Monthly Magzine
Wednesday 22 Nov 2017

अभिमन्यु नहीं

शैलेय
वीटा-24, ओमेक्स
रूद्रपुर (यू.एस. नगर)-263153 (उत्तराखंड)
मो. 09760971225

अभिमन्यु नहीं
भरपूर-लाव-लश्कर के साथ
सुनियोजित इस चक्रव्यूह में
कौरव
अपने पूरे रोमांच पर हैं
जबकि मैं
अभी अपनी पहली ही चाप पर

नितांत अकेला

अब
चूंकि मेरे पिता अर्जुन नहीं हैं
न मां ही सुभद्रा
जाहिर है कि
मैं भी कोई अभिमन्यु नहीं हूं

इसलिए इस महाभारत में यही सच है कि
कुछ भी घटित
कुछ भी संभव है मेरे लिए

पहले ही द्वार पर
गिराया जा सकता हूं
और
काले हहराते इन सारे ही व्यूहों को
ध्वस्त भी कर सकता हूं।

मुगलता नहीं

एक मुगालते में कि
मैंने जो किया
ठीक किया
मैं जीता रहा और हारी हुई लड़ाइयों की लज्जा
फजीहत से
खुद को दरकिनार करता रहा

यहां तक कि
कुत्ता भी अगर कभी काट खाया तो
मैंने उसे भी एक
बुरी बला का टल-निपट जाना ही कहा
संतोष किया कि
कुछ दर्दीले इंजेक्शन जरूर लगेंगे

पागल होने से तो बच ही जाऊंगा
जीवन रह जाएगा
इस तरह
मुगालता यहां तक बढ़ गया कि
दुनिया ही मुझे बहाना लगने लगी

पर आज
इस असहाय अवस्था में
मैं खुद को ही लेकर थरथरा रहा हूं कि
कहीं कोई मुगालते में ही न ले-ले
करुणाद्र्र चीख रहा हूं-
मैं हकीकत में हूं
किसी को भी हकीकत में चाहता हुआ।

बिरादरी

भोजन को बैठा हूं
अभी पहला ही कौर खींचा
लगा कि
मैं तो जमी नहीं नोंच रहा हूं
और अब यह उन लोगों के लिए
औार भी छोटी पड़ती ही जा रही है जो
रहने भर की जगह तक के लिए
मारे-मारे फिर रहे हैं

क्या मैं इतना खतरनाक
इतना लोभी
इतना अहंकारी हूं कि
दूसरों का निवाला भी निगले जा रहा हूं

तभी खयाल आया कि
ऐसे तो एक रोज
मेरी अपनी आंतें ही बाहर निकल आएंगी
आखिर  मैं भी तो भूखा हूं

वैसे भी
मैं कोई ऐसा आदमी भी नहीं हूं कि
किसी दूसरे का कौर छीन खाऊं
मैं ही जानता हूं
रसोई में आंच मैं कैसे-कैसे कर लाता हूं
फिर भी
कौर लिया हाथ
अधबीच ही रुक गया है
शायद इनकी रसोई में भी आंच के लिए।