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Wednesday 22 Nov 2017

स्मृतियां


रमेश कुमार शर्मा   

  गायत्री मंदिर के पीछे बोईरदादर ,रायगढ़ (छ.ग.) मो. 9752685148  
उसे अपना घर छोड़े वर्षों गुजर गए थे। किसी को उसका गांव छोडऩा अब याद भी होगा या नहीं , ठीक-ठीक तय कर पाना उसके लिए असंभव नहीं, तो कम से कम आसान तो नहीं था। स्मृतियां इतनी आसानी से लोगों के जीवन से विदा हो सकती हैं क्या? इस सवाल से बार बार उसका सामना हो रहा था। अगर उसका जाना लोगों को याद होगा, तो यह भी याद होगा कि वह दोबारा वहां कभी नहीं लौटा। बार बार बुलाने, याद किए जाने के बावजूद अपने बीमार माता-पिता के लिए भी नहीं। हर बार नौकरी का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारियां दूसरों पर डालने की उसकी आदत जीवन भर बनी रही। वह बाहर का होकर ही रह गया। एक विशुद्ध शहरी बाबू बनकर, एक विशुद्ध नौकरीपेशा आदमी बनकर, जो सुबह ऑफिस के लिए निकलता है और शाम होते घर लौटकर अपने बीबी बच्चों में रम जाता है।   
आज वह अपनी नौकरी से रिटायर हो रहा था। सरकारी मकान खाली करने का नोटिस भी अब कुछ दिनों में ही आ जाएगा यह सोचकर उसका सर चकराने लगा। सरकारी मकान के चलते अपना खुद का कोई मकान बनाने के प्रति वह हमेशा लापरवाह ही रहा। जबकि अगर वह चाहता तो खुद का मकान कब का बना चुका होता। उसके मन में ये सारी बातें भी आती जाती रहीं कि मकान अलग से बनाने के फायदे भी क्या थे आखिर ! जबकि उसके बच्चों ने विदेशों में फ्लैट ले लिए हैं। जीवन के आखरी समय में उसे तो आखिर उनके साथ ही जीवन बिताना है। इन सब चीजों के चलते इन तीस सालों में अपने लिए रहने को एक अदद मकान की व्यवस्था भी अब तक वह नहीं कर सका, यह सोचकर उसे रोना आ गया। जीवन की सारी कमाई दोनों बच्चों की पढ़ाई लिखाई में लग गई। इधर-उधर का पैसा भी उसने खूब कमाया पर सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया। बची-खुची सारी कमाई पत्नी की बीमारी में चली गई और अंत में पत्नी का भी साथ छूट गया। नौकरी के नाम पर दोनों बच्चे भी विदेशों में जाकर बस गए और वहीं के होकर रह गए। उनके साथ विदेशों में रहने का सपना धराशायी तब हो गया जब दोनों बेटों ने उसे साथ रख पाने में असमर्थता व्यक्त कर दी। किसी ने उसकी ओर पलटकर नहीं देखा।
उसके विदाई समारोह में ऑफिस में एक शानदार कार्यक्रम रखा गया था। सबने उसके सम्मान में कशीदे पढ़े। कईयों ने उसे जीवन में एक सफल हुआ आदमी इसलिए कहा कि उसने अपने दोनों बेटों को ऊंची तालीम दिलाकर विदेशों में अच्छी नौकरी पर भेज दिया था और आज वे लाखों में खेल रहे थे। वह सबको ध्यान से सुनता रहा। अंत में उसने सबका आभार प्रकट किया और अपने चेहरे पर मुस्कान लाने की हर संभव कोशिश की। सबका आभार प्रकट कर अंत में वहां से वह विदा हो गया। आफिस से आखरी बार लौटते हुए आज उसे लग रहा था कि दुनिया में वह बिल्कुल अकेला है। आज उसके पास कोई नहीं है। रहा सहा ऑफिस भी आज छूट चुका है। वह सोचता रहा कि आखिर उसे किस बात की सजा मिल रही है। कहीं इस बात की तो नहीं कि उसने जीवन में कभी किसी की सहायता नहीं की। किसी का काम भी अगर किया तो पैसे लेकर या स्वार्थ के लिए ही किया। नौकरी का नशा इस कदर चढ़ा कि वह तो मां-बाप तक को भूल गया। ये सारी बातें आज उसका पीछा कर