Monthly Magzine
Saturday 25 Nov 2017

शगुन-अपशगुन

वीना श्रीवास्तव
सी. 201, श्रीराम गार्डेन, कांके रोड
रिलायंस मार्ट के सामने
रांची-834008 (झारखंड)
मो. 09771431900

क्सर ही सूरज कल्लू को हमारी छत पर लाकर उगता। कल्लू कभी छत पर तो कभी घर की चौहद्दी पर बैठकर सुबह से ही कांव-कांव करता और हर बार बड़ी मां उसे भगाने के लिए एक हाथ कमर पर रखकर जीना चढक़र छत पर जातीं या दरवाजा खोलकर चौहद्दी पर विराजमान कल्लू साब को बड़ी इज्जत के साथ हट-हट कहकर भगातीं। कल्लू यानी कौआ महाराज, उनका नाम बड़ी मां ने कल्लू रख दिया था। कितने भी कौए छत पर आते, सब कल्लू थे या यूं कहें कि पूरी कौआ जाति का नाम ही कल्लू था और वो जब भी उन्हें देखतीं तो कहतीं आ गए नासपिटे कल्लू...भगवान ने शकल तो दी नहीं और ऊपर से दूसरों के लिए आफत और ले आते हैं। नासपिटों तुम रोटी खा लिया करो मगर छत पे कांव-कांव मत किया करो। जैसे वो उनकी बात समझेंगे और फिर दोबारा नहीं आएंगे या कभी पूछती आज किसके आने का संदेसा लाए हो? उनका मानना था कि जब भी कल्लू आकर उनकी छत पर कांव-कांव करता है, मेहमान जरूर आते हैं। मेहमानों को उन्होंने हमेशा भगवान का दर्जा दिया लेकिन मंहगाई के जमाने में उन्हें मेहमान नहीं सुहाते थे। मेहमानों के मामलों में उन्हें पतझड़ का मौसम ही अच्छा लगता था जब मेहमान नाम के पत्ते पेड़ पर ना टिकें और पेड़ खाली रहे। इसीलिए जब भी किसी कौए को छत पर, मुंडेर पर बैठा देखती तो उन्हें भगा देतीं और उनके हटते ही कौए फिर से अपना डेरा हमारी छत पर जमा लेते, जैसे उन्हें समझ आ गया हो कि बड़ी मां हमें भगाकर हमारी बेइज्जती करती हैं। हम काले हैं क्या इसलिए? गौरैया के लिए तो वो आज भी कठौते में दाना और टूटे मटके के तले में पानी भरकर रखती हैं तो फिर हमसे क्या दुश्मनी है जो हमें डंडा लेकर भगाती हैं? इस खेल में लगता है कौऔं को भी मजा आने लगा था। हालांकि वो अक्सर ही छत पर कांव-कांव करते मगर मेहमान इक्का-दुक्का बार ही आए होंगे और हमारे गांव में कौए थे भी बहुत ज्यादा। आजकल तो शहर में तो कौए दिखाई ही नहीं देते और गांव में भी उतने नहीं हैं जितने पहले थोक में झुंड के झुंड हुआ करते थे। सुबह और शाम को घरों की मुंडेर पर कौओं का जमघट होता तो गर्मी की दोपहर को सामने वाले गुलमोहर पर सुस्ताते या किसी भी घने पेड़ की शाखों पर धूप से बचने के लिए पत्तियों के बीच हवा का आनंद ले रहे होते। छोटे बच्चों के हाथों से रोटी छीनकर ले जाना तो उनके लिए सबसे आसान था। कौओं को भगाने वाली बड़ी मां श्राद्ध में उन्हें बुलातीं, छत पर उनके लिए पकवान रखती। तब मुझे लगता कि वैसे तो उन्हें डंडा दिखाकर भगाती हैं और श्राद्ध में उन्हें खाना खिलाती हैं। इससे क्या फायदा? इंसान भी जाने कब और कैसे-कैसे रंग बदलता है, इंसान को बनाने वाला भगवान भी धोखा खा जाता है। गिरगिट तो बेचारा खामखां ही बदनाम है, कभी किसी की पूजा करना तो कभी डंडा दिखाना, ये शातिरपना तो केवल इंसानों की खासियत है। शायद इसी को कहते हैं आज सिर पर बैठाना तो कल जूती दिखाना।
