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Monday 20 Nov 2017

समकालीन दर ओ दौरां में तलब छांव की

सत्यदेव त्रिपाठी
मातरम 26, गोकुल नगर कंचनपुर डीएलडब्ल्यू वाराणसी- 221004

राकेश शर्मा को मुम्बई के मंचों पर, बैठकबाजियों में लगभग 20 सालों से सुन रहे हैं। कभी-कभार प्राय: किसी के भेज-भेजवा देने पर पत्र-पत्रिकाओं में फुटकर तौर पर कुछेक गज़़लें पढऩे को भी मिल जाती रही हैं। और दोनों रूपों में प्यास जगाती रही हैं कि इन्हें थोक में पढ़ा जाये। लेकिन प्रकाशन के पेशे में रहते हुए भी राकेश अपनी बेपरवाह मस्ती में पुस्तक छपाने से भागता-बचता रहा।  
ऐसे में अपनी प्यास बुझाने के लिए उसके एकल काव्य पाठ का आयोजन भी 8-10 साल पहले करना पड़ा, पर तमाम इसरारों-आग्रहों के बावजूद राकेश ने इन दो दशकों में छापने-छपाने की कोई पहल न की। और अब भी जो यह पुस्तकाकार रूप मिल सका है, वह उनके कुछ यारों व शायद परिदृश्य (प्रकाशन) की पहलकदमी का नतीजा है। लेकिन यह भी उल्लेख्य है कि इन गज़़लों की वक्त के अनुकूल परिदृश्य का यह लिबास कतई नहीं है, जो सारी सदाशयता के बावजूद परिदृश्य की बेपरवाही या बेवफाई ही है, जबकि वहाँ से छपी एकाध पुस्तकों की गवाही में उसे यह काम आता है, लेकिन जहनियत और सुन्दरता कब रही है परिधान की मोहताज !!
फिर भी शायर राकेश की प्रकाशन-निरपेक्षता की इस वृत्ति का उल्लेख बेहद जरूरी था, क्योंकि यही हमारी परम्परा रही है, जो आज साहित्य ही क्या, जीवन के हर क्षेत्र में लगभग समाप्तप्राय हो चुकी है। फलत: छपास और आत्म-प्रकाशन का रोग इस कदर व्याप गया है कि लेखन और जीवन की मूल्यवत्ता नदारद हो गयी है। ऐसे में राकेश की यह निरपेक्षता भी एक मानीखेज मूल्य है।  
शोर-शराबा पा जाता है रुतबा फन का, शेर ओ सुखन से गर बेसुध महफिल हो जाये।  ऐसे चीखने-चिल्लाने वालों को शायरी का फन आता नहीं और जिसे थोड़ा आता है, वे आज की बाजारू दुनिया में बिक गये हैं। दोनों से आहत व झल्लाये राकेश बड़ी बेबाकी और हिकारत के साथ इन प्रवृत्तियों को बेपर्द करते हैं- होंठ सीकर अदीब बैठे हैं, चल रही है जुबान जाहिल की या जो अदब से बेखबर, आदाब से गाफिल लगे।  और कहता बाजार में बिका शायर, इन दिनों शायरी की सेल नहीं।  ऐसी हकीकतों की तपिश इतनी बढ़ गयी है कि तलब छाँव की, वाकई आज की अहम जरूरत है। इसीलिए यह इत्तफाकन नहीं, सहज इरादतन है कि ऐसी छांव देने वाली अपनी साहित्यिक विरासत पर जितने शेर राकेश ने कहे हैं; हालांकि इसकी स्वस्थ परम्परा रही है, स्वातंत्र्योत्तर तो क्या, आज तक की शायरी के समूचे दौर में अमूमन व औसतन किसी दूसरे ने अकेले नहीं कहे होंगे- वारिस हम तुलसी कबीर के, लेकिन हैं शागिर्द मीर के और मीर के हम नाती हैं साहब
राम कथा तुलसी की पढक़र देख जरा तू, बोल रहे हैं बन्दर-भालू भाषा मेरी
मंडराती है आगे-पीछे ये गालिब के, सौंप रहे खुसरो को दादू भाषा मेरी
बन्दर-भालू भाषा मेरी में तुलसी काव्य-कला के मानवेतर विस्तार के साथ भाषिक विकास की विरासत के प्रतीकार्थ भी निहित हैं। इस सिलसिले में शायरी सम्बन्धी राकेश की मान्यताएं भी आपोआप आती गयीं हैं, जो खाँटी और असाध्य की साधना सी भी लगती हैं, गोकि कल्पनातीत नहीं- सर पे जिसके ताजेजऱ, पैरों तले कालीन है, मान लूँ कैसे वो शायर मेरा समकालीन है?
