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Monday 20 Nov 2017

मैथिलीशरण गुप्त की कविता का ताना-बाना

डॉ. सेवाराम त्रिपाठी

  6 रजनीगंधा, शिल्पी उपवन, श्रीयुत् नगर, रीवा मप्र 486002
मो. 9425185272

गुप्त जी को उनके समय के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिये, यदि आज की नजऱ से उनकी साहित्यिक साधना को देखा जायेगा तो संभवत: हम उनके अवदान का ठीक ठीक मूल्यांकन नहीं कर पाएंगें। मैथिलीशरण गुप्त जी को याद करना उनके कालखण्ड, समाज और परिवेश की विडम्बनाओं, अन्तर्विरोधों और चुनौतियों को भी याद करना है। गुप्त जी की रचनात्मकता का दौर लगभग छ: दशकों तक फैला हुआ है। वे ऐसे समय की देन हैं जब भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन की लड़ाई चल रही थी। राष्ट्रीय नवजागरण की फिजा थी। हिन्दी खड़ी बोली अपने अस्तित्व रक्षा और विकास की लड़ाई लड़ रही थी। आधुनिक काल के फैलाव और व्याप्ति से उस जमाने की खड़ी बोली और आज की हिन्दी के विकास और निर्धारण में उनका साहित्य और खासकर उनकी कविता की महती भूमिका है। हरिऔध जी का ‘प्रियप्रवास’ खड़ी बोली का पहला महाकाव्य है लेकिन उसकी भाषा में संस्कृत की तत्समता और छन्द कौशल का वितान है जबकि गुप्त जी के महाकाव्य साकेत में रचनात्मकता और प्रश्नाकुलता और खड़ी बोली की निरन्तरता है। गुप्त जी पर लिखते या बात करते हुए हम उस राष्ट्रीय परिदृश्य को ओझल नहीं कर सकते। गुप्त जी की आसान सी लगने वाली कविताएं अपने समय के द्वन्द्व को जिस रूप में परिभाषित और व्याख्यायित करती हैं वह आज भले ही साधारण लगता हो लेकिन उस दौर में असाधारण और जटिल था।
‘‘ हम कौन थे, क्या हो गये और क्या होंगे अभी।
    आओ विचारें आज मिलकर ये समस्यायें सभी।। ‘‘
    गुप्त जी की यह प्रश्नाकुलता बीसवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों एवं इक्कीसवीं शताब्दी के शुरूआती दौर में भले ही सामान्य सी लगती हो लेकिन गौर से देखने में लगेगा कि वे प्रश्न आज भी हमारा पीछा कर रहें हैं और उनका उत्तर खोजे बगैर हम विकास का कोई नया मानदण्ड निर्धारित नहीं कर सकते। उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी के स्वरूप को स्थिर किया। अपने जातीय छंदों का प्रयोग और उसका निर्वाह किया। यह उस दौर में बड़ी बात थी। गुप्त जी स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर के कवि थे। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के निर्देशन में उनकी कविता फूली-फली। उनमें महात्मा गांधी के जीवन दर्शन और विचारों का व्यापक असर रहा है उनकी कविता में भरपूर वैष्णवता है। यह असर भारतीय संस्कृति के उन उदात्त तत्वों से मिलकर ज़्यादा गाढ़ा हुआ है, जहां मनुष्यता, विनम्रता, सरलता, सहजता और निश्छलता है। उसमें सामान्य जनों की पीड़ा, दैन्य और संघर्षशीलता का अजस्र प्रवाह है। उनकी कविता कई आयामों को लेकर चलती है। उनकी काव्य दृष्टि एकांगी न होकर विविधतामय है, उसमें हमें दूर तक ले जाने की क्षमता है।
    हिन्दी संसार ने गुप्त जी का मान-सम्मान भरपूर किया। वे अपनी दिनचर्या और समग्र जीवन में मर्यादाओं के बहुत क़ायल रहे। उनकी जीवनी शक्ति का अन्दाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनमें प्राचीनता और आधुनिकता का जबरदस्त दन्द्व रहा है। एक वैष्णव परिवार में जन्म लेने, संस्कारित होने के बावजूद उनके व्यक्तित्व में रूढि़भंजक तत्वों की कमी नहीं है। कभी-कभी आश्चर्य होता है कि पूजा अर्चना का अभ्यासी यह कवि कैसे बड़ी ऊंची बातें करता है। डॉ.नगेन्द्र के शब्दों में ‘‘उन्होंने मध्य युग के ही संस्कार विरासत में पाये थे परंतु आधुनिक जीवन की गतिविधि को आत्मसात करने के लिये उनके मन की स्फूर्ति अन्त तक बनी रही। खाने मे जूठे संकरे का ध्यान उन्हें अन्त तक रहा। पर जाति और वर्ण की क्षुद्र भेद-भावना से वे सर्वथा मुक्त हो चुके थे।......संस्कार तो पुराण युग में रमते थे पर विवेक की दृष्टि वर्तमान पर केन्द्रित थी। परिणामत: उनकी कल्पना और भावना जब-जब मध्ययुग के इतिहास या उससे भी पूर्व के पुराण युग या और भी धुंधले महाभारत रामायण काल में विचरण करने जाती थी तो कवि का अपना देशकाल सदा साथ चलता था।’’ (चेतना के बिम्ब-पृष्ठ 26) मेरी समझ में वे भारतीय पारिवारिकता के बड़े कवि हैं। उपेक्षित स्त्री को अपने समय में रचने का उनका माद्दा व्यापक मानवीय और संघर्षकामी है। वे भारतीय सांस्कृतिक सम्पन्नता के साहित्यिक अनुरागमयी सहजता के एवं राष्ट्रीय मूल्यों के अनुगायक रहे हैं। राष्ट्रीय गरिमा को वे बहुत उदारता सहजता और मानवीयता के साथ उठाते हैं। महादेवी वर्मा, अज्ञेय और अन्य कवियों ने भारत भारती जैसी कृतियों से निरन्तर प्रेरणा ली है और राष्ट्रीय जीवन मूल्यों के विकास से उनकी कविता के पदचापों को गम्भीरता से सुना है और स्वाधीनता आन्दोलन में उनके प्रेरक मर्म को रचनात्मक रूप में आत्मसात किया है।
    इससे साफ़  जाहिर होता है कि गुप्त जी के मनोविज्ञान में परम्परा और आधुनिकता की टकराहट तो थी ही लेकिन अपने देशकाल को, अपने परिवेश को वे कभी भूले नहीं। मूलत: गुप्त जी की चेतना में राष्ट्रीय स्वाभिमान और अपने सांस्कृतिक मूल्यों को सुरक्षित और संरक्षित रखने का दायित्व बोध था। वे अपने संस्कारों मान-मूल्यों में एक सच्चे गृहस्थ की भूमिका भी निभा रहे थे तो दूसरी ओर उनके सामने खड़ी बोली को कविता की भाषा में बदलने का स्वप्न भी था। सदियों से उपेक्षित, वंचित पात्रों और चरित्रों को वे हाशिये से निकाल कर केन्द्र में या कम से कम अन्य पात्रों या चरित्रों की बराबरी पर खड़ा करना चाहते थे। अपनी सीमाओं के भीतर गुप्त जी की कविता इन चुनौतियों का रचनात्मक स्तर पर सामना करती है। इन सबको यथोचित अवसर देने के लिये वे बार-बार अतीत में झांकते हैं। दबे हुए राष्ट्रीय स्वाभिमान को जगाने के लिये इतिहास, पुराण और उन आदर्शों की ओर लौटते हैं जिनसे यह काम संभव हो सके। यह सुविख्यात तथ्य है कि गुप्त जी इतिहासकार नहीं थे इसलिये वे पुराण इतिहास से अपने अनुकूल कथायें चुनते हैं, अपने ढंग से उनका रचनात्मक इस्तेमाल भी करते हैं। यह मान लेने में कोई विशेष हिचक नहीं होनी चाहिये कि वे बहुत प्रतिभा संपन्न कवि नहीं थे। वे असावधान भी नहीं थे। हां, उनमें राष्ट्रभक्ति का जज्बा औरों की तुलना में किसी से कम नहीं था। यह काम वे अतीत के गौरव की पृष्ठभूमि पर कर रहे थे।
मानस भवन में आर्यजन जिनकी उतारें आरती।
  भगवान  भारतवर्ष  में  गूंजे  हमारी  भारती।।
    उत्तर भारत में राष्ट्रीयता के प्रचार-प्रसार में ‘ भारतभारती’ का महत्वपूर्ण एवं सार्थक योगदान है। हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में ‘‘ भारतभारती ने उन दिनों के विदेशी शासन से मुक्ति पाने की अपूर्व प्रेरणा दी। समूचे हिन्दीभाषी प्रदेश को उद्बुध और प्रेरित करने में इस पुस्तक ने प्रशंसनीय शक्ति का  परिचय दिया’’। (हिन्दी साहित्य का उद्भव और विकास-पृष्ठ 232) ‘भारतभारती’ ऐसी कृति है जिसकी रचनायें गाते हुए लोगों ने राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन की लड़ाई लड़ी। महादेवी वर्मा का मानना है कि ‘‘जब स्वतंत्रता का आन्दोलन चला तो हमारे हाथ में केवल भारतभारती थी और उसको हम गीता की तरह पढ़ते थे।........ उनकी क्रांति विचार की क्रांति है, लेखन की क्रांति है, आचरण की क्रांति है, भाषा की क्रांति है। कितनी क्रंातियां हैं एक साथ ही।’’
    मैथिलीशरण गुप्त का मन एक देशी मन था, और देशीपन के प्रति उनका विश्वास भी था। बुन्देलखण्ड उनकी रचनाओं में रचा बसा है वैसे ही जैसे वृंदावन लाल वर्मा के समूचे गद्य में वह विद्यमान है। कविता और अपने जीवन में वे अपने देशीपन को कभी भूले नहीं, साधारण बोल-चाल की भाषा, अपनी परम्परा से प्राप्त जातीय छंद, सीधा-सादा गृहस्थ जीवन, विनम्रता में अटूट विश्वास ये कुछ मूलभूत तत्व हैं जिनसे उनकी कविता अपनी आकृति पाती है। वे दूर की कौड़ी खोजने नहीं गये। कोई विशिष्ट  प्रयोग नहीं किये। सहजता उनकी आत्मा का श्रृंगार है। यह सहजता उनके जीवन कथ्य और भाषा तथा भाव भंगिमा में अनुस्यूत हैं। कविता लिखते वक़्त भी वे मनुष्य को कभी नहीं भूलते। दो उदाहरण दृष्टव्य हैं-
(1.) ‘‘हो रहा है जहां, सो हो रहा, यदि वही हमने कहा तो क्या कहा?
