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Monday 20 Nov 2017

साहित्य और विचार की बोली

सर्वमित्रा सुरजन
देश के चर्चित विद्वान और राज्यसभा के माननीय सांसद सुभाष चंद्रा ने 14 सितंबर, हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी की वर्तमान स्थिति : चुनौतियां एवं समाधान विषय पर साहित्य अकादमी में बतौर मुख्य वक्ता अपने विचार प्रस्तुत किए। इस सूचना ने चौंकाया नहीं, बल्कि निराशा की लकीर थोड़ी और लंबी कर दिया कि अब और क्या-क्या देखना बाकी है, अब और कैसे दिन आने वाले हैं। याद करें कि 12 मार्च 1954 को साहित्य अकादमी की स्थापना की गई थी, उद्देश्य था भारतीय साहित्य का विकास करना तथा उसके स्तर को ऊंचा करना, सभी भारतीय भाषाओं में साहित्य को परिपोषित करना तथा उनमें समन्वय स्थापित करके देश में सांस्कृतिक एकता स्थापित करना। यह एक स्वायत्त संस्था के रूप में स्थापित की गई थी बावजूद इसके कि अकादमी के लिए धन की व्यवस्था भारत सरकार का संस्कृति विभाग करता है। किसी भी संस्था में जब वित्तीय सहयोग सरकार का रहता है, तो थोड़ी बहुत दखलंदाजी, लाभालाभ का गणित, नियुक्तियों में मनपसंद लोगों को तरजीह देना, यह सब होता ही है। इसमें नैतिकता के उच्च मापदंडों की अपेक्षा करना, खुद को मूर्ख बनाना है। साहित्य अकादमी में भी कुछ वर्षों पहले तक ऐसा होता रहा है, लेकिन अब जो हो रहा है, उससे उसके उद्देश्यों पर बड़ा सा प्रश्नचिह्नï लग गया है। साहित्य समाज का दर्पण होता है, और साहित्य अकादमी के बड़े से दर्पण में समाज की वैचारिक दरिद्रता के दर्शन आसानी से किए जा सकते हैं। हिंदी वर्तमान में जिस स्थिति पर पहुंची है, उसकी चुनौतियां क्या हैं और समाधान किस तरह हो सकता है, इसका चिंतन न जाने कितने वर्षों से लगातार हो रहा है और हिंदी दिवस के आते-आते तो इस चिंतन की सघनता कुछ और बढ़ जाती है। यह बात और है कि चिंतन की ईमानदारी वर्ष दर वर्ष घट रही है, जबकि इस आयोजन से प्रकारांतर जितने लाभ सध सकते हों, साधे जा रहे हैं। हिंदी दिवस पखवाड़े में तब्दील हो गया और माह में भी, और इसके साथ ही हिंदी की दुर्दशा भी दुगुनी, चौगुनी हो गई। आलम यह है कि बच्चे को हिंदी पढऩे-लिखने में मुश्किल हो तो अधिकतर मां-बाप के लिए यह गर्व से बताने वाली बात हो जाती है। हिंदी केवल उनके लिए काम की भाषा रह गई है, जिनकी स्वार्थसिद्धि इससे होती है। टीवी चैनल, फिल्में, विज्ञापन इन सबका काम, इनमें निवेश करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों का काम हिंदुस्तान में हिंदी के बिना नहींचल सकता, भारत के बाजार से हिंदी गायब नहींहो सकती, तो हिंदी का महत्त्व इन लोगों के लिए बना हुआ है। इस बाजार का साहित्य से कोई लेना-देना नहीं, हां अगर जयपुर जैसा साहित्य उत्सव करना हो तो अलग बात है। तो क्या अब साहित्य अकादमी भी उसी राह पर चल पड़ी है। सुभाष चंद्रा आज देश के बड़े उद्योगपतियों में और प्रधानमंत्री के करीबियों में से एक हैं। हाल ही में वे राज्यसभा सांसद भी बन गए। उसके पहले वे जी इंटरटेनमेंट इंटरप्राइजेज लिमिटेड के अध्यक्ष और एस्सेल समूह कंपनियों के मालिक भी हैं। भारत में सेटेलाइट टीवी में जी टीवी के पदार्पण से ही नए युग की शुरुआत भी मानी जा सकती है। अपने टीवी चैनल के माध्यम से वे युवाओं को सफल कैसे बनें, जैसे उपदेश भी बखूबी देते हैं। उनकी आत्मकथा का दो बार विमोचन भी हो चुका है, एक बार प्रधानमंत्री निवास पर नरेन्द्र मोदी के हाथों और दूसरी बार जयपुर लिटररी फेस्टिवल में। वे मल्टीमीडिया तालीम (ट्रांसनेशनल अल्टेरनेट लर्निंग फॉर एमैन्सिपेशन एंड एम्पावरमेंट थ्रू मल्टीमीडिया), चंद्रा ग्लोब विपाश्ना फाउंडेशन, सिविलाइज्ड हारमोनी और एकल विद्यालय जैसे संगठन भी चलाते हैं, जो सामाजिक, शैक्षणिक कार्यों में संलग्न हैं। पिछले कुछ समय से उन्हें भारत का मीडिया मुगल कहा जाने लगा है। बेशक ये सब उनकी व्यावसायिक कुशलता से प्राप्त सफलताएं हैं, लेकिन इससे वे देश के चर्चित विद्वान कैसे हो गए? उन्हें चर्चित उद्योगपति कहा जा सकता है और इस नाते एसोचैम, फिक्की या अन्य व्यापारिक संस्थाओं में मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया जा सकता है। लेकिन हिंदी की वर्तमान स्थिति, चुनौतियों और समाधान पर विचार रखने के लिए क्या देश में उनके अलावा कोई विद्वान नहींबचा? साहित्य अकादमी को क्या देश में बुद्धिजीवियों का अकाल नजर आ रहा है? मान लिया कि देश में रचनाकार कई पंथों और वादों में बंटे हुए हैं, लेकिन निष्पक्ष विचार रखने वालों की भी कमी नहींहै। यूं तो गोविंद पानसरे और कलबुर्गी जैसे लेखकों की हत्या के बाद, पुरस्कार वापसी सिलसिले के वक्त साहित्य अकादमी ने जिस तरह का मौन धारण किया था, उसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता तभी स्पषट हो रही थी, लेकिन अब इस प्रतिबद्धता पर भी संशय हो रहा है। सत्ता से नजदीकी रखने वाले या वामपंथ के उलट जाने वाले भी कई रचनाकार देश में हैं और जनता के बीच सम्मान्य भी। वे हिंदी के सच्चे हिमायती भी हैं और उसकी दशा सुधारने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव भी दे सकते हैं। साहित्य अकादमी ने ऐसे किसी लेखक को क्यों नहींचुना? क्या इसलिए इस बार हिंदी दिवस के उसके आयोजन में सुभाष चंद्रा की जी कंपनी प्रायोजक थी। केेंद्र सरकार का वित्तीय सहयोग क्या साहित्य अकादमी को कम पड़ रहा है, जो निजी घरानों के प्रायोजन की जरूरत उसे पड़े गई। जिस तरह सबसे ज्यादा चंदा देने वाले को पहले आरती करने या फीता काटने का मौका मिलता है, क्या वही चलन साहित्य अकादमी में भी अब चलेगा? साहित्य और विचारों की बोली जब देश में लगने लगेगी तो तय जानिए आईने के चूर-चूर होने में वक्त नहींलगेगा।