Monthly Magzine
Wednesday 22 Nov 2017

औरत की कोशिश

रमाकांत श्रीवास्तव
एल.एफ-1, कनक स्ट्रीट
ई-8/218, त्रिलंगा
भोपाल-462039
मो. 977137809

उर्मिला शुक्ल की दस कहानियों का संकलन ‘मैं फूलमती और हिजड़े’ की छोटी सी भूमिका भारत भारद्वाज ने लिखी है जिसका शीर्षक उन्होंने ‘समय और समाज का दुखद वृत्तांत’ दिया है। मैं इसमें यह जोडऩा चाहूंगा कि यह दुखद वृत्तांत वंचिताओं का है। स्वयं लेखिका भी, अपनी ओर से दो शब्द लिखते हुए इंगित करती है कि स्त्री ‘महावंचिता’ है और वह उसे ही अपनी कहानियों के केन्द्र में रख रही है। इन कहानियों की विशेषता आकृष्ट करती है कि इनमें कोई हाहाकारी क्रांतिधर्मा स्वर नहीं है। नारी विमर्श के नाम पर कई बार अतिरंजनापूर्ण, एक नकलीपन का स्पर्श रचनाओं में दिखलाई पड़ता है। उर्मिला शुक्ल ने स्त्री की पीड़ा और उसके जीवन की विडंबनाओं के वृत्त में खामोशी से प्रवेश किया है। लेखिका की संवेदना मध्यवर्ग और  श्रमजीवी वर्ग के प्रति विशेष रूप से है। मध्यवर्ग की पढ़ी-लिखी, साधन सम्पन्न स्त्री की त्रासदी और उसके जीवन की विडंबनाओं को वे विश्वसनीयता से व्यक्त करती हैं। श्रमजीवी औरतें तो एक ओर गरीबी की मार को झेलती हैं और दूसरी ओर पुरुष की वर्चस्ववादी प्रवृत्ति को भी। उर्मिला का जोर पुरुष द्वारा रचे गए प्रवंचनापूर्ण वितान के बीच स्त्री को चित्रित करने पर है। समर्पण छत्तीसगढ़ की माटी को किया गया है अत: स्वाभाविक है कि रचनाओं की पृष्ठभूमि में छत्तीसगढ़ के शहर, गांव, कस्बे हैं। इस आनुष्ठानिक समर्पण से स्वाभाविक रूप से इस अंचल की स्त्री की पीड़ा और ताकत को रेखांकित करना लेखिका का प्रेम है किंतु प्रकारांतर से यह परिदृश्य, परिस्थितियां और पीड़ा अन्य अंचलों की भी है।
इन रचनाओं में उपस्थित स्त्री पात्रों पर ही पाठकों का ध्यान सर्वाधिक जाता है। ये कहानियां मूलत: पात्रों के आसपास बुनी गई हैं। यह सामाजिक सत्य उभरकर आता है कि श्रमजीवी औरत अपेक्षाकृत मुखर और साहसी है अत: वह अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व की रक्षा करने में भी आगे है। यदि हम शीर्षक कथा को ही लेकर बात शुरू करें तो वर्गीय चरित्र की हल्की झलक जरूर मिलेगी। कहानी में दो स्त्री पात्र आमने-सामने हैं। कथा नायिका सीमा शर्मा और फूलमती की जीवनदृष्टि में स्वायत्तता हासिल करने के ताप और साहस में खासा अंतर है। पढ़ी-लिखी नौकरीपेशा होकर भी सीमा अपने पति के गर्हित इरादे और व्यवहार का सीधा विरोध नहीं कर पाती। पति अपने व्यावसायिक लाभ के लिए पत्नी का इस्तेमाल करना चाहता है। एक रईस व्यवसायी से विवाह होने के बाद, कीमती गहनों-वस्त्रों में सजी-धजी सीमा ट्रेन में बैठकर अपनी नौकरी से त्यागपत्र देने दुर्ग जा रही है। विवाह पूर्व ट्रेन में उसके जो परिचित साथी और सहेलियां मिला करती थीं वे पुन: उसे मिलती हैं। वे सीमा के भाग्यशाली होने पर उसे बधाइयां देती हैं किन्तु इस सत्य को केवल सीमा जानती है कि दुर्ग स्टेशन पर पति के व्यवसाय को लाभ पहुंचाने वाले एक सज्जन माखीजा भी मिलने वाले हैं। पति का निर्देश है कि सीमा अपनी मध्यमवर्गीय मानसिकता को तिलांजलि देकर माखीजा को खुश करे। किसी भी कीमत पर। अनकही बात का संकेत स्पष्ट है।
