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Tuesday 21 Nov 2017

बाबरी मस्जिद और सिख दंगों के समय भी विरोध किया था

रोहित कौशिक
टी-7 ,एकता अपार्टमेन्ट
कुबेर स्कूल के सामने ,रुडक़ी रोड
मेरठ (उत्तर प्रदेश)
मो. 09917901212


लब्धप्रतिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी से रोहित कौशिक की बातचीत
प्र.वाजपेयी जी ,साहित्यिक विधाओं में आप कविता को किस जगह रखते हैं?
हो सकता है कि इस जमाने में कविता सबसे पिछड़ी विधा हो तथा बाकी और विधाएं आगे निकल गईं हों। लेकिन साहित्य की हजारों वर्ष की जो बड़ी परम्परा है, वह तो मुख्यत: कविता की परम्परा है। यह सही है कि हमारे जमाने में गद्य का बहुत विकराल विस्तार हुआ है। तो मैं नहीं समझता कि विधाओं के बीच कोई आगे-पीछे का भाव उचित या नैतिक या बौद्धिक रूप से बचाव करने लायक है। एक अच्छा कहानीकार सत्रह खराब कवियों से बेहतर है, आगे है। ठीक उसी तरह से जैसे एक अच्छा कवि चार उपन्यासकारों से बेहतर है। तो हमारे मित्रों ने विधाओं को लेकर जो विवाद खड़ा किया था, मुझे उसमें कोई विशेष तत्व नजर नहीं आता।
प्र: इस दौर में जिस तरह से सपाटबयानी को एक काव्य मूल्य के रूप में स्थापित किया जा रहा है, उस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
देखिए मैं सपाटबयानी शब्द का इस्तेमाल करने वालों में सबसे पहले हूं। उस जमाने में जब कविता में बिम्ब आक्रान्त और अलंकारिकता से परिपूर्ण था, तो उससे मुझे लगा कि सपाटबयानी बेहतर है। वो हमें सच्चाई के ज्यादा नजदीक ले जाती है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि जो एक समय में उचित था, वह हर समय उचित हो। अब भाषा के बहुत सारे गुण हैं, बहुत सारी शक्तियां हैं, जिनका कविता को इस्तेमाल करना चाहिए। उनमें से एक सपाटबयानी भी है। लेकिन अगर आप बाकी जो उसके गुण हैं, शक्तियां हैं, उनको निरुपयोग में डाल दें, उनका उपयोग न करें तो इससे भाषा की जो अपनी कल्पनाशक्ति है, उसको आप सीमित कर रहे होंगे। अब मुझे लगता है कि सपाटबयानी का जमाना बीत चुका। अब कविता को सपाटबयानी छोड़ कर दूसरी तरफ  जाना चाहिए।
प्र: आज समकालीन हिन्दी कविता के समक्ष किस प्रकार की चुनौतियां हैं?
देखिए हर समय एक बड़ी चुनौती तो कविता के सामने यही है कि जैसी भी परिस्थिति हो वह कविता बनी रहे। कविता पर डोरे डालने वाले बहुत हैं, यानी विचारधाराएं हैं ,संस्थाएं हैं और अनेक किस्म के लोकप्रियता के प्रलोभन हैं, सम्प्रेषण के नए प्रकार हैं। इन सबके चलते कविता को अपने सत्व को बचा सकना चाहिए। सबसे बड़ी चुनौती तो यही है। दूसरी गद्य की बहुत बड़ी चुनौती है। गद्य का जितना विस्तार हुआ है और गद्य जितने रूपों में हमारे समाज और समय में हैं, उतने रूपों में कभी नहीं रहा। तो जाहिर है कि कविता के सामने एक चुनौती यह है कि वह बिना गद्य हुए कैसे कविता बनी रहे। कुल मिलाकर पिछले पचास-साठ वर्षों में हमारी कविता ने ठीक से जो भूमिका निभाई है वह भूमिका है प्रतिरोध की। यानी हमारा काम लोकतंत्र में रहकर भी लोकतंत्र का प्रतिरोध करना है। तो वह कविता ने किया है और प्रतिरोध भी एक तरह का सत्यापन है।
प्र: वाजपेयी जी, इस दौर का कवि अपने देशकाल के ज्वलंत सन्दर्भों के साथ कितना जुड़ पा रहा है?
