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Sunday 19 Nov 2017

सिनेमा का जीवन,सिनेमा का जादू

जयशंकर
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(ह)म अपनी बात इस सवाल से भी शुरू कर सकते हैं कि हम सब सिनेमा देखने क्यों जाते हैं? हम सभी के उत्तर अलग-अलग होंगे लेकिन इन उत्तरों में जो एक बात समान होगी। जो एक बात कॉमन होगी कि ‘‘हम अपने मनोरंजन के लिए जाते हैं।’’ मन को रंजित करने के लिए। उसी तरह जैसे हम किताबें पढ़ते हैं। संगीत सुनते हैं। चित्र और नाटक देखते हैं। खेल और सर्कस, नृत्य, रामलीला और कुश्तियां देखते हैं। पर एक अच्छी फिल्म सिर्फ आपका मनोरंजन ही नहीं करना चाहती। वह इससे कुछ आगे जाना चाहती है। वह आदमी के बारे में, आदमी की दुनिया के बारे में आपसे कुछ कहना चाहती है। वह आदमी के इतिहास से टकराती है। वह आदमी के स्वप्नों और स्मृतियों से खेलती हैं। वह हमारी-तुम्हारी दुनिया के बीच से, अपनी और सिर्फ अपनी दुनिया बनाती है। कोई भी अच्छी फिल्म हमारे लिए क्या क्या करती है? एक अच्छी फिल्म बहुत कम समय में, हमें एक बड़ी गहरी और सच्ची दुनिया से जोड़ती है। जिस उपन्यास को पढऩे में हमें दो-तीन दिन लग सकते थे, उस उपन्यास के अनुभवों को वह फिल्म डेढ़-दो घंटों में हमारे सामने खड़ा करती है। दोस्तोएव्स्की के प्रसिद्ध उपन्यास ‘‘अपराध और दण्ड’’ पर बनी फिल्म, बोरिस पास्तरनाक के उपन्यास डॉ. जिवागो पर बार-बार बना सिनेमा हमारी इस बात के उदाहरण हो सकते हैं। सिनेमा के लिए कहा जाता है कि वह अपने जन्म के समय ही कपड़े पहने हुए था। अन्य कलाओं से एकदम अलग-थलग। अपने पैदा होने के समय ही उसने नाटक, साहित्य, संगीत और स्थापत्य से मिलकर बने हुए कपड़े पहने हुए थे। यह सिनेमा के लिए वरदान रहा तो अभिशाप भी। धीरे-धीरे सिनेमा स्वयं को साहित्य और अन्य कलाओं से मुक्त करता चला आया। उसने खुद को संवादों, संगीत, नृत्य और नाटक से अलग करते रहने का संघर्ष जारी रखा। धीरे-धीरे अन्य कलाओं पर उसका आश्रित बने रहना कम होता गया। दूसरे महायुद्ध के बाद का सिनेमा अपने आप में स्वतंत्र, स्वायत्त सिनेमा हो गया था। सिनेमा की अपनी भाषा गढ़ी जा चुकी थी। वह निर्देशक का माध्यम होने लगा था। अब सिनेमा की पहचान उसके निर्देशक से होने लगी थी। हर अच्छी फिल्म में निर्देशक की अपनी छाप (सिग्नेचर) होती। कुछ ही दृश्यों में समझ में आ जाता कि फिल्म निर्देशन चैपलिन कर रहे हैं या हिचकॉक, वह कुरोसावा की फिल्म है या फेलिनी की। उसे त्रुफो ने बनाया है या गोदार ने। पर इसके साथ-साथ ऐसा भी सिनेमा पनप ही रहा था जो अपनी सफलता के लिए, अपनी अभिव्यक्ति के लिए संगीत, नृत्य और अभिनय पर बहुत ज्यादा आश्रित रहता आया था। भारत में बन रही कितनी ही फिल्में, अपने बेमिसाल गानों से, तरह-तरह के नृत्यों से, अभिनेता, अभिनेत्री की अभिनय क्षमता से सिल्वर जुबली मनाया करती थी। हॉलीवुड का सिनेमा, बम्बइया सिनेमा, हमारे अपने ही देश में, दक्षिण और बंगाल में हिट होती फिल्में ऐसी ही अन्य कलाओं का बड़ा सहारा लिए हुए धूमधाम से चलती थी। फिल्मों का जनता के बीच इतना ज्यादा लोकािप्रय हो जाना, उसका इतने बड़े स्तर पर जन माध्यम बनना भी धीरे-धीरे संभव हो सका था। सिनेमा के इतिहास और विकास में ऐसे दौर भी आए थे जब कि वैन में प्रोजेक्टर, सिनेमा की रील्स और परदा