क्योंकि असली शायर को तो पेट भरने को करनी पड़ी चाकरी, दे सकीं न हमें शायरी रोटियां इसीलिए शायर को मयस्सर कभी दौलत नहीं होती, फिर भी यकीन इतना कि -जिन्दगी जब तलक अधूरी है, शायरी तब तलक जरूरी है।     
और ऐसे शायर की खुद्दारी, आन, फऩ व मुल्क के प्रति दीवनागी का जज्बा, आदि एक साथ देखना हो, तो पृष्ठ 44-45 की गज़़ल देख लें- मर मिटते हैं आन की खातिर, थोड़े जज्बाती हैं साहब।             
शायरों की विरासत के इसी क्रम में आज सिरे से लुप्त होती जा रही सांस्कृतिक विरासत को भी बड़ी कद्रदानी से उकेरते हैं राकेश। वस्तुत: यह भी उनका बड़ा प्रदेय है- गज़़लों में सांस्कृतिक चेतना, जो पुन: कहीं और इतनी हाईलाइट होती अमूमन नजऱ नहीं आती, जैसी तलब की छाँव में आयी है , समय औ जिन्दगी का पुरजोर सिला बनकर। आज संस्कृति का घनघोर ह्रास हो रहा है। मौजूदा हालात का बड़ा व आंतरिक कारण कहीं अपनी इस मूल संस्कृति को भुला देना ही तो नहीं
 तारीख अपनी याद है, न अपना तमद्दुन, अपनी जुबान अपना सुखन भूल गये हैं।
हम वाकई तहजीबे-ए-वतन भूल गये हैं, पाकीजग़ी-ए-गंगोजमुन भूल गये हैं।
और बदलाव ऐसा कि जीने के नये ढब सीख लिये, हर सीख पुरानी खो बैठे, पुरखों की निशानी खो बैठे
पर साथ ही इस दौर में भी कायम रह पाने का सबब भी भारतीय संस्कृति ही है, क्योंकि  
जड़ें हमारी फैली हैं पाताल लोक तक, इसीलिए हम आंधी में भी तने पेड़ से खड़े हुए हैं
जज्ब कर लेती है खुद में हर नयी तहजीब को, सभ्यता इस मुल्क की इस वास्ते प्राचीन है
लेकिन आज अध:पतन की आंधी भी मामूली नहीं। उसके वेग में आज के सांस्कृतिक हालात ऐसे हैं कि
तलब छांव की उस दरख्त से क्या करियेगा, फूल नुचे हैं, पत्ते जिसके झड़े हुए हैं
तो कड़वा सच यह भी है कि बेजा है तहजीब-तमद्दुन की बातें, लहू बसर का जब पानी से सस्ता है
ऐसे में तहजीब को ओढ़ें या बिछायें वो अदब को, जिन बेघरों के सर पे कोई छत नहीं होती
जाहिर है कि साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासतों की छाँव और उनसे ऐसी महरूमियत के इस दौर के लिए बेहद मौजूँ सिद्ध होता विरासत के प्रति ऐसा अगाध प्रेम व उसके नष्ट होने की ऐसी गहन चिंता का इतना स्पष्ट राकेशीय सोच-ओ-अन्दाज़। हिन्दी शायरी के लिए सर्वथा अभिनव फेनोमिना है यह भी।
ध्यातव्य है कि स्वातंत्र्योत्तर काल में दुष्यंतकुमार और आपात्कालोत्तर दौर में अदम गोंडवी गमेदौरां की समान जमीन पर खड़े होकर इस कालावधि की हिन्दी गज़़लियत के दो रूपों के सच्चे रहनुमा ठहरते हैं। उसी जमीन पर दोनों के सन्धि-स्थल से गज़़लियत को आगे बढ़ाने वाले राकेश शर्मा दोनों को एक साथ याद करते हैं- वही कहते हैं दुष्यंत-ओ-अदम दुनिया के बारे में।
