Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

कुछ न कुछ...!

गफूर तायर
बजरिया- 2
दमोह (मप्र)
कुछ न कुछ...!

कुछ शब्द थे चले आए जो
यूं ही टहलते से
अपने अतीत के जंगल से
व्यस्त जिंदगी  के जंगल में
और अफसोस में थे वे
कि तमाम व्यस्त चौराहे
बिजली के खंभे
शकुनियों की चौपालें
चारदीवारी में
लगातार दौड़ते हांफते से घर
कबाड़ से भरे लोग
उनकी नि:शंक पवित्रता के बावजूद
उन्हें नहीं पहचानते
बेजरूरत शख्स की तरह
जेब में हाथ डाले वे,
खड़े रहते हैं तमाशाई बनकर
कुछ अहसास थे
जो आए थे
अपनी शिनाख्त कराने
लेकिन बेमौसम बादलों की तरह
जाना ही पड़ा उन्हें
बिन-बरसे, बिन-गरजे
कुछ पल ठंडी छांव की
एक झलक दिखलाकर
उनके पैरों में थे
आवारगी के फटे जूते
जिन्हें कोई सीने को
तैयार नहीं था।

एक धुन सांस की तरह
बजती रहती आठों पहर
मगर वह न भूले-बिसरे गीतों में थी
न कहीं सुनी हुई
मगर बस कि
बजती रहती... हम सुनते रहते
पता नहीं कब आई वह
(शायद होश संभालते ही)
और शामिल हो गई
हमारी रगों में खून बनकर
जिस पर ध्यान जाता कभी-कभी
किसी-किसी का ही
सोने से कुछ पहले
जागने के कुछ बाद
तकिये की तरह

एक नदी लबालब
मगर एक सदी की प्यास
जज्ब थी उसमें
उस प्यास को
कोई भी मौसम
तृप्त करने में था नाकाम
परे थी समझ से हम सबकी भी
लेकिन दोनों किनारे जानकर भी
सहमे और चुप थे
एक डरावनी खुशी थी शामिल उनमें
एक पहाड़ अपलक निहारता
चला आता उदास गुमसुम सा
जैसे रेल की खिडक़ी से
जीवन यात्रा में होता शामिल
पास आता और जुदाई में
छूटता जाता धीरे-धीरे
लेता पीछे कदम
कुछ बोलता भी नहीं
मगर लगता घनघोर बारिश का
अंदेशा छुपाये है अपने अंदर
हमारे अंदर भी
संवेदनाओं के अंकुर अकुराने लगते
मगर अगला स्टेशन आते न आते
सूखने लगते तमाम अंकुर
रह जाता बस खिडक़ी के पार
साथ दौड़ते तारों और खंभों का
लगातार होता उतार-चढ़ाव
जैसे लम्बी उसांसों की पटरियों पर
छाती का उठना बैठना
और आंखों का सूखता पानी
इतनी यात्रा के बाद भी
हम नाकाम थे तारों पर लिखी
सुख-दुख की भाषा पढऩे में
अबूझ था पहाड़ों का मौन

कुछ दरख्तों से
और खुश्बूतर लताओं से
छूटी हुई हवाएं थीं
जो हमारी सांसों में उतरती
आशीष बनकर
और तैरने लगता सब जगह
एक पहचाना हरापन
मैं अपने बच्चों में भी
यह हरापन बोना चाहता
मगर अफसोस कि वे अभी
नहीं हैं बिलकुल $फुरसत में
बुला रही हैं उन्हें
आधुनिक फैशन और गहनों से
लदी हुई दिशाएं
एक हरी-भरी नाजुक डाल
फूल अपने जूड़े में सजाये
पुराने गली में डोलती
झुकती, लहराती इसरार से भरी
लेकिन.. लेकिन
कूक उठती कोयल उसी समय
और मैं चौंककर संभल जाता
याद आता
आजकल मोबाइल में भी तो
बजने लगी है कोयल की कूक
मैं शर्मिंदगी और दुख से भरा
हर दरख्त के पत्तों से लिपटकर
रोना चाहता था
मगर अफसोस उस वक्त
सारे वृक्षों के पत्ते
अपने सायों को बंद कर
बाजार जा चुके थे
कुछ चेहरे थे जो
उभर आए थे यूं ही यादों में
पसीना सुखाने की गरज से

हम उनका नाम तो भूल गए थे
मगर उनकी पहचान
उनके पसीनों में कायम थी
और अब वे हमारे लिए थे
सिर से निकले बालों की तरह
फंसे रह जाते हैं जो
यादों की कंघी के बीच

एक पहचानी-सी
ताजी मिट्टी की खुश्बू थी
जे मुझे चौंका गई
कहां की है यह सोंधी खुश्बू
व्यस्त चौराहे पर
आंखें बंद कर
पल भर के लिए मुदित मन
याद करता कि उसी समय
मेरी बस आ गई थी
लौटना था मुझे
रोज की तरह घर
लेकिन जूते में जैसे
चुभती हुई कील
पूछती रहती
कहां है घर?
सच मानो तो कहूं दोस्तों
तमाम रास्ता
घर याद करने में गुजर जाता...