उन्होंने नया कपड़ा कभी भी रविवार या मंगलवार को नहीं पहना, उनके हिसाब से इन दोनों दिन नया कपड़ा पहनने से कपड़ा फलता नहीं और ज्यादा दिन नहीं चलता और पहनना जरूरी हो तो ठाकुर जी के चरणों में रखकर ही पहनना चाहिए। उनके हिसाब से अगर इन दोनों दिन में नया कपड़ा पहना जाता है तो वह अपशगुन होता है, जैसे भगवान सूर्य देव और बजरंगबली जी को नए कपड़े पहनने वालों से नफरत हो और वो उनके दिन कोई नया कपड़ा पहन लेगा तो उसे श्राप दे देंगे। उन्हें कौन समझाए कि नए कपड़ों से भला किसी को क्या एतराज होगा, चाहे वो भगवान जी ही क्यों ना हों? सप्ताह के सातों दिन के लिए उनके कपड़े निश्चित थे, रविवार को सुनहरा, सोमवार को सफेद, मंगलवार को लाल या सिंदूरी, बुधवार को हरा, बृहस्पतिवार को पीला, शुक्रवार को सफेद व चमकीला और शनिवार को काला। ये उनके निश्चित रंग थे और अगर ये नहीं पहनतीं तो उस रंग से मिलता-जुलता रंग पहनती। खाने में बृहस्पतिवार को चने की दाल, शनिवार को उरद की या काले चने बनना और बुधवार को मूंग की दाल बनना एकदम पक्का था। इसमें कोई फेरबदल नहीं होता, उनका कहना था सभी ग्रहों के अपने-अपने रंग हैं, इसलिए रोज ग्रहों के अनुसार कपड़े पहनने से सब शुभ होता है और ग्रह कभी विपरीत प्रभाव नहीं डालते और सभी प्रसन्न रहते हैं।
बड़ी मां का जीवन शगुन और अपशगुन के बीच उलझकर रह गया था। उनकी आती-जाती सांसें शुभ-अशुभ मुहूर्त को पहचानने लगी थीं। किसी भी घटना को वो किसी होनी-अनहोनी से जोड़ देतीं और घर की अन्य महिलाओं के दिमाग में शक का कीड़ा छोड़ देतीं। वो भी ठहरी गांव की महिलाएं, बहुत पढ़ी-लिखी तो थी नहीं। बाबा भी पांचवी तक ही पढ़े थे लेकिन बड़ी मां के अनुसार उस समय का पांचवी पास भी आज के हाई स्कूल से बेहतर होता है और हिसाब के मामले में तो बाबा इतने तेज थे कि कम्प्यूटर को भी पीछे छोड़ दें। पढ़ाई के नाम पर छोटे भइया और छोटे पापा के दोनों बेटे ही शहर पढऩे गए थे और फिर वहीं शादी कर ली। तीनों भइया बस होली-दीवाली पर ही दो दिन के लिए आते थे। बड़े भइया गांव में ही खेती-बाड़ी देख रहे हैं, बड़ी भाभी भी ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं आईं और घर की लड़कियों को ज्यादा पढ़ाया नहीं गया। बड़ी दीदी का ब्याह तो दसवीं पास करते ही हो गया था। छोटी दीदी बारहवीं तक पढ़ीं और मैं भी ज्यादा नहीं पढ़ पाई। बस किसी तरह से ग्रेजुएशन कर पाई और फिर मेरा भी कन्यादान करके, गऊ की तरह दान देकर बांध दिया गया अनजान खूंटे से, जहां पर आज तक बंधे हैं हम पूरी निष्ठा से। बड़ी मां खुद को सबसे भाग्यशाली मानती थीं क्योंकि उनकी पहली संतान बेटा था, मेरी मां को