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Sunday 19 Nov 2017

जो न होत जग जनम भरत को राज्यप्राप्ति की सूचना पर भरत की मन: स्थिति: विभिन्न रामायणों के संदर्भ से

 

डॉ. शोभा निगम
फव्वारा चौक
बैरन बाजार, रायपुर
मो. 9826947776

जो न होत जग जनम भरत को
राज्यप्राप्ति की सूचना पर भरत की
मन: स्थिति: विभिन्न रामायणों के संदर्भ से
भरत के विषय में वाल्मीकि अत्यंत सटीक बात कहते हैं कि वे धर्ममिव धर्मज्ञं देहबन्धम् अर्थात् देहबद्ध धर्म के समान धर्मज्ञ हैं। मानस में तुलसीदास ने भी इस रामानुज के लिये एक बड़ी सुंदर बात कही है -जो न होत जग जनम भरत को। सकत धरम धुर धरनि धरत को।। अर्थात् यदि संसार में भरत का जन्म नहीं होता तो पृथ्वी पर संपूर्ण धर्मों की धुरी कौन धारण कर सकता था? सचमुच राम-कथा में भरत का चरित्र अनुपम है। राम-कथा ही क्यों, समूचे विश्व-साहित्य में भरत का सा चरित्र मिलना कठिन है।
        रामकथा में भरत का अनुपम चरित्र तीन प्रसंगों पर विशेष रूप से झलकता है। पहला, जब उन्हें अयोध्या के सिंहासन की प्राप्ति की सूचना मिलती है, दूसरा जब वे राम को वापस लाने चित्रकूट जाते हैं और तीसरा जब राम 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटते हैं। प्रस्तुत लेख में हम भरत की तब की मन:स्थिति का अवलोकन करेंगे जब उन्हें कैकेयी अयोध्या का राजसिंहासन प्राप्त होने की सूचना देती है।
 राजसिंहासन की प्राप्ति किसी भी राजकुमार के लिये जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि, सबसे बड़ी प्रसन्नता होती रही है, किंतु भरत थे कि यह सूचना उन्हें मृत्यु से भी भयंकर पीड़ा देती है। गुरूजनों के कहने पर भी वे किसी तरह राजसिंहासन पर बैठने तैयार नहीं होते। प्राय: सभी रामायणकारों ने भरत की इस अवसर की मन:स्थिति का सुंदर चित्र खींचा है।
वाल्मीकि रामायण में रामानुज भरत विवाह के कुछ काल पश्चात् ही अपने मामा युधाजित् के साथ केकय देश चले गये थे। यहां युधाजित् विवाह के पूर्व ही भरत को केकय देश ले जाने अयोध्या आये हुए थे। भरत के विवाह-समारोह में तो वे अचानक शामिल हुए थे। विवाह भी तो अचानक ही हुआ था। जनकनंदिनी के स्वयंवर में राम ने शिवधनुष को तोडक़र सीता को पाया था किंतु जनक के आग्रह पर दशरथ उनकी अन्य कन्याओं उर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति से क्रमश: लक्ष्मण, भरत और शत्रुघन का उसी मंडप में विवाह करने तैयार हो गये थे। अस्तु, विवाह के बाद केकय कुमार के भरत को केकय ले जाने के आग्रह को तब दशरथ नहीं टाल सके। तब भरत के साथ सदा साये की तरह रहने वाले शत्रुघन भी प्रेमवश उनके साथ केकय गये थे।