           किन्तु होना चाहिये, कब क्या, कहां कम करती है कला ही यह यहां ’’ (साकेत)
       (2.) संसार में कविता  अनेकों  क्रांतियां  कर  चुकी।
         मुरझाये मनों में वेग की विद्युत प्रभायें भर चुकी।। (भारतभारती)
    डा. कमला प्रसाद ने सही लक्ष्य किया है कि ‘‘मैथिलीशरण गुप्त जातीय चेतना के कवि हैं। बुन्देलखण्ड के लोक विश्वास, त्यौहार, रीतिरिवाज उन्हें पता थे।..... काव्य विषय के क्षेत्र में उन्होंने पुराने वृत्तों के भीतर से नये संघर्ष पैदा किये तथा भाषाकार के रूप में बोलियों की मिठास, जि़न्दादिली सहजता और वास्तविकता को खड़ी बोली में समो दिया। लोक काव्य से उन्होंने अन्योक्ति प्रणाली में बहुत अच्छा इस्तेमाल नये संदर्भ में किया।’’
    यह है गुप्त जी की असली ताक़त जिसके कारण उनकी कविता इतने बदलावों के बाद भी जमी हुई है। आधुनिक कविता के परिदृश्य में उनकी अपनी सहजता, सरलता और आडम्बरहीनता के बावजूद सर्वमान्य है। वर्णन की कविता, आख़्यानक और प्रबंधपरकता उनकी कविता के ऐसे दुर्लभ तत्व हैं जो साधना के बिना कोई ग्रहण नहीं कर सकता। गुप्तजी ने जो कथा प्रसंग अपनी कविता के लिये चुने हैं उनमें विविधता हैं। वे राम कथा, कृष्ण कथा, महाभारत, गौतम बुद्ध और  कार्लमाक्र्स के पास भी जाते हैं कथाचयन के लिये। इन समूचे कथा प्रसंगों की संरचना वे अपने मनोविज्ञान के आधार पर करते हैं। अतीत को वर्तमान में समेटते हुए उसे वे युगानुकूल बनाने का प्रयास करते हैं। उनमें रचनात्मकता दंभ का नामोनिशान तक नहीं मिलता। दरअसल उन्हें अपनी कविता की भूमिका का ज्ञान था। प्रेमचन्द्र की पहली बरसी पर दिये गये भाषण में उन्होंने कहा था ‘‘ मैं किसी क्षण अपने युग को नहीं भूला हूं। हमारी आज की रचनायें आज का ही काम चला दें तो यही क्या थोड़ा है? कल के लिये आज की उपेक्षा करके हम, विशेषकर मेरे ऐसे जन, कौन अमर हुए जाते हैं?’’
    अपने युग, अपनी मिट्टी और अपने लोगों के प्रति गुप्त जी की तरह सच्ची भावनामयता, संवेदनात्मकता कम मिलती है। उनकी कवितायें इन गुणों से भीगी हुईं हैं। निश्चय ही देश की स्वतंत्रता, समृद्धि और राष्ट्रीय एकता के लिये वे प्राणपन से आजीवन जुटे रहे। उनकी यह कविता मुझे बरबस याद आती है-
 ‘‘मेरी मिट्टी मैं बलि जाऊं/तुझे पात्र में परिणत  पाऊं।
 खुले खेत से लाकर छानूं/जल दूं, सार मिलाकर सानूं।
    सनू स्वेद में किन्तु न मानूं/जब लौ लोच न लाऊं।’’
    यूं तो गुप्त जी का काव्य फलक बहुत व्यापक और बहुआयामी है। भारतभारती, साकेत, जयद्रथवध, यशोधरा, झंकार, कावा और कर्बला, सिद्धराज, रंग में भंग, गुुरुकुल, द्वापर, शकुन्तला, सैरन्ध्री, हिडिम्बा, विष्णुप्रिया, नहुष, कुणालगीत, अर्जन और विसर्जन, पृथिवीपुत्र, उच्छवास, तिलोत्तमा, पंचवटी, किसान, जयभारत, हिन्दू, गुरुतेग बहादुर आदि उनके संकलन हैं। इन सभी के माध्यम से वे आधुनिक भारत और खासकर अपने वर्तमान को खोजते हैं। हिन्दी में जितने काव्यांदोलन चले उन सबकी गंूज-अनूगूंज उनके कथ्य और शैली में आवाजाही करती है। त्रिलोचन जी मानते हैं कि ‘‘मैथिलीशरण गुप्त हिन्दी कविता में कोई भी नई प्रवृत्ति आई हो उस पर ध्यान रखते थे, यह उनकी रचनाओं को पढऩे से ही जाना जा सकता है।’’  (आलोचना अंक-79)
    मैथिलीशरण गुप्त की कविता में उन मानवीय मूल्यों की खोज हुई है जो धीरे-धीरे विसर्जित होते जा रहे हैं। उन पात्रों और चरित्रों की खोज है जिनकी जिजीविषा और संघर्ष को अनदेखा किया गया है। साकेत की उर्मिला, कैकेयी, पंचवटी की शूर्पणखा, यशोधरा की यशोधरा, विष्णुप्रिया की विष्णुप्रिया, जयिनी की जयिनी, द्वापर की कुब्जा को उन्होंने बड़ी आत्मीयता और संवेदनशीलता से छुआ और चित्रित किया है। यहां गुप्त जी की संवेदनशीलता छलक-छलक पड़ती हैं। वे इन खोये हुए अनचीन्हे पात्रों और चरित्रों को अपनी आंतरिक अनुभूतियों के साथ बिम्बित और चित्रित करते हैैं। ऐसे पात्र जिन्हें पुराणों में जगह नहीं मिली, कथाओं में रचनाकारों ने जिन्हें छोड़ दिया ऐसे तमाम चरित्रों पर उन्होंने भरपूर रोशनी डाली। मेरी समझ में यह रचनात्मकता के क्षेत्र में एक नया दृश्यान्तर था जिसे गुप्त जी ने हमारे लिये संभव बनाया। नारी के प्रति उनके मन की तड़प को हम दो उदाहरणों से थाह सकते हैं।