इश्क-ओ-हुस्न के लिए बनी गज़़ल विधा की बेहन (पौधे) को उसके बेहणउर (मूल खेत याने उर्दू कविता) से उखाडक़र सामाजिक सरोकार की जमीन पर रोपने का जो युगांतकारी कार्य दुष्यंतजी ने किसी प्रतिज्ञा-घोषणा के बिना बड़ी मसर्रत से किया और जनाब अदम ने घोषित रूप से (भूख के अहसास को शेर-ओ-सुखन तक ले चलो या अदब को मुफलिसों की अंजुमन तक ले चलो) आक्रोश भरे तेवर के साथ किया, उसी को राकेश सोद्देश्य सहजता से सामाजिक फिक्र की जानिब से लेकर आगे चलते हैं-
गज़़ल को दे रहा हूँ इक नयी अफ्कार (फिक्रों) की भाषा,
पुरानी पड़ गयी आरिज़, लबो, रुखसार की भाषा।
और इस सोच व इरादे की संजीदगी व प्रतिबद्धता का प्रमाण यह कि दुष्यंत में भी प्रेम-शृंगार की जमीन के दो-एक खांटी शेर मिल ही जाते हैं, लेकिन राकेश के यहाँ खोजे से भी कोई गज़़ल क्या, एक शेर तक सीधे हुस्न-ओ-इश्क पर नहीं मिलता। इनसे बावस्ता शब्दों में बातें आती हैं, पर अपने सरोकारी मायने लेकर,  सुलझाना उलझी लट को कोई जुर्म न था, रुसवाइयां मिलीं हमें शोहरत नहीं मिली। अथवा
इशारों ही इशारों में कहा करते हैं कुछ हमसे,
तुम्हारी जुल्फ  के ये पेचोखम दुनिया के बारे में
इस तरह सरोकार का इमकान भी, इतनी सम्पूर्णता में, राकेश के अलावा शायद ही मिले। ऊपर उल्लिखित विक्रेता व बिकाऊ शायर अपना सर्वाधिक कारोबार (इस्तेमाल) इसी इश्क व हुस्न का ही करते हैं और कदाचित् हद दर्जे की फूहडता भी फैलाते हैं। तलब छाँव की के सरोकार की संजीदगी उन पर उसी हद की कड़वाहट भरे आक्रोश के साथ आचारधर्मिता की सारी हदें तोडक़र प्रहार करती है-
सुनाना लंतरानी इश्क की है काम शोहदों का,
 लिखा करती है शायर की कलम दुनिया के बारे में।
सरोकार की यह जमीन निस्सन्देह वक्त के साथ आज और ज्यादा कड़ी व खुरदरी हो गयी है। इसे खोदते हुए राकेश शर्मा का शायर उक्त दोनों प्रतिनिधि शायरों की गज़़लियत के औजारों को तराशता है। बतौर उदाहरण, दुष्यंत का बड़ा मकबूल शेर है- कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो। सम्भावना की जानिब से बदलाव की कोशिशों के लिए इससे अच्छा शेर हो नहीं सकता। किंतु आज के यथार्थ ने उसे खत्म कर दिया है, जिसे परिभाषित करते हुए राकेश ने इन्हीं शब्द-प्रतीकों में शायद दुष्यंत (के समय) को जवाब भी दिया है- सूराख आसमान में करने से लाभ क्या, पत्थर हवा में हमसे उछाला नहीं गया।
उछाला नहीं गया याने उछालने का जज़्बा व ताकत नहीं रही आज के समय में और व्यवस्था इतनी नाकारा हो गयी है कि उछालने का कोई मतलब भी नहीं रहा। इस तरह यथार्थ के पक्ष-प्रतिपक्ष वाले दोनों सिरे भी आ गये हैं और दुष्यंत अदम से आगे का दोहरापन भी उघड़ गया है। पर क्या इसमें यह व्यंजना आपको भी दिख रही है कि अब तो पत्थर सर पर फेंको उनके, आसमान में क्या उछालना!!   