अस्तु , मामा के महल में हर तरह की सुख-सुविधा होने पर भी भरत अपने वृद्ध पिता दशरथ की हमेशा याद करते थे। उधर दशरथ भी परदेश गये अपने पुत्रों की हमेशा याद किया करते थे। किंतु इधर कुछ समय से दशरथ को कोई दुश्चिंता सता रही थी। रात में उन्हें बुरे-बुुरे स्वप्न डरा रहे थे। इसीलिये अचानक ही वे राम का युवराज पद पर अभिषेक करने का निर्णय लेते तथा तत्काल इसकी तैयारी भी प्रारंभ करवा देते हैं।
इसके बाद की घटना से हम सभी परिचित है। अयोध्या के भावी राजा के रूप में राम का अभिषेक तो नहीं होता बल्कि उन्हें 14 वर्ष का वनवास मिलता है। अपने औरस पुत्र भरत से भी अधिक राम को प्यार करने वाली कैकेयी दशरथ से भरत के लिये राज्याभिषेक और राम के लिये 14 वर्ष के वनवास की मंाग करती है ताकि भरत अवध की राज्यलक्ष्मी का निर्विघ्न उपभोग कर सके...और इसमें  सफल भी होती है। किंतु राम ,सीता और लक्ष्मण के वन जाने के कुछ ही दिन बाद दशरथ राम की विरह-व्यथा में प्राणों का त्याग कर देते हैं...और फिर गुरू वशिष्ठ के आदेश पर भरत को लाने दूत केकय भेजे जाते हैं।
अवध की इस भारी उथल-पुथल से अनभिज्ञ भरत केकय देश में सुख-पूर्वक रह रहे थे। किंतु जिस दिन भरत को अयोध्या लाने अयोध्या से दूत केकय पहुंचते हैं ,उस दिन भरत बड़े उद्विग्न थे। वस्तुत: बीती रात्रि में उन्होंने पिता को लेकर बड़ा भयानक स्वप्न देखा था । इसी से वे बड़े दु:खी थे। पर दूतगणों ने उन्हें ऐसा कुछ नहीं बतलाया...केवल शीघ्र अयोध्या जाना है ,यह कह वे उन्हें अयोध्या लिवा ले गये।
बेचारे भरत! जिस बात का भय था वही वास्तविकता सामने आई। हमेशा गुलजार रहने वाली अयोध्या को श्रीहीन देखकर पहले से ही शंकालु भरत और भी अधिक डर गये। मनुष्य तो मनुष्य, अयोध्या के पशु-पक्षी भी जैसे सहमे हुए से बैठे थे। सारथी से उन्होंने कहा भी कि जाने क्यों मेरा मन बैठा जा रहा है? लगता है कहीं कुछ अनहोनी हुई है। भरत का दुर्भाग्य! यह अनहोनी अपनी ही जन्मदायिनी माता के मुख से उन्हें सुननी थी जिसका कारण भी माता ही थी। कैकेयी के यह बताते ही कि राजा सुरपुर चले गये, भरत, ‘हाय मैं मारा गया’ कहते हुए भूमि पर लोटकर रोने लगे। रोते-रोते ही उन्होंने कहा , ‘मैंने तो सोचा था कि महाराज राम का राज्याभिषेक करेंगे और स्वयं यज्ञ का अनुष्ठान करेंगे ...यही सोचकर मैंने बड़े हर्ष के साथ केकय से चला था। अब तो मेरे बड़े भ्राता राम ही मेरे पिता है, मैं उन्हीं के आश्रय में रहूंगा।’
फिर भरत ने कैकेयी से पूछा, ‘पिता के अंतिम वचन क्या थे?’ इस पर कैेकेयी ने कहा, ‘हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण!  यह कहते हुए तुम्हारे पिता ने परलोक की यात्रा की है।’ भरत को आश्चर्य हुआ, पूछा, ‘क्या इस अवसर पर भाई राम और लक्ष्मण तथा देवी सीता वहां नहीं थे?’ तब कैकेयी ने बताया कि उस समय पिता की आज्ञा से राम वनवास हेतु निकल पड़े थे जिनका अनुसरण सीता और लक्ष्मण ने भी किया। राम और वनवास! भरत आश्चर्यचकित रह गये...क्या बीर ने किसी ब्राह्मण का धन हरा था? किसी निष्पाप धनी या दरिद्र की हत्या की थी? उनका मन किसी पराई स्त्री की ओर तो नहीं चला गया था? आखिर किस अपराध पर तात ने उन्हें वनवास की आज्ञा दी? ...भरत ने अधीर हो पूछा।