मेरा ख्याल है कि हर कवि के सामने तीन-चार प्रसंग अनिवार्य रूप से मौजूद रहते हैं। पहला प्रसंग उसके समय का लेकिन उस पर छाया रहती है काल की। सिर्फ  हमारा समय नहीं, वो सारा समय जो हुआ है। दूसरा समाज के अनेक दबाव, अनेक चुनौतियां हैं। लेकिन कवि दृष्टि तो एक सामाजिक वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में भी सोचती है। एक सपना देखती है बदलाव का, विकल्प का। तीसरी चुनौती है भाषा की। भाषा को कैसे बचाया जाए। खासकर हमारे समय में भाषा का ऐसा अवमूल्यन, ऐसा प्रदूषण है कि भाषा बचा सकना भी अपने आपमें बहुत जरूरी सांस्कृतिक और सामाजिक कार्य है, कर्तव्य है। तो कविता को यह भी करना होता है। तो यह बहुत कुछ कवि कौशल पर, कवि की प्रतिभा पर निर्भर करता है। मुझे लगता है कि आजकल के ज्यादातर कवि अकेलेपन से घबराते कवि हैं। अकेला पड़ जाने से बहुत घबराते हैं। दरअसल संसार को और कविता को भी उन्हीं लोगों ने बदला है जो जब तब अकेले होते रहे और अकेले होने से घबराते नहीं रहे।
प्र: भूमंडलीकरण के इस दौर में भाषा को कैसे बचाया जा सकता है? पहले आम जनता अखबारों के भाध्यम से भाषा सीखती थी लेकिन इस दौर में अखबारों में जिस तरह के शब्द प्रयोग हो रहे हैं, उन्हें देखकर केवल अपना माथा पीटा जा सकता है। क्या भाषा को बचाने में अखबारों की कोई भूमिका हो सकती है?
अखबारों की भूमिका हो सकती है लेकिन इस समय तो वह बहुत ही निन्दनीय है। इस समय भाषा बिगाडऩे का काम जो संस्थाएं कर रही हैं, उनमें सम्भवत: सबसे आगे मीडिया है। चाहे वो इलैक्ट्रानिक हो या प्रिन्ट मीडिया हो। देखिए भाषा परिवर्तन के प्रति हमेशा खुली रहती है। जो भी भाषा जीवित या जीवंत है, परिवर्तन के प्रति खुली रहती है। पहली बार नहीं है कि हम विदेशी शब्दों को या विदेशी अभिव्यक्तियों को आत्मसात कर रहे हैं। हमने संस्कृत से तत्सम् शब्द लिए तो बहुत सारे तद्भव हमने बनाए। लेनटर्न अंग्रेजी का शब्द था उसे हमने लालटेन कर दिया। ऐसे बहुत सारे शब्द हमने लिए। तो शब्दों और अभिव्यक्तियों को लेना बुरा नहीं है। लेकिन वह हम अपनी भाषा की मर्यादा के भूगोल में लें। उससे भाषा का जो बुनियादी संगठन है, वो तो क्षत-विक्षत नहीं होना चाहिए, जो कि आज हो रहा है। अब इससे लडऩे का उपाय क्या हो, तो आप उसकी कोई योजना तो बना नहीं सकते सिवाय इसके कि हर लेखक को वो जहां भी है, उसे अपने काम का यानी अपने सृजनात्मक, बौद्धिक उद्यम का एक अनिवार्य हिस्सा भाषा को बचाने में लगाना चाहिए। इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए कि इस कारण उसकी कितनी अवहेलना या अवज्ञा होगी। होगी सो होगी। लेकिन अगर हम भाषा नहीं बचाएंगे तो कौन बचाएगा।
प्र: इस दौर के अधिकतर कवि अपनी कला और संस्कृति को जाने बगैर ही कविता रच रहे हैं। कला और संस्कृति कविता को किस प्रकार पोषित करते हैं?