हमेशा दोयम दर्जे का जीवन जीना पड़ा क्योंकि मेरी मां ने मुझे जन्म दिया और बेटी को तो अशुभ माना जाता रहा है। वो भी पहली संतान अगर बेटी हो तो उस मां के अधिकांश सुख छीन लिए जाते हैं क्योंकि पहली बेटी होना शुभ नहीं माना जाता। यहां उस बहू के कदम शुभ माने जाते हैं जो पहली बार में ही वंश के वारिस को जन्म देती है। छोटी मां ने भी पहले बेटी को जन्म दिया लेकिन बाद में उनके दो बेटे हुए और उनकी अशुभता थोड़ी कम हो गई। मैं कभी नहीं समझ सकी कि बड़ी मां खुद महिला होकर लडक़ी को कैसे अशुभ मानती रहीं। हम सभी बहनें आस-पास के गांव में ही ब्याही गईं। बड़ी मां बूढ़ी हो गईं थीं, फिर भी उनके तेवर कम नहीं हुए थे। वो बीमार रहने लगीं और उनके बेटे ही उनसे दूर थे मगर हम बहनें बारी-बारी उनके पास रहतीं। समय मिलते ही हम बहनें उन्हें इस बात का एहसास करवा देतीं कि देखो हम अशुभ समझी जाने वाली बेटियां ही आज काम आ रही हैं। इसके बावजूद वो हमेशा बेटों पर ही जान छिडक़ती हैं, हम भी अपना कर्तव्य समझकर उनका ध्यान रखते हैं। बड़ी मां इस घर की मुखिया थीं। मां और छोटी मां की क्या मजाल कि बड़ी मां की बात काटें, हालांकि मां पढ़ी-लिखी थीं, दसवीं पास थीं और छोटी मां बारहवीं पास। मगर घर में चलती बड़ी मां की थी। मां उनसे हमेशा कहती कि शगुन-अपशगुन कुछ नहीं होता। जो होना होता है, वो होकर रहता है लेकिन किसी को कहीं आना-जाना हो, कोई काम करना हो तो बड़ी मां शुभ मुहुर्त दिखवातीं लेकिन मुझे तो कभी उस शुभ मुहुर्त में कुछ शुभ होता नहीं दिखाई दिया। बलिया वाले फूफा जब भी आते तो वो सोमवार व शनिवार को जा नहीं पाते और उन्हें एक दिन की अतिरिक्त छुट्टी लेनी पड़ती क्योंकि बड़ी मां के अनुसार सोमवार व शनिवार को पूरब दिशा की तरफ  यात्रा नहीं करते। अब उन्हें कौन समझाए कि दुनिया भर में क्या सोमवार व शनिवार को यातायात के सारे साधनों की हड़ताल हो जाती है? पूरब दिशा ही क्यों, सभी दिशाओं के लिए किसी ना किसी दिन को दिशा शूल माना गया है। होली-दीवाली में जब भइया घर आते तो उन्हें परेवा के दिन जाने की इजाजत नहीं होती। हर काम के पहले शुभ दिन, शुभ तिथि देखी जाती। इसके लिए कई बार दिन और तिथि का इंतजार भी करना पड़ता। ये बात अलग है तब तक समय निकल जाता। बड़े भइया ने कितने सारे फॉर्म समय देखकर भरे और शुभ तिथि को पोस्ट किए लेकिन उनका सेलेक्शन कहीं नहीं हुआ और वो घर की खेती संभालने लगे। कई सारे फॉर्म इसलिए नहीं भर सके या वो समय से नहीं पहुंचे क्योंकि कभी सही तारीख या दिन नहीं होता और फिर कभी सही तारीख या दिन भूल जाते लेकिन परिणाम यही हुआ कि शुभ के फेर में पडक़र मौके गंवाए और अशुभ मुहूर्त ने उन्हें एक सफल किसान बनाया और धरती भी सोना क्या हीरे-मोती उगल रही थी और घर में लक्ष्मी जी का वास हो गया।