इस पर कैकेयी ने बड़े धैर्य से बताया कि राम ने ऐसा कोई काम नहीं किया ...वे ऐसा कोई अपराध कर ही नहीं सकते ...उन्हें मैंने वनवास दिलवाया है ताकि तुम निष्कंटक होकर अवध पर शासन कर सको।
 प्रसन्नवदना कैकेयी के निष्ठुर वचन सुन भरत मर से गये ‘हाय! त्ूाने मुझे मार डाला!’ यह पहला वाक्य उनके मुख से निकला। राजा को परलोकवासी बनाकर तथा भ्राता राम को तपस्वी बनाकर तूने मुझे दु:ख पर दु:ख दिया, मानो घाव पर नमक लगा दिया है। क्या तू इस कुल का विनाश करने के लिये काल-रात्रि बनकर आई थी? मेरे पिता ने तुझे पत्नी क्या बनाया, दहकते हुए अंगार को हृदय से लगाया था, किंतु उस समय उनकी समझ में यह बात नहीं आई ..इसी तरह और भी बहुत तरह से कैकेयी को फटकारने तथा विलाप करने के अनन्तर भरत कहते हैं- पापवश केवल पुत्र-स्वार्थ के लिये राज्य चाहने वाली तेरी कामना मैं कभी पूरी नहीं होने दूंगा। मैं वन से अपने निष्पाप भाई को लौटा लाऊंगा तथा उनका दास बनकर पूरा जीवन व्यतीत करूंगा। आगे भरत माता से बड़ी कठोर बात कहते हैं - राज्याद् भ्रंषस्व कैकेयि नृषंसे दुश्चारिणिम्।  परित्यक्तासि धर्मेण मा मृतं रूदती भव।। (वा.रा.अयो.कंा. 74.2) अर्थात्, दुष्ट कैकेयी, तू राज्य से भ्रष्ट हो जा! धर्म ने तेरा परित्याग कर दिया है। अब तू मरे हुए महाराज के लिये मत रोना।
 तत्पश्चात् भरत कौशल्या से मिलते हैं। उनकी गोद में सिर रखकर फूट-फूटकर रो पड़ते हैं। भरत के मनोभावों से अनभिज्ञ दुख से संतप्त कौशल्या जब उन्हें कुछ कठोर वचन कहती हैं ,तब वे अचेत हो जाते हैं। चेतना आने पर वे तरह-तरह से शपथ लेते हैं कि उनका इस षड्यंत्र में कोई हाथ नहीं है। तब भरत की बातों से द्रवित कौशल्या उन्हें इस तरह शपथ लेने मना करती है। उन्हें धर्मज्ञ एवं शुभ-लक्षणों से युक्त कहते हुए उन्हें गले लगाकर वह रो पड़ती हैं।  
सचमुच बड़े धर्मज्ञ थे भरतजी। इतनी कष्टदायक दु:सह्य घडिय़ों में भी वे अपनी धर्मबुद्धि नहीं छोड़ते हैं। सारे दुख की जड़ मंथरा को जब शत्रुघन क्रोधित हो पीटने लगते हैं तब भरत कह उठते हैं, सभी प्राणियों के लिये स्त्रियां अबध्य होती है, इसे क्षमा करो। आगे वे कहते हैं, यदि मुझे यह भय नहीं होता कि रामभद्र मातृघाती समझकर मुझसे घृणा करेंगे तो मैं अवश्य ही दुष्टा कैकेयी को मार डालता।
