Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

समुद्र मंथन के बहाने

डॉ. गोरेलाल चंदेल
दाऊचौरा, खैरागढ़
जिला-राजनांदगांव (छ.ग.)
मो. 9425560759

किस्सा समुद्र मंथन का है। है तो मिथकीय कथा, पर इस कथा ने अपने भीतर इतिहास का ऐसा सत्य छुपा रखा है कि वह सच 21वीं सदी के कारपोरेट की निगमीय दुनिया में भी चीख-चीख कर सच्चाई बयां कर रही है। मिथकीय कथा में देवता और असुरों ने या यों कहें, आर्यों और अनार्यों ने समुद्र का मंथन करने की ठानी। जिससे वहां से निकलने वाले तत्वों से समाज की नये सिरे से रचना की जा सके। समाज को नयी दिशा दी जा सके। इसके लिए सामाजिक समन्वय का रास्ता निकाला गया। आपसी भेदभाव को मिटा कर एक साथ मिलकर सामूहिक शक्ति से समुद्र का मंथन किया जाय, क्योंकि समुद्र का मंथन अकेले देवताओं के बस की बात नहीं थी। यदि ऐसा होता तो देवता असुरों को साथ लेने का प्रयास कभी नहीं करते। इसलिए उसने असुरों को साथ लेकर समुद्र मंथन का विचार किया। देववादी लोग यह कह सकते हैं कि देवता सक्षम थे, सर्वशक्तिमान थे। वे सब कुछ कर सकते थे। यह तो उनकी उदारता थी कि इस महान कार्य में उन्होंने असुरों को अपने साथ जोडऩे की उदारता दिखाई। देवता महान थे। पर देवता और असुरों का उपलब्ध इतिहास या मिथ कथा यह बतलाते है कि देवता और असुरों में देवताओं के आगमन के साथ ही तालमेल बिगड़ चुका था। वे एक दूसरे के दुश्मन हो चुके थे तो भला समुद्र मंथन के लिए साथ लेने की उदारता सिरे से ही गले नहीं उतरती।
    खैर जो भी हो, समुद्र मंथन दोनों ने मिलकर किया। मंदराचल पर्वत को मथानी बनायी गई और शेषनाग को रस्सी के रूप में उपयोग किया गया। मथानी का जब वर्णन उस मिथ कथा में मिलता है तो मथानी के भीतर से अलिखित इतिहास बोलने लगता है। मथानी का प्रयोग पशुपालन युग के विकास क्रम में ही हुआ होगा। क्योंकि दही से मक्खन निकालने का काम बिना मथानी के संभव ही नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि समुद्र मंथन की कथा लेखन के समय तक मथानी समाज में काफी प्रचलित हो गयी रही होगी। कृष्ण को माखन चोर बनने-बनाने में मथानी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। याने समुद्र मंथन की कथा के समय पशुपालन युग काफी विकसित हो चुका था। पशुपालन युग में आर्यों और अनार्यों के बीच आपसी संघर्ष का भी काफी विकास हो चुका था। मिथकीय कथाओं में इसके ढेर सारे प्रमाण मिलते है। इसे बताने की जरूरत नहीं है। तब देवताओं द्वारा असुरों को साथ लेने की उदारता की बातें अपने आप ही अर्थहीन लगने लगती है। शेषनाग को रस्सी बनाने की बात में भी इतिहास का संकेत मिलता है। आदिवासी अनार्य अपने आपको नागवंशी कहते हंै। इससे शेषनाग की रस्सी का रहस्य बहुत कुछ खुल जाता है।
रस्सी के एक सिरे को देवता पकड़ते है और दूसरे सिरे को असुर। कथा में यह नहीं बताया गया है कि शेषनाग के मुख के सिरे को कौन पकड़ते हैं और पूंछ के सिरे को कौन। पर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि मुख के सिरे को पकडऩा किसके हिस्से में आया होगा और पूंछ को पकडऩा किसके हिस्से। सिर का हिस्सा निश्चित रूप से असुरों के हिस्से आया होगा। क्योंकि शेषनाग के जहरीले प्रहार से मरें तो असुर मरें, देवता तो पूंछ के सिरे को पकडक़र सुरक्षित रहे होंगे। अब क्षीर सागर को मथना शुरू किये। मथानी चलती रही। क्षीर सागर के मथने से जब रत्न निकलता था मथानी रूक जाती थी और यह रत्न किसके हिस्से आयेगा? किसको मिलेगा? इसको लेकर विवाद की स्थिति बनती रही होगी। स्वभाविक है कि यह हक की लड़ाई है। दोनों बराबर श्रम कर रहे हंै तो उस श्रम के प्रतिफल पर दोनों का बराबर का हक होना चाहिए। इस मंथन में चौदह रत्न निकले। ये चौदह रत्न थे- (1) लक्ष्मी (2) कौस्तुभ (3) पारिजात (4) सुरा (5) धनवंतरी (6) चन्द्रमा (7) गरल (8) पुष्पक (9) ऐरावत (10) पांचजन्य शंख (10) रम्भा (11) कामधेनु (12) उच्चै:श्रवा (13) कल्पवृक्ष(14) अमृत कुंभ। इन रत्नों का बंटवारा तो बराबर-बराबर होना चाहिए था। पर पुराण की कथा ही इसका गवाह है कि बंटवारा बराबर नहीं हुआ। जो अच्छे रत्न थे, जिससे देवता ऐश्वर्यशाली बन सकते थे। जिससे उनके विलासी जीवन का रास्ता साफ  हो सकता था, जिसके माध्यम से वे असुरों पर अपनी सत्ता स्थापित कर सकते थे, उन रत्नों पर देवतओं ने हक जमा लिया। स्कंध पुराण की जिस कथा में समुद्र मंथन का वर्णन मिलता है, मंथन से