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Tuesday 21 Nov 2017

दर्द पीड़ा है मगर इजहार मत कर,

सेवाराम गुप्ता ‘प्रत्यूष’
सी-686 शारदा
सदन, अर्बुदानगर
ओढव, अहमदाबाद-382415
(1)
दर्द पीड़ा है मगर इजहार मत कर,
अपनी सूरत को तू यूं अखबार मत कर।

जानकर भी दर्द बांटेगा न कोई,
धैर्य रख खुद को सखे लाचार मत कर।

वक्ते नाजुक हो वतन को हो जरूरत,
हंस के दे दे जां सखे इन्कार मत कर।

प्यार का जज्बा इनायत है खुदा की
राह चलते प्यार का इजहार मत कर।

जो मुहब्बत से मिले स्वीकार कर ले,
बेसबब ज्यादा तू इसरार मत कर।

मृणमयी पर कीमती सौगात है यह,
बेशकीमत जिंदगी को ख्वार मत कर।

एक दिन ‘प्रत्यूष’ जब लेनी विदा है,
मौत से बेबात ही यलगार मत कर।

(2)
कैसी बीते तन्हाई भी देखेंगे।
कितनी मिलती रूसवाई भी देखेंगे।

यूं तो पार किये हैं कितने ही दरिया,
अब सागर की गहराई भी देखेंगे।


जीवन बीत गया असर सा ही अब तक,
वक्त मिला तो अमराई भी देखेंगे।

झूठ कपट का साथ रहा केवल अब तक
बहुत बखानी सच्चाई अब देखेंगे।

पिछलग्गूपन ओढ़ नहीं जीना है अब,
मिलने वाली अगुआई भी देखेंगे।

स्वेताई में खादी की जिसको ढांका
भारत जन वह कजराई  भी देखेंगे।

जो हंसते ‘प्रत्यूष’ तेरे भोलेपन पर,
वो अब तेरी चतुराई भी देखेंगे।