इसके  बाद भरत को एक और दु:खद दौर से गुजरना पड़ता है... जब गुरूजन उनका अयोध्या के सिंहासन पर अभिषेक करना चाहते हैं। तब तो भरत टूट से जाते हैं। बड़ी कठिनाई से वे कहते हैं, ‘हमारे कुल में ज्येष्ठ ही राजा होता आया है। राम हमारे अग्रज भ्राता हैं अत: वह ही राजा बनेंगे...और उनके बदले मैं चौदह वर्षों तक वन में निवास करूंगा। अभिषेक की सामग्री लिये हम सब कल ही वन चलेंगे।’
तमिल कवि कंबर ने भी अपनी कंब रामायण में भरत संबंधित इस प्रसंग को बड़े भावपूर्ण शब्दों में उकेरा है। पिता की मृत्यु का समाचार सुन सबसे पहले भरत ने राम के विषय में पूछा और ऐसा करते समय आदरपूर्वक हाथों को सिर पर रखा, किंतु जैसे ही उन्होंने मां से वरों के विषय में जाना, उनके दोनों हाथ कानों पर आ गये। भौंहें संकुचित होकर भाल पर चढ़ गईं और नाचती हुई सी कंापने लगी। नि:ष्वास के साथ अग्निज्वालाएं निकलने लगी। आंखों से रक्त बहने लगा। कपोल फड़क़ उठे। रोमकूपों से चारों ओर अंगारे छूटने लगे। भरत ने जब डग भरा तो पदाघात से धरती डगमगाने लगी। देवता उनका रोष देखकर भय से मृत से हो गये। भरत कैकेयी की ओर बढ़े। वे उन्हें मारना ही चाहते थे किंतु फिर राम रूष्ट होंगे,यह सोचकर रूक गये। किंतु मां पर विष-बाण चलाने में उन्होंने कोई कमी नहीं की। कहा, ‘कहां जाकर अपना कलंक धोऊं! सब यही कहेंगे कि इस षड्यंत्र में भरत भी शामिल था। किंतु मैं किसी स्थिति में राज्य नहीं लूंगा। पहले तुमने स्तन्य दिया, अब मुझे अमिट कलंक प्रदान किया! और भी क्या देने वाली हो बोलो? तुम रोग नहीं हो तो भी अपने पति के प्राण पी चुकी हो! तुम अवश्य पिशाचनी हो। तुम मरोगी नहीं? जीवित ही रहोगी क्या? अब भी तुम प्राण छोड़ दो तो लोक तुम्हारा पाप-कृत्य भूल जायेगा।’ ...और फिर भरत कौशल्या के पास जाते हैं। यहां कौशल्या भरत की सच्चाई पर तत्काल विश्वास करती है और यह भी कहती है, ‘तुम्हारे पिता का प्राणंात हुए सात दिन हो गये हैं। अब तुम पुत्र के करने योग्य कर्म करो।’
यहां कंबर नयी बात लिखते हैं। माता कौशल्या एवं ब्राह्मणों के कहने भरत पिता का दाहसंस्कार करने आगे बढ़ते हैं, किंतु तभी वसिष्ठ मुनि उन्हें रोक देते हैं, यह कहते हुए कि तुम्हारी माता के कुकर्मों से दुखी होकर पिता ने तुम्हारा पुत्ररूप में त्याग कर दिया था। अत: तुम दाह-संस्कार नहीं कर सकते। (वाल्मीकि तथा अन्य रामायणों में भरत ही यह कार्य करते हैं और कोई उन्हें नहीं रोकता है। जबकि थाई रामायण रामकियेन में भरत स्वयं ही ग्लानिवश पिता का अंतिम संस्कार नहीं करते।)