चौदह रत्न निकलने का उल्लेख मिलता है, उसी स्कंध पुराण की कथा में उसके बंटवारे का भी उल्लेख मिलता है। और उस बंटवारे में, हक पर, असुरों के हक पर देवताओं द्वारा कब्जा करने का उल्लेख भी मिलता है। याने असुरों के हक को छीनने का उल्लेख मिलता है। माक्र्स का वह कथन याद आता है जिसमें पूंजीपति को माक्र्स ने श्रम की चोरी करने वाला चोर कहा है। उसने एक लकड़ी को टेबिल के रूप में उत्पादन करने का उदाहरण दिया। पेड़ से टेबिल तक की उत्पादन की यात्रा में श्रम की ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। पेड़ की लकड़ी की कीमत यदि 10-20 रूपये है तो उससे उत्पादित टेबिल की कीमत दो सौ रूपया हो जाती है। उत्पादन के साधन भूमि, श्रम, पंूजी, साहस और संगठन। इस उत्पादन में श्रम की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पर उसे 40-50 रूपया मजदूरी दे दी जाती है और शेष राशि पूंजी डकार लेती है। ठीक ऐसा ही समुद्र मंथन में हुआ। असुरों ने पूरी ईमानदारी से श्रम किया पर उन्हें मिला क्या? कथा के अनुसार उन्हें अपना सर कटाने के अलावा कुछ भी नहीं मिला।
        रत्न निकलते गये, बंटवारा होता गया। पहले रत्न के रूप में लक्ष्मी निकली। लक्ष्मी याने चल सम्पत्ति। आज के दौर में जमीन-जायदाद की गणना भी चल सम्पत्ति के अन्तर्गत ही होती है। अब लक्ष्मी मिले किसको, याने चल सम्पत्ति का मालिक समाज का कौन सा वर्ग बने? कौन उसका उपयोग करे? और कौन चल सम्पत्ति को समाज में बढ़ाये? इन सबको देवताओं ने बड़ी चालाकी से सुलझा लिया। याने त्रिदेव की रचना कर ली। ब्रम्हा-विष्णु-महेश। उन्होंने अपने ही वर्ग के विष्णु को पालन कर्ता बना दिया। देव समाज, आर्य समाज और अनार्य समाज का पालन कर्ता, ठीक उसी तरह जिस तरह परिवार का मुखिया होता है। पर परिवार के मुखिया पालनकर्ता और त्रिदेव के पालनकर्ता में बड़ा अन्तर होता है। परिवार का मुखिया खुद आगे बढक़र श्रम भी करता है और पूरे परिवार को श्रम की संस्कृति से लगातार जोड़ता भी है। श्रम द्वारा प्राप्त चल सम्पत्ति पर मुखिया का, परिवार के पालनकर्ता का अधिकार होता है और वह परिवार के सभी सदस्यों का बिना कोई भेदभाव के पालन करता है। उनकी हर जरूरत को ईमानदारी से पूरा करता है। जबकि पालनकर्ता विष्णु श्रम विभाजन कर देता है। देवता वेद पुराणों की रचना करेंगे। भक्ति भाव की गंगा बहायेंगे, उनके ज्ञान गंगा के पवित्र जल में सब व्यक्ति स्नान करेंगे और उनके द्वारा बताये गये ज्ञान को ही अंतिम ज्ञान माना जायेगा। दूसरा वर्ग परिश्रम और मिहनत करने वालों का वर्ग होगा। जिनका केवल श्रम पर अधिकार रहेगा। उन श्रम करने वालों के पूरे उत्पाद पर पालनकर्ता का अधिकार रहेगा। और वह जैसा चाहे वैसा उसका उपयोग कर सकता है। किसी को इस पर प्रश्न उठाने या आपत्ति करने का अधिकार नहीं होगा, हो गया पालनकर्ता का श्रम विभाजन। एक वर्ग को मिहनतकश लोगों की मिहनत पर ऐशोआराम और भोगविलास की सारी वस्तु मिलेगी। उन्हें मिहनत करने या श्रम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। स्वयं पालनकर्ता भी कोई श्रम नहीं करेगा। वह शेषनाग के मुलायम पलने पर हमेशा लेटा रहेगा और चल सम्पत्ति रूपी लक्ष्मी हमेशा उनका पैर दबाती रहेगी। याने समाज की चल सम्पत्ति के वह सम्पूर्ण अधिकारी होंगे। और अपने आर्य कुनबे के लोगों को सारी सुख सुविधा उपलब्ध कराते रहेंगे। दूसरे वर्ग को जिनकी मिहनत और श्रम से चल सम्पत्ति पैदा होती है, उन्हें पेज पसिया पीकर अपना जीवन यापन करना होगा। समुद्र मंथन से प्राप्त लक्ष्मी का इस तरह बंटवारा हुआ, जिसमें अनार्य असुरों को कुछ भी नहीं मिला।
दूसरा रत्न कौस्तुभ मिला, जो जमीन के भीतर पाये जाने वाले खनिज रत्न का प्रतीक माना जा सकता है। उन रत्नों को निकालने के लिए कुदाल, फावड़ा, गैती चलाने वाले हाथ अलग होंगे और उसको धारण करने वाला गला अलग होगा। याने जमीन को खोदकर जो रत्न निकाला जायेगा उस पर निकालने वाले अनार्यों का अधिकार नहीं होगा वरन् पालनकर्ता आर्य देव विष्णु का अधिकार होगा। इसलिए उस कौस्तुभ को विष्णु के गले में डाल दिया गया। खनिज संपदा पर किसका अधिकार हो और कौन उसे निकाले यह समुद्र मंथन के समय ही तय हो गया था। समुद्र मंथन की यह परंपरा अपने चरम उत्कर्ष पर पहुंचकर इस 21वीं सदी में भी फल फूल रही है। इसके बाद पारिजात निकला जो देव कानन की शोभा बना। अनार्यों का जमीन-जंगल के पेड़-पौधों पर भी कोई अधिकार नही रहेगा। जंगल के कीमती वृक्ष पालने-पोसने और तैयार होने की प्रक्रिया में, उसकी कटाई छंटाई करने का काम अनार्य मजदूर करेंगे और उसका उपयोग देव वर्ग करेंगे। चाहे उसका बाजार विकसित करके करे या फिर स्वयं की विलासिता के लिए उसका उपयोग करे। मालिकाना हक उनका होगा। याने धरती के पेड़ पौधों पर भी आर्यों का हक हो गया। बंटवारे में अनार्यों को बबूल जैसी कंटीली झाडिय़ा मिली।
