Monthly Magzine
Monday 20 Nov 2017

परशुराम शुक्ल की बाल कविता में पर्यावरण एवं वन्यजीव

ज्योति रघुवंशी
बीएम-153, नेहरू नगर
भोपाल (म.प्र.) 462003
मो.  09826493844
बाल साहित्य में बाल कविता संभवत: सर्वाधिक प्राचीन और लोकप्रिय विधा है। बच्चा मां की लोरी के साथ कविता के संपर्क में आता है और जीवनभर किसी न किसी रूप में इससे संबद्ध रहता है। बाल कविताएं बड़ी प्रभावशाली होती है। बच्चा वयस्क होने के बाद पढ़ी अथवा सुनी कविताएं तो कभी-कभी भूल जाता है किन्तु बचपन में पढ़ी हुई बहुत सी बाल कविताएं उसे जीवनभर याद रहती हैं। वास्तव में ये कविताएं उसे केवल याद ही नहीं रहतीं, बल्कि उसके जीवन को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित भी करती हैं। बच्चों के व्यक्तित्व के विकास में बाल कविता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बाल कविता बच्चे को उस समय की संस्कृति से परिचय कराती है, जिसमें वह रहता है। इसके साथ ही यह कुछ अंशों तक व्यक्ति को समाज में रहने और सामाजिक कार्यों में भाग लेने योग्य बनाती है। यह बालक की पाशविक प्रवृत्तियों को नियंत्रित करके उसमें मानवीय प्रवृत्तियां को विकसित करने की विधा है।
बाल साहित्य, विशेष रूप से बाल कविता एक लम्बे समय तक उपेक्षित रही। बहुत से हिन्दी साहत्यिकारों ने बाल कविता, इसके महत्व और इसकी उपयोगिता को तो स्वीकार किया है, किन्तु पूरी तरह बाल साहित्य साधना नहीं की। डॉ. परशुराम शुक्ल के शब्दों में ‘‘बाल साहित्य, बाल मनोविज्ञान, बाल कल्पना और बाल जीवन से संबंधित होता है, जबकि प्रौढ़ साहित्य का प्रमुख आधार जीवन के अनुभव हैं। जीवन के अनुभव तो व्यक्ति को सरलता से प्राप्त हो जाते हैं, किन्तु बाल मनोविज्ञान को समझना, प्रौढ़ होते हुए बाल कल्पनाओं और रुचियों को वास्तविक रूप में समझना तथा बच्चों की गतिविधियों का अत्यंत सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन करना आसान कार्य नहीं है। बच्चों को अपनी ओर आकर्षित करने वाली सरल, सुबोध और रसभरी भाषा भी सबके वश की बात नहीं। बाल साहित्य का सृजन करने के लिए बच्चों के धरातल पर उतरना पड़ता है, बच्चों जैसी कल्पना करनी पड़ती है और बच्चों के समान सोच उत्पन्न करनी पड़ती है तथा यह सब इस प्रकार करना पड़ता है कि स्वाभाविकता का गुण बना रहे।’’1
लगभग दो दशक पूर्व अर्थात् सन् 1990 के बाद बाल साहित्य की स्थिति में परिवर्तन आया और बहुत बड़ी संख्या में साहित्यकारों ने बाल साहित्य का सृजन आरंभ किया। इन्होंने बहुत बड़ी संख्या में बाल साहित्य के लिए अनेक नए-नए विषयों की खोज की। इस काल के पूर्व के बाल साहित्यकार गर्मी, सर्दी, वर्षा, कोयल, कौआ, चूहा, बिल्ली जैसे विषयों तक ही सीमित थे। वर्तमान समय के बाल साहित्यकारों ने पर्यावरण, कम्प्यूटर, रोबोट जैसे वैज्ञानिक विषयों और ह्वेल, सील, मनाती, लालपाण्डा जैसे जीवों पर भी बाल कविताएं लिखीं। इसके साथ बाल कविताओं में, विशेष रूप से परशुराम शुक्ल की बाल कविताओं में विभिन्न प्रकार की वैज्ञानिक और यथार्थ सूचनाओं के भी दर्शन हुए, जो बाल कविता में पहले कभी देखने को नहीं मिला।