इसके बाद भरत को और भी पीड़ा झेलनी पड़ी जब गुरूजनों ने उन्हें पिता द्वारा कैकेयी को दिये वर के अनुसार राज्यग्रहण करने का आग्रह किया। इस समय भरत की स्थिति का वर्णन करते हुए कंबर लिखते हैं -यह सुनकर भरत ऐसे कांपे मानो किसी ने विष खाने कह दिया हो। यदि राज्य लिया तो जननी का कृत्य सदोष कैसे हुआ? यदि मैं यह राज्य ग्रहण करूं तो माता के कुकर्म में क्या दोष है? यदि आप सब मुझे अयोध्या का राजा स्वीकार करते हैं तो मैं तो इसका अर्थ यही लेता हूं कि कलियुग आ गया है। ...तब सब उनकी प्रशंसा करते हैं। और जब भरत कहते हैं कि वे राम को वन से लौटा लाएंगे ...और उन्हें ही राजमुकुट धारण करवाएंगे तब सारे अयोध्यावासी ऐसे प्रसन्न हुए मानो प्राणहीन पड़े शरीर में जान आ गई हों। सचमुच भरत का चरित्र यहां राम से ज्यादा निखरा है। वन में जाते समय गुह सारी बातें जानकर कह उठता है, ‘ सहस्र राम भी भरत की समानता नहीं कर सकते। ’
तुलसीदास ने मानस में इस सारे प्रसंग में भरत की वेदना को मानो अमर करते हुए उकेरा है। माता की करतूत उसी के मुख से सुन भरत स्तब्ध रह गये थे। कैकेयी मानो (मरमु पांछि जनु माहुर देई) मर्मस्थान को चाकू से चीरकर उसमें जहर भरते हुए आदि से अंत तक अपनी करनी मुदित हो सुनाती है। राम का वनगमन सुन पिता का मरण भूल गये और जब जाना कि सारे अनर्थ का कारण वे स्वयं है, तब मौन होकर स्तंभित रह गये। बड़ी लंबी संास लेकर वे बोल उठे -पापिनि सबहि भांति कुल नासा। हे पापिनी ! तूने तो सब तरह से कुल का नाश कर दिया। जो कैकेयी क्षण भर पहले ही अपने पुत्र को राजा बनाने पर इतरा रही थी उससे भरत कहते हैं -हाय! यदि तेरी ऐसी ही दुष्ट इच्छा थी तो तूने जन्म देते ही मुझे मार क्यों नहीं डाला? जनमत काहे न मारे मोही।। तूने पेड़ काट कर पत्ते को सींचा है और मछली को जीने के लिये पानी को उलीचा है! भरत यहीं नहीं रूके। आगे वे कहते हैं ,‘ जब तेरे मन में ऐसा बुरा विचार आया तभी तेरे हृदय के टुकड़े-टुकड़े क्यों नहीं हो गये। वरदान मांगते समय तेरे मन में क्या थोड़ी भी पीड़ा नहीं हुई? उसी समय तेरी जीभ क्यों नहीं गल गई ? तेरे मुंह में कीड़े क्यों नहीं पड़ गये? राम तेरे बैरी कैसे हो गये? वे यहां तक कहते हैं -यह कैकेयी संसार में जन्मी ही क्यों और जन्मी तो बांझ क्यों न हुई ! कैकइ कत जनमी जग माझा । जौं जनमि त काहे न बांझा।।
बेचारे भरत असहाय हो कह उठते हैं -मुझे सूर्यवंश सा वंश मिला, दशरथ से पिता मिले, राम लक्ष्मण से भाई मिले। पर जननी तूं जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ।(वही अयो.कां.161)
गीतावली में भरत मां से कहते हैं -ऐसे तैं क्यों वचन कह्यो री। राम जाहु कानन कठोर तेरो कैसे धौं हृदय रह्यो री।। तूने आखिर ऐसे वचन कैसे कहा कि राम वन को जाएं! तेरा हृदय कैसा कठोर है। बहुत देर ऐसे ही कलपने के बाद वे मानो कैकेयी को चेतावनी देते हैं- रामजी वन से लौटेंगे, सब लोग सुखी होंगे और ईश्वर मेरा अपयश दूर करेगा। पर मुझे बड़ी चिंता यह है कि तू जनम कौनि बिधि भरिहैं।। तू अपना जीवन कैसे बितायेगी?