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आंचल में है दूध आंखों में पानी।
‘पंचवटी’ में शूर्णपखा का यह प्रश्न आज भी हमें मथता और झकझोरता है-
‘नरकृत शास्त्रों के सब बन्धन हैं
नारी को ही लेकर,
अपने लिये सभी सुविधायें
पहले ही कर बैठे नर।’’
कह सकते हो कि चन्द्र का कौन
दोष जो ठगा चकोर
              किन्तु कलाधर ने डाला है किरण जाल क्यों उसकी ओर।
    नारी के प्रति गुप्त जी का दृष्टिकोण बहुत उदार, व्यापक और सम्मान से युक्त है, यह इसलिये भी संभव हुआ कि उन्होंने सम्पूर्ण भारतीय पारिवारिक वातावरण उसकी वस्तुस्थितियों को बड़ी उदात्तता, संलग्नता और सघनता से चित्रित किया है। ध्यातव्य है कि नारी हमेशा उत्पीडि़त और वंचित रही, उसे अधिकारों से विहीन करके हमेशा पराश्रित रखने का प्रयत्न किया गया। नारी उत्पीडऩ के और उसकी दुर्दशा के अनेक चित्र हमारी पुराण कथाओं एवं गाथाओं में मिलते हैं। साथ ही साकेत में किसानों, श्रमिकों की ओर गुप्त जी का ध्यान बार-बार जाता है। उसकी मुख्य वजह यह है कि वे लिख तो राम कथा रहे हैं, जीवन स्वतंत्रता संग्राम में लगा है और मन लोगों के जीवन्त संघर्षों की खोज में। वे अनुभव स्वतंत्रता संग्राम से लाते हैं। जिन्दगी के संघर्षों से लाते हैं, अतीत के पात्रों से, उन्हें फिर जि़न्दा करते हैं। यह उनकी अन्यतम विशेषता है। गुप्त जी की चेतना में अविचल राम भक्ति के साथ ही युगीन चेतना और उसकी कार्यवाहियों की व्यापक अभिव्यक्ति होती है। आलोचकों को प्राय: यह भ्रम रहा है कि गुप्त जी ने पुरानी कथाओं को ज्यों का त्यों रखते हुये पिस्टप्रेषण किया है। लेकिन उनका ध्यान शायद इस ओर नहीं गया कि पात्र प्राचीनतम और विविध रूपात्मक होते हुए भी आधुनिक कवि के यहां आधुनिकीकरण रूप में भी दिखाई देते हैं। मैथिलीशरण गुप्त केवल अनुगामी नहीं हैं। वे उद्भावक भी हैं। उनकी रचनाओं को पढऩे से पता चलता है कि उन्होंने उर्मिला, यशोधरा और कुब्जा जैसे पात्रों को नये सांचे में युग के अनुकूल और नवजागरण की स्थितियों के संदर्भ में ढाला है। यह उनका अपना निजी मुहावरा है। जो उस दौर में प्राय: किसी के पास नहीं था।
    मैथिलीशरण गुप्त जी की भाषा के प्रसंग में कुछ बातों का संकेत किया जा सकता है। इससे उनकी दृष्टि का पता चलता है। यहां यह देखना ज़रूरी है कि उनके काव्य संसार में कृत्रिम भाषा की आवाजाही लगभग नहीं है। दूसरा उनका एक संकल्प यह भी था कि खड़ी बोली को कविता की भाषा में तब्दील किया जाये। इसके लिये उन्हें अतिरिक्त रूप से परिश्रम करना पड़ा। जैसी भाषा का व्यवहार गुप्त जी करते हैं वैसा कोई चाहकर भी नहीं कर सकता क्योंकि यह भाषा एक तरह से संस्कारित भाषा है। किस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना है, यह चेतना गुप्त जी में हमेशा मौजूद रही है।
    जाहिर है कि गुप्त जी की भाषा सायास है, इसलिये उसमें इकहरापन है। इस इकहरापन के मूल में उनके भावबोध और चिन्तन के इकहरेपन की अनुगूंज है। गुप्त जी की भाषा में जो सपाटपन है उससे उनकी कविता का सौन्दर्यबोध और अर्थबोध बाधित होता है। जयद्रथ वध की भाषा गद्यात्मक है। नामवर सिंह मानते हंै कि इसके बावजूद वह प्रसंगों की मार्मिकता के उद्घाटन में पूरी तरह समर्थ है। गुप्त जी वक्रोक्ति के कवि नहीं हैं, उनमें स्वभावोक्ति का पूरा ऐश्वर्य है। डा. रामविलास शर्मा गुप्त जी के गद्य के प्रशंसक हैं। जिसे हिन्दी संसार बहुत कम जानता है। गुप्त जी ने समीक्षाएं लिखी हैं वे वर्णित विषयों को बहुत गहराई तक प्रस्तुत करती हैं। यही गुप्त जी के गद्य का सौन्दर्य है। इस गद्य में गुप्त जी पूरी तरह से खुलते हैं। अपने मन की और युगीन स्थितियों को साधते हैं। बहुत दूर तक जाने का प्रयास करते हैं।