जैसा कि प्रश्न में निहित है, यह समय बहुत ही अपढ़ समय है। हालांकि पढऩे की सामग्री तो अधिक है लेकिन इतने अपढ़ कवि या लेखक हिन्दी में पहले कभी नहीं हुए जितने आज हैं। वो न तो परम्परा पढ़ते हैं, न हमारे क्लासिक्स पढ़ते हैं और न हमारे बड़े कवियों या लेखकों को पढ़ते हैं। उनका जब-तब इस्तेमाल वैधता की तलाश में भले कर लें लेकिन उनसे कोई सृजनात्मक रिश्ता या संवाद नहीं बनाते हैं। तो बहुत ही ज्यादा अपढ़ लोग इस समय लिख रहे हैं। इतने कम पढ़े-लिखे लोग साहित्य में पहले कभी नहीं थे। यानी या तो वे पुस्तक पढक़र पढ़े लोग होते थे या अपनी परम्परा में होकर पढ़े होते थे, अपनी परम्परा को ग्रहण करते थे। इसलिए हमारे समय में साहित्य का एक काम, यह जो कला-संस्कृति परम्परा का बोध है, इसकी जो बहुलता है, इसकी जो विपुलता है, उसको बनाए रखने का है। अब इसे कैसे करें, यह हर कवि-लेखक अपनी तरह से तय करे।
प्र: वाजपेयी जी, साहित्य और कला में स्त्री या दलित लेखक को कोई छूट मिलनी चाहिए या नहीं?
छूट तो देखिए किसी को नहीं मिलनी चाहिए। मैंने बहुत पहले वक्तव्य दिया था, जिसको लेकर बहुत मारा-मारी हुई थी। साहित्य एक कसाईखाना है, उसमें आप किसी चोर दरवाजे से प्रवेश नहीं कर सकते। आपको प्रतिभा के बल पर ही आगे बढऩा है, नहीं तो प्रतिभा मारी जाएगी। एक निर्ममता, एक जरूरी निर्ममता जो कि वस्तुनिष्ठता का प्रमाण है, जरूरी है। आप स्त्री हैं या दलित हैं इसलिए आपको कोई रियायत दे दी जाए मैं इसके पक्ष में नहीं हंू। अच्छी स्त्रियां तथा अच्छे दलित लेखक ऐसी रियायत मांगते भी नहीं हैं। हमारे जो बड़े लेखक हैं, दो नाम ले लीजिए स्त्रियों के मसलन महादेवी वर्मा और कृष्णा सोबती, इन्होंने अपने लिए कभी रियायत नहीं मांगी कि हम स्त्रियां हैं। लेकिन स्त्रियां बोल रहीं हैं। सदियों तक चुप रहने के बाद बोल रही हैं। यह सांस्कृतिक रूप से, सामाजिक रूप से बहुत बड़ी घटना है कि जो लोग खामोश थे, वे बोल रहे हैं। इसलिए उनको बोलने के अवसर बराबर दिए जाने चाहिए। जहां तक दलितों का प्रश्न है तो डॉ. तुलसीराम की आत्मकथाओं को ले लीजिए। अब वो दलित हैं लेकिन उनकी आत्मकथाएं किसी भी गैर-दलित स्वर्ण लेखक के समकक्ष रखी जा सकती हैं। इसमें किसी तरह की रियायत न तो वो मांग रहे हैं और न उन्हें कोई दे रहा है। हम लोग उनकी प्रशंसा इसलिए कर रहे हैं कि इतनी अद्भुत आत्मकथाएं हिन्दी में लिखी ही नहीं गईं हैं।
प्र: भारत भवन और महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं की स्थापना में आपका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। जिन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बड़े ही जतन से आपने इन संस्थाओं की स्थापना में अपना योगदान दिया था, क्या इस दौर में ये संस्थाएं अपने उन उद्देश्यों को पूर्ण कर पा रहीं हैं।
देखिए मैं सम्भवत: हिन्दी अंचल का सबसे बड़ा संस्था निर्माता हंू। इतनी बड़ी संस्थाएं बहुत कम लोगों ने बनाईं हैं। मुझे सौभाग्य मिला कि मैं उन्हें बना सकूं लेकिन हिन्दी अंचल में अपनी संस्थाओं के प्रति न तो लगाव है और न उनके संचालन या भविष्य या उत्तराधिकार की कोई चिन्ता है। भारत भवन हिन्दी अंचल में ही बन सकता था। क्योंकि अगर कोलकाता में बनता, बंगलौर में बनता तो उस पर बंगाल या कन्नड़ का प्रभाव होता, वो अखिल भारतीय न होता। तो एक तरह की अखिल भारतीयता हिन्दी में ही सम्भव है। लेकिन दूसरी तरफ  हिन्दी में संस्था चलाने का हुनर नहीं है। अगर वह व्यक्ति वहां से हट जाए या हटा दिया जाए, जैसा