मुझे तो हमेशा से बड़ी मां के शुभ-अशुभ संकेतों से उलझन होती थी लेकिन मैं कुछ बोल नहीं सकती थी। कारण बड़ों के आगे मुंह नहीं खोलना। घर में जब मां-पापा की हिम्मत नहीं थी तो मेरी क्या बिसात। मैं ठहरी छोटी और फिर लडक़ी। आजकल का समय होता तो बच्चे बगावत पर उतर जाते लेकिन हमें ये सिखाया ही नहीं गया और घर के मुखिया के आगे किसी की नहीं चलती थी। मैं छोटी थी और गांव के स्कूल में पढ़ती थी। एक बार परीक्षा देने के लिए जैसे ही घर से निकली बिल्ली रास्ता काट गई और बड़ी मां ने देख लिया। उन्होंने मुझे रोक दिया ये कहकर कि पांच मिनट रुककर निकलना नहीं तो परीक्षा में फेल हो जाओगी लेकिन मुझे देर हो रही थी, मैंने उनकी बात नहीं मानी और परीक्षा देने चली गई। जब परिणाम आया तो मेरे सबसे ज्यादा नम्बर उसी विषय में थे जिस विषय की परीक्षा में बिल्ली ने रास्ता काटा था। इस पर बड़ी मां ने कहा कि तुमने तो हमारी बात नहीं मानी लेकिन परीक्षा के समय हुए अपशगुन को दूर करने के लिए हम तुम्हारी परीक्षा के समय राम-राम जपते रहे, देखो इसका ही फल है कि सबसे ज्यादा नम्बर तुम्हारे उसी विषय में आए और फिर इतराते हुए कहा कि देखा हमारी पूजा का कमाल। मन में आया कह दूं कि आगे से पढऩा छोड़ दूंगी, आपकी पूजा, आपका राम नाम का जाप है ना मुझे पास करवाने के लिए। उस दिन लगा कि हमारी मेहनत की भी कोई कीमत नहीं, जो कुछ है ये शुभ-अशुभ है और सब पर बड़ी मां की सोच हावी है। पूरे साल मैंने जी तोड़ मेहनत की और बड़ी मां ने सारा श्रेय अपनी पूजा को दे दिया। साथ ही ये भी लगा कि कैसे समझाया जाए इन इन लोगों को कि शुभ-अशुभ को छोडक़र अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए और इन्हें पढ़ा भी दिया जाए तो भी ये सोच कैसे बदलेगी? वो ज्ञान कहां से मिलेगा जो उन्हें इन अंधविश्वास की बातों से ऊपर उठाएगा?
बड़ी मां कभी शहर गई ही नहीं। वैसे हमारा गांव भी छोटे-मोटे शहर से कम नहीं था। स्कूल, अस्पताल और बाजार शहर जैसे तो नहीं पर उससे कुछ कम भी नहीं थे। एक सिनेमा हॉल भी था जहां इंतजार होता था कि जब हॉल भर जाए तो वो पिक्चर शुरु करें। इस चक्कर में कभी-कभी चार की जगह तीन शो ही होते थे और जब लौटते थे तो वहां की सौगात यानी खटमल साथ लेकर घर लेकर आते थे और दो-चार महीनों में एक बार चारपाइयों में खटमल मारने का अभियान चलाया जाता। हमारे गांव में मंदिर सभी भगवानों के थे और बड़ी मां उन सभी मंदिरों में जाने वाली भक्त थीं। सप्ताह में तीन दिन तो वो मंदिर की चौखट पर माथा जरूर टेकतीं और कहतीं कि सभी भगवानों का मानना चाहिए। जिससे कभी कोई नाराज ना हो। वैसे भी हमसे गलती हुई और भगवान नाराज हो भी गए तो ज्यादा मुसीबत में नहीं डालेंगे और शनिदेव को तो बिल्कुल नाराज करने के पक्ष में नहीं थीं। हर शनिवार पीपल के नीचे दिया जरूर जलातीं और माहवारी के जिन दिनों उन्हें नहीं जाना होता था तो मां या छोटी मां की ड्यूटी होती और वो जाकर दिया जलातीं। शनि देव की साढ़ेसाती और ढैय्या से वो बहुत डरतीं इसलिए कहतीं कि हमेशा दिया जलाएंगे तो जब भी हम पर साढ़ेसाती या ढैय्या आएगी तो शनिदेव जरूर सोचेंगे कि ये तो हमेशा हमारी भक्ति करती है इसलिए इसके परिवार को तकलीफ नहीं देगें या देंगे भी तो कम कर देंगे।