ट्रेन में पुराने साथियों के अतिरिक्त उसे मूंगफली बेचने वाली फूलमती भी मिलती है। वह भी सीमा की पूर्व परिचिता है जिसके विषय में उसकी एक सहेली लता की राय है कि वह बदचलन है और वह देह का धंधा भी करती है। फूलमती उसके इशारों को समझकर साफ और कर्री-कर्री बातों से उसे हतप्रभ करके चुप करा देती है। सीमा के साथियों के अपने स्टेशन उतर जाने के बाद सीमा के कहने पर फूलमती अपनी दास्तान सुनाती है कि वह अपने पति को धिक्कार कर उसे छोड़ चुकी है क्योंकि उसके पति ने, जिससे उसने प्रेम विवाह किया था, उसे धोखा देकर देह व्यापार में उसे डाल दिया। पति को अलग करके उसने फिर अपने ही दम पर स्तवंत्र रूप से धंधा शुरू किया। स्त्रैण जैसे दिखने वाले एक ग्राहक की नजरों में उसे अपने प्रति प्रेम और सम्मान दिखलाई दिया तो वह उसके साथ रहने लगी और मूंगफली बेचने लगी। सीमा अपनी तुलना फूलमती से करती है जो देह व्यापार से जुड़े होने की तोहमत ढो रही है। सीमा को लगा कि उसका पति भी उससे संभ्रांत किस्म का देह व्यापार करवाना चाहता है। उसे फूलमती से प्रेरणा मिलती है और वह स्टेशन पर उसकी राह देखने वाले माखीजा को अनदेखा करके अपनी संस्था में जाकर त्यागपत्र देने के स्थान पर ज्वाइनिंग देकर उन्हें चकित कर देती है जो सोच रहे थे कि एक रईस व्यापारी की पत्नी बनने के बाद तो उसे नौकरी करने की जरूरत ही नहीं है। लेखिका के मंतव्यों को स्पष्ट करने में सहायक कुछ बिन्दुओं का खुलासा करें जो संकलन की अन्य कहानियों में भी अनुस्यूत है।
अपनी स्थिति का आकलन फूलमती ऐसी स्वतंत्र नारी के रूप में करती है जो अपने को पति कहने का दावा करने वाले को लताडक़र करती है- ‘पति बनता है साला मादर... अरे मड़वा तू तो मेरे को गिराहिक भी नहीं चलेगा। अब पास आया तो सारा मरदपन ऐंठ दूंगी, ऐसे।’ फूलमती का प्रभाव सीमा पर यूं पड़ा- ‘मैंने कंगन उतारे और उन्हें पर्स में रख दिया।’ यह गर्हित जीवन के प्रति विद्रोह का प्रतीक है। त्यागपत्र के बदले ज्वाइनिंग देना अपनी स्वायत्तता की उद्घोषणा है।
इस कहानी में हिजड़ों की उपस्थिति कहानी को सार्थक आयाम देती है। नपुंसकता को किस रूप में देखें यह एक सवाल कहानी के पाठक के मन में स्वयं ही उठता है। ताली बजाकर, ट्रेन में पैसे मांगने वाले हिजड़ों का एक दृश्य कहानी में है। पैसा देने में आना-कानी करने वाले को एक हिजड़ा कहता है- ‘तू भी अपने जैसा है तो चल हमारे संग।’ ये हिजड़े तो प्रकृति की अभागी संताने हैं। इसके अलावा कहानी में दो हिजड़े और हैं। एक का केवल जिक्र है, वह सामने नहीं है। सीमा जानती है कि उसकी सहेली शीबा का पति नपुंसक है लेकिन लज्जा के ताले ने उसका मुंह बंद कर रखा है। लेकिन वास्तव में सबसे बड़ा हिजड़ा तो सीमा का व्यवसायी पति है। हिजड़ा भर क्यों वह तो फूलमती के पति की तरह ‘भड़वा’ भी हुआ। तीसरा हिजड़े किस्म का पात्र है फूलमती को चाहने वाला स्त्रैण पुरुष। फूलमती की नजरों में वह है सही मर्द। कहानी के कथ्य के भीतर से यह सवाल उठते हैं कि वेश्या किसे कहें? हिजड़ा कौन है?