कि हम लोगों के साथ हुआ, तो वे संस्थाएं ध्वस्त हो जाती हैं। यह अपने आप में उचित या ठीक नहीं है। संस्थाओं को इतना व्यक्ति निर्भर नहीं होना चाहिए। लेकिन अब क्या किया जाए, हमारे यहां ऐसी स्थिति है। तो मैं एक तरह से संस्था निर्माता भी हंू लेकिन उनकी विफलता का हिन्दीभाषी होने के कारण विधायक भी हूं। क्योंकि हिन्दी भाषा अपनी संस्थाओं को नष्ट करने वाली भाषा है। सिर्फ  इन्हीं संस्थाओं के साथ ऐसा नहीं हुआ। ऐसा नागरी प्रचारिणी सभा और हिन्दी साहित्य सम्मेलन के साथ हुआ जो कि सरकारी संस्थाएं नहीं थीं। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान और बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के साथ भी यही हुआ।
प्र: आपने अपने एक कविता संग्रह में लिखा है - मैंने सारा जीवन कविता की पांच जिल्दें लिखीं हैं: प्रेम, मृत्यु ,घर ,कला और संसार की जिल्दें। मुझे लगता है कि इन पांचों जिल्दों में समस्त सामाजिकता और सांसारिकता समाहित है। इसके बावजूद आपको देह और गेह का कवि मान लिया गया?
अब मान लिया गया तो मान लिया गया। इसमें मैं क्या कर सकता हंू । मैं कहां-कहां मनवाता फिरूं कि भैय्या हमने जितना प्रेम पर लिखा है उतना मृत्यु पर भी लिखा है। उतना कलाओं पर भी लिखा है। ऐसा है कि हिन्दी में और शायद हर भाषा में ऐसा होता होगा। कुछ सामान्यीकरणों का प्रचलन हो जाता है। उसमें से एक सामान्यीकरण यह था कि मैं देह और गेह का कवि हूं। उस समय मुझसे किसी ने पूछा तो मैंने कहा कि देह और गेह का कवि होना क्या बुरी बात है। अगर मैं सिर्फ  प्रेम कवि ही रहता तो मुझे भी लगता कि मेरी सामाजिकता या सांसारिकता में कोई कटौती होती। मैंने समाज के लिए जितना किया है, उतना मेरे समकक्ष किसी और ने किया हो तो आप बता दें।
प्र: वाजपेयी जी, आज छन्दमुक्त कविता जीवन के विभिन्न पहलुओं पर बात करते हुए ज्यों-ज्यों अपना दायरा बढ़ा रही है, त्यों-त्यों उसका सामाजिक दायरा सिमटता जा रहा है। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
यह हिन्दी में एक विडम्बना है कि जब साहित्य ने समाज से सीधे उन्मुक्त होना शुरू किया तो समाज ने उसकी बेरूखी करनी शुरू कर दी। यह विचित्र विडम्बना है। छायावाद तक कोई समाज-समाज नहीं चिल्लाता था और लोग छायावादी कवियों को मानते थे, उनको पढ़ते थे और समझते थे। लेकिन अगर हिन्दी में 60-70 साल से मुक्त छन्द का वर्चस्व है तो मैं मुक्त छन्द को हिन्दी का जातीय छन्द कहता हंू। ऐसा तो नहीं हो सकता कि 70 साल तक लोग मुक्त छन्द में पागल हैं। अब हिन्दी समाज को इसको मानने में कठिनाई है, संकोच है। असल में तो हिन्दी साहित्य जो है, वो हिन्दी समाज का सच्चा राजनैतिक प्रतिपक्ष है। इस समय कोई राजनैतिक प्रतिपक्ष हिन्दी अंचल में नहीं है। सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे नजर आते हैं। मैं बरसों से यह कह रहा हंू कि साहित्य प्रतिपक्ष है और क्योंकि प्रतिपक्ष में आपकी दिलचस्पी कम होती है। आपकी दिलचस्पी सत्ता में अधिक है। हिन्दी साहित्य को जिस एक चीज ने इस बीच बचा रखा है, वो है उसका सत्ता विरोध। यानी हिन्दी में ऐसे लेखक नहीं के बराबर हैं, जिन्होंने सत्ता का समर्थन किया हो। ऐसे कुछ लोग हैं जो सत्ता के निकट आएं हैं लेकिन उनके साहित्य में सत्ता का समर्थन नहीं है ।
प्र: क्या छन्द में ही आधुनिकता और समकालीनता लाने का प्रयास नहीं हो सकता। क्या आपको लगता है कि छन्द की वापसी से हिन्दी के पाठकों और श्रोताओं को पुन: कविता से जोड़ा जा सकता है?