    गुप्त जी की भाषा पर विचार करते हुए यह कहना लाजमी है कि उन्होंने अपने समय तक प्रचलित काव्य भाषा ब्रजी से संघर्ष करते हुए खड़ी बोली हिन्दी को भाषा बनाने में भूमिका निभाई। उनकी भाषा की सहजता, सरलता और सपाटता जहां एक ओर हमें आकर्षित करती है वहीं दूसरी ओर वह उसके सौन्दर्यबोध और व्यंजकता को कम करती है। ऐसा नहीं है कि उनकी भाषा में व्यंजनाओं के नये तेवर नहीं हैं। यहां त्रिलोचन जी का यह कथन बरबस याद आता है कि ‘‘भाषा परिमार्जन और परिनिष्ठापन की दृष्टि से मैथिलीशरण का कार्य अन्य कवियों से बहुत बढ़ा-चढ़ा है। उनकी हिन्दी पर दूसरी भाषाओं का प्रभाव प्राय: नहीं के बराबर है। सरल स्वाभाविक और स्वच्छन्द प्रवाह उनकी भाषा में बराबर मिलता है।’’ (आलोचना-79)
हमारे जीवन में ‘स्वतंत्रता एक मूल्य की तरह है। फ्रांस की राज्य क्रांति के पश्चात् स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व- ये तीन बिन्दु उभर कर सामने आये थे। इन बिन्दुओं ने समूची दुनिया में एक नये तरह का विचार पैदा किया। आज तो इन मूल्यों के बगैर हमारे जीवन की सार्थकता के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। स्वतंत्रता का फैलाव सभी ओर है। राजनीतिक स्वतंत्रता मिलने के बावजूद यदि हम मानसिक रूप से गुलाम हैं तो वह राजनीतिक स्वतंत्रता बहुत कारगर नहीं होती। स्वतंत्रता रीतिवाद, रहस्यवाद के खि़लाफ  आधुनिकता की, गुलामी के खि़लाफ़  आज़ादी की। भारत का स्वाधीनता आंदोलन कई तरह के उतार चढ़ाव के बीच लड़ा गया। डॉ. रामविलास शर्मा मानते हैं कि ‘‘लगभग दो सौ वर्षों से हमारे लिये मुख्य समस्या राष्ट्रीय एकता की रही है। इस समस्या के विवेचन में सबसे पहले ध्यान 1857 के स्वाधीनता संग्राम की ओर जाता है। इस संग्राम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका नेतृत्व पूंजीपतियों,  पूंजीवादी पार्टियों के हाथ में नहीं था। इसके नेता फौजी वर्दी पहने हुए किसान थे और वे सामंतों को इसके साथ लेकर चले थे, पीछे न चले थे।.....मूल समस्या हिंसा और अहिंसा की नहीं है वरन साम्राज्य विरोधी संघर्ष को सुसंगत रूप से चलाने की है।’’ (स्वाधीनता संग्राम बदलते परिप्रेक्ष्य)
    मैथिलीशरण गुप्त का आविर्भाव और लेखन उस समय हुआ जब गुलामी के खि़लाफ़ भारत का स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था। खड़ी बोली हिन्दी के रूप में नई चाल में ढल रही थी। राष्ट्रीय पुनर्जागरण से नवजागरण की ओर नये प्रस्थानक क्रियाशील थे। इसके पूर्व राजा राममोहन राय, दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जैसी क्रांतिकारी प्रतिभाओं की विरासत और उनके द्वारा किये गये कार्य हमारे सामने थे। सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक परिप्रेक्ष्य हमारी विकास यात्रा में हर तरह से सामाजिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप कर रहे थे, जिसकी गूंज बाद के दौर में भी लगातार सुनाई पड़ती रही है। गुप्त जी का कवि कर्म जनता से सीधे-सीधे संवाद के रूप में रहा है। अपनी सहज सरल भाषा में अपनी सादगी के साथ अपने समय के सवालों को उठा रहे थे।
    ये सवाल इस समय भले ही बहुत छोटे लगें लेकिन उस दौर में वे हमारे जीवन-मरण के सवाल थे। इस तरह के गहरे प्रश्नांकन गुप्त जी की मनोभूमि में बार-बार दिखाई पड़ते हैं। उनकी कविताओं में स्वतंत्रता आंदोलन, सामाजिक परिवर्तन और दबे-कुचले भारत की जनता के अनेक चित्र हैं। वे ब्रिटिश साम्रज्यवाद और देशी सामंतवाद के खि़लाफ़ लडऩा चाहते थे। उनकी रचनात्मकता में राष्ट्रीयता, देशभक्ति, आज़ादी और भारतीय संस्कृति के उजले पक्षों के लिये भरपूर जगह है। साम्राज्यवादी, उपनिवेशवादी ब्रिटिश हुकूमत के खि़लाफ़  वे अपने औजारों के माध्यम से लडऩे के आग्रही रहे हैं। उनकी रचनाओं में भविष्य के प्रति गहरी आस्था है। वे अपने आपको आधुनिकता से जोड़ते हैं। अपने युग की चेतना और आवश्यकताओं से उसे आधुनिकता के विभिन्न आयामों से व्यवस्थित करते हैं।