लिए हुए, गांव-दर-गांव भटकना पड़ता था। खुली जगहों में परदा लगाकर फिल्म के प्रदर्शन हुआ करते थे। लोग अपने-अपने घरों से कुर्सियां, चटाइयां और शतरंजिया लिए हुए सिनेमा के प्रदर्शन की जगह पर एकत्र हुआ करते थे। विज्ञान और कला का यह जादू लोगों को छूने लगा था। परदे पर जीवन अपनी संपूर्णता में नजर आता। आदमी जो और जैसा जीवन जी रहा होता, उसे परदे पर ठीक वैसा ही देख पाता। एक समय के लोगों के लिए सिनेमा किसी बहुत बड़े चमत्कार से कम नहीं रहा था। एक तरफ सामान्य जन अपने मनोरंजन के लिए सिनेमा की तरफ आकर्षित होता चला जा रहा था। दूसरी तरफ पढ़े-लिखे, सोचने-समझने वाले लोगों के मन में आता था कि जिस काम को सफलता से करने में आधुनिक साहित्य को पांच सौ से भी ज्यादा बरस लगे थे। उसी काम को सिनेमा अपनी सौ बरस की उम्र में करने में समर्थ हो चला था। डेढ़ दो घंटों की फिल्म में एक आदमी का समूचा जीवन, उसका पड़ोस और परिवेश, उसकी जन्म से मृत्यु तक की पूरी गाथा नजर आ जाती थी।
फिल्म के इतिहास में सिनेमाघर बहुत बाद में आए। बरसों तक सिनेमा लोगों के पास जाता रहा। बहुत बाद में यह हुआ कि लोग सिनेमा के पास जाने लगे। इधर के बरसों में कुछ देशों में, कुछ ऐसी भी फिल्में बनी हैं जिनसे हमें सिनेमा के अपने संघर्ष का, सिनेमा के विकास के लिए कुछ लोगों के आवेग का, सिनेमा के लिए आदर-अनुराग का पता चलता है। हमारे देश में भी सिनेमा बीसवीं सदी के दूसरे दशक तक आते-आते बनने लगा था। पहले-पहले मूक फिल्में आई और फिर बोलती फिल्में। कलकत्ता, बम्बई और मुद्रास में फिल्में बन रही थी और देश के विभिन्न इलाकों के लोग, कलाकारों की हैसियत से इन महानगरों में बसने लगे थे। नौकरी करने लगे थे। तब भारत का विभाजन नहीं हुआ था और लाहौर भी सिनेमा-संगीत-कला का एक बड़ा केन्द्र था। भारतीय सिनेमा को विश्व स्तर के सिनेमा के साथ खड़ा करने में, सत्यजीत राय की पहली फिल्म ‘पथेर-पांचाली’ की निर्णायक भूमिका रही। यह फिल्म 1955 में बनी। इस फिल्म की प्रसिद्धि कान समारोह में अपने जन्म के बाद से जो प्रशंसा शुरू हुई थी, वह आज इस फिल्म के साठ बरस के हो जाने तक जारी है। ‘सर्वश्रेष्ठ मानवीय दस्तावेज’ के रूप में विदेश में पहचान मिलने के बाद यह फिल्म देश-विदेश के लाखों लोगों की निगाहों का तारा बन गई। सिनेमा का शायद ही कोई छात्र होगा, जिसके मन में ‘पथेर-पांचाली’ के लिए गहरा अनुराग नहीं होगा। यह अत्यंत कम बजट में बनी, दुनिया की आज भी एक असाधारण फिल्म है। इस फिल्म के बनने के पहले भारत में पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह हो चुका था। कलकत्ता में हुए इस समारोह में विदेशों में बनी कुछ अविस्मरणीय फिल्मों का प्रदर्शन हुआ था। कलकत्ता में ही फिल्म सोसायटी की शुरूआत हो चुकी थी। जिसमें दुनियाभर का बेहतर सिनेमा दिखाया जाता था। कलकत्ता में मशहूर फ्रांसीसी निर्देशक रेनुआ अपनी फिल्म ‘द रीवर’ की शूटिंग के दौरान रहे थे। ‘पथेर-पांचाली’ के निर्देशक सत्यीजत राय फिल्म सोसायटी के संस्थापक सदस्य रहे। अपने इंग्लैंड प्रवास में उन्होंने वहां कुछ शानदार फिल्में देखी। (इनमें डी-सीका की ‘बाइसिकल थीफ’ भी थी) कलकत्ता में रेनुआ से मिलते रहे। वे शांति निकेतन में चित्रकला के अध्ययन के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर के जीवित रहते ही