Monthly Magzine
Monday 20 Nov 2017

वैज्ञानिक दृष्टि व वस्तुनिष्ठता की आवश्यकता


राजेश्वर सक्सेना
 एलआईजी-52
नेहरूनगर, बिलासपुर
फोन : 07752-271010
प्रगतिशील लेखक संघ का 16वां राष्ट्रीय अधिवेशन 9,10,11 सितम्बर 2016 को बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में संपन्न हुआ। जाने-माने चिंतक व समीक्षक डॉ. राजेश्वर सक्सेना इस तीन दिवसीय कार्यक्रम के स्वागताध्यक्ष थे। अपने स्वागत भाषण में उन्होंने दुनिया के सामने वित्तीय पूंजी, तकनालॉजी का वर्चस्व व वैज्ञानिक दृष्टि के लोप आदि जो चुनौतियां उभरी हैं, उन पर सूत्र रूप में विचार रखे। उनका वक्तव्य यहां अविकल प्रस्तुत है-
मित्रो,
आज की विपरीत परिस्थिति में इतनी बड़ी संख्या में एकत्रित प्रगतिशील विचार के लेखकों और विचारकों को देखकर एक नई रचनात्मक उम्मीद पैदा होती है। कहिये कि ‘ईमान ताजा’ (बकौल गुलाम रब्बानी ताबां) हो जाता है।
जैसा कि आप जानते ही हैं कि आज की दुनिया नवउदारवादी विकास के अर्थशास्त्र के एक नये दौर में है। तो यह जान लेना भी जरूरी है कि यह नवउदारवाद अब एक सिस्टम के अर्थ वाला हो गया है। वह सामाजिक संबंधों को एक नया रूप या एक नई आकृति देने में सक्षम हो गया है। इस नये दौर की एक विशेषता यह भी है कि मूल्य और मुद्दों के बदले मैनुफेक्चर्ड आंकड़ों और डाटाज पर भरोसा किया जाने लगा है। लगता है कि जैसे ‘इंटरनेट’ ही हमारी जिंदगी का उत्तर, यहां तक कि अंतिम उत्तर देने में सक्षम हो गया है। अब ऐसा माना जाने लगा है कि जो इंटरनेट में नहीं है, वह कहीं नहीं है।
इसका नतीजा यह हुआ है कि सूचना प्रौद्योगिकी के नित नये रूपों और प्रकारों के विकास ने हमारी पूरी जिंदगी को ही अपने कब्जे में कर लिया है। हम सूचना की दुनिया का शिकार हो गए हैं। सूचना के मकडज़ाल में फंसकर रह गए हैं। इस परिस्थिति में अब कोई अमूर्तन, कोई व्यंजनात्मकता बाकी नहीं रह गई है। सब कुछ ‘जैसा वह है’ (ड्डह्य द्बह्ल द्बह्य) की तकनीकी सोच का होकर रह गया है। ऐसे में लगता है हमारी यह ‘दुनिया सपाट’ सी हो गई है। जीवन संबंधों की व्यवस्था खलास सी हो गई है।
तो मित्रो यह सब क्या है? क्यों कर है? आज हमें विकास के पावर-हाऊस (अर्थशास्त्र) से रौशनी मिल रही है। एक अरब पच्चीस करोड़ जिंदगीयों का संबंध विकास के इस पावर हाऊस से है।
तो विकास के ऐसे नये परिदृश्य में प्रगतिशीलों का यह जमावड़ा का अर्थ रखता है? हमें अच्छे से मालूम है कि प्रगति का यह पद विज्ञान के केन्द्र का है और विकास तकनालाजी के केन्द्र का पद है।
ऐसे में यदि जमाना यह कहता है कि प्रगति की कोटि, ज्ञान-कोटि, क्रिया कोटि विखंडित हो चुकी है, आज के परिदृश्य में, विकास के परिदृश्य में प्रगति का कोई अर्थ नहीं रह गया है तो ऐसे कथन का एक आशय यह है कि विज्ञान के ज्ञान और क्रिया को तकनालॉजी में घटाकर देखा जाने लगा है।