भगवान पर इतना भरोसा कि हर प्रश्न का हल उन्हें रामायण में दिखता। कुछ भी होता रामायण लेकर रामशलाका प्रश्नावली खोलकर बैठ जातीं और किसी भी अक्षर पर उंगली रखवाकर समस्या का समाधान कर देतीं। हाई स्कूल में तो मैं फस्र्टडिवीजन से पास हुई थी मगर इंटर मीडिएट की परीक्षा के बाद डर लग रहा था। मैंने भी परीक्षा देने के बाद ये जानने के लिए कि मेरी डिवीजन फस्र्ट आएगी या नहीं प्रश्नावली में अपना उत्तर खोजा और जवाब आया कि कार्य बहुत उत्तम है, सफलता जरूर मिलेगी और मैं खुश हो गई लेकिन परिणाम ने मेरी खुशी को घिस-घिसकर धो डाला था और उसके बाद मेरा बचा-खुचा विश्वास भी उडऩ-छू हो गया। मैंने बड़ी मां से जाकर कहा कि आपकी प्रश्नावली के हिसाब से तो मुझे फस्र्ट आना चाहिए था मगर मेरी तो सेकेंड डिवीजन ही रह गई, बड़ी मां ने कहा कि तुमने मन से नहीं पूछा होगा, प्रश्न का जवाब जानने वाले के मन में जब तक श्रद्धा नहीं होगी, सही उत्तर कैसे निकलेगा? उसके बाद किसी भी परेशानी या शंका के समय बड़ी मां ने कई बार कहा कि आओ मैं तुम्हारे प्रश्नों के हल निकाल दूं मगर मैंने फिर कभी दोबारा अपने प्रश्नों के उत्तर रामायण में नहीं तलाशे। लेकिन शगुन-अपशगुन ने बड़ी मां के दिमाग में इस कदर घर कर लिया था कि वो इंसानियत भी भूल गई थीं। हमारे गांव में जीवन काका थे। सडक़ दुर्घटना में उनकी एक आंख फूट गई थी। देखने में बहुत सुंदर थे मगर किस्मत ने ऐसा क्रूर मजाक किया कि उनकी सुंदरता में धब्बा लग गया। चांद में भी दाग है मगर फिर भी वो खूबसूरत ही लगता है मगर जीवन काका उस निर्जीव चांद से भी गए-गुजरे हो गए थे। उन्हें लोग कनऊ प्रसाद कहने लगे थे तो भला बड़ी मां पीछे क्यों रहतीं और जब कभी किसी काम से बाहर जाते समय जीवन काका दिख जाते तो कहती अब ये काना दिख गया तो कोई काम नहीं होगा। उनका दर्द समझे बिना उन्हें मनहूस माना जाने लगा। उनका हर कदम शुभ-अशुभ संकेतों की सीढ़ी चढ़ता-उतरता।
बात कोई 20 साल पहले की है जब हम सब छोटे थे और गांव के ही स्कूल में पढ़ते थे। स्कूल भी पास नहीं था, दूर था। चार किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था स्कूल के लिए और रास्ते में पेड़-पौधे अधिक होते थे, जहां हम बच्चे चिडिय़ा के घोंसलों पर नजर रखते थे और कभी-कभार उनके बच्चों को घोंसले से निकालकर हाथ में लेकर प्यार कर लिया करते थे। एक दिन छोटे भइया स्कूल से घर आ रहे थे, उस दिन वो अकेले ही स्कूल गए थे। रास्ते में उनके सिर पर कौआ बैठ गया, वो डर गए घर की तरफ  