अस्तु, इसके बाद वशिष्ठ द्वारा राज्यग्रहण करने के आग्रह पर भरत की मन:स्थिति का भी मानस में तुलसीदास ने सुंदर चित्रण किया है। भरत पूछते हैं कि मेरे राजा बनने में किसका हित है, मेरा कि आपका? मेरा हित तो सियपति सेवकाई है जिसका माता की कुटिलता ने हरण कर लिया है किंतु मेरा कल्याण इसके बिना नहीं है। अत: मुझे आप राम की सेवा में जाने की आज्ञा दीजिये। यदि अयोध्यानरेश बनाकर आप अपने हित की बात सोच रहे है यह नहीं हो सकता क्योंकि-  
कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज ।
तुम्ह चाहत सुखु मोह बस मोहि से अधम केें राज।। (मानस,अयो.कां.178)
अस्तु, अंत में राम को वापस लाने की बात से अयोध्यावासी प्रसन्न होते हैं , मानो मेघ की गर्जना सुन मोर और चातक आनंदित हो रहे हों।
 ओडिय़ा रामायण वैदेहीष विलास में राजपद पर अभिसिक्त होने का प्रस्ताव रखे जाने पर भरत कहते हैं ,‘आप सब पंडित होकर अविवेकियों की सी भाषा क्यों बोल रहे हैं? क्या हीरक और स्फटिक एक से होते हैं? मैं अग्रज राघव के समान बिल्कुल नहीं हंू।’ इस पर वशिष्ठ कहते हैं,‘ जैसे गणेश विनायक हैं अर्थात् नायक पद के अयोग्य हैं फिर भी बड़े भाई कार्तिकेय के होते हुए भी पिता के कहने पर गणेश्वर बन गये तो तुम क्यों नहीं पिता के आदेशानुसार राजा बन सकते हो?’ तब भरत उत्तर देते हैं, ‘मैं गणेश के समान गजमुख नहीं हंू। जैसे विधाता चंद्र के अनजाने में उसमें कलंक रख देता है वैसे ही मेरी माता ने मेरे अनजाने में मुझ पर कलंक रक्खा है। मैं तो भाई को मना कर अयोध्या लाऊंगा और उन्हें ही राज्य दूंगा। (18.20-24)  
इस प्रसंग में शत्रुघन को रामायणकारों ने लगभग मौन ही रखा है किंतु वैदेहीष विलास में यहां उनका एक सुंदर कथन है। भरत की उपरोक्त बातें सुन शत्रुघन कहते हैं,‘ विशुद्ध सोना और विशुद्ध पीतल दोनों एक वर्ण के दिखते हैं किंतु दोनों को जलाने पर दोनों का भेद पता चल जाता है। भाई भरत के चरित्र रूपी शुद्ध स्वर्ण के साथ उनकी माता का कुमंत्रणारूपी पीतल मिला है या नहीं, उनके वनगमन से तथा राम को वापस लाने के प्रयत्न साबित हो जायेगा। अत: भाई भरत को वन जाने दीजिये।’ (18.25)
तेलुगु रंगनाथ रामायण में पिता की मृत देह के सामने खड़े भरत विलाप करते हुए कहते हैं, ‘आप मेरी ओर देखना नहीं चाहते इसीलिये ऐसे आंखें मूंदे पड़े हैं। यह सोच कर कि यह कैकेयी का गर्भजात है आप मुझे नहीं देखना चाहते हैं ना? ठीक है, पर इस सुमित्रा-पुत्र की ओर तो देखो। अत्याधिक दु:खी हो यह भूमि में लोट रहा है। आप अपने हस्त-पंकजों से इसके शरीर की धूल क्यों नहीं पोंछते? इस पर कृपा करो, इससे बातें करो। इसने क्या पाप किया है? आपकी दया-रति आज कहां छिप गई? क्या कैकेयी ने आपकी बुद्धि को क्षुब्ध कर दिया है? मरते तो सभी है पर ऐसे नहीं मरते। स्नेह-बंध सबके होते हैं पर ऐसे नहीं होते। स्त्रियां प्राण-वल्लभों से दान मंागती हैं पर ऐसे वर तो नहीं मंागती! हाय! इस कष्टप्रद आचरण से मैं कैसे पार पाऊं! (अयो.कंा.1458-65)