चौदह रत्नों में से एक रत्न धनवंतरि निकला। वास्तव में धनवंतरि प्राकृतिक औषधियों का मानवीयकरण है। प्राकृतिक औषधियों को जानने समझने और जन स्वास्थ्य के लिए उपयोग के जानकार धनवंतरि रहे होंगे। परजीवी वर्ग को अपने स्वास्थ्य की चिंता बहुत रहती है। उनमें मृत्यु भय भी अधिक होता है। श्रमिक और मिहनतकश वर्ग अपने स्वास्थ्य के प्रति इतना अधिक सचेत नहीं होते। अपने स्तर पर अपने आसपास के पेड़ पौधों से अपना इलाज कर लेते हंै। पर देव वर्ग को तो चाहिए पांच सितारा इलाज। पांच सितारा इलाज उपलब्ध करवाने में धनवंतरि ही उनको सक्षम दिखायी दे रहे थे। इसलिए समुद्र मंथन से निकले हुए धनवंतरि को उन्होंने देव-वैद्य घोषित कर दिया, वह देवलोक में आर्यों के बीच रहकर आर्यों के स्वास्थ्य की रक्षा करेंगे, अधिकांश प्राकृतिक औषधि जंगल और पहाड़ों में जलवायुगत कारणों से पैदा होते है। धनवंतरि अपने ज्ञान के आधार पर उन औषधियों को चिन्हांकित करेंगे। जंगल में रहने वाले अनार्य उसकी देख-रेख रक्षा-सुरक्षा करेंगे। उसका संकलन करेंगे। उसको कूट-पीस कर दवाई बनाने का काम करेंगे। उसका उपयोग देवता करेंगे। बंटवारे में उन्हें दवाई बटोरने, बनाने का काम मिला, दवाई पर अधिकार देव समाज के हक में गया। और आगे चलकर देव समाज द्वारा इसका बाजार विकसित किया गया। जिसे आज की बाजारवादी व्यवस्था में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यानी समुद्र मंथन से निकलने वाले धनवंतरि पर देवों का पूर्ण अधिकार हो गया। असुरों को इसमें भी कुछ नही मिला।
समुद्र मंथन से एक और महत्वपूर्ण रत्न मिला सुरा। जिन्दगी का सब गम भुलाकर मौज मस्ती का रत्न। जिनको कोई गम ना हो उनको अपने जीवन को और मस्त बनाने का रत्न। इस रत्न को दो भागों में बांटा गया। या अपने-अपने भाग का अलग-अलग नाम रखा गया। देवताओं को इसका जो अंश मिला वह आला दर्जे का या कहना चाहिए उच्च कोटि की सुरा मिली। जिसे देवताओं ने सोमरस का नाम दिया। सोमरस पर असुरों का कोई अधिकार नहीं था या कहें उस तक उनकी पहुंच नहीं थी। जैसे आज के युग में उच्च वर्ग के मौज मस्ती की सुरा शैम्पेन या जानीवाकर या ब्लैक डाग, आदि आदि न जाने कितने नाम। असुर या अनार्य तो उनके नाम भी नहीं जानते। फिर उन तक पहुंच पाने का सवाल ही कहां उठता है। उनके हिस्से में आया महुआ, ताड़ी, सल्फी, लांदा। इस तरह के निम्न श्रेणी की सुरा। जिसे पीकर वे मस्त हो जाते हैं, अपनी पीड़ा के कारक तत्व को भूलकर मस्ती में झूमते रहते हंै। आज के युग में अनार्य के लिए देशी ठर्रा। बंटवारे का यह हिसाब तो आज भी जस का तस है। सुरा के बाद जो रत्न मिला वह था चन्द्रमा, शीतल किरणों वाला चन्द्रमा। पसीने को सुखाने वाला चन्द्रमा। श्रम का परिहार करने वाला चन्द्रमा। रात के अंधेरे में भी रोशनी का आभास कराने वाला चन्द्रमा। इस रत्न को लपकने में देवताओं ने देरी नहीं की। उन देवताओं ने जिन्हें न तो पसीना सुखाने की समस्या से जूझना पड़ता था न श्रम परिहार की समस्या से। न ही उनके जीवन में दूर-दूर तक कोई अंधेरा था। वास्तव में उस पर जिनका हक होना चाहिए था वह उनसे छीन लिया गया। आज के जमाने में एयरकंडीशन घर और एयरकंडीशन गाड़ी, आफिस आदि के रूप में देखा जा सकता है, जिन पर किनका हक होना चाहिए और किनका हक है यह किसी से छुपा नहीं है। अर्थात शीतलता प्रदान करने वाले प्रतीक रूपी चन्द्रमा को देव मंडल में शामिल कर लिया गया। और उसमें से भी उनके त्रिदेव में से एक अनार्य देव शंकर के सिर पर द्वितीया का चन्द्रमा रखकर अनार्यों को संतुष्ट कर दिया गया। जिसमें न रोशनी न शीतलता। केवल चमकती हुई लकीर से अनार्य संतुष्ट हो गये। और पूर्णिमा के चांद में देव समाज रास रचाने में मगन होते रहे।
