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Tuesday 21 Nov 2017

कवि रामकृष्ण श्रीवास्तव, जिनके निधन पर शहर उमड़ पड़ा

डॉ. रामप्रकाश
10, ब ड्यूप्लेक्स, वर्धमान
सोसायटी, राजपूतपुरा, अकोला-444001 (महाराष्ट्र)


बहुतेरी अंतिम यात्राएं लोगों ने देखी होंगी पर किसी साहित्यकार की अंतिम यात्रा में सैलाब उमड़ पड़ा हो। सैकड़ों पर जन-सागर उतर आया हो, ऐसा देखने में केवल एक बार आया था, जब अकोला में स्व. रामकृष्ण श्रीवास्तव की अंतिम यात्रा निकली थी। छोटे से छोटे आदमी से लेकर बड़ा से बड़ा व्यक्ति उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित करने पहुंचा। कितनों को नसीब होती है ऐसी मृत्यु? बहुत कम, एकाध को। यह दिन था 29 सितंबर 1967। श्रीवास्तव जी महाराष्ट्र के अकोला जिले के सीताबाई कला महाविद्यालय के प्राचार्य थे। कुर्सी पर बैठे-बैठे ही वे दिवंगत हो गए। उनके निधन का समाचार जिसने भी सुना सन्न रह गया। उनका जन्म 4.10.1926 को जबलपुर में हुआ। भोपाल, नागपुर के बाद वे अकोला में प्राध्यापक के रूप में आए, फिर प्राचार्य बने। 41 वर्ष की अवस्था में उनका असामयिक निधन हो गया। इतनी कम आयु में किसी अन्य शहर से आया व्यक्ति इतना लोकप्रिय हो ेगया हो, ऐसा देखने में कम ही आता है। वे अकोला में केवल ग्यारह वर्ष रहे। इस बीच वे इतने लोकप्रिय हुए कि उनकी ख्याति किसी भी सांसद या मंत्री से अधिक थी। उन्होंने हिन्दी और मराठी भाषी जनता के बीच एक पुल के रूप में कार्य किया था। चाय और सब्जी बेचने वालों से लेकर बंगले में रहने वाले उनके मुरीद हो गए। वे कवि, समीक्षक, प्राध्यापक, प्राचार्य, पत्रकार रहे। अकोला के उनके कार्यकाल में जाने कितने कवि सम्मेलन हुए। उस समय देश का बड़े से बड़ा कवि भी अकोला में शिरकत किए बिना नहीं रहा। वे सबके थे, सब उनके थे। वे सच्चे कवि थे। स्वाभिमानी। जैसा उनका जीवन था वैसा ही उनका कृतित्व भी। साहित्यकार कैसा होना चाहिए, उनकी निम्नलिखित पंक्तियां देखिए-
जो कलम सरीखे टूट गए, पर झुके नहीं,
उनके आगे यह दुनिया शीश झुकाती है
जो कलम किसी कीमत पर बेची नहीं गई
वह तो मशाल की तरह उठाई जाती है।

आज साहित्य जगत में पुरस्कारों की जुगत लगाई जाती है। साहित्यकार खेमों में बंटे हैं। सरकारी सुविधाएं उठाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार साहित्यकारों को रामकृष्ण श्रीवास्तव की इन पंक्तियों से प्रेरणा लेनी चाहिए। साहित्यकार क्या होता है क्या होना चाहिए, इस पर यदि कोई लेख या उपन्यास भी लिख ले, तो भी ये चार पंक्तियां उस पर भारी पड़ेंगी। एक सामथ्र्यवान, समर्थ कवि के रूप में प्रस्थापित करने के लिए ये पंक्तियां ही पर्याप्त हैं। श्रीवास्तव जी का केवल एक काव्य-संग्रह छपा, ‘चट्टान की आंखें’ इस संग्रह की रचना ‘सीढ़ी का पत्थर’ उत्कृष्टतम रचनाओं में से एक है। इस रचना के बारे में हरिशंकर परसाई जी ने लिखा है-
‘‘रामकृष्ण ने और मैंने लगभग एक साथ लिखना शुरू किया था। यह संयोग की बात थी कि जब ‘रामा’ की पहली कविता ‘प्रहरी’ के दफ्तर में पहुंची, तब मैं वहीं बैठा था। तिवारी जी (भवानीप्रसाद तिवारी प्रहरी के संपादक) ने ‘सीढ़ी का पत्थर’ कविता पढक़र सुनाई और हम चौंक उठे कि किस सशक्त प्रतिभा ने जन्म लिया है। रामा की खोज हुई और वे मंडली में शामिल हो गए।’’
रामकृष्ण श्रीवास्तव हिन्दी काव्य-जगत में एक तूफान की तरह आए। उनके काव्य में कोमलता है तो आक्रोश भी है। उनका एक-एक शब्द शोले की तरह है। उनमें रूमान और कठोर वास्तविकता एक साथ थी। उनकी कविताएं स्वयं में एक आंदोलन  भी हैं। अपनी कविताओं के बारे में कवि ने स्वयं कहा है- ‘‘मेरी कविता रामायण, महाभारत की अपहृत कथाओं की क्लासिक जूठन नहीं है। मेरी कविता प्रबुद्ध अनुसंधित्सु पाठकों की वैज्ञानिक फसल है। शोषितों की छाती कवच... अक्षत यौवना, ज्ञान-रत्नमयी दिशाओं की पौरुष विस्फोटक अंगड़ाई है।’’
श्रीवास्तव जी ने संघर्षों की कठोर छाती को चीरकर अपने कवि को आकारित किया है। देखिए-
ईंट और चूने की तरह सख्त
परिस्थितियों की समाधि में
चुना गया मैं
चुप नहीं बैठा हूं,
फूट रहा हूं