    अपनी कविता में वे बार-बार भारती के गूंजने की बात करते हैं। यह गूंजना अनायास नहीं है। इसके पीछे उनके फौलादी इरादे और मुक्ति की अदम्य आकांक्षा की भावना की प्रबलता है। वे स्वतंत्रता आंदोलन की आग को निरन्तर जलाये रखने के पक्षधर रहे हैं। एक दौर ऐसा भी था जब गुप्त जी की कविता हिन्दी भाषा-भाषी लोगों की जबान पर रहती थी। अज्ञेय के शब्दों में-‘‘स्वर्गीय श्री मैथिलीशरण गुप्त दद्दा मेरे गुरू स्थानीय थे। स्वयं उन्हें यह बात आसानी से स्वीकार्य नहीं होती क्योंकि इस शिष्य की बहुत सी प्रवृत्तियां उन्हें नापसंद थी। लेकिन मैं तो जानता हूं कि बचपन से ही जब से हिन्दी बोलना और फिर पढऩा सीखा, उन्हीं की कविता पर पलकर किशोर हुआ। निज मातृभूमि स्वदेश के गोदी भरे हम लाल हैं अथवा तेरे घर के द्वार बहुत हैं किसमें होकर आऊं मैं अथवा नीलाम्बर परिधान हरित पट पर सुंदर हैं आदि से हिन्दी काव्य से और देश भूमि से परिचित हुआ।’’ (स्मृति लेख से)
    1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में गुप्त जी को जेल भी जाना पड़ा। महादेवी वर्मा ने ‘पथ के साथी’ में उसका वर्णन कुछ इस प्रकार किया है-‘‘सन् 1942 के आंदोलन में पुलिस ने बिना किसी कारण के ही उन्हें तथा उनके अग्रज को अपने बंदीगृह में अतिथि बनाया। वैष्णवता की जिस सजलता ने उनके मन में रोष का दाह धो डाला था, उसी में अनेक निर्दोषों के बंधन ने ज्वाला उत्पन्न कर दी।’’ दुर्भाग्यवश कलेक्टर जेल की परिधि में अपने कवि बंदी से प्रश्न कर बैठा। आप कुछ कहेंगे? उत्तर देने वाले बंदी की विनम्रता मानो शिला से टकरा कर उग्रता में फूट पड़ी। ‘‘आपका दिमाग खराब हो गया है, आप से क्या बातें करें। आप निर्दोषों को पकड़ते घूमते हैं। हमारा क्या हम तो लेखक ठहरे यहां सब देखेंगे और इसके खि़लाफ  लिखेंगे।’’ इसे हम गुप्त जी की साहस कथा के रूप में चिन्हित कर सकते हैं।
    गुप्त जी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के वारिस हैं जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में अपने तमाम साथियों के सामने एक मिसाल रखी, ‘‘रोवहु सब मिलि भारत भाई। हा! हा! अब भारत दुर्दशा न देखी जाई।’’ वे भारत का समूचा धन विदेश ढोकर जाने की बात करते हैं। वे अंग्रेजों के खि़लाफ मुकरियां लिखते हैं। वे अंधेरनगरी का महास्वप्न देखते हैं। अंधेर नगरी उनके समय की जटिल स्थितियां हैं। उनके समय की नकारात्मकता है। भारतेन्दु के नक्शे क़दम पर चलते हुए गुप्त जी ने उस दौर के यथार्थ का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है।
        ‘‘अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी, टके सेर खाजा’’ गुप्त जी के मन में स्वाधीनता के  प्रति, अपने सुनहरे अतीत के प्रति गहरा राग पैदा करता रहा है। उनका काव्य सच्चाई और संकल्प से संचालित है, ऐसी सच्चाई जो किसी अवरोध को स्वीकार नहीं करती।
            ‘‘हा लेखनी! हत्पत्र पर लिखनी तुझे है यह कथा,
            दृक्कालिमा में डूबकर तैयार होकर सर्वथा।
            स्वच्छंदता से कर तुझे करने पड़े प्रस्ताव जो,
    जग जाये तेरी नोक से सोये हुए हों भाव जो।।’’(भारत भारती)
    जाहिर है कि आज़ादी की कहानी हृदय के पत्रों पर लिखी जाती है। गुलामी के विरुद्ध संघर्ष किये बिना विकास की कोई किरण नहीं। गुलामी अपने आप में बहुत बड़ी कालिमा है। इस कालिमा को जाने बिना इसकी वास्तविकता को पहचाने बिना स्वतंत्रता के मूल्यों को समझा नहीं जा सकता। गुप्त जी की कविताओं में स्वाधीनता की चेतना प्रारम्भ से ही रही है। वे राष्ट्र प्रेम, राष्ट्रहित को कभी भुलाते नहीं, बल्कि उसे लगातार जगाये रखने का प्रयत्न करते रहे हैं। यहां स्वतंत्रता से तात्पर्य हर प्रकार की स्वतंत्रता से है। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक। गुप्त जी का समूचा काव्य प्रयास इन्हीं बिन्दुओं और सन्दर्भों के आस-पास है। वे पराधीनता से हर स्तर पर लोहा लेते हैैं। इसीलिए उनकी कविता हमें बहुत ताक़तवर और ओजस्वी भी दिखाई पड़ती है।
    गुप्त जी के काव्य का एक बहुत बड़ा सांस्कृतिक पक्ष है। स्त्रियों की मुक्ति की आकांक्षा, दलितों वंचितों के प्रति सहानुभूति आदि। उन्हें जब भी अवसर मिला कथा प्रसंग चाहे जिस तरह का रहा हो उन्होंने अपनी बातें कही हैं। पंचवटी में शूर्पणखा के माध्यम से वे स्त्रियों की बात करते हैं और उनकी मुक्ति का सपना देखते हैं-