इस तरह के ढेरों शेर हैं, जो दुष्यंत के नमूने के साथ उठते हैं और अपने युग को नुमायां करते हैं- तब एक चिनगारी कहीं से ढूंढ लाने की स्थिति थी, अब तो दियासलाई ही गीली हो गयी है - याने चिनगारी की उम्मीद ही खत्म। तब व्यवस्था में हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं का यथार्थ था और अब व्यवस्था ही झुनझुना हो गयी है, शोर करता है, नहीं सुनता किसी की, खूब यह जम्हूरियत का झुनझुना है!! दुष्यंत के पाँवों से पेट ढंक लेंगे के यथार्थ को राकेश के घुटने पेट में मोड़े हुए हैं।
गमेदौरां के उक्त सूरतेहाल के लिए असली व एकमेव जिम्मेदार राजनीति है। और नेताओं के चलते देश लक्ष्यहीनता में भटक गया है, रहनुमाओं के भटकने की सजा है, गुम है मंजिल, पांव में छाले पड़े हैं। आज सब कुछ सत्ता की राजनीति के लिए राजनीति की सत्ता से ही यूं परिचालित हो रहा है कि देश के लिए कुछ नहीं हो रहा, सब कुछ सिर्फ राजनीति के लिए हो रहा है, राजनीति से हो रहा है। इस पर जितनी तेज व धारदार बात होगी, अदब उतना ही कारगर होगा तथा उसे अवाम में उतनी ही मकबूलियत मिलेगी। और इतना धारदार व बेबाक कौन होगा, जितना 2002 के गुजरात दंगे पर लिखी गज़़ल में राकेश हुए हैं। इस हिम्मत व जज्बे को सलाम करके ही तलब छाँव की में निहित सियासी चेतना में प्रवेश करना मौजूँ होगा- त्राहि-त्राहि गुजरात कर उठाए सत्ता में जल्लाद आ गया।
राम-नाम की ओढ़ चदरिया, गजनी का उस्ताद आ गया।
जख्म जो भर आये थे, उनमें, फिर से पीप-मवाद आ गया।
संविधान के होश उड़ गये, लोकतंत्र को पाद आ गया।  
जी हाँ, यही है शायर की बेपनाह विह्वलता, न कोई डर, न संकोच। तभी तो राकेश डंके की चोट कह सकता है- यही खासियत रही हमारे लिखने की, जो लिक्खा, जितना लिक्खा, बिंदास लिखा है। यह बिन्दासपन (निर्बन्ध बेपरवाही) गज़़लों के तेवर में है, जो उतने ही साफ-साफ  सोच से होती (बनती) हैं, जिसके तहत राकेश को लोकतंत्र की जर्जर नैया, क्यों है डाँवाडोल पता है, कि इसकी असली फाँस राजनीति के घनघोर अध:पतन में है। राजनीति पर कहा राकेश का कोई भी शेर उनके चरित्रों के घटियापन से खाली नहीं। सबको एक जगह रख दिया जाये, तो उनका सारा घिनौनापन विशाल घूरे की तरह गन्धाता नजर आयेगा। राकेश के यहाँ इस घिनौनेपन का शीर्ष है- राजनीति का खूनी व हत्यारा होना, जिसके लिए अब हिंसक राजनीति शब्द बहुत शालीन लगता है- खेल नफरत का खेला सियासत ने वो, जिस्म चीरे गये सर उछाले गये से उठकर सियासतदारों पर खून पीते हैं, पिलाते हैं हलाहल, वो सियासी दोमुँहें पाले पड़े हैं और ये उनकी हॉबी है- हुक्मराँ इस शहर का आखेट का शौकीन है। (कृपया, शहर को देश समझें)
 दो खास पहचानें सियासत की, जो काव्य-अभिव्यक्ति में खासी मुश्किल व विरल हैं। पहली में है ऐतिहासिक चेतना के साथ भयंकर व्यंग्य- फूट डालो, करो राज, लूटो मजे, दुश्मनों की सियासत को भूले नहीं। ऐसा एक शेर में तो शायद ही कहीं कहा गया हो। और दूसरी में है खास शख्सियतों की एक युति की तरफ खूबसूरत इशारा -नाचती है खुद, नचाती भी हमें है रात-दिन, तखत पे दिल्ली की कठपुतली कोई आसीन है।        