पीपल की कत्थई कोंपल की तरह।
एक सफल कवि वह होता है जिसकी रचनाएं कालबाह्य नहीं होती अर्थात् समय के साथ पुरानी नहीं होती अपितु जैसे-जैसे समय बीतता है वे और अधिक प्रासंगिक हो जाती हैं। कबीर अपने समय में उतने प्रासंगिक नहीं रहे होंगे जितने आज हैं। श्रीवास्तव जी भी इसी तरह के कवि हैं। उनकी ‘मठाधीश’ नामक कविता से यह बात सिद्ध हो जाती है।
तुम उगो
मैं सींच रहा हूं
किन्तु मठे से!
याद रहे
मैं मठाधीश हूं।

श्रीवास्तव जी ने छन्दबद्ध और मुक्तछन्द दोनों रूपों में कविताएं लिखी हैं। उन्होंने स्वयं कहा है कि उनकी अभिव्यक्ति को तुक और लय की बैसाखियों की जरूरत नहीं है। यथार्थवादी रचनाकार का आक्रोश छंदों में बंधा नहीं रह सकता, यह सत्य है पर दोनों रूपों में वे सफल कवि रहे हैं। वे एक लब्ध प्रतिष्ठ गीतकार रहे हैं। उनकी जिस रचना का जिक्र परसाई जी ने किया है वह गीत ही है। श्रीवास्तव जी की वह प्रथम रचना है जो 21 नवम्बर 1948 को प्रहरी में प्रकाशित हुई। पूरा गीत यहां संभव नहीं है पर इसके दो छन्द यहां दे रहा हूं-
जिस पत्थर से देव बने तुम मैं उस पत्थर का टुकड़ा हूं।
मेरी छाती पर चढक़र दुनिया पैरों की धूल झराती
लोट तुम्हारे चरणों में आंसू से भीगे फूल चढ़ाती
आंख मूंदकर मानव की परवशता  गीत तुम्हारे गाती
मंदिर के आगे मेरी ममता अपना मुंह खोल न पाती
कंधों पर लेकर वैभव की सत्ता मैं चुपचाप खड़ा हूं।
त्याग असुन्दरता अपनापन तुम चाहे जितने सुन्दर हो।
अरे अनश्वरता के अभिनेता आखिर तुम भी नश्वर हो।
बाहर से मैं जो कुछ हूं, तुम छुपे हुए अपने भीतर हो,
मैं पत्थर का पत्थर हूं, पर तुम पत्थर के आडम्बर हो
विद्रोही बनकर मैं कितनी बार सीढिय़ों से उखड़ा हूं।
जिस पत्थर से देव बने तुम, मैं उस पत्थर का टुकड़ा हूं।

अप्रैल 1967 में श्रीवास्तव जी ने अपने जीवन की अंतिम रचना  ‘यात्राएं कभी नहीं मरतीं’ लिखी। इस रचना को पढक़र सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इसमें मुक्तिबोध की छाप है। यह सही है कि उनकी यात्रा अधूरी रह गई परन्तु कुछ यात्राएं अधूरी रहकर भी महत्वपूर्ण होती है-
उत्तरदायित्वों से हटा हुआ मैं
मुझमें जो जन्मी या मुझ पर से होकर गुजरी
यात्राओं से कटा हुआ मैं अयात्री
अकेलेपन से अभिशप्त रहा
मैंने यात्राओं से हमेशा कहा- ठहरो!
यात्राएं कभी नहीं ठहरती।
यात्राएं कभी नहीं मरती।

साहित्यकार की जीवन यात्रा के साथ-साथ उसकी सृजन-यात्रा भी निरंतर उत्कृष्टता की ओर गतिशील रहती है। किसी भी कवि की प्राथमिक रचनाओं में वह प्रगल्भता नहीं आती जो परिपक्वता की अवस्था में होती है पर रामकृष्ण श्रीवास्तव इसके अपवाद रहे है। उनकी पहली रचना ही इतनी सशक्त है कि यदि वे केवल एक ही कविता लिखते तो भी उन्हें बड़ा कवि कहने में कठिनाई नहीं होती। उनकी जनवादिता की प्रतिबद्धता, कर्मठता, संघर्षशीलता को नमन।