अस्तु, चलिये आगे की कथा वाल्मीकि रामायण में देखते हैं। भरत के द्वारा राम को वापस लाने वन जाने की बात सुन सारे शोकाकुल चेहरे हर्र्ष से खिल उठे। किंतु पिता की मृत्यु, राम का वनवास और माता की करनी रह-रह कर उनके हृदय को चीरती रही। तभी तो सारी रात उन्होंने पलकों पर ही काटी। अवध का अगला सूर्योदय भी इस रामानुज के लिये कम कष्टकारी नहीं था। शंख आदि मंगल वाद्य उनको जगाने के लिये बजाये जा रहे थे। ऐसे वाद्य सामान्यतया राजाओं को प्रतिदिन नये उत्साह से भरते हैं, भरत के कानों में मानों पिघले शीशे से घुसने लगे।  तब उन्होंने यह कहकर कि मैं राजा नहीं हूं जिसके लिये ये मंगलवाद्य बजाये जा रहें हैं ... उन वाद्यों को बंद करवाया...और फिर पिछली सारी बातों को याद कर पुन: विलाप करने लगे।
अगले दिन भरत राम को अयोध्या वापस लाने का दृढ़ संकल्प कर राम की राह का अनुगमन करते हैं। यद्यपि राम तक पहुंचने के बीच में कई बार ऐसे मौके आते हैं जो इस कोमलहृदय कुमार के दिल को चाक-चाक कर देते हैं, जैसे, निषादराज गुह जब उनकी निष्ठा पर संदेह करते हैं, जब वे निषाद से राम-लक्ष्मण द्वारा अपने बालों को वट-वृक्ष का दूध लगाकर जटा के रूप में बांधे जाने का वर्णन सुनते हैं, जब वन में वे वह स्थान एवं कुशशैय्या देखते है जहां राम एवं सीता की पहली रात व्यतीत हुई थी ...और जब मुनि भरद्वाज के आश्रम में मुनि को यह आशंका प्रगट करते सुनते हैं कि कहीं तुम वन में राम का अनिष्ट करने तो नहीं जा रहे हो? इस समय तो भरत पूरी तरह टूट जाते हैं। अश्रुमुख हो वे बोल पड़ते हैं-,यदि आप भी मुझे ऐसा ही समझते हैं तब तो मैं हर तरह से मारा गया। (वैसे मानस में भरद्वाज भरत पर तनिक भी संदेह नहीं करते बल्कि भरत को प्रणाम करते देख स्वयं दौडक़र उनके पास जाकर उन्हें हृदय से लगाते हैं। )  
अस्तु, भरत की व्यथा तो तभी कम होती है जब वे चित्रकूट में श्रीराम से मिलते हैं। राम को मनाने का हर संभव प्रयास करते हैं ...और फिर अंत में राम से सहमत हो उनसे वचन ले कि ठीक चौदह वर्ष बाद अवध आकर वे राज्य ग्रहण करेंगे अन्यथा उनका मरा मुख देखेंगे, राम की पादुकाओं को सिर-माथे पर लिये हुए अयोध्या लौटते हैं। फिर भरत उन पादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित कर पूरे चौदह वर्षों के लिये राम के समान ही मुनिवेश धारण करते हुए नंदीग्राम से राम की धरोहर समझते हुए अवध का शासन संभालते हैं ! साकेत का यह संत प्रणम्य है ,और प्रणम्य है उसका रामप्रेम तथा राजविरक्ति।
(लेखिका  दर्शनशास्त्र की सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं एवं वर्तमान में भारत सरकार के संस्कृति विभाग के सीनियर फैलोशिप के अंतर्गत रामायण पर शोधकार्य कर रही हैं। )