वर्तमान समय में बढ़ती हुई ग्लोबल वार्मिंग और पानी की समस्या ने विश्वभर के राजनेताओं और वैज्ञानिकों के साथ ही बाल साहित्यकारों को भी अपनी ओर आकर्षित किया हैा। वास्तव में ये मानव के द्वारा उत्पन्न की गई समस्याएं हैं एवं इन पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। शुक्ल जी का मानना है कि बच्चों को पर्यावरण का परिचय देकर और उन्हें पर्यावरण प्रदूषण के खतरों से सावधान करके हम इस समस्या पर नियंत्रण कर सकते हैं-
पर्यावरण किसे कहते हैं, आओ हम सब इसको जानें,
पर्यावरण प्रदूषण के सब खतरों को पहले पहचानें।
इतना ही नहीं, वह आगे लिखते हैं-
डीजल औ पेट्रोल आदि सब, ऐसी वायु प्रदूषित करते,
बच्चे, बूढ़े, युवा सभी जन, बिना मौत बेचारे मरते।2
पर्यावरण की सुरक्षा में वृक्षों का विशेष महत्व है। वृक्ष मानव जीवन के प्राण हैं। वृक्षों द्वारा दी गई ऑक्सीजन से मानव सांस लेता है :-
अगर धरा पर वृक्ष न होते, तो क्या बादल गर्जन करते?
चारों ओर मरुस्थल होता, सारे प्राणी प्यासे मरते।
इसीलिए तो मेरे दादा, हर दिन पौधा एक लगाते,
इन्हें काटना बहुत बुरा है, मुझको सदा ही समझाते।3
शुक्ल जी ने अपनी बाल कविताओं में बाल साहित्य के सामान्य विषयों के साथ ही तीन अन्य विषयों पर भी लेखनी चलाई है. पर्यावरण, वैज्ञानिक आविष्कार और वन्यजीव। वे पर्यावरण प्रदूषण को भविष्य की एक गंभीर एवं जटिल समस्या के रूप में देखते हैं। उन्होंने सन् 1990 में एक किवता लिखी थी- वृक्षकथा। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय भारत सरकार, नई दिल्ली द्वारा आयोजित ‘‘अखिल भारतीय पर्यावरण सुरक्षा प्रतिायेगिता : 1992’’ में इस कविता को प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया था। इस कविता में एक हरा वृक्ष अपनी उत्पत्ति और महत्व की कहानी सुनाता है तथा अंत में वृक्षों की कटाई से होने वाले विनाश से सावधान करता है-
देख कुल्हाड़ी लिए हाथ में, हरा वृक्ष यूं बोला-
तुमने अपने ही हाथों से द्वार नर्क का खोला।
मेरे मिट जाने पर तुम, कैसे जल बरसाओगे?
सूख गए यदि खेत तुम्हारे, बोलो फिर क्या खाओगे?
भूख-प्यास, पीडि़त मानवता, छोड़ अगर तुम जाओगे,
मरकर अपने पूज्य पिता को कैसे मुंह दिखलाओगे?4
पर्यावरण मानव के साथ ही साथ पेड़-पौधों और वन्य जीवों को भी प्रभावित करता है। वन्य जीवों का जीवन तो पूरी तरह पर्यावरण पर निर्भर करता है।  विश्व से जिस दिन पेड़-पौधे और वन्य जीव समाप्त हो जाएंगे, मानव भी समाप्त हो जाएगा। अत: मानव की सुरक्षा के लिए पेड़-पौधों और वन्य जीवों का बना रहना आवश्यक है-
जब तक जीव जगत है जग में, तब तक जग में पानी।
जब तब शुद्ध वायु बहती है, सोंधी मिट्टी रानी।
तब तक मानव का जीवन है, यह सबको समझाओ।
पर्यावरण बचाओ।5