चले गए थे। कला, साहित्य और संगीत में उनकी गहरी रुचियां उन बरसों में ही सशक्त-सबल हो चुकी थी। अपनी पहली फिल्म के लिए उन्होंने बंगला लेखक विभूतिभूषण बंधोपाध्याय के उपन्यास ‘पथेर-पांचाली’ का एक अंश चुना था। यह फिल्म बंगाल के एक गांव के पुरोहित हरिहर और उसके परिवार की करुणा-मर्मस्पर्शी कथा कहती है। परिवार में हरिहर की पत्नी के अलावा उनके बच्चे दुर्गा और ओपू है। हरिहर के रिश्ते की एक अत्यंत वृद्ध स्त्री है। हरिहर को पंडिताई से बहुत ही कम पैसे मिलते हैं। परिवार का जीवन अभावग्रस्त लोगों का जीवन है। उनके मकान की हालत जर्जर हो चुकी है। फिल्म में पहले उस बुढिय़ा की और बाद में किशोरी दुर्गा की मार्मिक मृत्यु दिखाई जाती है। हरिहर पंडिताई के लिए गांव से बाहर जाते हैं और लौटते ही अपनी पहली संतान दुर्गा की मृत्यु की खबर सुनकर गहरे विषाद में उतर जाते हैं।  यह काली, सफेद फिल्म, दुर्गा और ओपू की निगाहों से, हमें भारत के ग्रामीण लोगों के जीवन की सच्चाइयों, सपनों से रूबरू करवाती है। इस फिल्म का संगीत पंडित रविशंकर ने दिया था। बाद के बरसों में सत्यजीत राय ने ही ‘अपराजितो’ और ‘अपूर संसार’ में ‘पथेर-पांचाली’ के ओपू के जीवन को असाधारण कलात्मक अंर्तदृष्टि से फिल्म के परदे पर जीवित किया था। उनकी पहली फिल्म की ही तरह उनकी त्रयी की इन दोनों फिल्मों को भी बहुत ज्यादा सराहना मिली थी। ‘पथेर-पांचाली’ भारतीय सिनेमा का ही नहीं विश्वसिनेमा का एक दुर्लभ कलात्मक दस्तावेज है।
पिछले पैंतीस बरसों में मैंने सत्यजीत राय की कुछ फिल्मों को बार-बार देखा है। पर सबसे ज्यादा ‘पथेर-पांचाली’ को। अब भी इस फिल्म को देखते हुए महसूस होता रहता है कि मैं धीरे-धीरे बूढ़ा होता जा रहा हूं और यह फिल्म धीरे-धीरे युवा होती जा रही है। इसी फिल्म के लिए कभी हमारे एक-दूसरे बड़े फिल्म निर्देशक ऋत्विक घटक ने कहा था कि ‘सत्यजीत राय की निगाहें जहां ठहरती हैं, वहां से सिनेमा शुरू होता है।’ कितने ही लोगों ने ‘पथेर पांचाली’ के बारे में कितना कुछ कहा है, कितना कुछ लिखा है। इस फिल्म की लोकप्रियता के कारण स्वयं सत्यजीत राय को अपनी इस फिल्म के बारे में काफी कुछ कहना पड़ा है, काफी कुछ लिखना पड़ा है।
यह होता है किसी कालजयी फिल्म का जादू और जीव। हम जितनी बार किसी कालजयी कलाकृति के पास जाते हैं, उतनी बार हमें उसमें कुछ नया-सा, अप्रत्याशित-सा और अद्भुत-सा नजर आता है। इसीलिए सदियों से सैकड़ों लोग क्लासिक रचनाओं के  पास बार-बार लौटते रहे हैं। एक अच्छी फिल्म को सिर्फ देखना ही नहीं सुनना भी पड़ता है। सिर्फ उस फिल्म के पात्रों के संवादों को ही नहीं, उन पात्रो ंके मौन को भी सुनना पड़ता है। उस फिल्म के संगीत को ही नहीं उसके सन्नाटे को भी सुनना पड़ता है। एक अच्छी फिल्म तरह-तरह से, अलग-अलग ढंग से आपको मंत्रमुग्ध करने की क्षमता रखती है। कभी उसके विषय की गहरी मानवीयता आपको छू जाती है और कभी उसके देखने के ढंग की कविता आपको प्रभावित कर जाती है। कभी फिल्म का नैतिक आवेग और आयाम आपको पकड़ लेता है तो कभी उसका सौंदर्यात्मक विस्तार। एक अच्छी फिल्म का निर्देशक, सिर्फ इस बात की ही चिंता नहीं करता है कि उसे अपनी फिल्म में क्या-क्या कहना है। वह इस बात को भी ध्यान में रखता है कि उसे अपनी बात को किस अंदाज में कहना है। आलोचना की शब्दावली में उसे