    ‘‘नर कृत शास्त्रों के सब बंधन हैं नारी को ही  लेकर अपने लिये सभी सुविधायें पहले ही कर बैठे नर।’’ साकेत के बारहवें सर्ग में भरत के माध्यम से उन्होंने समकालीन स्वतंत्रता सेनानी के हृदय में क्या बातें हैं, उसे उत्साह के साथ बहुत संजीदा तरह से चित्रित किया है-
भारत लक्ष्मी पड़ी
राक्षसों के बंधन में।
      सिन्धु पार वह विलख रही है व्याकुल मन में।।
इसके साथ वे यह भी लिखते हैं-
सजे अभी साकेत बजे
 हां जय का डंका।
 रह न जाये कहीं किसी
रावण की लंका।।
    इन पंक्तियों में राष्ट्र भावना की सक्षम अभिव्यक्ति हुई है। भारत लक्ष्मी से कथा के संन्दर्भ में सीता की प्रतीति होती है। अत्याचार और शोषण को समाप्त करने के लिये राष्ट्रीय आंदोलन चलाया जा रहा था। हमारे देश की सम्पत्ति सिन्धु के पार जा रही थी। विदेशी शासक लगातार सम्पन्न होते जा रहे थे। राक्षस का सन्दर्भ निशाचर में है और यह व्यंग्य अंगे्रजों पर है। राष्ट्रीय सन्दर्भों में साकेत में सम्पूर्ण भारत की व्यंजना है और रावण की लंका में क्रूर लूटखोर अंग्रेज शासकों की।
    गुप्त जी के बारे में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का यह कहना अत्यंत महत्वपूर्ण है- ‘‘गुप्त जी की प्रतिभा की सबसे बड़ी विशेषता है कालानुसरण की क्षमता अर्थात उत्तरोत्तर बदलती हुई भावनाओं और काव्य प्रणालियों को ग्रहण करते चलने की शक्ति। इस दृष्टि से हिन्दीभाषी जनता के प्रतिनिधि कवि ये नि:सन्देह कहे जा सकते हैं। भारतेन्दु के समय में स्वदेश प्रेम की भावना जिस रूप में चली आ रही थी उसका विकास भारत-भारती में मिलता है। इधर के राजनीतिक आंदोलनों ने जो रूप धारण किया उसका पूरा आयाम पिछली रचनाओं में मिलता है। सत्याग्रह अहिंसा, मनुष्यत्व, विश्व प्रेम, किसानों और श्रमजीवियों के प्रति प्रेम और सम्मान सबकी झलक हम पातें हैैं।’’  (हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ 418)
    जाहिर है कि गुप्त जी में कालानुकरण की क्षमता अद्भुत है। उनके काव्य विकास में यह सहज ही देखा जा सकता है। वे अपने समय, समाज और राजनैतिक हलचलों से सीधे जुड़े थे। वे स्वतंत्रता आंदोलन और उसके नेतृत्व करने वालों और सामान्य जनता के बीच सेतु का काम कर रहे थे। जनता से सीधा जुड़ाव होने की वजह से स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लोगों से वे एक कदम आगे की बात करते रहे। समूचे स्वतंत्रता आंदोलन में अपने समकालीनों समान धर्माओं जैसे माखनलाल चतुर्वेदी, सोहनलाल द्विवेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, रामधारी सिंह दिनकर, सुभद्रा कुमारी चौहान के साथ-साथ चले। यहां साथ का मतलब है उनकी मानसिक तैयारी और गुलामी के प्रति प्रतिरोध की भावना। स्वतंत्रता आंदोलन से सीधा संबंध रखने वाले रचनाकारों ने जनता को जगाने, अपनी काव्य विरासत को पहचानने के साथ स्वतंत्रता में सबको अपनी भूमिका निभाने का आह्वान किया। सम्भवत: इसीलिये आचार्य शुक्ल ने उन्हें कालानुसरण का कवि माना। कालानुसरण वही कवि कर सकता है जिसका सीधा रिश्ता जनता में होता है। जनता के दु:ख दर्द में जनता की भावनाओं, स्थितियों और समस्याओं से होता है। गुप्त जी का द्वन्द्व यह है कि उनमें जितना स्वीकार का साहस है उतना ही अस्वीकार का। वे अपनी रचनाओं में सामंतवाद का तीव्र विरोध करते हैं लेकिन अंग्रेजी शासन की व्यवस्थाओं को कहीं-कहीं अच्छा मानते हैं। गुप्त जी का विकास निरन्तर हुआ है। वे कहीं न तो रुके न थमे। काल की गतिशीलता उनमें बराबर देखी जा सकती है। और इसीलिये उनके विचारों में भी गतिशीलता दिखाई पड़ती है।
    मैथिलीशरण गुप्त ने बहुत लिखा है लेकिन जो भी लिखा सहज भाव से बहुत विनम्र होकर। उनकी काव्य साधना में कहीं कोई विश्राम नहीं बल्कि एक अटूट निरन्तरता है। आचार्य  नन्ददुलारे वाजपेयी ने सही पहचाना- ‘‘वे दीन दरिद्र भारत के विनीत, विनयी और नतशिर कवि हैं। कल्पना की ऊंची उड़ान भरने की उनमें शक्ति नहीं है किन्तु राष्ट्र की और युग की नवीन स्फूर्ति, नवीन जागृत के स्मृति चिन्ह हमें हिन्दी में सर्वप्रथम गुप्त जी के काव्य में ही मिलते हैं।’’(हिन्दी साहित्य: बीसवीं शताब्दी-पृष्ठ 77)