तेजी से भागे, कौआ तो उड़ गया था लेकिन उसके डर से वो दो दिन घर से नहीं निकले और बड़ी मां ने भी उन्हें बाहर जाने से मना कर दिया। इसके बाद उन्होंने रिश्ते-नातेदारों में सबको खबर भेज दी कि पंकज गुजर गया। गांव में भी खबर फैल गई। कुछ रिश्तेदार शाम तक और बाकी सुबह तक रोते-पीटते घर पहुंचने लगे। तब लोग घर-गांव से बहुत दूर नहीं रहा करते थे। घर पर सारे रिश्तेदार जमा थे। सभी का सवाल था कि पंकज की मिट्टी (शव) कहां है? उसके आखिरी दर्शन तो कर लें। सभी बड़ी मां को सांत्वना दे रहे थे लेकिन बड़ी मां चुप थीं कुछ बोल नहीं रही थीं। उनको खामोश और उनकी सूखी आंखें देखकर रिश्तेदार ये कहने लगे कि बेचारी सदमे में आ गई है। इसके आंसू भी नहीं निकल रहे और भगवान से पंकज की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने लगे। जब सारे रिश्तेदार आ गए और कोहराम मच गया तब बड़ी मां अंदर गईं और पंकज भइया को बाहर लेकर आईं। पंकज को सामने सही-सलामत देखकर सभी हैरत में थे। सबके बहते आंसुओं पर तुरंत विराम लग गया और सब अचरज से निगाहों में पहाड़-सा प्रश्न लिए बड़ी मां की तरफ  देख रहे थे। बड़ी मां भी समझ रही थीं कि सबकी निगाहें क्या पूछ रही हैं? वो सबसे बोलीं कि भगवान की बड़ी कृपा है कि पंकज बिटवा ठीक है। उसे कुछ नहीं हुआ। तो फिर? बनारस वाली बुआ ने प्रश्न किया और उसके साथ ही ना जाने कितनों के स्वरों ने उस प्रश्न को दोहरा दिया। बड़ी मां ने सबको चुप कराया और फिर कहा- कुछ दिन पहले पंकज बिटवा स्कूल से घर आ रहा था तो उसके सिर पर कौआ बैठ गया था। आप सभी जानते हो कि कौआ बैठना कितना बड़ा अपशगुन होता है, बिलकुल मृत्यु तुल्य। इसलिए अगर सब मिलकर मातम मनाते हैं तो अपशगुन टल जाता है नहीं तो या तो मौत मिलती है या मौत के बराबर कष्ट और हमरे आपके बिटवा पर कोई कष्ट आए, ये तो आप सब नहीं चाहोगे? सबने हां में हां मिलाई लेकिन कुछ लोगों को बहुत खराब लगा कि सारा काम छोडक़र आना पड़ा और वो भी केवल अपशगुन के चक्कर में पडक़र। लेकिन किसी ने कुछ कहा नहीं, दबी जुबान में ही चर्चा होकर रह गई। आज का समय होता तो दस गालियां मिलतीं और गंवार होने के तमगे से अलग से नवाजा जाता। खैर, उसके बाद सबकी दावत हुई और पूरे गांव में मिठाई बांटी गई क्योंकि मृत्युतुल्य कष्ट पाने से छोटे भइया बच गए थे। मुझे भी बहुत खराब लगा कि अपशगुन के चक्कर में इतने सारे लोगों का समय और पैसा बर्बाद हुआ,  सब अपना काम छोडक़र आए, वो भी अपशगुन के चक्कर में, ये कैसा रिवाज है और कैसा शगुन-अपशगुन? फिर मुझे याद आया कि एक बार मेरे भी सिर पर कौआ बैठ गया था, छोटे भइया के सिर पर बैठने से काफी पहले। तब लगा था कि ना जाने कितना बड़ा बोझ लद गया था मेरे सिर। उसके पंजे और वजन को अभी तक नहीं भूल सकी। उसके बाद जहां कौए होते थे, मैं भूलकर भी नहीं जाती थी। डर रहता कि कहीं वो