लेकिन राजनीति का वो सबसे शातिराना काम, जिसके समक्ष उक्त सब कुछ फौरी साबित हो जाता है और जिसे राकेश के अलावा किसी ने शायद ही उद्घाटित किया हो और ऐसी सफाई व मसर्रत से, वो है- थमाकर झुनझुना जम्हूरियत का मुझको जालिम ने, मेरे होठों से हंसकर छीन ली ललकार की भाषा।  यूं बोलने की मसर्रत ही नहीं छीनी, किसी काम का न रहने देने का बेबाकी भी दर्ज है।
कमजर्फ  सियासत ने निकम्मा बना दिया,
 हक छीन के ले लेने का फन भूल गये हैं
इसी रौ में आज की मजहबी राजनीति (राजनीति ने ओढ़ रखा है, क्यों मजहब का खोल पता है), और राजनीतिक मजहब (शेख-बरहमन दोनों खुश हैं, धर्म ने शक्ल सियासी ली है) का जगजाहिर राज फाश होता है और यह सच भी - कुर्सियों का नहीं कोई मजहब, दैर ढह जाये या हरम टूटे।
अब क्या जरूरत है 1992 जैसी तमाम वारदातों के तथ्य बताने की?
और इसी का दूसरा पक्ष मजहब की जानिब से-
शेख-बरहमन दोनों हुए सियासतदाँ, दैर-हरम, गीता-कुरान की चिंता है।    
प्रवचनों और पोथी-पाठों के नकलीपने व भीतर छिपी असली वृत्ति का मर्म एकसाथ यूँ खुलता है- जुबाँ की अहमियत क्या है, बरहमन-शेख क्या जाने, उन्हें आती है ले-देकर फकत तकरार की भाषा।
यह तकरार जुनूनी बनकर बढ़ती हुई आतंकी खून-खराबे तक पहुँचती है- खून से धोते हैं धब्बे खून के, वहशियों का तौरे मातम देखिए।        
इन मजहबी षड्यंत्रों-पचड़ों के बीच से धर्म की असली बात भी शायर बताता है- हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई बस इतना जान लें, आदमीयत की इबादत आदमी का दीन है।
इन सबके साथ तलब छाँव की में आये हैं थैलेशाह । आज भी ये मुल्क थैलाशाहों के आधीन है और सेठों के घर मुल्क रेहन, भूल गये हैं। इनके सिक्कों के नाम बदलते हैं- डॉलर से निपटूं, तो रूबल आता है पर लूट का इक बाजार बना है मुल्क मेरा, की हकीकत नहीं बदलती।
सो, उक्त राजनीति, धर्म व साम्प्रदायिकता के साथ इन्हें जोड़ दिया जाये, तो शोषण-तंत्र का वह वृत्त पूरा हो जाता है, जिनसे आज का यह मंजर बना है और जो शायर राकेश की ज़हीन पीड़ा है -गमे दुनिया गमे दौरां से है नाशाद दिल मेरा। और इसमें उसकी चेतना एवं चिंता उस अवाम के साथ है, जो सब कुछ का कत्र्ता है, पर वही बेसिक जरूरतों तक से वंचित है- इससे भद्दी और ठिठोली क्या होगी, दहकां की थाली में रोटी बासी है।
ये विडम्बनाएं व विसंगतियां ही आज के युग की त्रासदियां हैं। और किसी भी जहीन रचनाकार की तरह  जाहिर तौर पर इसी को तलब छांव की में सबसे अधिक स्थान का अधिकार मिला है। पृष्ठ 17, 18, 19, 22, 26, 29, 30, 46, 60, 71 आदि पर आयी लगभग पूरी की पूरी गज़़लें व्यवस्था की मनमानियों, अंतर्विरोधों, नाकारेपनों से उपजी विडम्बनाओं, विद््रूपताओं और बदहालियों पर आधारित हैं। और यूं तो 70 पृष्ठों की इस कृति में शायद ही कोई गज़़ल हो, जिसमें इस दंश के एक या एकाधिक शेर न हों। इनमें मूल्यहीनता की गत्र्त में बिल्बिलाता आज का पूरा जलजलाता परिदृश्य आंखों के सामने नाचने लगता है - घर का रख-रखाव उनके हाथ, जिनकी रग-रग में बेशऊरी है।
               कोई और है, मैं नहीं आदमी वो, मेरे धड़ से सर जिसका जोड़ा गया है।
               रोटियों के लिए बेटियां बिक गयीं, हो गयीं किस कदर कीमती रोटियां!!   