अब बारी आयी उस रत्न की जिसे स्कंध पुराण में गरल कहा गया है। जैसे ही समुद्र मंथन के दौरान हलाहल विष निकला उसके ताप से धरती आकाश सब कुछ जलने लगे। देव समाज में कोलाहल मच गया। अनार्य तो मिहनतकश थे, जेठ के सूरज की तपन में भी उन्हें गैती चलाने का अभ्यास था। इसलिए वे तो कुछ सह पा रहे थे, पर देवताओं को इस तरह की जहरीली आग को झेलने का कोई अनुभव ही नहींथा। उसके लिये तो 10 डिग्री सेल्सियस से 50 डिग्री में अचानक आ जाने जैसी स्थिति थी, और वह भी जहरीली आग। इससे बचने के लिए उन्होंने न तो आर्य देव ब्रम्हा से निवेदन किया न आर्य देव विष्णु से। उन्होंने इसे ग्रहण करने का निवेदन अनार्य देव शंकर से किया। उन्हें अनार्यों के जीवन संकट में पडऩे का वास्ता दिया गया। याने सृजनकर्ता ब्रम्हा और पालनकर्ता विष्णु की ही यह जिम्मेदारी बनती थी कि आर्य-अनार्य समाज में आये इस संकट से समाज को बचाये पर देवताओं ने बड़ी चालाकी से शंकर जी का संवेदनात्मक दोहन किया। जिसे आज की भाषा में ब्लैकमेल कहा जा सकता है। उन्होंने बार-बार अनार्यों के जीवन के संकट की दुहाई दी। शंकर अनार्य देव थे। इसलिए अनार्यों की तरह ही भोले-भाले थे। इसीलिए तो उनका एक नाम भोलेनाथ भी है। वे अपने भोलेपन में देवतओं की चालाकी नहीं समझ पाए और अनार्यों के जीवन को बचाने, उन्हें सुरक्षित रखने और इस जहरीले संकट से मुक्त करने के लिए हलाहल का घट उठाया और उड़ेल लिया अपने मुख में। पेट में जाने से रोकने के लिए पूरा हलाहल अपने गले में भर लिया। कंठ नीला पड़ गया उसे गौरवान्वित करने के लिए उनका नाम भी नीलकंठ विभूषित कर दिया गया। हलाहल की गहरी जलन और तपन से शंकर जी मूच्र्छित होकर लेट गये। काफी समय बाद उनकी मूच्र्छा टूटी। तब तक समुद्र मंथन में बहुत कुछ हो चुका था। कहा जाता है कि भगवान शिव, जिन्हें मानव कल्याण और समाज कल्याण का देव माना जाता है, जो सभी वनवासी अनार्यों के देव के रूप में आज भी उनके घरों में कुलदेवता बनकर स्थापित हंै, वही भगवान शिव समुद्र मंथन से निकले उस गरल की आग और ताप तथा जहरीले प्रभाव से प्रभावित हैं इसीलिए उनकी पूजा में जलाभिषेक अथवा दुग्धाभिषेक का विधान रखा गया है और भक्त जलाभिषेक या दुग्धाभिषेक का विधान भले ही पूरा न कर सकंे पर एक लोटा जल या आधा लोटा दूध चढ़ाना नहीं भूलते। उनकी पूजा में विकट गर्मी की ताप से लडक़र मस्त रहने वाले फूलों का उपयोग होता है। आक का फूल जो बैशाख और जेठ की जलाने वाली तपन से संघर्ष करते हुए हराभरा रहता है, और खूबसूरत नीले-पीले के मिश्रण वाले फूलों से ग्रीष्म पर विजय का शंख नाद करते हुए दिखायी देता है। उस आक के फूलों को शिव पर चढ़ाया जाता है। वैसे ही धतूरे और कनेर के फूलों की हरियाली भी ग्रीष्म ऋतु में उन्माद में दिखायी देती है। इन फूलों से भगवान शिव का अभिषेक कर ग्रीष्म, ताप, जलन के विरूद्ध जेहाद का शंखनाद शिव पूजा में दिखायी देता है।
मुझे यह भी लगता है कि गरल, समुद्र मंथन से निकला हुआ गरल वास्तव मानव जीवन का, खासकर मिहनतकश श्रमजीवी मानव जीवन का गरल ही रहा है जो प्रतीकात्मक रूप में समुद्र मंथन में दिखाया गया है। भगवान शंकर ने तो समुद्र मंथन का गरल पिया है, पर निम्नवर्गीय किसान मजदूर तो रोज जहर पी रहे हैं। कभी भूख का जहर, कभी वस्त्र के अभाव का जहर, कभी अनावृष्टि का जहर, कभी अतिवृष्टि का जहर, कभी ओला का जहर, कभी पाला का जहर, कभी पानी के अभाव का जहर, कभी हारी-बिमारी का जहर, तो कभी बाल बच्चों के स्वास्थ्य का जहर, रोज पी रहे हंै किसान और मजदूर और हार मानकर मूर्छित नहीं हो रहे हंै। वरन आक के पौधे की तरह इन तमाम जहरों से संघर्ष कर रहे हंै और हारने पर या जीतने पर भी आक के फूल की तरह हमेशा मुस्कान भरते हुए जीवन को गतिशील बनाकर तथाकथित ब्रम्हा की सृष्टि को नष्ट होने से बचा रहे हैं। विषपायी शिव की परंपरा को रोज विष पीकर आगे बढ़ाते हुए हंस-खेल कर जीवनी शक्ति का परिचय दे रहे हंै।
अभी मंथन चल ही रहा है। देवता और असुर पूरी ताकत से मथ रहे हैं क्षीर सागर। पता नहीं क्षीर सागर में शेषशायी विष्णु मंथन के समय अपनी सुख निन्द्रा को छोडक़र कहां गये थे। जहां भी गये हों पर मंथन अबाध गति से जारी है। मंथन से एक रत्न पुष्पक निकला। यातायात का सुखमय साधन। हवा में उडक़र शीघ्र गन्तव्य तक पहुंचाने का साधन। वास्तव में उस युग में विमान के आविष्कार का कोई वैज्ञानिक आधार तो है नहीं। इसलिए हम इसे यातायात के तीव्रगामी साधन के रूप में देख सकते है। वह साधन चाहे जो भी रहा हो पर निश्चित ही उस समय के उपलब्ध यातायात के साधनों से बेहतर रहा होगा। देवता तो योजना बनाकर समुद्र मंथन कर रहे थे। असुरों के पास कोई योजनाएं नहीं थी। वे तो