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Saturday 18 Nov 2017

ममता का काव्य ‘लोरी’


डॉ. जियाउर रहमान जाफरी

उच्च विद्यालय माफी
पोस्ट- माफी, व्हाया- अस्थावां
जिला- नालंदा-803107 (बिहार)
मो.  0993484794
‘लोरी’ कविता की विधा उस रूप में कयबी नहीं रही, जिस रूप में गीत, नवगीत, गजल या मुक्त छंद का काव्य है। लेकिन जिन लोगों ने वात्सल्य रस की कविता लिखी, उन्होंने लोरी जरूर लिखी। सूर और नंद का वात्सल्य वर्णन इसका उदाहरण है। सूर के बालकृष्ण को नींद नहीं आ रही, मां उन्हें सुलाने का सारा यत्न कर रही है। कभी उन्हें झूले झुलाती है, कभी हिलाती-डुलाती है, उस पर भी जब कामयाब नहीं होती तो अपने लाडले को दुनिया की सबसे मीठी  जुबान में लोरी सुनाती है-
जशोदा हरि पालने झुलावै
हलरावै दुलराई मल्हावै, जो सोई कछु गावै।
लोरी शब्द हिन्दी का है जिसका अर्थ वह गाना या गीत है, जो  मां अपने बच्चों को सुलाने के लिए गाती हैं।
मां का प्यार बच्चों के जीवन की दिव्य विभूति है। वह अपनी सारी खुशी अपने बच्चों के लिए न्योछावर कर देती हैं। उसके लाडले को थोड़ी भी तकली$फ न हो इसके लिए वह सारी रात जागती है। उसकी थोड़ी सी परेशानी उसे बेचैन कर देती है। जागते ही नहीं सोते हुए बच्चे को भी किसी भय की आशंका से सीने से लगाए रखती हैं। मां के साथ जैसे ममता है, वैसे ही ममता का साथ निभाने वाली लोरी है।
लोरी की रचना कमोबेश दुनिया की सारी भाषाओं और मुल्कों में हुई क्योंकि मां चाहे जिस देश की हो, उसकी ममता एक-सी होती है। हर मां बेचैन बच्चों को अपने लाड़-प्यार और आत्मीयता के साथ, सुकून के साथ नींद के आ$गोश में सुलाना चाहती है। उसे पता है, इसके लिए लोरी से बेहतर कुछ नहीं है। लोरी के बोल सुनते ही बच्चों का सो जाना, बच्चे की जन्मजात संगीतप्रियता को जाहिर करती है। लोरी एक ताकत है, एक उपचार है, एक ताजगी है, एक शक्ति है, जिसका एक उदाहरण पिछले दिनों भी देखने को मिला। जयपुर में ढाई साल की बच्ची को निमोनिया ने ऐसा जकड़ा कि वह कोमा में चली गई। डॉक्टर ने एक प्रयोग कर बच्ची को म्यूजिक थैरेपी के साथ मां की लोरी सुनाई और नन्हीं बच्ची मां की चिरपरिचित आवाज सुनकर धीरे-धीरे आंखें खोलने लगी और कोमा से वापस आ गई। वैज्ञानिकों ने भी एक शोध के क्रम में पाया कि दो पौधों में से जिन पौधों को संगीत सुनाया गया, वह पौधे अपेक्षाकृत अधिक तेजी से बढऩे लगे।
लोरी लिखने की शुरूआत जब भी हुई हो, लेकिन किताबी शक्ल में इसका प्रकाशन आज तक नहीं हुआ।
लोरी का उद्देश्य बच्चों को मीठी नींद में सुलाना है, लेकिन ऐसा नहीं है कि इसमें सिर्फ सोने का वर्णन होता है। उसमें बच्चों के प्रति मां की शुभकामनाएं, सफल जीवन के लिए ढेरों शुभकामनाएं, उसे जल्दी से बड़े हो जाने की तमन्ना आदि भी दिखाई देती है। कुछ लोरियां ऐसी भी हैं जिसे मां ने न गाकर बहन, नानी, दादी आदि ने गाया है।
लोरी को प्रसिद्ध करने में फिल्मों की बड़ी भूमिका रही। सौ से अधिक $िफल्में ऐसी हैं, जिसमें लोरियां गाई गईं, और सारी लोरियां फ़िल्म की प्रसिद्धि का आधार बनीं। उदाहरण के लिए कुछ लोरियां देखी जा सकती हैं-