    गुप्त जी साधना के कवि हैं। उनके यहां जोड़-तोड़ नहीं है। वे रूढिय़ों के खि़लाफ़  लगातार संघर्ष करते हैं। उन्होंने नारी गाथायें ज्यादा लिखी हैं जिनमें स्त्रियों की यातनाओं के नये-नये कोण हैं। उन्होंने उपेक्षितों को वाणी दी। उनके यहां परलोक के बजाय लोक की चिन्ता है। लोक की चिन्ता उन्हें आधुनिक भाव-बोध से जोड़ती है। वे आधुनिकता को बहुत बारीकी से समझना चाहते हैं। महादेवी वर्मा ने उनके बारे में जो टिप्पणी की है उसमें उनके काव्य संसार पर नये सिरे से प्रकाश पड़ता है। - ‘‘गुप्त जी कवि भी हैं और भक्त भी। अत: निर्माण भी उनके स्वभाव में है और निर्मित के प्रति समर्पण भी। साहित्य में उन्हें ऐसी कथायें चाहिये जो लोक हृदय में प्रतिष्ठा पा चुकी हों, पर उस परिधि के भीतर हर चरित्र का कुछ नया निर्माण उनका अपना है।......ये कथायें अनेक युगों की लम्बी यात्राओं का आंधी पानी, धूप छाया सहते सहते धूमिल हो गई है। पर जिन्हें ये वहन करके लाई हैं वे पात्र गुप्त जी के आंसुओं में नये रंगों में उद्भाषित आज के  प्राणी बन चुके हैं। उनके साहित्य में जो नया है उसका मेरुदण्ड पुराना है और जो पुराना है उस पर रंग नया है।’’  (पथ के साथी)
    अपनी साधारणता में गुप्त जी की कविता आसाधारण है और उनका यही असाधारण उन्हें हमेशा महत्वपूर्ण बनाये रखता है। गुप्त जी की काव्य यात्रा अपने लिये मानक चुनती है और उन्हीं मानकों के मार्फ़त वे समय समाज और सांस्कृतिक प्रश्नों को हल करते हैं। अपने समय की बेचैनियां उनके यहां स्वतंत्रता आंदोलन अतीत के गायन और मनुष्य को मनुष्य बनाने में रही है। वे इस धरती को स्वर्ग बनाने के इच्छुक रहे हैं। समय चाहे जितना बीत जाये उनकी कविता का स्वर हमेशा बजता और गूंजता रहेगा।
    गुप्त जी का योगदान ऐतिहासिक और अप्रतिम है। वे देशभक्ति का पाठ पढ़ाने वाले, जन आन्दोलनों को विस्तार देने वाले सच्चे जन प्रतिनिधि कवि हैं। उन्होंने अपनी समकालीन पीढ़ी को बहुत गहरे तक प्रभावित किया था। वे भारतीय इतिहास के ऐसे महाबली हैं जिनका नाम हमेशा दर्ज़ रहेगा। उन्होंने अपने समय में एक दायित्वपूर्ण कार्य किया है। उनके नाम से आने वाली पीढिय़ां अपने लिये उत्साह और हौसला पाती रहेंगी। गुप्त जी का मूल्यांकन जिस व्यापक फलक पर भारतीय आलोचना में होना चाहिये था वह शिद्दत के साथ नहीं हुआ। आज भी उसकी आवश्यकता बराबर महसूस की जा रही है। गुप्त जी की कविता ने जिन परिस्थितियों में अपने-आप को जीवन्त और सक्षम बनाया तथा मानवीय मूल्यों, स्वतंत्रता आन्दोलनों की विभिन्न छवियों को प्रस्तुत किया है वह अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों मे ‘‘गुप्त जी की प्रतिभा की सबसे बड़ी विशेषता है कालानुसरण की क्षमता, अर्थात उत्तरोत्तर बदलती हुई भावनाओं और काव्य प्रणालियों को ग्रहण करते चलने की शक्ति। इस दृष्टि से हिन्दी भाषी जनता के प्रतिनिधि कवि ये नि:संदेह कहे जा सकते हैं।’’ (हिन्दी साहित्य का इतिहास-पृष्ठ 588)
    गुप्त जी ने हमेशा अपनी कविता में अपने युग और उसके संघर्षों को प्रतिबिम्बित और चित्रित किया है। उन्होंने ऐसे पात्रों को चुना जो आदर्शों और मर्यादाओं के भीतर संघर्ष करते हैं। उनकी वह विशेषता यह भी है कि वे यहां स्वर्ग का संदेशा देने नहीं आये थे बल्कि तमाम दिक्कतों से संघर्ष करते हुए इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने की इच्छा रखते थे। उन्होंने अपनी कविता में अपने ही युग को गाया है। उन्हीं के शब्दों में-
‘‘संदेशा नहीं मैं यहां स्वर्ग का लाया हूं।
  इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया हूं।।
    गुप्त जी की कविता युगों-युगों तक हमें प्रभावित करती रहेगी। भारतीय संस्कृति के मूल्यों को सुरक्षित करती रहेगी। यही उनकी कविता का सबसे बड़ा प्रदेय और संदेश है। ऐसी सादगी से युक्त पारदर्शी और सहज सरल कविता पर हिन्दी संसार को हमेशा गर्व रहेगा। भारतीय संस्कृति के प्रति ऐसी निष्ठा और मानवीय मूल्यों पर गहरा विश्वास उन्हें वैष्णव बनाता है। ‘वैष्णव जन तो तेणे कहिये जे रे पीर पराई जाने रे’ वे इसकी जीवंत मिसाल हैं।