रहीं थीं। और वह उनसे बचने की नाकाम कोशिश करता रहा। अगर वह दोबारा गांव लौटा तो लोग क्या कहेंगे? पहली बार ऐसे सवाल उसे चिंता में डाल रहे थे। वह गांव लौटे या नहीं लौटे, या किसी दूसरी जगह जाने के बारे में सोचे, यह तय कर पाने में भी उसे बहुत परेशानी हो रही थी। हालांकि ग्रेच्युटी और पीएफ का तकरीबन बीस लाख रुपए कुछ दिनों बाद उसे मिलने वाला था पर शहर में एक फ्लैट की कीमत कम से कम पच्चीस लाख रुपए से कम नहीं थी। किसी माध्यम से उसने पता किया था कि उसके गांव का घर बहुत जीर्ण-शीर्ण हालत में है पर उसका मरम्मत कर देने पर उसमें आराम से रहा जा सकता है। तो क्या वह गांव के घर की मरम्मत करवा ले और वहां जाकर रहने लगे? ये विचार भी उसके मन में आ जा रहे थे।
ऑफिस से अंतिम विदाई लेकर जब वह अपने सरकारी मकान में पहुंचा तो अंधेरा घिर चुका था।
अब वह सरकार का आदमी नहीं रहा। यह घर जिसे वह अपनी बपौती समझता था और अपने आंगन से किसी को एक फूल भी तोडऩे नहीं देता था, वो भी उसका नहीं रहा। उसके बच्चे भी उसके नहीं रहे। लालच और स्वार्थ के कारण शहर के ज्यादातर लोगों के बीच वह पहले ही बदनाम था इसलिए शहर में अपना कहने को भी कोई नहीं बचा।  .....ऐसे विचार उसके मन में ज्वार-भाटे की तरह आते जाते रहे। सोचकर उसे एक झटका सा लगा।
इसका मतलब उसके पास कुछ भी नहीं बचा - सोचते सोचते उसने कमरे की बत्तियां जलाई और पलंग पर निढाल होकर लेट गया।
रिटायरमेंट के बाद अब गांव ही एक अंतिम आसरा है। यह खयाल आते ही उसके भीतर का डर थोड़ा कम हो गया। दरअसल कुछ महीनों से एक भारी असुरक्षा की भावना उसके भीतर घर कर चुकी थी। रिटायरमेंट के बाद क्या होगा? अकेले जीवन आखिर कैसे गुजरेगा? ऐसे सारे सवाल मुंह बाएं आकर खड़े हो जाते थे और उसे डराते रहते थे। पलंग पर लेटे-लेटे वह घर के सीलिंग फैन को निहारता रहा। शाम को ऑफिस से आने के बाद वह घर के बाहर की लाइट अक्सर जला दिया करता था। पता नहीं आज क्या हुआ कि वह बाहर की लाइट जलाना भूल गया। अचानक उसका ध्यान बाहर की ओर गया। उसे लगा बाहर बहुत घना अंधेरा है। इस अंधेरे ने उसके भीतर के डर को और बढ़ा दिया था। अचानक बाहर एक आहट सी हुई। आमतौर पर ऐसी आहटों पर उसका ध्यान कभी नहीं जाता था पर आज वह बाहर निकल कर देखने लगा। बाहर कोई नहीं था। एक बिल्ली ऊपर से छलांग लगाकर अहाते के भीतर आई थी।
आज उसे क्या हो रहा है? मन के भीतर आज उसे एक बोझ सा अनुभव हो रहा था। अंदर आकर पलंग पर लेटते हुए वह बचपन के दिनों की ओर लौटने लगा।
तब उसकी उमर यही कोई दस ग्यारह के आसपास रही होगी। गांव में शायद उसके कुछ बचपन के दोस्त भी थे। मनोहर, जयविलास, टीकाराम ..... शायद यही नाम थे उनके। आज उनसे, उसका कोई संबंध भले ही नहीं रह गया था फिर भी जोर देकर वह उन्हें याद करने लगा। इनके साथ उसका रोज का उठना बैठना था। साथ-साथ स्कूल जाना, साथ-साथ लौटना, तालाब किनारे रोज घंटों बैठकर बतियाना, सारी बातों को याद करने का आज उसके पास पूरा अवकाश था ।