संकलन की दो कहानियों की कथा नायिकाएं औरत को ‘नस्ल’ के रूप में देखती हैं। समाजार्थिक दृष्टि से वह इस पद का प्रयोग करती है। औरत किसी भी वर्ग की हो, उसकी स्थिति विडंबनापूर्ण रही है। विपन्न दलित स्त्री की पीड़ा बेशक दोहरी है किन्तु इतिहास गवाह है कि हर वर्ग की स्त्री को पुरुष अपनी आक्रांता का साधन बनाने में प्रयत्नशील होता है। सीमा की सहेलियां जब फूलमती के प्रति घृणाभाव व्यक्त करती हैं तो सीमा सोचती है- ‘आश्चर्य तो यह है कि औरतें भी अपने आपको, अपनी ही नस्ल को जलील करने में पीछे नहीं रहतीं।’ संकलन की एक कहानी का शीर्षक ही है- ‘अपनी नस्ल के लिए’। कहानी की पात्र वसुधा ने मां को हमेशा पिता द्वारा उपेक्षित होते हुए देखा है। एक पुत्र की चाहत में पिता ने उसकी मां का बार-बार गर्भपात करवाया। बीमार मां की मृत्यु के बाद पिता ने एक संतानवती स्त्री के साथ शादी कर ली। पिता की मृत्यु के बाद उसने देखा कि सौतेला भाई पिता की पूरी संपत्ति हड़प लेना चाहता है तब वह उस सौतेली मां के प्रति संवेदनशील हो उठती है जिसके प्रति उसके मन में पहले घृणा भरी हुई थीं। सौतेली मां और उसकी नन्ही पुत्री बेसहारा न हो जाए इसलिए वह एक ऐसा निर्णय लेती है जिसे उसके करीबी लोग उसका भावुकता भरा कदम मानते हैं। वह पिता की संपत्ति का ट्रस्ट बनाती है और अपना हक छोड़ देती है। आने वाली पीढ़ी के लिए अपनी चिंता व्यक्त करते हुए वह कहती है-‘सपना (उसकी छोटी सी सौतेली बहन) के लिए मैंने यह सब किया। इस ट्रस्ट से सपना का भविष्य सुरक्षित होगा। कम से कम सपना अब किसी के हाथ का खिलौना नहीं रहेगी। अब उसे किसी और के सहारे की जरूरत नहीं होगी।’ उर्मिला की कहानियां लाउड नहीं हैं किन्तु उनमें उपस्थिति स्त्रियां अपने स्वतंत्र अस्तित्व की तलाश में हैं। स्त्री की यह पीड़ा उनके केन्द्र में है कि पुरुष या तो उसे अपने भोग की वस्तु समझता है या अपनी आश्रिता। स्त्री इन दोनों स्थिति के विरोध में है। उसके स्वतंत्र अस्तित्व का हनन केवल बाहरी लोग ही नहीं उसके अपने परिवारजन भी करते हैं। रिश्तेदार तो क्या कभी-कभी उसकी बेटी को भी पढ़ी-लिखी मां पुराने विचारों की ऐसी निरीह महिला लगती है जिसे उसकी देखभाल में ही रहना चाहिए।
भारत की सामान्य युवती यदि महत्वाकांक्षी हो तो उसके आदर्श इंदिरा गांधी, कल्पना चावला, मेधा पाटकर, जैसी तेजस्विनी महिलाएं होती हैं किन्तु मध्य वर्ग के परिवार की लडक़ी को विवाह के पूर्व यही सिखाया जाता है ससुराल में अपने आपको खपा देना ही सार्थक जीवन है। समय बदल गया है और अब कई स्त्रियां स्वावलंबी हैं किन्तु इस नये समय में एक नई त्रासदी उसके सामने है। तिनका-तिनका कोशिश में उर्मिला ने खूबी के साथ इस बदलाव को चित्रित किया है। कथा की प्रमुख पात्र वसुधा न तो वंचिता है और न ही शोषिता। उसका दर्द उसकी अपनी बेटी के द्वारा ही खुद को न समझे जाने का