क्या आप यह जानते हैं कि विज्ञान के विचार का विलोप और तकनालॉजी सर्वस्व का क्या मतलब है? इसका मतलब दर्शन और इतिहास के ध्वस्तीकरण से है। ज्ञान की अमूर्त प्रक्रियाओं (द्वन्द्ववादी) के ध्वस्तीकरण से है। कुल मिलाकर वस्तुनिष्ठता की कोटि के, जीवन संबंधों की वस्तुनिष्ठता की कोटि के न रह जाने से है।
जानते हैं कि जीवन-संबंधों की वस्तुनिष्ठता के न रह जाने का क्या मतलब है? इसका मतलब दिक्-काल सापेक्ष अनुभव-सम्पदा, स्मृति और संवेदना के क्षरण से है। आत्मनिष्ठ आदर्शवाद की तत्ववादी वक्तृता के मायावी क्रीड़ा लोक का होकर रह जाने से है। तकनालाजीकल सर्वस्व की इंस्ट्रूमेंटल वस्तुपरक की यांत्रिकता में फंसकर रह जाने से है।
तो मित्रो, इस तरह विज्ञान, दर्शन और इतिहास के विलोप का अर्थ मानव-विचार के और मानव की हर विरासत के विखंडन का द्योतक है। तब फिर ऐसी हालत में मानव की हैसियत क्या रह जा सकती है? ऐसे में मानव एक नृवैज्ञानिक मानव, मूल प्रवृत्तियों का दास मानव, आदि मनोवृत्तियों के अनुकूल व्यवहार करने वाला मानव, आज की भाषा में एक उपभोक्ता पशु के रूप में घटकर रह गए मानव का विचार ही शेष रह जा सकता है।
आज हम वित्तीय पूंजी के अखंड प्रभुत्व के समय में है। यह वित्तीय पूंजी स्वत्वहीन है, मानव श्रम की उत्पाद नहीं है। यह वित्तीय पूंजी मानव निरपेक्ष है। यह बनी बनाई व्यवस्था को तोड़ती है, किन्तु किसी नई व्यवस्था को रचती-गढ़ती नहीं है।
संकेत यह है कि वित्तीय पूंजी की यांत्रिकी गतिकी से जीवन संबंधों की वस्तुनिष्ठता भंग हो जाती है। मनुष्य का आभ्यातांतरिक खंड-खंड विभक्त हो जाता है। उसकी अपनी आत्मपरकता दरक जाती है, वह आत्महीन सा होकर रह जाता है।
जानते हैं इसका क्या अर्थ है? इसका सीधा सादा अर्थ है मनुष्य का निरर्थक हो जाना। ‘मनुष्य डिस्पोज़ेबिल है’, नष्ट कर दिए जाने योग्य है। आज इस तरह की $िफल्में बनने लगी हैं जिनमें यह बताया जाता है कि आज की दुनिया में साढ़े सात अरब मनुष्यों की कोई जरूरत नहीं है। मनुष्य की संख्या को कम किया जाना बहुत जरूरी है। हम देखते हैं कि दुनिया भर में मनुष्यों की एक बड़ी संख्या बायोमास में तब्दील होती जा रही है।
कहने का आशय यह है कि कल तक मनुष्य विलगाव, आत्मविलगाव के एक दार्शनिक विचार में था और विलगाव से मुक्त होने के वास्ते सकारात्मक कोशिश में था किन्तु आज मनुष्य गैर जरूरी हो गया है। यह वित्तीय पूंजी मानव को नहीं पहचानती। वह मानव-भक्षी है।
तो मित्रो, ऐसे में इस वित्तीय पूंजी का विरोध करना संभव नहीं है। हां, उसके वितरण की प्रणाली को, उसके वितरण की व्यवस्था को किसी नीतिगत रास्ते पर लाना, किसी सिद्धांत के तहत लाना, इस पर विचार किया जा सकता है। वित्तीय पूंजी की परिघटना स्वयं में गैरद्वन्द्वात्मक है, किन्तु उसके वितरण की प्रणाली और व्यवस्था को द्वन्द्ववादी दृष्टि से विश्लेषण और मूल्यांकन किया जा सकता है।
