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Tuesday 21 Nov 2017

हसीन जिस्म पे जगमग से जेवरात से दिन

हिमांशु द्विवेदी
 ई-78, कमला नगर, आगरा (उ.प्र.)
मो. 9412750843
(1)

हसीन जिस्म पे जगमग से जेवरात से दिन
वो पत्थरों के कलेजे बहे प्रपात से दिन।

हमें तो याद है चंदन समेटती दोपहर
तुम्हें भी याद तो होंगे वो पारिजात से दिन।

समय से दुगने चले तेज जिनमें संवत्सर
रूपहली रातों में आपस में हुई बात से दिन।

(2)

हर पल के सफर में है गिरफ्तार आदमी
छालों से छिले पांव की रफ्तार आदमी।

जम्हूरियत के जुर्म  की दहशत भी खूब है
खुद अपने कातिलों का मददगार आदमी।

सुइयों की चुभन जैसी अपाहिज है ख्वाहिशें
ये जानकर भी उनका परस्तर आदमी।

(3)

सलीकेदार तसल्ली से निकलते आंसू
निभाते रस्म हैं दामन तो तर नहीं करते।

उदास आंखों में आंसू अकेला जेवर हैं
ये पहना जाता है गिरवी कहीं नहीं धरते।

तमाम उम्र समेटे हुए लम्हे अकसर,
गुजर तो जाते हैं रूक कर बसर नहीं करते।

हवा से बोलती बिल्डिंग के बड़े बाशिंदे
हमारे जख्मों की गलियों में घर नहीं करते।