कुछ पाने की उम्मीद में समुद्र मंथन कर रहे थे। देवता तीनों लोक में अपनी सत्ता स्थापित करने की योजना के साथ समुद्र मंथन में भिड़े हुए थे। इसलिए उन्हें तो ऐसा साधन चाहिए था जो आसानी से तीनों लोक में उनकी आवाजाही को सुलभ कर सके। जब रत्न के रूप में पुष्पक निकला तो उनकी बांछे खिल गयी। तीनों लोक में सत्ता स्थापित करने का उनका सपना साकार होते हुए दिखायी देने लगा और तीनों लोक की निगरानी भी आसानी से की जा सकती थी। असुरों को कहीं आने जाने के लिए अपने पांव पर पूरा भरोसा था या फिर भैंस पर चढक़र कहीं आने-जाने में मजा आता था। मैं जब बचपन में भैंस भैंसा धोने के लिए नदी तक किसी भैंस भैंसा पर सवार होकर जाता था तो गूंगे केरी सर्रकरा की तरह आनंद लेता था। इसके आनंद का पार तो अनुभवी व्यक्ति ही पा सकता है। देवताओं ने जब पुष्पक विमान पर अपना हक जताया तो असुरों ने अपने हक के प्रति कोई रूचि नहीं दिखायी। क्योंकि उनको तो भैंसे की पीठ की सवारी पुष्पक की सवारी से बेहतर लग रही थी। इसीलिए पुराणों में अधिकांश असुरों की सवारी भैंस को ही दिखाया गया है। असुर यहां देवताओं की चालाकी को नहीं समझ पाये। उनको अपने श्रम और प्रकृति के साथ संघर्ष के अलावा अन्य चीजों का सपना ही नहीं था। जिस तरह आज जो लोक समाज, खासकर ग्रामीण लोक समाज को अपने श्रम पर गर्व होता है, ठीक वैसा ही। एक रत्न और निकला ऐरावत हाथी, उसे देवताओं के राजा इन्द्र ने अपना वाहन बना लिया। लगता है समुद्र मंथन के काल में सामंतवादी व्यवस्था की स्थापना हो चुकी थी। तभी तो इन्द्र देवराज हो चुके थे। यह सही है कि सामंतवादी व्यवस्था के पुरोधा आर्य ही थे। असुरों में तो कबीले का मुखिया या कबीले का सरदार हुआ करते थे। और यह सरदार या मुखिया अलग से आलीशान महल या अलग से लज्जतदार भोजन या सुरा और सुंदरी में मगन नहीं हुआ करते थे। अपने कबीले के लोगों के साथ उनकी ही तरह सामान्य जिन्दगी जीते थे। पर सामंतवाद की परंपरा तो भोग विलास की परंपरा रही है। सुरा और सुंदरी में गले तक डूबने की परंपरा रही है। ऐसी स्थिति में कई गुणों और चमत्कारी शक्तियों से परिपूर्ण रत्न ऐरावत को भला असुरों के हाथ कैसे लगने दिया जा सकता था। उन्होंने अपने राजा इन्द्र को ऐरावत देकर उन्हें अजेय बनाने की दिशा में कदम बढ़ा दिये। असुरों की महिष सवारी का गुणगान करते हुए ऐरावत इन्द्र को दे दिये और असुर भी ऐरावत के लिए कोई विरोध नहीं कर पाये। वे अपनी महिष सवारी में ही मस्त रहे और महिष के सामने ऐरावत को तुच्छ समझते रहे।
पांचजन्य शंख भी निकला समुद्र मंथन में। पांचजन्य शंख की आवाज लोगों में शक्ति भर देती थी। शक्ति श्रम करने की नहीं, मिहनत करने की नहीं, हल चलाने या बोझ उठाने की या हथौड़ा चलाने की शक्ति नहीं वरन् अपने शत्रु के सर काटने या उन्हें युद्ध में पराजित कर उन्हें दास बनाने की। उनके राज के जान माल पर कब्जा करने की शक्ति भर देती थी। निश्चित तौर पर देवता छल-बल की शक्ति में तो बहुत ताकतवर थे। जबकि असुर छल-बल की शक्ति में बड़े कमजोर थे। दूसरी ओर शारीरिक शक्ति, भुजाओं की शक्ति में देवता बहुत कमजोर थे और असुर या अनार्य अपनी शारीरिक शक्ति में देवताओं से कई गुना अधिक ताकतवर थे। फलस्वरूप देवताओं को असुरों पर विजय के लिए युद्ध के ताकत की जरूरत थी जिसे पांचजन्य की ध्वनि पूरी कर सकती थी। इसीलिए पांचजन्य को विष्णु जी को थमा दिया गया। विष्णु जी अपनी चार भुजाओं में से एक में पांचजन्य धारण कर विश्वविजयी बनने का सपना देखने लगे। उनके साथ समूचा देव समाज तो था ही। असुर अपनी तुरही या बांस की पोली नली की जंगल को गुंजाने वाली आवाज में मगन थे। बांस या तुरही की तेज ध्वनि के सामने पांचजन्य की क्या बिसात? उस पर भी हक जमाने के लिए असुरों ने कोई विरोध नहीं किया। और पांचजन्य पालनकर्ता देव विष्णु के हाथों की शोभा बन गया।