है। बदले समय में पीढिय़ों की मानसिकता बदल गई है। बेटी की शादी के समय अकेली मां की संवेदनाएं उमड़ती हैं किन्तु पुत्री उसे समझ ही नहीं पाती। यहां तक तो फिर भी ठीक है। इसे समय के साथ युवा मानसिकता के बदलाव की तरह स्वीकार किया जा सकता है। लेकिन जब बेटी पति के साथ रहने के लिए कनाडा जाने लगी तो मां से बोली- ‘ममा, अब यहां इतने बड़े घर की जरूरत भी क्या है? थोड़े दिनों ही की तो बात है, फिर हम आपको बुला लेंगे। तब तक कोई छोटा सा घर देख लेंगे। आदित्य चाहते हैं आप हमारे साथ रहें। आपको कुछ नहीं करना है, आदित्य ने ब्रोकर से बात कर ली है।’ वसुधा को महसूस होता है कि उसके अपने अस्तित्व का ही यह अस्वीकार है। तब वह तय करती है कि वह कहीं नहीं जाएगी और यही रहेगी अपने देश में।’ एक अन्य कहानी ‘रहना नहिं देस बिराना’ की मन्टोरा भी अपने गांव वापस लौटकर ही आश्वस्त हो पाती है। ठेकेदार के ईंटभट्टे में कड़ी मेहनत करने के बाद भी उसे कुछ हासिल नहीं होता। यूं यह कहानी मजदूरों के श्रम के शोषण किए जाने की है, यह शोषण वर्ग के साथ है। स्त्री या पुरुष होना इसमें गौण है किन्तु लेखिका संकलन की रचनाओं में स्त्री की व्यथा को केन्द्र में रखना चाहती है अत: फोकस में मन्टोरा है। यह सूत्र एक अन्य कहानी ‘फूलकुंवर तुम जागते रहना’ में स्त्री को कथा की पृष्ठभूमि में अंकित करता है। कथ्य बस्तर की राजनैतिक-सामाजिक परिस्थितियों की विडंबनाओं को उजागर करता है। इसमें सरकारी तंत्र, खनिजपूरित जमीन पर आंखें गड़ाती हुई कंपनियों के साथ राजनैतिक दुष्चक्र का रेखांकन है। भूतपूर्व नरेश के विरुद्ध चुनाव में, सामान्य हैसियत की आदिवासी स्त्री खड़ी होती है और प्रतिद्वंद्वी को पराजित करती है। फूलमती यहां स्त्री चेतना और शक्ति के प्रतीक के रूप में उपस्थित है। इस रचना के माध्यम से उर्मिला भूमंडलीकृत बाजारवादी नीतियों के विरुद्ध आंचलिक जीवन की सहजता-सौंदर्य और उसकी कलाओं के संरक्षण की आवश्यकता की ओर इंगित करती है।
पुरुषवादी वर्चस्व और नारी के प्रति उसकी भोगवादी प्रवृत्ति को लेखिका कहानियों में उभारती है। पश्चिमी देशों के कुछ क्लबों की शैली की नकल करने वाले आधुनिकतावादी पतनशील उच्च मध्य वर्ग की ‘औरतबदल’ पार्टी की हकीकत और खोखलेपन को लेखिका ‘बंसवा फुलइन मोरे अंगना’ में बयान करती है। पार्टनर बदलकर नई-नई स्त्री देह का स्वाद लूटने के हिमायती पति को जब मालूम होता है कि पत्नी गर्भवती हो गई हो तो वह पत्नी से गर्भपात का प्रस्ताव रखता है क्योंकि बच्चा उसका या मल्होत्रा का या दीपांश का यह नहीं कहा जा सकता। तब पत्नी पति के सामने एक प्रश्न रखती है और एक निर्णय लेती है। प्रश्न है- ‘तुम्हारी तथाकथित शुद्धता बाधित क्यों हो रही है?’ और निर्णय है- ‘मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे यह बच्चा उतना ही अजीज है जितना...? और यह तुम्हारा हो न हो, मेरा तो है ही। इसमें मेरा अंश तो अभी भी उतना ही है।’ कुछ भिन्न प्रकार से लेकिन ‘फूल गोदना के’ कहानी की केंवरा का विरोध भी यौन प्रसंग में पुरुषवादी वर्चस्वता से है। अपने प्रेमी और हिन्दू-मुस्लिम के ठप्पे का प्रश्न उठाने वाली पंचायत दोनों का ही वह तिरस्कार करती है। भविष्य में जीवन की राह कठिन होगी, यह जानते हुए भी वह स्वेच्छा से अपनी अलग राह तय करती है।