दोबारा ना बैठ जाए। छत पर ज्यादा कौए आ जाते तो छत पर भी नहीं जाती थी मगर मैंने घर में किसी को भी नहीं बताया था। इसलिए मातम भी नहीं मनाया गया। फिर भी मैं आज तक जिंदा हूं। मुझे तो कुछ नहीं हुआ। तबसे मुझे बड़ी मां की किसी भी बात से जुड़े अपशगुन पर विश्वास नहीं होता था। अच्छा ही हुआ कि उस समय मैंने कौए के बारे में किसी को नहीं बताया, नहीं तो तब भी सबको अपने-अपने काम छोडक़र मेरा मातम मनाने आना पड़ता और हो सकता है किसी को ना बुलाया जाता क्योंकि मैं लडक़ी जो थी। जहां पहली संतान लडक़ी होने को अपशगुन माना जाता हो, वहां लडक़ी का जीना क्या और मरना क्या? हो सकता है कौए को ही दुआएं दी जातीं कि अच्छा हुआ तू बैठ गया, अब ये लडक़ी नाम की मुसीबत टल जाएगी, खैर, मैं नहीं जानती क्या होता? जो हुआ अच्छा हुआ। मेरे अंधविश्वास खत्म हुए और मैं शुभ मुहूर्त के फेर में नहीं पड़ी।
सबसे खराब तब लगा था जब कन्नू जीजी बीमार हुई थीं। कई साल पहले की बात है, उन्हें तेज बुखार हुआ। तब गांव में छोटा-सा सरकारी अस्पताल हुआ करता था। उन्हें वहीं दिखाया। दवाइयों में खुली गोलियां और पीने की लाल-लाल दवा भी अस्पताल से ही मिलती थी। एक रात उन्हें दवा देते समय मां के हाथ से दवा की शीशी गिरकर टूट गई। जीजी को बहुत तेज बुखार था। बुखार से उनका बदन ऐसे तप रहा था जैसे भट्टी लेकिन उन्हें दवा नहीं मिल पाई और वो पूरी रात कराहती रहीं। हममे से कोई भी सो नहीं सका। रात होने के कारण अस्पताल बंद था और आस-पास कोई दवा की दुकान भी नहीं थी। तब तो ये एक छोटा-सा गांव था। उस पर बड़ी मां ने कहा कि दवा गिरना शुभ होता है। उन्होंने कहा दवा गिरने का मतलब होता है अब दवा जल्दी फायदा करेगी। मुझे तब भी समझ नहीं आया कि इसमें शुभ क्या हुआ? जीजी बुखार से बेहाल है और बड़ी मां इसे शुभ बता रही हैं। दवा फायदा तो तब करेगी जब पीने को मिलेगी लेकिन दवा तो बिखर गई थी। पूरी रात कन्नू जीजी का बदन बुखार से तपता रहा। वो कराहती रहीं, रात भर हम ठंडे पानी की पट्टियां ही करते रहे और सुबह का इंतजार। सुबह होते ही सीधे अस्पताल पहुंचे और दवाखाना खुलते ही पहले दवा लाकर जीजी को पिलाई जिसके दो घंटे के बाद जीजी को आराम मिला। पूरी रात हमने आंखों में काटी थी। दवा गिर जाए और कोई बुखार से तड़पता रहे तो इसमें दवा गिरना कहां से शुभ हो गया। दवा समय से मिलती तो जीजी रात में ही ठीक हो गई होती। पूरी रात बुखार में तपते हुए नहीं गुजारती।