छन्द को गंवाना एक गम्भीर क्षति है, इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन वो वापस कैसे आए, यह सोचना होगा। वापस आने पर लोग जुड़ पाएंगे, ऐसा कहना कठिन है। ये तो दरअसल अटकलें हैं। छन्द में जो कविता लिखी गई है ,वह बहुत ही सतही, भावुक और लिजलिजी या तो एक स्तर पर घटिया भदेस किस्म का हास्य या दूसरे स्तर पर एक बहुत ही अजीब किस्म की भावुकता से परिपूर्ण है। तो ये तो छन्द के स्वाभाविक गुण नहीं हैं। छन्द का पुनराविष्कार एक कठिन मामला है। उसका पुनराविष्कार भी करें और उसे समकालीनता का संवाहक भी बनाएं, यह एक बड़ी चुनौती है। लेकिन देर-सबेर हमें इस चुनौती का सामना करना चाहिए।
प्र: वाजपेयी जी, हिन्दी समाज साहित्य और कला के प्रति उदासीन क्यों है?
देखिए मैं इसका भी रोना बहुत वर्षों से रो रहा हंू। हिन्दी साहित्य का जो सांस्कृतिक क्षरण है, वह लगभग पिछले 40-50 वर्षों की दुर्घटना है। शास्त्रीय संगीत के लगभग सभी घराने हिन्दी क्षेत्र में थे। ग्वालियर, आगरा, लखनऊ, बनारस, पटियाला, जयपुर, अतरौली- ये सब उत्तर भारत के शहरों के नाम पर हैं लेकिन पिछले पचास वर्षों में बंगाल और महाराष्ट्र ने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को बचाया है। अब ग्वालियर में ग्वालियर नहीं है, आगरा में आगरा नहीं बचा है, बनारस से बनारस गायब हो रहा है, जयपुर, अतरौली का जयपुर, अतरौली में पता नहीं। ये सारे घराने और इनके अच्छे संगीतकार आज या तो मराठी हैं या बंगाली। हिन्दी रंगमंच के जो सबसे बड़े नाम हैं, उनमें अधिकांश गैर हिन्दीभाषी हैं। हबीब तनवीर, एमके रैना, बंसी कौल- इन सबकी मातृभाषाएं हिन्दी नहीं हैं। आप अगर 25 महान चित्रकारों की सूची बनाएं जो भारत के हैं, उनमें से कुल चार हिन्दी क्षेत्र से हैं। मकबूल फिदा हुसैन, सैयद हैदर रजा, रामकुमार और सुबोध गुप्त। हमारी संस्थाओं की हालत देख लीजिए। हमारी सभ्यता समीक्षा की हालत देख लीजिए। हिन्दी में ज्ञानोत्पादन नहीं के बराबर है। कोई बड़ा इतिहासकार हमने पैदा नहीं किया। कोई बड़ा अर्थशास्त्री हमने पैदा नहीं किया। कोई मनोवेत्ता पैदा नहीं किया। कोई विचारक पैदा नहीं किया। बाबा जैसे लोग पैदा कर दिए, जो अध्यात्म की खुराकें बांटते फिरते रहते हैं। तो हिन्दी में सांस्कृतिक विपन्नता है। यह सारा काम साहित्य को करना पड़ रहा है जो उसका काम नहीं है। हमारी आलोचना बहुत आक्रान्त है दूसरे अनुशासनों से। उसका एक कारण यह है कि अगर आलोचना में विचार न हो तो फिर कैसे होगा। क्योंकि स्वतंत्र रूप से विचार करने वाले बहुत कम हैं। दर्शन इत्यादि में भी हमारी कोई भूमिका नहीं है। तो हिन्दी में एक बड़ी दिलचस्प बात यह है कि वामपंथी दृष्टि का बड़ा बोलबाला और कब्जा है। 80 प्रतिशत लोग उनमें से अपढ़ भी हैं, साहित्य की किसी न किसी माक्र्सवादी आस्था से अपने को जोड़ते हैं। पूरी हिन्दी अंचल की जो राजनीति है, उसमें वामपंथ की जगह जो थोड़ी-बहुत पहले थी भी, वो अब लगभग नगण्य हो गई है। तो साहित्य में आप ऐसे बैठे हुए हैं कि जैसे सारा समाज आप ही के कब्जे में है और समाज में आपकी कोई जगह नहीं बची। तो यह एक और विडम्बना है। तो इन सबने मिलकर हिन्दी का जो माहौल बनाया है, सो बनाया है।
प्र: कविता में सम्प्रेषण और अभिव्यक्ति के सम्बन्ध को आप किस रूप में देखते हैं ?