मंथन अब भी चल रहा था। जिस तरह मक्खन की अंतिम परत निकलते तक दही में मथानी चलती रहती है। देवता तो खींचते-खींचते फुसरने लगे थे। असुर भी स्वेद कणों की दिव्य आभा से अलंकृत हो गये थे पर मंदराचल की मथानी चलती रही। शेषनाग की रस्सी में कोई झोल भी नहीं आया। गाय की पंूछ के बालों से बनी हुई नोई रस्सी जिससे दही की मथानी चलती है, उससे भी अधिक मजबूत थी शेषनाग की रस्सी। मथानी चलती रही और अब नवनीत इक_े नरम मुलायम लोंदे की तरह निकल आई कामधेनु। यों तो कामधेनु गाय थी। गाय की तरह ही चार पैर, चार ढेठी (थन) सींग, कान, पूंछ सब कुछ गाय का। यानि कामधेनु मंथन से निकलने वाली गाय थी। पर इस गाय की पुराणों में कई विशेषताएं बतलाई गयी। वह चमत्कारी गाय थी। गाय की उन चमत्कारी विशेषताओं से देवता तो वाकिफ थे पर असुरों को, भोले भाले असुरों को उनके चमत्कारों की कोई जानकारी नहीं थी। वे तो गाय की तुलना भैंस से कर रहे थे। भैंस से कम दूध देने वाली गाय के प्रति उनकी रूचि वैसे ही कमजोर पड़ गयी रही होगी। सरल तो थे ही। चमत्कारी शक्ति शिव की तपस्या से मिलती है केवल यही जानते थे। इसलिए उन्हें उस धेनु का वास्तविक अर्थ समझ में ही नहीं आया। जिसके आगे काम शब्द लगा हो। काम का अर्थ यहां यौन जनक काम नहीं है। काम का अर्थ यहां हर कामना को पूरा करने वाले, हर विलास की वस्तु को देने वाला ही रहा है। इसलिए मंथन से निकलने वाली धेनु को कामधेनु कहा गया। पुराणों में यह बताया जाता है कि इसके थन को पकड़ कर जिस वस्तु की कामना करेंगे वह वस्तु ठीक उसी तरह उपलब्ध हो जाती है जिस तरह थन को खींचने से दूध की धार गिरने लगती है। यानी मनोकाम को पूरा करने वाली धेनु कामधेनु। बिना श्रम के ही सब कुछ पा लेने वाली, सब कुछ दे देने वाली धेनु, कामधेनु। श्रम की संस्कृति से अलग हटकर परजीवी संस्कृति को साकार करने वाली धेनु कामधेनु। श्रमजीवियों के शोषण को जायज ठहराने का पुख्ता आधार बनाने वाली धेनु कामधेनु। वास्तव में मनोकामना के अनुसार उनके थन से वस्तुएं निकलती थीं या नहीं, यह तो एक मिथ है। पर इस मिथ के आधार पर युगों-युगों तक आर्यों के विलासितापूर्ण जीवन के वैभव को जायज ठहराने की राह तो प्रशस्त हो ही गयी थी। इस तरह दूसरों के श्रम पर वैभवशाली जीवन जीने का अधिकार देव समाज को कामधेनु ने दे ही दिया। इसलिए इस मिथकीय गाय पर देव समाज ने अपना अधिकार जमा लिया और असुरों को इस मिथकीय धेनु से वंचित कर दिया और असुरों के श्रम के उत्पाद को अपने वैभवशाली जीवन के लिए हथियाने का एक रास्ता तो कामधेनु के रूप में निकल ही गया। असुर अपने ही पालित पशुओं पर गर्व करते रहे। उनके सामने तो कामधेनु का मिथ टूटने में हजारों वर्ष लगा होगा और बहुत हद तक आज भी वह मिथ अपनी अर्थवत्ता बना कर रखा है जिससे आर्यों के, उच्च वर्ग के लोगों के, उच्च वर्ग के बनने की सीढ़ी का काम आसानी से लिया जा सकता है। कामधेनु देवताओं को मिल गयी और असुर देखते ही रह गये और अपने भोलेपन में खुश होते रहे।
उसके बाद रंभा, उच्चै:श्रवा चमत्कारी घोड़ा और कल्पवृक्ष जैसे रत्न निकले जिस पर अपनी जरूरत के अनुसार देव समाज ने अधिकार कर लिया। आर्यों की चालाकियां चलती रही। अपने वैभवशाली जीवन की व्यवस्था करते रहे। स्कंध पुराण के अनुसार आखिर में निकला अमृत कुंभ। पर देव समाज द्वारा हथियाने की क्रिया को मूकदर्शक बनकर देखने वाले असुरों में, अनार्यों में सुगबुगाहट होने लगी। विरोध की चेतना जागने लगी। विरोध की चेतना जागने की जमीन तैयार होने लगी। उनकी सहनशक्ति और धैर्य जवाब देने लगे। अपने हक की लड़ाई लडऩे की मानसिकता बनने लगी। पर अनार्य एक नहीं थे। हर कबीला अलग-अलग खेमों में बंटा हुआ था। और एक कबीला दूसरे कबीले के विरूद्ध हमेशा अपना हथियार भांजते और मांजते रहते थे। इस कारण उनकी सामूहिक शक्ति बंटी हुई थी, जिसका फायदा देव समाज अपनी कूटनीतिक चाल से उठाया करते थे। देव समाज को अर्थात आर्यों को मालूम था कि जब तक असुर अनार्य आपस में लड़ते रहेंगे तब तक उनकी सत्ता को कोई आंच नहीं आयेगी। फूट डालो, लड़ाओ और राज करो की नीति बहुत पहले विकसित हो चुकी थी। आदिवासी, वनवासी अथवा मैदानी क्षेत्र में रहने वाले निम्न वर्ण के लोगों में बिखराव ही उनको कमजोर कर रहा था। समुद्र मंथन के रत्नों के बंटवारे पर असंतोष तो समस्त असुरों में था पर वे एक साथ मिलकर उस असंतोष को सामूहिक शक्ति में बदलने में असफल रहे।