बड़ी मां 70 साल की हो गई थीं। वो बीमार रहने लगीं। अक्सर ही उन्हें बुखार हो जाता। थोड़ी दूर चलतीं तो सांस फूलने लगता। दमा हो गया था उन्हें। फिर हाई ब्लडप्रेशर भी रहने लगा लेकिन दवा खाने से लेकर पानी पीने तक वो शुभ-अशुभ की गणना करतीं। कभी भी नई दवा उन्होंने शनिवार को नहीं शुरु की। उसके लिए वो रविवार का इंतजार करतीं। बुखार रहने की वजह से वो काफी कमजोर हो गई थीं लेकिन जब भी पानी पीती तो उठकर अपना मुंह पूरब दिशा की तरफ करतीं। इतनी बीमारी के बाद भी वो मंदिर जरूर जातीं और हर शनिवार को पीपल के पेड़ के नीचे दिया जरूर जलातीं क्योंकि मासिक धर्म की बाध्यता से मुक्त हो चुकी थीं। मां उनसे कहतीं कि उनकी जगह वो खुद जाकर दिया जला आएंगी लेकिन वो नहीं सुनती और हर शनिवार को पैदल जातीं। पेड़ घर से थोड़ी दूरी पर था। मुझे उनकी इन बातों से तकलीफ होती। शादी के बाद अब हम बहनें थोड़ा-बहुत बोलने लगी थीं। उन्हें समझाने का प्रयास करतीं तो वो कहतीं कि पूरी उमर निकल गई इन्हीं रास्तों पर चलते हुए, अब तो पैर भी कबर में लटके हैं, देह निढाल पड़ी है, सिर बाहर निकालने से क्या होगा? प्रभु अगला जनम ही सुधरवाएंगे लेकिन हमारी बातों को याद रखना। शुभ समय किए गए सारे काम अच्छे फल देते हैं। हमें कुछ हो जाए तो हमारी चिता को मुखाग्नि शुभ महूरत में ही दिलवाना। कहीं ऐसा ना हो मरने के बाद भी हमारी आत्मा भटकती रहे। बड़ी मां सभी को बहुत प्यार करती थीं। हम सभी उनको प्यार करते थे लेकिन बाद में हम सारे भाई-बहन इन बातों को तवज्जो नहीं देते थे। सभी को लगता इस विज्ञान के युग में अभी भी इन दकियानूसी बातों के साथ जीया नहीं जा सकता। अगर सब इस तरह की बातें मानने लगे तो जीवन ठप हो जाएगा और ये बातें संस्कारों की नहीं झूठे अंधविश्वास की हैं।
पिछले माह की कार्तिक अमावस की रात उनकी आखिरी रात थी। उस अमावस ने उनके जीवन के चंद्रमा की रोशनी को हमेशा के लिए हर लिया था। बाहर रोशनी जगमगा रही थी मगर हमारे घर का तुलसी का दिया बुझ गया था। सभी लोगों ने दीवाली की पूजा की और फिर बड़ी मां को कमरे में लिटाकर सब लोग पटाखे फोडऩे लगे। घर में अंदर बड़ी मां ही थीं, सभी भइया घर आए हुए थे और बाहर खुशियां मना रहे थे। बड़ी मां को अनार जलाना बहुत अच्छा लगता था। जब अनार जलाने शुरु किए तो बड़े भइया ने अपने बेटे सचेत से कहा जाओ दादी से पूछो कि दादी बाहर आएंगी? वो अंदर गया और थोड़ी देर में आया तो बोला दादी कुछ बोलती ही नहीं। वो तो पलंग पर उलटा पड़ी हैं। क्या..? हम सब के मुंह से एक साथ निकला और सब दौडक़र अंदर गए। देखा, बड़ी मां पलंग से नीचे झुकी हुई थी और उनका हाथ पलंग से नीचे झूल रहा था। पास ही दवा की शीशी टूटी पड़ी थी और दवा बिखरी हुई। शायद उन्हें हार्ट अटैक आया था और उन्होंने अपने आप दवा उठाने की कोशिश की होगी। उठाते वक्त दवा की शीशी हाथ से गिरकर टूट गई होगी क्योंकि शीशी टूटी और टेबलेट बिखरी हुई थीं। उन्होंने झुककर टेबलेट उठाने की कोशिश की होगी मगर उठा नहीं पाईं और हार्ट फेल हो गया और उनके जीवन का अंत भी। उस दिन फिर उनके अनुसार शुभ शगुन हुआ था। दवा की शीशी जो टूटी थी। दवा का गिरना, बिखरना अच्छा माना जाता है। मगर उस दिन उन्हें दवा मिल गई होती तो बड़ी मां आज हमारे बीच होतीं।