मित्रो, एक बेहद जरूरी बात यह है कि इक्कीसवीं सदी के विज्ञान का नया शोध डायलैक्टिकल पद्धति की उच्चतर अवस्थाओं में है, वह सूक्ष्म जटिल प्रक्रियाओं में है। जापान के भौतिकविद् (नोबेल पुरस्कार) सकाता का यह कथन आज भी अपना एक नया अर्थ लेता हुआ है कि द्वन्द्ववाद, प्रकृति का तर्कशास्त्र है। (Dialectics is the logic of nature) यदि प्रकृति, मनुष्य और समाज अन्तर्बद्ध हैं, अन्तक्र्रिया में हैं तो यह द्वन्द्ववाद समाजविज्ञान की, मानविकी की और भाषा, साहित्य कला की, संवेदना की विधाओं की ज्ञान पद्धति और रचना दृष्टि हो सकता है।
आज की अकादमिक्स में मुख्यत: तीन माडेलों का चलन हैं सिस्टम माडेल, विकासवादी माडेल और द्वन्द्ववादी माडेल। यह द्वन्द्ववादी माडेल है जिसमें गुणात्मक रूपांतरण पर जोर बना रहता है। आज ऐसे अनेक तकनालाजीकल सर्वस्ववादी हैं जो गुणात्मक के विचार को तकनालॉजी में जगह देना चाहते हैं-
कि इक्कीसवीं सदी का विज्ञान कहता है- सब कुछ भौतिक है, जो अव्यक्त और अमूर्त है, वह भी भौतिक (डार्क मैटर, ब्लैक इनरजी) है तो यह भौतिक गतिमान है, ऊर्जावान है। यह भौतिक बीईंग रूप है, स्वत्ववान है और बिकमिंग की प्रक्रियाओं में है। कि नैनो-विज्ञान भौतिक है कि सूचना-भौतिक है। आज मैटर, इन्$फारमेशन और लाइफ पर भौतिकवादी दृष्टिकोण से सोचा जाता है। आज ‘द सन’, ‘द जेनोम’ और ‘द इंटरनेट’ से अति सूक्ष्म-जटिल जैविक प्रक्रियाओं के सच का संज्ञान लिया जाने लगा है।
तो मैं अपने प्रगतिशील विचार के मित्रों से यह आग्रह करता हूं कि उन्हें विज्ञान के विरुद्ध तकनालाजी-सर्वस्व के विरोध में खड़ा होना, इसी तरह सूडो विज्ञान, एन्टी विज्ञान और क्रिएशन साइंस के विचार के विरुद्ध खड़ा होना जरूरी है। विज्ञान केन्द्रित विचार से ही ज मीनी हकीकत को समझा जा सकता है। ‘सर्वविसर्जनवाद, सर्वनिषेधवाद के विरुद्ध एक नया सकारात्मक तर्क जुटाया जा सकता है। आज के परिदृश्य में तो सकारात्मक में खड़ा होना ही संघर्ष करने के तर्क में होना जैसा है।’
आप कहेंगे कि वक्तव्य में भारत नहीं है, भारत की जमीनी हकी$कत नहीं है। आपका ऐसा कहना ठीक हैं लेकिन मैंने अपने इस वक्तव्य में दृष्टिकोण-रचना का सवाल उठाया है। निराशा, हताशा और निष्क्रियता से बचे रह जाने के लिए एक नये नवाचारी दृष्टिकोण का सवाल उठाया है। वस्तुनिष्ठतावादी कोटि के पुनर्गठन और नवगठन के लिए क्या करना जरूरी है, इसे देखा है। भीतरी उमड़-घुमड़ बहुत है। किन्तु यहां पर, बस इतना ही।
उम्मीद है कि तीन दिनों की गोष्ठियों में कोई नया संवाद पैदा होगा। घिसे-पिटे और टुकड़ों-टुकड़ों में विभक्त मुद्दों पर बात करने का कोई अर्थ नहीं है। हमें विखंडन के विरुद्ध व्यापक कोटि की संगति चाहिए और संगति को एक वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण चाहिए।        धन्यवाद