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Saturday 18 Nov 2017

हुक्क-हुक्क


अजितकुमार

166, वैशाली, प्रीतमपुरा
नई दिल्ली. - 110088
मो. 9811225605

लोग कहते तो हैं कि जीवन में सब कुछ देश-काल से परिचालित होता है, पर वे उसके बारे में अकसर खामोश रह जाते हैं जो उसको ‘चिर’ या ‘स्थायी’ रीति से जकड़ लेता है । ‘हुक्क-हुक्क’ उसी का एक बयान है।
छोटी-मोटी व्याधियाँ- खाँसी, जुकाम, कमर या घुटने में दर्द- गिरधारी का कुछ खास बिगाड़ नहीं पाई थीं और बड़ी व्याधियों- हाइपरटेंशन, पक्षाघात, हृदयरोग आदि से वे चाहकर भी बच नहीं सके थे। उनकी यह सुपरिचित मुसीबत दिसंबर 2002 के महज 3 साल बाद 2005 के दिसंबर महीने में एक बार फिर लौट कर आई जब ‘माल ऑफ एमिरेट्स’ में दिन भर के सैर-सपाटे और छककर मनपसंद भोजन करने के बाद परम तृप्त हो वे सपरिवार घर लौटे थे और शाम के कामकाज निपटा निश्चिंत भाव से बिस्तर पर जा लेटे थे ।
रात में वैसा कोई दु:स्वप्न भी उन्हें नहीं दिखा, जैसा 3 साल पहले दिसंबर की ठीक इसी तारीख को देखने के बाद वे सुबह 4 बजे के करीब लकवे का शिकार हो अस्पताल पहुँचाए गए थे। इस बार भी करीब-करीब वैसा ही हुआ। अचानक नींद खुलने पर उन्हें लगा कि हाथ-पैर में हिलने-डुलने की ताक़त नहीं बची है; फिर भी कोशिश कर बाथरूम तक तो गए पर वापस अपने बिस्तर की ओर आते समय हिम्मत कुछ इस क़दर टूटी कि बेटे के कमरे का दरवाज़ा  खटखटाने की ज़रूरत पड़ी... उसके बाद लगभग नीमबेहोशी में ही वे जान सके कि एम्बुलेंस में लादा जाकर उन्हें अस्पताल पहुँचाया गया है जहाँ कैजुअलटी वार्ड में भरती किए जाने के बाद वे दोबारा सभी प्रियजनों पर भारी बोझ बन गए हैं। बहरहाल, पक्षाघात के दूरगामी परिणामों से लड़ते-झगड़ते जहाँ उन्हें पता था कि आत्मनिर्भर होने में  कई साल कई लग जाएँगे, वहीं यह भी पता था कि बूढ़े शरीर में पहले वाली चुस्ती-फुर्ती तो लौट नहीं सकेगी.. और इस वास्तविकता से उन्होंने समझौता भी कर लिया था...
लेकिन यह मालूम न था कि सन 2006 का दिसंबर बीतते-न-बीतते वे ऐसी एक और परेशानी में घिर जाएंगे, जिससे उनका साबका पहले भी दो-तीन बार पड़ चुका था.. और वह थी- ‘हुक्क-हुक्क’ यानी लगातार हिचकी आना और आते ही रहना। वह एक बार आती तो बस आती ही चली जाती थी- एक ऐसी परेशानी.. जिसका सबसे उलझन भरा पहलू यह था कि जहाँ वे दम साधे यह उम्मीद करते कि बस यह आखिरी वाली है, इसके बाद अगली हिचकी न जाएगी, वहाँ वह रुकने का नाम ही न लेती थी। तब इस क़दर झुँझलाहट तन-बदन में भर जाती कि मन होने लगता- हे भगवान, या तो इसे रोक दो या ऐसा करो कि एक आखिरी दम तोडऩे वाली हिचकी के साथ वे दुनिया से विदा हो जाएँ ... ऐसे जीने से क्या फायदा कि वे सामने वाले व्यक्ति से कुछ बात करना चाहते हैं पर वह केवल उनकी ‘हुक्क-हुक्क’ भर सुन-समझ पाता है।
किसी दोस्त का फोन आने पर जब उन्होंने अपना मनपसंद एक शेर उसको सुनाना चाहा तो कमबखत हिचकी ने शेर की शक्ल कुछ यूँ बना दी- ‘आई जो.. हुक्क.. तेरी याद.. हुक्क तो.. हुक्क आती.. हुक्क.. चली गई हुक्क.’. अगला मिसरा पूरा करने का साहस न हुआ।
इससे भी ज्यादा खीझ की बात यह थी कि लोग जो इसके फेर में नहीं पड़े थे, जिन्हें यह सरदर्द कभी नहीं भुगतना पड़ा था, ऐसी-ऐसी मासूम सलाहें देते थे, ‘अजी, एक गिलास पानी पीते ही यह दूर हो जाएगी’... ‘ओहो, आपने ठंडा पानी पिया होगा, गुनगुना पानी पीना चाहिए था’, ‘जी, गुनगुना नहीं, उबला, गरमागरम । आज़मा कर देखिए- दो मिनट में उडऩ छू।’