‘एक सुहाग की मौत’ और ‘तिरिया जनम’ कहानियों के भावुक कथ्य के बरक्स उर्मिला की कहानी ‘झीनी झीनी रे चदरिया’ सामाजिक सत्य के अधिक निकट है और लेखिका इसमें अपने तय किए गए दायरे से बाहर निकलकर वर्गीय सामाजिक स्थिति का जायजा लेती है। वर्तमान समय में उत्पाद का लाभ मिहनतकश निर्माता को नहीं मिलता वह दलाल और व्यापारी को मिलता है। यह स्थिति पूर्व में भी थी किन्तु समय के साथ यह बद से बदतर होती गई है। युवा पीढ़ी के कुशल बुनकर की सफलता और संघर्ष की यह कहानी में छत्तीसगढ़ के कोस्टा (बुनकर) समुदाय की सहकारी समिति और सेठ की प्रतिद्वंदिता और सहकारी समिति के विरोध में होने वाली व्यावसायिक चालबाजी की झलक है। इस कहानी का सत्य पूरी व्यवस्था का है।
उर्मिला स्त्री के संसार के कई आयामों को विशेष रूप से उसकी पारिवारिक स्थितियों को अपनी रचनाओं में समेटती हैं किन्तु कुछ रचनाओं में उसके पात्रों की संघर्ष चेतना का सहज विकास दिखलाई नहीं देता। कुछ पात्र तर्कपूर्ण मानसिकता के साथ स्थितियों से टकराने के स्थान पर कथाकार द्वारा ढकेले हुए से मालूम पड़ते हैं। ‘एक सुहाग की मौत’ और ‘तिरिया जनम’ की अनु अपने पति को मनु, राम, गौतम, युधिष्ठिर जैसे पुराण पुरुषों के आधुनिक संरक्षण के रूप में देखती है। वह एकाएक ही अपनी पुत्री में शक्ति भरने का संकल्प ले लेती है। ‘एक सुहाग की मौत’ में कथा नायिका को अपने अपराधबोध से मुक्ति मिलती है। उसे लगता है जैसे मृत मां कह रही है ‘करुणा तुम अपराधी नहीं हो।’ लेखिका यह अवश्य जोड़ती है- ‘यह मां की आवाज थी जो उसके भीतर से उभर रही थी।’ यह तर्क या वैचारिक जागृति नहीं बल्कि एक आश्वस्ति मात्र है। सच्चा अपराधबोध शायद संकल्प का प्रस्थान बिन्दु होता है। ऐसी ही मन:स्थिति ‘रहना नहिं देस बिराना’ में कथा नायिका मन्टोरा की है जिसे अचानक लगता है कि उसका देश यानी उसका गांव उसका हाथ पकडक़र कह रहा है- ‘आओ मन्टोरा आओ।’ वस्तुत: यथार्थ को तरल बनाकर आदर्श से अपने पात्र को मंडित करना सामाजिक सत्य तक जाने में हमें मदद नहीं करता। दरअसल लेखिका की मंशा स्त्री की शक्ति और उसके संकल्प को रेखांकित करना है। इसे सिद्ध करने के लिए वह कथा के फ्रेम से बाहर स्वयं स्थितियों को विश्लेषित करने लगती है। ऐसे स्थलों पर कहानी लेखिका के वक्तव्य में बदलने लगती है। इस शिल्पगत कमजोरी के बावजूद उर्मिला की कहानी संग्रह वर्तमान समय में स्त्री जीवन को प्रतिबिंबित करने में सफल है।