    है नये रूप में शिकारी अब, हाथ में ढेला-ओ-गुलेल नहीं।
ये तो रहीं जीवन वास्तवों की बातें, जो देखी-जानी-समझी हुई हैं और बड़े पते की हैं। सच्ची बातें। जरूरी बातें, साहित्य व कला की प्रेरक-निर्माता बातें। इनमें गजब का ऐतिहासिक चौकन्नापन या सजगता (सौंप रहे खुसरो को दादू भाषा मेरी, वाली तथ्यगत भूल के अलावा) है जो किसी भी जहीन शायर के लिए जरूरी होती है। यह राकेश में आयत्त (इम्पोर्टेड)नहीं, सुनियोजित भी उतनी नहीं, जितनी उद्भुत (इनीशिएटेड) है, बल्कि सन्निहित (इनबिल्ट) है। लेकिन इस स्थिति पर बात रुकती नहीं। ये तो छाँव की तलब के कारण हैं। यहीं बात रुक जाती, तो राकेश अच्छा शायर जरूर होता, पर बड़ा शायर होने की वे सम्भावनाएं न बनतीं, जो उसमें पनपी हुई देखी जा सकती हैं। वह मुकाम है, उसका प्रतिसंसार, जो न जीवनेतर है, न महत्तम। न उसमें धरती पर स्वर्ग उतार लाने की फैंटेसी है, न धरती को स्वर्ग बना देने का खयाली पुलाव वाला दिवास्वप्न, याने इनमें बड़े सपनों की असम्भव बातें नहीं, वरन छोटी-छोटी बातों से मिलकर बनते भले समाज के बड़े सपने हैं- मामूली चीजों के देवता जैसा। यह वैकल्पिक संसार मासूम तमन्नाओं एवं पुरजोर इरादों से लबरेज है- एक नया इंसां गढऩा मकसद है मेरा, एक नयी दुनिया का ख्वाहिशमन्द हूँ लोगों।
वह नया इंसान बस इतना करे कि सच को सच, झूठ को झूठ लिखा करे, ऐसे भी कुछ रिसालों की दरकार है। और उस नयी दुनिया में बस इतना हो कि न हो छोटा-बड़ा कोई बराबर हों सभी इन्साँ बनायें आओ ऐसा इक नियम दुनिया के बारे में।  ऐसी दुनिया तक पहुँचने के लिए तलब छाँव की में कई तरतीबवार माकूल सोपान हैं- पहले सोपान पर बेजा हालात में भी जिन्दा पुरजोर आशाएं हैं, हौसला जीने का हममें सौगुना है।   
   जमीं को नापने का हौसला रखते हैं पाँवों में, फलक के वास्ते एक हसरते परवाज़ लाये हैं।
फिर है अवाम में आस्था -बदल देंगे इक दिन नसीबा वतन का, यकीं कीजिए बदनसीबों के बच्चे।  
बदलावों की सुचिंतित चेतना है।
 वक्त की धार को रख दें जो मोडक़र, खल्क को उन जियालों की दरकार है।
फटा पड़ता आक्रोश है- मेरे आरिज़ झुलसे हैं मालूम है क्यों, मेरी आंखों से तेजाब बरसता है
विरोध के तेवर हैं- पत्थरों का दोस्त अब तो पत्थरों से दे जवाब, पत्थरों पर गालियों का कुछ असर होता नहीं और दुश्मन हैं जो जोर-जुल्म के हम उनके साथी हैं साहब।
 संघर्ष का जज्बा है- हम अपना अधिकार समझते हैं उसको, हक की खातिर जंग हर घड़ी करते हैं।