चंदनिया छुप जाना रे
क्षण भर को लुक जाना रे
निंदिया आंखों में आए
बिटिया मेरी सो जाए
111
लल्ला-लल्ला लोरी
दूध की कटोरी
दूध में बताशा
मुन्ना करे तमाशा
    (फिल्म मुक्ति)
111
आ जा रही आ निंदिया
तू आके न जा
नन्हीं सी आंखों में
घुल-मिल जा
    (फिल्म- बीती बातें)
111
फिर 1935 में ‘वचन’ फिल्म आई और उसकी यह लोरी तो दुनिया की सबसे प्रसिद्ध लोरी  बन गई-
चंदा मामा दूर के
पूरी पकाए गूर के
आप खाए थाली में
मुन्ने को दे प्याली में
हिन्दी में अष्टछाप के प्राय: सभी कृष्ण भक्त कवियों में लोरी के तत्व मिलते हैं। देर रात जब मां बच्चे को लोरी सुनाकर सुलाने का प्रयत्न करती हैं तो सूर के कृष्ण और तुलसी के बाल राम दोनों चांद को देखकर मचल उठते हैं और मां से चांद की $फरमाइश करते हैं। लोरी में ‘चांद’ का वर्णन शायद सबसे ज्य़ादा हुआ है। यह चांद बच्चों के मामा हैं। बच्चे ही नहीं उनके पिता जी भी जब बच्चे थे तो यह उनके  भी मामा लगते थे। एक चांद दूर आसमान है और एक चांद मां की गोद में है-
सो गई धरती सो गया अंबर
 सो गए चांद सितारे
सो गई नदिया, सो गए अंबर,
सो गए सारे नजारे।
अथवा
बेटा मेरा प्यारा है
दिल का राजदुलारा है
चांद के जैसा लगता है
उसका घर उजियारा है।
    (शाहिद फिरोजी )
लोरी में चांद के अलावा झूलों, परियों, फूल-फलों, गुड्डे, गुडिय़ों, खौ$फनाक जानवरों का वर्णन तो है ही, उस मौत का भी वर्णन है, जिस चिर निद्रा के बाद आदमी कभी नहीं जागता।
पाकिस्तान के लाहौर में स्कूल के बच्चों के साथ घटी दुर्लभतम घटना का वर्णन साबिर हिना ने अपनी हालिया लोरी में किया है, जिसका अंत यों होता है-
मेरे बच्चे न रो अब तो
तेरा भैया न आएगा
मेरे मुन्ने तू अब सो जा
ऐसी ही एक लोरी गुलाम रब्बानी की है, जिसमें उसी मौत का वर्णन है-
पापा जो कुरबान थे तुझ पर
सो गए कब्रिस्तान में जाकर
भाषा के दृष्टिकोण से लोरी बेहद ही सहज और सरल जुबान में लिखी जाती है। काव्य की दूसरी और तीसरी शक्तियां लक्षणा और व्यंजना का यहां कोई काम नहीं होता। लोरी में भाषा की मिठास का उसकी सहजता का और संप्रेषणीयता का बेहद $ख्याल रखा जाता है। यों भी मां की बोली में सि$र्फ ममता होती है, और ममता की जुबान निहायत ही सीधी-सादी होती है।
लोरी मां का गेय काव्य है, जाहिर है कि उसकी रचयिता भी स्त्री हो तो उसकी मधुरता और बढ़ती जाती है। डॉ. शगुफ्ता $गजल की लोरी में शायरा नींद को भी आहिस्ता से आने की हिदायत देती हैं-
निंदिया रानी आना जरा धीरे-धीरे आना
आकर मेरी प्यारी गुडिय़ा को सुलाना
वहीं तलत $फातमा बच्चे को काजल और टीका लगाकर सुलाती है-
तुझको किसी की डर न लगे
मेरी गुडिय़ा को नजर न लगे

काजल टीका लगा जा रहे
निंदिया रानी आ जा रे
मधु अनूप लोरी ही लोरी में बच्चे को पढ़ाने का काम कर देती हैं-
उर्दू-बंगला हिन्दी पढऩा
बिटिया मेरी अंग्रेजी पढऩा
कहना न होगा कि किसी भी काव्य विधा में लोरी की प्रभावोत्पादकता कम कर नहीं आंकी जा सकती।
जरूरत है आने वाले वक़्त में लोरी पर शोध किया जाए ताकि यत्र-तत्र फैली हुई हजारों लोरियां संदर्भ के साथ एक जगह इकट्ठा हो सके। निश्चित ही ऐसा प्रयास नया और सराहनीय होगा।