विषय-वस्तु (ष्टशठ्ठह्लद्गठ्ठह्ल) और रूप (द्घशह्म्द्व) दोनों ही साधना चाहिए। जब इन दोनों का पूरा-पूरा खयाल रखते हुए कोई फिल्म बनती है तब उस फिल्म की अनुगूजें फिल्म को देखते वक्त ही नहीं फिल्म को देखने के बाद भी दर्शकों के मन में गूंजती रहती है। इस तरह एक अच्छी फिल्म को देखने से मिला प्रकाश कभी-कभार हमारे लिए प्रभु प्रकाश (श्वश्चद्बश्चद्धड्डठ्ठ4) भी बन जाता है। कितना अजीब है कि फिल्म को देखते हम अंधेरे में हैं लेकिन मिलता हमको उससे प्रकाश है और फिल्म कालजयी होने पर वैसा प्रभु प्रकाश श्वश्चद्बश्चद्धड्डठ्ठ4 जो कथानुसार जीसस क्राइस्ट के पृथ्वी पर जन्म लेने पर बाहर आया था। पिछले बीस-पच्चीस बरसों से सिनेमा का केन्द्र सिर्फ यूरोप नहीं रहा है। अब उत्कृष्ट फिल्में दुनिया के छोटे-छोटे, आर्थिक रूप से पिछड़े देशों से भी बड़ी संख्या में आ रही है। राजनैतिक और भौगोलिक कारणों से ध्वस्त हो चुके देश इरान ने दुनिया को कुछ अविस्मरणीण्य फिल्में दी है। इधर लेबनान, ताइवान, कोरिया और तुर्की जैसे देशों से कुछ बेहतरीन फिल्म निर्देशक और उनकी फिल्में आई है। कई देशों में सेंसरशिप की कैद को लांघकर असाधारण फिल्में आई हैं। एक समय में पूर्वी यूरोप और सोवियत रूस में अभिव्यक्ति की आजादी न होने से जैसी उत्कृष्ट फिल्में बाहर आई थीं, वैसे अब इरान से आ रही है, जहां तरह-तरह की पाबंदियों से समाज और उसके भीतर रह रहे लोग घिरे हुए हैं।
यह जानना अच्छा लगता है कि अब हमारे देश में भी, विभिन्न भाषाओं में ऐसी फिल्में बन रही है जिन्हें हम सिनेमा को भारतीय योगदान के रूप में देश सकते हैं। इतना जरूर है कि फिल्म सिर्फ कला ही नहीं, उद्योग भी है। अच्छी फिल्में तभी तक बनती रहेंगी, तभी तक बची रहेंगी जब तक उसको देखने वाले दर्शक बने-बचे रहेंगे। इसीलिए यह हम सबका नैतिक दायित्व बनता है कि हम बेहतर फिल्मों को बराबर देखते रहे ताकि उनको बनाने वाले लोग अपना जीवन बनाए रख सके, अपना साहस और कर्म जुटाकर रख सके। जिस तरह अच्छी किताबों को बचाने में अच्छे पाठकों की भूमिका और अहमियत रहती है, उसी प्रकार अच्छे दर्शक ही अपने नैतिक आवेग से अपने नैतिक दायित्व को समझते हुए, भविष्य में बेहतर सिनेमा को जीवित रखने में अपनी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। कुछ बरसों पहले तक अच्छी फिल्मों के निर्माण में हमारे देश की सरकारों से आर्थिक मदद मिलती रही थी जो अब शायद बहुत कम हो गई है। अच्छी फिल्मों के लिए अलग सिनेमाघर नहीं है। पत्र-पत्रिकाओं में सिनेमा पर गंभीरता और परिश्रम से लिखा गया आलोचनात्मक काम, भारतीय भाषाओं में कम से कम होता गया है। ऐसे परिप्रेक्ष्य में दर्शकों की सिनेमा के लिए जिम्मेवारी, समाज और व्यक्ति की सिनेमा के लिए प्रतिबद्धता का विकास और विस्तार होना चाहिए। यह हम सब नागरिकों की जिम्मेवारी है। आखिर एक अच्छा सिनेमा, हमारे लिए जितना कुछ करता है उसमें हमारी नागरिकता के विस्तार में उसकी अपनी भी एक भूमिका होती है। एक अच्छा सिनेमा हमें सिर्फ अपने आप से ही नहीं, हमारे अपने समय और समाज से भी जोड़ता है। हमें हमारी सृष्टि, संस्कृतियों और सभ्यताओं से भी जोड़़ता है। एक अच्छे सिनेमा के लिए थोड़ा-सा भी कुछ करके, हम बेहतर सिनेमा को ही नहीं, बेहतर समाज को भी बना सकेंगे। यही सिनेमा के प्रति हमारी कृतज्ञता होगी।