 इन सबकी मंजिल बगावत है और उसके लिए शहादत तक की तैयारी है। राकेश को दुनियावी चलन मालूम है कि हर शख्स से दुनिया में बगावत नहीं होती, पर सर हथेली पे लेकर के फिरते हैं हम, अपने तौर-ए-बगावत को भूले नहीं, की फितरत पर यकीन अभी बाकी है। हमें तो खाक-ए-मक्तल की तलब है, शहादत से बड़ा मनसब नहीं है और मुझ पे मत रो ऐ शम्मे वतन, मिट के ही खुश पतंगा रहे।       
अब आलेख के अंतिम चरण में कुछ रचना-विधान की बातें- जीवन और युगबोध के स्तर पर राकेश शर्मा ने जिस तरह अपने पहले की स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी शायरी के दो रहनुमाओं दुष्यंत-अदम की राहों के बीच से अपनी राह बनायी, उसी तरह भाषा के स्तर पर भी दोनों के बीच से गुजरते हुए अपने औजार गढ़े। दुष्यंतजी ने उर्दू शब्दों का इरादतन कम इस्तेमाल करके और उसकी जगह शुद्ध हिन्दी (जु़ल्फों तक चला आया, न कहकर अलकों तक चला आया) शब्द को रवां करते हुए हिन्दी गज़़ल की अलग पहचान बनाने का ऐतिहासिक कार्य सुनियोजित रूप से किया। इस प्रयत्न में उन्होंने उर्दू शब्दों के हिन्दीकरण (शह्र की जगह शहर) का उल्लेख भी भूमिका में किया। लेकिन अदम ने उर्दू शब्दों से परहेज न करते हुए भी हिन्दी गज़़ल की स्वरूपगत पहचान बनायी। वहीं राकेश ने उर्दू शब्दों को आने दिया, बल्कि फिक्र से अफ्कार व मंजर से मनाजिर जैसे प्रयोग भी मुलाहिजा हुए, पर आम व शुद्ध हिन्दी शब्दों को बढ़ा दिया, जो पुन: शायद आपोआप ही हुआ -
इक आयातित चमक-दमक ने, आँख सभी की चुँधिया दी है
और धधकता हो सीने में लावा-सा जिसके, वो आँखों से आँसू निचोड़े तो कैसे।
राकेश में लोक शब्दों की बहुतायत (ठेंठ ठिठोली, ठोंक-टोक देना) जैसे शब्दों की छौंक व रोजमर्रा के मुहावरों की रवानगी आदि मिलकर हिन्दी गज़़ल का संस्कार देने में सहज भाव से बड़ी कारगर भूमिका निभा रही है।
खूबसूरत बहर में गज़़लगोई का फन राकेश में खूब है, पर उसमें भी कुछ तो सुभानअल्लाह जैसी बन पड़ती हैं- कुछ ऐसे मनाजिर से आँखे लड़ी हैं, कलेजे में कल आजकल थोड़ा कम है। इसमें बहर की गति की मसर्रत के साथ नौटंकी के किसी ठसक वाली धुन (खुदा ने गर चाहा, बहुत जल्द शादी, हो जाये रश्क कमर धीरे-धीरे) की अनक बड़ी प्यारी है। यूँ आँखें लडऩा व कलेजे में कल पडऩा के मुहावरे और कल आजकल के प्रास के साथ कल की अनुपमेय लोक-प्रयुक्ति को भी मिलाकर महसूस करें, तो कविताई का तह तक का मजा है इसमें। काश, तमाम पंक्तियों के ऐसे ही विवेचन का अवकाश होता!!    