देखिए अभिव्यक्ति और सम्प्रेषण जो हैं, ये हमेशा कठिन होते हैं। कठिन मतलब जटिल होते हैं। आप क्या सम्प्रेषित करना चाह रहे हैं। अगर कोई सूक्ष्म या कोई अधिक जटिल अनुभव या सच्चाई का कोई अधिक जटिल अलक्षित अंधेरा हिस्सा आप सम्प्रेषित करना चाह रहे हैं, तो उसमें कठिनाई होगी। क्योंकि ज्यादातर पाठक या रसिक लोग ऐसी जटिलता या सूक्ष्मता के लिए न तो उत्सुक हैं, न तैयार और दीक्षित हैं। हमारे जो विश्वविद्यालय और उनके विभाग इत्यादि हैं, उनकी भूमिका इसमें और भी निन्दनीय है। क्योंकि उन्होंने तो साहित्य के रसिक भी पैदा नहीं किए, जो सूक्ष्मता और जटिलता को थोड़ी समझ और संवेदनशीलता के साथ देख सकें।
प्र: क्या आपको लगता है कि इस मशीनी युग में संवेदनाओं का विलोपन हो रहा है ?
देखिए संवेदना के विलोपन के लिए मशीनों को उत्तरदायी ठहराना उचित नहीं है। उत्तरदायी तो हम हैं। आखिर सारे संसार मे मशीनों का जो बोलबाला है, वह हमारे देश से कहीं अधिक है। मशीनों का उपयोग अफ्रीकी और यूरोपीय लोग हमसे कहीं ज्यादा करते हैं लेकिन उनके यहां इसलिए संवेदना का विलोपन तो नहीं हो गया। हमारे यहां अगर यह हो रहा है तो उसके लिए मशीन उत्तरदायी नहीं है। यानी हम सामाजिक रूप से एक समाज के रूप में भी उत्तरदायी हैं और व्यक्ति और जहां भी हम काम कर रहे हैं, वहां उत्तरदायी हैं।
प्र: वाजपेयी जी, इस दौर में साम्प्रदायिकता की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। क्या साम्प्रदायिकता हमारी कला, साहित्य और संस्कृति को प्रभावित कर रही है ?
देखिए साम्प्रदायिकता इन सबके लिए सबसे बड़ा खतरा है। क्योंकि हमारी अपनी परम्परा और हमारा आधुनिक साहित्य भी साम्प्रदायिकता का पक्षधर कभी नहीं रहा। उसके अधिकतर हिस्से को किसी भी तरह की धर्मान्धता या साम्प्रदायिकता या जातिवाद के विरुद्ध ही पढ़ा जा सकता है। लेकिन इसके बावजूद साम्प्रदायिकता बढ़ रही है, और यह हिन्दी का बड़ा दुर्भाग्य है। हिन्दी अंचल इस समय पिछड़ेपन, साम्प्रदायिकता, धर्मान्धता, छद्म अध्यात्म -इन सबकी गिरफ्त में है। और ये सब इसलिए साहित्य के सामने भी चुनौतियां हैं। ये सब मिलकर जो एक स्थिति बनाते हैं, उस स्थिति को हमारी परम्परा से, हमारे ज्ञान से और हमारे साहित्य से कोई समर्थन नहीं मिल सकता।
प्र: वाजपेयी जी, अनेक लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि आप लोगों ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस तथा सिख-विरोधी दंगों जैसी घटनाओं के समय साहित्य अकादमी पुरस्कार क्यों नहीं लौटाए? इस सम्बन्ध में आप क्या कहना चाहेंगे?