ऐसे ही समय में समुद्र मंथन से सर्वाधिक महत्वपूर्ण रत्न निकला अमृत कुंभ। अमृत से भरा हुआ घड़ा। मिथ कथा यह बतलाती है कि इस कुंभ के दो चार बूंद जिसे मिल गया वह जन्म मरण से मुक्त हो गया। न वह कभी बूढ़ा होगा न उसकी कभी मृत्यु होगी। मिथ कथा के अनुसार अमृत पीने वाला व्यक्ति हमेशा जवान रहेगा, चिर युवा। उस कुंभ में भरे हुए द्रव की विशेषता से देवता परिचित थे। अनार्यों को भी भनक पड़ गयी थी कि अमृत पान से जन्म मरण से मुक्त हुआ जा सकता है। इसलिए अमृत पाने की सुगबुगाहट उनके मन में भी हो रही थी। देवताओं में भी व्यक्तिगत स्वार्थ का, यों कहे व्यक्तिवादी गुणों का विकास हो गया था। उसी व्यक्तिवादिता ने व्यक्ति को निजी स्वार्थ के प्रति उत्प्रेरित किया। इसलिए हर देवता, खासकर देव समाज में जो शक्तिशाली देवता थे वे अमृत कलश के अमृत को अकेला डकार लेना चाह रहे थे जिससे उनके चिर युवा रहने और जन्म मरण से मुक्त होने में कोई संदेह न रह जाय। एक तरफ असुरों में सुगबुगाहट और दूसरी ओर देवताओं का व्यक्तिवाद। पालनकर्ता विष्णु के सामने गंभीर समस्या आ गयी। इन दोनों को कैसे संतुष्ट किया जाय? वे जानते थे कि कहने समझाने से कोई भी तैयार नहीं होगे। स्वार्थ अंधा होता है, वह न किसी की मानता है न सुनता है। ऐसी स्थिति में समझाने या समाज कल्याण या समाज हित का कोई सिद्धान्त काम नहीं आयेगा। ऐसी स्थिति से निपटने के लिये छल या कपटपूर्ण चालाकी का ही सहारा लेना उचित होगा। विष्णु चालाक तो थे ही। क्यों नहीं होते उन पर पालन कर्ता की जिम्मेदारी थी। उसका निर्वाह करने के लिए उनको हर तरीका अपनाना ही पड़ेगा। इसलिए मिथ कथा के अनुसार विष्णु ने विश्व सुंदरी का रूप धारण कर लिया। विश्व सुंदरी विश्वमोहनी भी थी। देवता और असुर उनके मोहक रूप से सम्मोहित हो गये। याने मोह लिया सबको विष्णु ने। सम्मोहन के बाद तो किसी को कुछ पता ही नहीं चला कि कौन क्या कर रहा है। देवता और असुर सब एकटक विश्वमोहनी को देख रहे थे। उनको अपना भी होश नहीं था। विश्वमोहनी के हाथ में अमृत का घट था। उसने देवताओं की अलग पात बनवायी और असुरों की थोड़ा हटकर अलग पात। पर इसका क्या किया जाय। असुरों में दो लोग ऐसे थे जो सम्मोहन में अपना होश हवाश नहीं खो पाये थे। उन पर विश्वमोहनी विष्णु के सम्मोहन का आंशिक असर ही पड़ा था।
आंशिक असर के कारण वे देव समाज की चालाकी को समझ रहे थे। पूरा असुर वर्ग सम्मोहित था। इसलिए उनको विरोध के लिए तैयार करना संभव ही नहीं था। वे दोनों देवताओं की शक्ति से लड़ भी नहीं सकते थे। ऐसी स्थिति में उनके पास एक ही चारा था कि जैसे के साथ वैसा ही किया जाय। राहू और केतू भी अपना रूप बदलने में माहिर थे। अपना रूप बदले, देवताओं का रूप धारण किये और देवताओं की पांत में जाकर बैठ गये। विश्वमोहनी विष्णु ने अमृत घट से अमृत बांटने की शुरूआत देवताओं की पांत से की। देवता गंगा जल की तरह अपनी अंजली में अमृत लेकर गटागट पी रहे थे। विष्णु इस चालाकी से अमृत बांट रहे थे कि देवताओं की पांत के अंतिम व्यक्ति तक जाते-जाते अमृत कुंभ पूरी तरह खाली हो जाय और असुरों को खाली कुंभ दिखाकर संतुष्ट कर दिया जाय। राहू और केतु जानते थे कि कोई न कोई ऐसी चालाकी होगी कि असुरों को अमृत की एक बूंद भी नहीं मिलेगी। अमृत बांटते हुए विश्वमोहनी आगे बढ़ रही थी अपने सम्मोहित करने की अदाओं के साथ। और देवता विश्वमोहनी की अदा का अमृत और अमृत घट का अमृत दोनों का पान एक साथ कर रहे थे और अमर होते जा रहे थे। अब विश्वमोहनी ने उस पांत में अमृत बांटना शुरू किया जिसमें असुर राहू और केतु बैठे हुए थे। बंटवारे में राहू और केतु को भी अमृत मिल गया और वे अंजली में भरकर अमृत पान करने में सफल हो गये। पर सूर्य और चन्द्रमा की दिव्य दृष्टि ने राहू और केतु को पहचान लिया और विष्णु से उसकी शिकायत कर दी। अमृत का घट तो अंतिम देवता की अंजुरी तक आकर समाप्त हो चुका था। जब सूर्य और चन्द्रमा की शिकायत मिली तो पालनकर्ता के क्रोध का ठिकाना न रहा। कठोर दंड देने की ठानी। उसी आवेश में अपने सुदर्शनधारी असली रूप में आ गये।  अपने चक्र सुदर्शन को आदेश दिया कि वह राहू और केतु का सर काट दे। चक्र ने विष्णु के आदेश का पालन किया और दोनों का सर धड़ से अलग कर दिया। पर दोनों तो अमृत पान कर चुके थे। मिथ कथा का कहना है कि उन दोनों का सिर आज भी जीवित है और अपना भेद खोलने वाले सूर्य और चंद्र से बदला लेने के लिए आज भी उसे निगलते रहते हैं। पर मुंह से निगलने के बाद वे कटे हुए गले से बाहर निकल जाते है जिसे सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण का पौराणिक सच सिद्ध किया जाता है।