श्री शुक्ल की बाल कविताओं में, एक ओर तो उपयोगी सूचनाएं अर्थात् जानकारियां हैं तो दूसरी ओर बच्चों का भरपूर मनोरंजन है। इस प्रकार की सभी बाल कविताओं की भाषा सरल, सहज और प्रवाहपूर्ण होने के कारण बच्चों में विशेष रूप से लोकप्रिय है। श्री शुक्ल ने धरती पर बढ़ते हुए पर्यावरण, प्रदूषण की ओर से ध्यान आकर्षित करने के लिए वन्य जीवों के माध्यम से एक प्रभावशाली रचना की है-
हाल देखकर वन-उपवन का, सारे पशु घबराए।
मीटिंग करने इसी बात पर, नदी किनारे आए।
भालू, गीदड़, हिरन आदि के, पैरों पड़े फफोले,
कहां जाए हम? कहां जाए हम? सब माइक पर बोले।
तभी दु:खी हो बंदर बोला, यहां न रह पाएंगे।
मानव अभी नहीं मंगल पर, मंगल ग्रह जाएंगे।6
डॉ. परशुराम शुक्ल को सूचनात्मक बाल साहित्य का जन्मदाता कहा जाता है। आपने एक ओर रोबोट, कम्प्यूटर, इन्द्रधनुष आदि की वैज्ञानिक जानकारियां कविता के माध्यम से बच्चों को उपलब्ध कराई हैं, तो दूसरी ओर वन्यजीवों और आकाश में विचरण करने वाले पक्षियों की जीव वैज्ञानिक जानकारियां दी हैं। इस संबंध में भारत के राजकीय प्राकृतिक प्रतीकों पर किया गया उनका शोधकार्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इस संबंध में श्री शुक्ल ने लिखा है कि- ‘‘बच्चो ! लम्बे समय से मैं एक ऐसे विषय की खोज में था, जो बिल्कुल नया हो, आपको नई-नई जानकारियां देने वाला हो और आपकी रुचि का हो। मेरी यह खोज कामयाब हुई और मुझे एक नया विषय मिल ही गया- ‘हमारे राजकीय प्राकृतिक प्रतीक।’ मैंने इस विषय पर पर्यावरण संबंधी अनेक पुस्तकों, विश्वकोशों, इंटरनेट आदि से जानकारियां एकत्रित कीं और आपके लिए एक पुस्तक तैयार कर दी। विश्व में अपनी तरह की यह पहली पुस्तक है। विश्व अथवा भारत की किसी भी भाषा में इस विषय पर अभी तक कोई काव्यकृति नहीं लिखी गई।’’7
श्री शुक्ल ने महाराष्ट्र के राजकीय पशु- दैत्याकार गिलहरी का परिचय कुछ इस प्रकार दिया है-
घने जंगलों में रहती है, सबसे बड़ी गिलहरी।
बस्ती में यह कभी न जाती, न जमीन पर ठहरी।
पूंछ सहित मीटर भर लम्बी, फुर्तीले तन वाली।
छोटे कान, बड़ी-सी आंखें, काया बड़ी निराली।
ऊंचे वृक्षों के कोटर में, अपने नीड़ बनाती।
कुछ में रहती, बच्चे देती, कुछ में खुद सो जाती।
शाम सबेरे भोजन करती, जो मिलता सो खाती।
और अ्धिक भोजन मिलने पर धरती खोद छिपाती।
कभी-कभी यह बीमारी में, कुतर नहीं कुछ पाती।
बढ़ते जाते दांत निरंतर, इससे यह मर जाती।8
श्री शुक्ल ने वन्य जीवों, पशु-पक्षियों आदि का बड़ा सूक्ष्म और गहन अध्ययन किया है। उन्होंने बाघ, तेंदुआ, सिंह, हिरण जैसे वन्य जीवों के साथ ही बहुत से दुर्लभ जीव-जन्तुओं पर भी बाल कविताओं का सृजन किया है-
अमरीका का रहने वाला, कहते सब मुझको रैकून।
धोकर खाना खाता हरदम, मानव जैसा मेरा खून। -
बच्चों बाल देखकर मेरे, कर सकते मौसम का ज्ञान।
बाल बड़े तो होगी सर्दी, कांपेगा फिर सकल जहान।9
 श्री शुक्ल की सर्वाधिक पुस्तकें जलचरों पर प्रकाशित हुई है। कुछ समय पूर्व आपकी ‘जलचर कोश’ नामक एक पुस्तक प्रकाशित हुई है। इसे धरती पर पाए जाने वाले जीवों का विश्वकोश कहा जा सकता है। इस पुस्तक में मछलियों, जलीय सरीसृपों, जलीय स्तनपायी जीवों, कस्टेशिया वर्ग के जीवों आदि का सैद्धांतिक विवेचन है। भारत में यह अपनी तरह की पहली पुस्तक है।