देखिए बाबरी मस्जिद के विध्वंस की घटना 1992 में हुई थी लेकिन मुझे 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। मैं उस समय सिविल सेवा में था। इसके बावजूद हम लोगों ने विरोध किया और अनेक लेखक अयोध्या गए। उस समय टेलीविजन जैसे साधनों की भी अपनी सीमाएं थीं। सोशल मीडिया भी प्रचलित नहीं था। लेखकों और कलाकारों ने तो आपातकाल ,सिख-विरोधी दंगे, पंजाब में उग्रवाद तथा गुजरात नरसंहार के समय भी इन घटनाओं का अपने-अपने तरीके से विरोध किया था। उस समय बहुत से लेखकों को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त नहीं हुआ था। इसलिए उस समय साहित्य अकादमी पुरस्कार न लौटाने की बात तर्कसंगत नहीं है। कुछ लोग यह कैसे तय कर सकते हैं कि हमें कब पुरस्कार लौटाना चाहिए और कब नहीं। पुरस्कार लौटाने के पीछे एक सोच यह भी थी कि असहिष्णुता के मुद्दे पर जनता का ध्यान आकर्षित हो। हमारे सामूहिक प्रयास से ही असहिष्णुता के मुद्दे पर संसद में बहस हुई। पुरस्कार लौटाने वाले विभिन्न भाषा-भाषी बौद्धिक बिरादरी से हैं। हममें से कोई भी किसी राजनैतिक दल से सम्बद्ध नहीं है। हालांकि राजनीति को लेकर हमारे सुनिश्चित विचार हैं। लेकिन भारतीय राजनीति जिस डगर पर बढ़ चली है, उसे लेकर बेहद चिन्तित हैं। आए दिन तमाम उदारवादी मूल्य और विचार, असहमति और संवाद की गुंजाइश और परस्पर सद्भाव तथा विवेकशीलता पर कुठाराघात हो रहे हैं। हिंसा के तमाम रूप और तरीके, भले ही वे धार्मिक और साम्प्रदायिक हों, उपभोक्तावादी और वैश्विक हों, जातिगत और सांस्कृतिक, सामाजिक और आंतरिक हों, नित बढऩे पर हैं। सन्देहों, भावनाओं को ठेस पहुंचाने तथा प्रतिबन्धों का सिलसिला आगे बढ़ाने में अनेक ताकतें जुटी हैं, जिन्हें सत्ता की शह मिल रही है। ऐसा करके उन्हें कानून का भी कोई डर नहीं रह गया है। हमारी परम्परा की विशेषता मात्र बहुलता ही नहीं रही है बल्कि संवाद और सहिष्णुता, सवाल उठाने और असहमति जतलाने, सार्वजनिक चर्चा, नूतनता के प्रति ललक और नीर-क्षीर परख जैेसे अवयव भी इसका हिस्सा रहे हैं। नए मुद्दों पर शास्त्रार्थ हमारे सार्वजनिक जीवन का अभिन्न और बेजोड़ हिस्सा रहे हैं, जिनके आधार पर विचारों को जांच-परख की कसौटी पर कसा जाता था। चर्चा या असहमति से भारतीय कभी भी भयभीत नहीं रहें। न ही नए विचारों के प्रति असहिष्णु रहे। हममें से कुछ सत्ता के सामने सच को बयां करने का महती कार्य ही कर रहे हैं। इसलिए हमने विरोधस्वरूप साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया है। हमने आमजन को बताना चाहा है कि हमारी स्वतंत्रता और स्वायत्तता पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। हम लेखक, कलाकार और बुद्धिजीवी इससे बेहद चिन्तित हैं।