आज उसे पहली बार एहसास हो रहा था कि जीवन में दूसरों के साथ बहुत कुछ गलत किया उसने! ये सभी तो बचपन के सखा भर थे, उसने तो मां-बाप तक की उपेक्षा कर दी। क्या ये सभी उसे माफ  करेंगे। मां-बाप तो चलो अब नहीं भी रहे, पर ये मित्र तो गांव में होंगे ही शायद! पूरे न सही पर कम से कम कुछ लोग तो जरुर होंगे गांव में! इन स्मृतियों ने अचानक इतने सालों बाद उसके भीतर गांव लौटने की इच्छा पैदा कर दी। एक संशय तब भी बना रहा कि उसे पहचानने से सभी इंकार कर दें तब क्या होगा? भीतर एक उम्मीद भी जगी कि सभी उसकी तरह स्वार्थी नहीं हो सकते! तत्काल एक अपराधबोध से वह इसलिए ग्रसित हो गया क्योंकि अपने इस लम्बे जीवन काल में जानबूझकर वह कईयों को न पहचानने का बहाना कर चुका था। उसके इस अशोभनीय व्यवहार से बहुत से लोगों को दुखी होते देखकर भी उसे कभी ग्लानि क्यों नहीं हुई? आज ठहरकर वह पहली बार सोच रहा था।
हर अपराध की सजा देर-सवेर मिल ही जाती है! मां-बाप का असमय चले जाना, पत्नी का साथ छूट जाना, दोनों बच्चों की ओर से आखरी समय में उसे त्याग देना! ये सभी सजा ही तो है जिसे वह भोग रहा है! सोचते-सोचते अचानक उसकी आंखें भर आई। रात के करीब बारह बज चुके थे। उसे नींद नहीं आ रही थी। उठकर उसने दूध गर्म किया। दूध पीकर सो जाने के बाद सीधे सुबह उसकी आंख खुली। हाकर आज का अखबार दे गया था। अखबार पर उसकी विदाई की खबरें भी छपी थीं। बिना ब्रश किए ही वह अपनी विदाई की खबरों को बड़े ध्यान से पढऩे लगा। उसे जीवन में एक अच्छा और सफल आदमी बताया गया था।
अखबारों में भी कितनी झूठी खबरें छपती हैं, वह मन ही मन बड़बड़ाते हुए बाथरुम की ओर चला गया। लौटा तो काम वाली बाई आ गई थी।
 बाबू रात में खाना नहीं बनाए थे क्या? सारे के सारे बर्तन साफ सुथरे रखे हैं। वह पूछ बैठी
 नहीं ! कल हम बाहर ही खा लिए थे इसलिए ............!
 आप और बाहर का खाना ! कहते कहते उसके चेहरे पर आड़ी तिरछी रेखाएं बन आई थीं।
 वो क्या था कि कल हम रिटायर हो गए! आखिरी दिन ऑफिस वालों ने हमें खाना खिला दिया!
तो आज से आप ऑफिस नहीं जाएंगे क्या? वह फिर पूछ बैठी
नहीं जाऊंगा!
 तब तो ये घर भी आपको छोडऩा पड़ेगा फिर ! मेरा भी एक घर का काम छूट जाएगा, ऐसा कहते कहते बाई के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें खींच आई।
बाई को उसकी चिन्ता नहीं बल्कि अपनी कमाई की चिन्ता थी। यह जानकर उसे थोड़ा दुख हुआ। सबको अपनी चिन्ता होती है, वह भी अपने बारे में सोच रही है तो क्या गलत कर रही है! यह सोचकर वह चुप हो गया।
कुछ दिनों बाद इस घर के साथ साथ बाई का भी साथ छूट जाएगा! सरकारी नौकरी, सरकारी घर, बाई, ऑफिस के सहकर्मी सब के सब स्मृतियों के हिस्से बन जाएंगे! बस कभी-कभी याद करने के लिए! ये स्मृतियां भी बड़ी अजीब होती हैं! आदमी दुनिया में जब बिलकुल अकेला हो जाता है तब भी ये साथ नहीं छोड़ती, चाहे आदमी कितना भी बुरा क्यों न हो! पता नहीं इतने वर्षों बाद सारी चीजें उसे क्यों समझ में आने लगी थीं।
काश सारी बातें वह बहुत पहले समझ लेता, कम से कम उसके बच्चे , गांव, गांव के बाल सखा आज उसके संपर्क  में होते! पछतावे का हथौड़ा उसके दिमाग को घायल किए जा रहा था।
उसने तय किया, कुछ भी हो अब वह यहां नहीं रहेगा। वह गांव लौट जाएगा। उसे विश्वास होने लगा कि बचपन के मित्र उसे जरुर स्वीकार कर लेंगे ! सालों बाद फिर से वह उनके बीच होगा। सारी बातें सोचकर उसे बहुत खुशी मिली। स्मृतियों ने भीतर से उसे एक ऐसी ताकत दे दी थी जिसका वह अब तक इंतजार कर रहा था। उसने आखरी बार इस सरकारी मकान का मुआयना किया और गांव की ओर लौट जाने की तैयारी के साथ अपना सामान समेटने लगा।