श्री शुक्ल ने बहुत बड़ी संख्या में जलचरों पर बाल कविताएं भी लिखी हैं। इनमें तितली मछली को बच्चों ने बहुत पसंद किया है-
भारत सहित कई देशों के, सागर में मिल जाती।
उथले पानी की चट्टानों में, आवास बनाती।
रंग-बिरंगी तितली जैसी, उडक़र धूम मचाती।
और कभी सागर से बच्चों नदियों में आ जाती।10
श्री शुक्ल का मत है कि मानव जीवन को सुखी बनाने के लिए पर्यावरण, वन्यजीवों और वनों की सुरक्षा आवश्यक है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर श्री शुक्ल ने छोटे-छोटे शिशुगीत लिखे हैं-
चीं-चीं करती चिडिय़ा रानी, मेरे घर आ जाती है।
दाना तिनका जो भी मिलता, बड़े प्रेम से खाती हैं।11
हमारे देश में पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं के संबंध में अनेक प्रकार की भ्रामक धारणाएं  प्रचलित हो गई है। उदाहरण के लिए यह कहा जाता है कि कोयल गाती है। वास्तव में कोयल गाती नहीं है, बल्कि कोयल गाता है। मादा कोयल की आवाज बड़ी कर्कश होती है। प्रजनन काल में मादा को अपनी आकर्षित करने केलिए नर कोयल कुहू... कुहू की मधुर आवाज निकालता है। श्री शुक्ल ने अपने शिशुगीतों तथा बाल कविताओं में इस प्रकार की भ्रामक धारणाओं का खंडन करने का प्रयास किया है-
कौआ कांव-कांव करता है, कोयल गीत सुनाता।
इसीलिए कौए से कोयल, अच्छा माना जाता।12
श्री शुक्ल हिन्दी बाल साहित्य के सक्षम हस्ताक्षर हैं। उनकी शिशुगीतों और बाल कविताओं पर 21 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं तथा चार पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं। इन सभी पुस्तकों में किसी न किसी रूप में पर्यावरण संरक्षण और वन्य जीवों की सुरक्षा का संदेश है। वर्तमान समय में इसी प्रकार के बाल साहित्य की आवश्यकता है।
1. परशुराम शुक्ल- हिन्दी बाल साहित्य का इतिहास, एक रूपरेखा, अक्षर शिल्पी, भोपाल, बाल साहित्य विशेषांक पृष्ठ-38, अंक जन- मार्च 2010
2. परशुराम शुक्ल- ‘तिरंगा’, पृष्ठ-48, जनवाणी प्रकाश प्रा.लि. दिल्ली, 2009
3. परशुराम शुक्ल- ‘चारों खाने चित्त’ पृष्ठ-73, संस्कृति साहित्य, दिल्ली 2009
4. परशुराम शुक्ल-  ‘तिरंगा’, पृष्ठ-108-109, जनवाणी प्रकाश प्रा.लि. दिल्ली, 2009
5. परशुराम शुक्ल- ‘सूरज पाना है’, पृष्ठ-50, चेतक पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली-2010
6. परशुराम शुक्ल- ‘मंगल ग्रह जाएंगे’, पृष्ठ-77, विज्ञान भारती, गाजियाबाद-2008
7. परशुराम शुक्ल- ‘हमारे प्राकृतिक प्रतीक’, पृष्ठ-8, जनवाणी प्रकाशन प्रा.लि. दिल्ली, 2009
8. वही
9. परशुराम शुक्ल- ‘आओ बच्चो, गाओ बच्चो’, पृष्ठ-95, सन्मार्ग प्रकाशन, दिल्ली, 2009
10. परशुराम शुक्ल- ‘हमारे प्राकृतिक प्रतीक’, पृष्ठ-126
11. परशुराम शुक्ल- ‘नंदनवन’, पृष्ठ-106, स्टारट्रेक पब्लिशर्स, दिल्ली, 2010
11. परशुराम शुक्ल- ‘कलरव’, पृष्ठ-12, विज्ञान शिक्षा संस्थान, गाजियाबाद-2010 ठ्ठ