कि यह किसी ढोंग को नहीं मानता। किसी झूठ के आगे हाथ जोडऩे से तनकर रहना (आत्मसम्मान से रहना) कितना बेहतर है।  श्रीकृष्ण ने तो गीता में भी कहा है कि नास्तिक वही नहीं ंहै जो मुझमें विश्वास नहीं करता। नास्तिक वह भी है जिसे स्वयं पर विश्वास नहीं है। हजारों वर्ष हो गए धर्म से कुछ नहीं हुआ। प्रेमचंद ने भी कहा था- पित्याये हुए को पित्याना मूर्खता है। जब तक संसार धर्म नहीं छोड़ेगा उसे आतंकवाद नहीं छोड़ेगा।