गिरधारी का भी भोलापन यह कि जो भी कोई नुस्खा बताता- लौंग, तुलसी, पुदीना, इलायची, कालीमिर्च यहां तक कि हींग भी.. सबकी आज़माइश करने पर वे तैयार हो जाते .. लेकिन हिचकी का हाल यह कि बदस्तूर मौजूद, जाने का नाम ही नहीं लेती.. बीच में कभी अपनी ही शर्तों पर धीमी भले हो जाए, पर उसके तुरंत बाद ठीक धौंकनी की तरह फिर चलने लगती। गिरधारी को यह भी सोचने का मौका न देती कि उसे ‘हिचकी’ कहना है या ‘हुचकी’ या ‘होचुकी’ जबकि वह दरअसल तो ‘होरही’ है।
28 दिसंबर से 31 दिसंबर सन 2006 तक सारे वक्त वे अपनी इस ‘हुचकी’ के खय़ालों में ही डूबते-उतराते रहे। उन्हें याद आया, अपने 75 वर्षों के लंबे जीवन में कम- से- कम तीन बार पिछले कऱीब 25 सालों के दौरान उन्हें इस मुसीबत ने घेरा है.. और हर बार उन्हें इससे निबटने के लिए अलग-अलग हथियारों की मदद लेनी पड़ी है।
25 साल पहले जब वे पूरा दिन कनाट प्लेस में गुज़ार मोहनसिंह प्लेस के निकट एक ढाबे में बैठ उम्दा बिरयानी खा, तृप्त हो घर लौटे थे, तो जीवन में पहली बार ‘हुक्क-हुक्क’ ने उन्हें धरा-पकड़ा था ।
दो रोज़ उस परेशानी से घिरे रहने के बाद संयोगवश एक मित्र से फोनवार्ता के दौरान जब इस परेशानी का जिक्र आया तो उन्होंने इरविन अस्पताल के वरिष्ठ गेस्ट्रोएनटालोजिस्ट डॉ. मिश्रा से मशविरा लेने की सलाह दी थी। डॉ. मिश्रा ने कहा, ‘यह तकलीफ़ पेट की गड़बड़ी से होती है। एक तरह का दुष्चक्र बन जाता है। बाजार से एक शीशी ‘डायजीन सिरप’ ले आइए, पीने पर वह सिलसिला थम जाएगा’.. और सचमुच ऐसा ही हुआ। एक शीशी डायजीन का शरबत क्या पिया, हिचकी उडऩ छू।
लेकिन जिस नाटकीय ढंग से वह उस बार आई-गई थी, उसी तरह साल भर बाद अचानक लौट आई- इस फर्क़ के साथ कि जिस औषधि- डायजीन शरबत- को अमोघ समझ गिरधारी ने एक की जगह 2-3 शीशियां पी डालीं, वह तनिक भी कारगर न हुई। तब पत्नी की सहेली की शरण में जाना पड़ा। उनके परिवार में डॉक्टर ही डॉक्टर भरे पड़े थे । बड़ी बहू ने सुझाया, आप दो टिकिया उस दवा-क्लोरोप्रोमैज़ीन- की सुबह-शाम ले लीजिए जो आमतौर से उत्तेजित लोगों को शांत करने के लिए दी जाती है। भले ही यह असामान्य स्थिति हो, पर आप एक तरह के ‘सिनड्रोम’ में घिर गए हैं, जो थम नहीं रहा। मुमकिन है, आपके मामले में यह टिकिया कारगर हो जाए।’  और सचमुच ऐसा ही हुआ । एकाध बार बाद में भी उसीसे फायदा हुआ ।
साथ ही नुकसान भी, क्योंकि श्रीमती गिरधारी के हाथ यह एक ऐसा हथियार आ गया था जिसके बूते उन्होंने अपने पति को सिरे से पागल समझ लेने का अधिकार हासिल कर लिया।
जब भी दोनों के बीच कोई विवाद शुरू होता, जोकि अकसर होता, श्रीमतीजी गिरधारी बाबू को सलाह देतीं कि ‘बहुत बहस करोगे तो ‘पागलपन’ का दौरा पड़ेगा और हिचकी शुरू हो जाएगी । तब वही वाली टिकिया खानी पड़ेगी’..
यह तर्क गिरधारी को खामोश तो कर देता था लेकिन ऐसी घुटन भी उनमें भरता जो भीतर ही भीतर उनको मथती रहती। उन्हें पता न था कि बिलकुल मामूली समझी जानेवाली तकलीफ़ से छुटकारा पाने की इतनी बड़ी कीमत उनको चुकानी पड़ेगी .. वे तो वे, उनके माता-पिता बल्कि पूरे खानदान को पागल होने का लांछन सहना पड़ेगा..एक बार नहीं, हर बार, बल्कि बार-बार- जब भी वे समझते कि ‘हिचकी’ या ‘हुचकी’ तो ‘होचुकी’ है, वो कमबख्त ‘होरही’ बन उनके दिल-दिमाग़ पर कब्ज़ा कर लेती थी। आम तौर से जिसे लोग हँसीठठ्ठे का मामला बताते हैं, वह गिरधारी के गले की बुरी फांस बन चुका था ।