खैर, समुद्र मंथन मेरी दृष्टि में समाज का मंथन रहा है। समाज आर्य और अनार्य दो वर्गों में बंटा हुआ था। उस समय जाति व्यवस्था नहीं थी। न ही वर्ण व्यवस्था। वर्ण व्यवस्था तो अनार्यों की ताकत को विभाजित करने आर्यों की एक गहरी चाल थी। जो आगे चलकर जाति व्यवस्था के नाम पर लगातार बिखरती गयी और अनार्यों की सामूहिक शक्ति विखंडित होकर कई टुकड़ों में बंटती गयी। जिसका लाभ आर्यों ने भरपूर उठाया। समुद्र मंथन को परजीवी और श्रमजीवी संस्कृति को हवा देने की शुरूआती सामाजिक व्यवस्था माना जा सकता है। उस मंथन से समाज में परजीवी संस्कृति की स्थापना हुई उसके विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ। आर्यों ने समाज के उस मंथन में दूसरों के श्रम पर जीने की कला की मजबूत जमीन तैयार की। इसीलिए समाज के उस मंथन से निकलने वाले समाज के वैभवशाली तत्व पर चालाकी से कब्जा किया। उनकी यही संस्कृति और इसी मंथन ने सामंतवाद को जन्म दिया। सामंतवाद के प्रारंभिक दौर में लंबे समय तक धर्म और सामंती सत्ता के गठजोड़ की भूमिका बनी। सारे परजीवी, चाहे वह सामंती सत्ता से जुड़े हों या धर्म से, एक हो गये। राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित कर दिया गया। जमीन जायदाद, चल-अचल सम्पत्ति पर राजा का, याने परजीवी का अधिकार हो गया। जंगल पहाड़ और नदी का जल भी राजा का हो गया। इस परजीवी संस्कृति का पूरा नेटवर्क तैयार किया गया। गांव और कस्बों तक। गांव में मालगुजार या गौटिया इस संस्कृति की अंतिम मजबूत कड़ी के रूप में विकसित की गयी। गांव की जमीन पर राजा या जमींदार के प्रतिनिधि के रूप में मालगुजार ही मालिक होता था। उसे किसान को बसाने या किसान को उजाडऩे का पूरा-पूरा अधिकार होता था। मालगुजार के कुएं से किसी को पानी भरने का अधिकार नहीं था, खासकर निम्न जाति के हरिजनों को तो बिल्कुल ही नहीं। ठाकुर का कुआं इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मालगुजार किसानों के उत्पाद पर मनमाने तरीके से मालगुजारी वसूल करता था। अस्सी प्रतिशत कृषि उत्पाद मालगुजार, राजा और मंदिर के टैक्स के रूप में वसूल कर लिया जाता था। केवल 20प्रतिशत में किसानों को अपने हल बैल, बीज-भात और परिवार के पेज पसिया की व्यवस्था करनी पड़ती थी। श्रमजीवी वर्ग को निम्न से निम्नतर माना जाता था और हेय दृष्टि से देखा जाता था। परजीवी संस्कृति को पुख्ता करने के लिए तरह-तरह के किस्से गढ़े जाते थे। ब्राम्हण ने हल का मूठ पकड़ लिया तो भगवान की नाराजगी के रूप में घनघोर अकाल पड़ जायेगा। इस तरह के अंधविश्वासों की जमीन तैयार की जा रही थी। मालगुजार का छावा बैल जो प्राय: एक जोड़ी और कभी-कभी दो जोड़ी भी होती थी, किसान की, किसी भी किसान की लहलहाती फसल को चरने के लिए छोड़ दिया जाता था और किसान को उन छावा बैलों को अपनी फसल से निकालने का अधिकार नहीं होता था।
कहने का तात्पर्य यह है कि समुद्रमंथन से जो लक्ष्मी निकली वह किसान मजदूरों के गाढ़ी कमाई की लक्ष्मी थी। जिस पर पहले विष्णु ने और उसके बाद उनके प्रतिनिधि राजाओं ने कब्जा कर लिया।  खनिज के रूप में जो संपत्ति प्रकृति के गर्भ से निकली उस पर आर्यों का अधिकार हो गया। जबकि खानों को खोदकर हीरा-पन्ना, सोना, चांदी, लोहा, कोयला, तांबा निकालने वाले अनार्य मजदूर ही थे। पर उन तमाम खनिजों पर पहले विष्णु का और उसके बाद राजा का अधिकार हो गया। समुद्र मंथन से निकलने वाले पेड़ पौधे सब राजा के हो गये। जंगल की कीमती लकड़ी और बांस राजा की सम्पत्ति हो गयी। इन्द्र के ऐरावत की तरह राजाओं के बड़े-बड़े हाथीथान और घुड़साल स्थापित हो गये जिस पर राजा ने शान से सवारी कर अपने आप को इन्द्र की गरिमा से विभूषित दिखाने में कोई कमी नहीं छोड़ी। इस तरह समाज का मंथन तो हुआ। श्रम ने प्रकृति पर विजय का डंका तो पीटा पर श्रम का मुंह खाली का खाली रहा और दूसरों के श्रम पर जीने वाले लोगों को सब कुछ मिल गया। इसलिए समुद्र मंथन को मिथकथा के रूप में ही न देखा जाय वरन् इस कथा के भीतर से समाज में जिस तरह का बदलाव लाया गया, उस बदलाव की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को भी समझने की जरूरत है, तभी इस का समाजशास्त्र खुलता है और सामाजिक व्यवस्था का यथार्थ सामने आता है। सामंती काल में जिस तरह का सामाजिक मंथन हुआ उससे दूसरों के श्रम पर जीने वाले, वैभवशाली जिन्दगी जीने वाले लोगों की एक बड़ी फौज तैयार हो गयी। यह परजीविता की संस्कृति राज्यों के विलय के साथ समाप्त नहीं हुई वरन् इस संस्कृति का तेजी से विकास हुआ। भारत के समुद्र मंथन की इस मिथकथा को आधार बनाकर ही पंूजीवादी संस्कृति का बीजारोपण हुआ। और आज वही पूंजीवाद कारपोरेट और बाजार के माध्यम से पूरी दुनिया में अपना नंगा नाच दिखा रहा है। अनेकानेक रूप धारण कर।