बात के होने न होने के विरोधाभास से बनती गज़़लें काफी हैं, जो अपनी बुनावट में विरल लुत्फ देती हैं- तीरगी है कि तिलिस्म कोई, शमा जलती है, रोशनी भी नहीं।
यह विरोधाभास प्रश्न बनकर आता है, तो अलग तरह से भाता है-
जो हो साथ लहरों के बहने का आदी, वो तूफान के रुख को मोड़े तो कैसे?
प्रश्न लाचारी बनकर आता है, तो बेबसी का भी अपना मजा है
मैं औरों सा नहीं, औरों को अपना सा समझता हूं, मेरे अहसास की पेचीदगी का क्या किया जाये?
निशां अपने होने का छोड़े तो कैसे, अकेला चना भाड़ फोड़े तो कैसे!!      
गालिबाना प्रभाव पैदा करती उलाहने व आक्रमणकारी प्रश्न शैली अभी राकेश को ईजाद करनी बाकी है-
जबकि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद, फिर ये हंगामा ऐ खुदा क्या है?
पक्ष-प्रतिपक्ष का अहसास कराते संवाद हमेशा प्रभावी होते हैं और राकेश के रदीफ-काफिये संवाद करते हैं, जिसमें कोई एक वर्ग या फिर पूरा अवाम सामने होता है-
बेशक फुटपाथी हैं साहब, मुल्क की हम थाती हैं साहब और हमें खरीद ले दुनिया में दम नहीं साहब।
बेचते फिरते हैं जो अपना जमीर, उनके हाथों में है परचम देखिये आदि आदि।
अपनी गढऩ से लय बनाते रदीफ. काफिये -
लश्कर से उलझता हुआ दस्ता है हमारा, बस्ती के दुखों से भरा बस्ता है  
गति में ठसक देते रदीफ-काफिये बड़ी पकी संवेदना के हमसफर बनकर आये हैं-
सितम झेलते कमनसीबों के बच्चे, जहर बेचते हैं तबीबों के बच्चे।     
तलब छाँव की में आयी ऐसी उल्लेख्य नेमतों का आकलन करते रहना समीक्षा का कृतकार्य होना होगा। गालिब के बीमार व चारागार के गाढ़े इश्किया प्रतीक को समाजोन्मुख व सरोकारयुक्त बनाने के राकेश के संस्कार-कौशल से इस विवेचन का उपराम करें- मेरे आजार का उपचार किस मुँह से करेगा वो, जो चारागर समझता ही नहीं बीमार की भाषा तो यह भी कहना होगा कि अभी राकेश को बहुत काम करना बाकी है, जिसके बिना उसकी वैसी शिनाख्त, जिसके काबिल है वो, नहीं हो पायेगी। उसकी बेपरवाही, मस्ती, बिन्दासपन और गज़़लों (आम कविता में तो उतनी दिखी नहीं) में उसकी ऐसी ही मस्ती भरी रुचि, यदि उसके शायर की उपलब्धि है, तो यही उसकी सीमा भी है। इतने से यहीं तक ऐसा ही व इतना ही हो सकता है, जितनी तलब व छाँव राकेश के यहां हुई है। इस बुनियादी वृत्ति, जिसे काव्यशास्त्र में प्रतिभा कहा गया है, के साथ जिस साधना और सन्नद्धता (काव्यशास्त्र की भाषा में अभ्यास) की दरकार होती है, वह राकेश और आज के शायरों की वृत्ति नहीं।
अस्तु, जितनी और जैसी है, उतने और उसी के आधार पर कुछ और तलबों और छांवों की उम्मीद तो राकेश से की ही जा सकती है, बशर्ते अभी-अभी अपनी घरू पत्रिका (चिंतन-दिशा) में छपी गज़़ल में शेरों की गिनती के रेकॉर्ड लिए हुई खींचातानी जैसी वृत्ति से बचे रह जायें।