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Thursday 23 Nov 2017

आज हिन्दी दिवस है और इस अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेकर मैं कुछ देर पहले ही लौटा हूं।

ललित सुरजन
आज हिन्दी दिवस है और इस अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेकर मैं कुछ देर पहले ही लौटा हूं। यह वैसा कार्यक्रम नहीं था जिसकी कल्पना अमूमन हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह, हिन्दी पखवाड़े और हिन्दी माह में की जाती है। मैं जिस संस्था में एम.ए. हिन्दी का विद्यार्थी था याने दुर्गा महाविद्यालय, रायपुर, उसके हिन्दी विभाग ने कुछ नएपन के साथ आज का आयोजन किया था। हिन्दी दिवस पर महाविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्राध्यापकों और विद्यार्थियों ने प्रेमचंद का स्मरण किया। सबसे पहले उनकी एक कहानी नशा का पाठ एक विद्यार्थी ने किया, फिर चार छात्र-छात्राओं ने क्रमश: ईदगाह, बड़े भाई साहब, गुल्ली डंडा व परीक्षा  का सार-संक्षेप अपनी टिप्पणियों के साथ प्रस्तुत किया। इस तरह से प्रेमचंद की पांच कहानियों से श्रोता परिचित या पुनर्परिचित हुए। इनमें बीए प्रथम वर्ष से लेकर एमए अंतिम वर्ष तक के विद्यार्थी उपस्थित थे। यह देखकर अच्छा लगा कि महाविद्यालय के प्राचार्य भी, जो कि वाणिज्य के प्राध्यापक हैं, पूरे समय मौजूद रहे। मेरे लिए यह सचमुच खुशी और संतोष का विषय था कि जिस कॉलेज से पचास वर्ष पूर्व मैं पढ़ाई पूरी कर निकला था वहां आज के माहौल में भी साहित्य के प्रति इतनी ललक बाकी है।
हिन्दी दिवस पर प्रेमचंद को केन्द्र में रखकर बातचीत की जाए यह सोच मुझे तो पसंद आई ही, आप भी शायद मुझसे सहमत होंगे कि औपचारिक आयोजन के बदले ऐसे कार्यक्रम अवसर विशेष को सार्थक बना देते हैं। अन्यथा हिन्दी को लेकर अधिकतर बातें तो वे ही हैं जो हम पिछले साठ सालों से दोहराते चले आ रहे हैं। केन्द्र सरकार के विभिन्न प्रतिष्ठानों के राजभाषा विभाग हों या हिन्दी पर काम करने वाली संस्थाएं हों, या फिर स्कूल-कॉलेज ही क्यों न हों, सब एक बंधी-बंधाई लीक पर चलते हैं। सबको पता है कि एक औपचारिकता है जिसे पूरा करना है। कार्यक्रम सिर्फ एक दिन याने चौदह सितंबर को ही करने से शायद अतिथि वक्ताओं का टोटा पड़ जाता हो, इसलिए दिन पहले सप्ताह में बदला, फिर पखवाड़े में और अब माह में।  जिसको जब सुविधा हो कार्यक्रम रख लो। ऐसे अवसर पर सबसे दयनीय स्थिति संस्था प्रमुख की होती है जिसे विवशता में अपना हिन्दी प्रेम प्रकट करना पड़ता है। वह अतिथि वक्ता के नाम-काम से भी अक्सर परिचित नहीं होता। किन्तु इससे अतिथि को फर्क नहीं पड़ता।  शाल, श्रीफल से सम्मान और पत्र पुष्प पाकर उसका मन खिल उठता है। उसे महीने भर पहले से मानो आज के दिन का इंतजार होता है।
इस दृष्टि से मैंने जिस आयोजन की चर्चा प्रारंभ की है उसका अनुकरण न सिर्फ एकरसता को तोडऩे में सहायक होगा बल्कि हिन्दी साहित्य के बारे में श्रोताओं के ज्ञान में भी कुछ वृद्धि होगी। यह आवश्यक नहीं कि कार्यक्रम हर बार प्रेमचंद पर केन्द्रित हो। विगत सौ वर्षों में जो मूर्धन्य लेखक हुए हैं उनमें से किसी के भी रचना संसार पर चर्चा रखी जा सकती है। इस वर्ष जैसे अमृतलाल नागर की जन्मशती है, तेरह नवंबर से मुक्तिबोध जी का जन्मशती वर्ष प्रारंभ हो रहा है। इनको अवसर के अनुरूप महत्व देकर स्मरण करना एक अच्छी पहल हो सकती है। यह ध्यान अवश्य रखना होगा कि अधिकतर श्रोता संभवत: हिन्दी के विद्यार्थी न हों तो ऐसी चर्चा न की जाए जो उनके लिए बोधगम्य न हो। यह उल्लेख प्रासंगिक होगा कि राजभाषा विभाग के पुस्तकालयों में अधिकतर वे किताबें होती हैं जिन्हें कोई नहीं पढ़ता। मसलन रेलवे, बैंक या डाक विभाग के किसी अहिन्दी भाषी कर्मचारी को किसी हिन्दी कवि पर लिखी गई समीक्षा पुस्तक से क्या लेना-देना? अर्थात् व्याख्यान में भी इस बात का ख्याल रखना आवश्यक है।
प्रेमचंद और उनके बाद हरिशंकर परसाई ये दो लेखक इस संदर्भ में आदर्श की तरह उपस्थित हैं। यह अकारण नहीं है कि प्रेमचंद आज भी हिन्दी के सबसे लोकप्रिय लेखक बने हुए हैं तथा परसाई जी को सोशल मीडिया पर लगभग प्रतिदिन उद्धृत किया जा रहा है। मेरा मानना है कि इनकी भाषा में जो सादगी और तरलता है वह कामचलाऊ हिन्दी जानने वालों को भी तुरंत अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। फिर विषय का चयन और उसका निर्वाह तो बाद में आते ही हैं। यहां शायद शरतचंद्र का उल्लेख किया जा सकता है जिन्होंने एक पाठक के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा था कि रवि बाबू मेरे लिए लिखते हैं, जबकि मैं तुम्हारे लिए लिखता हूं। इसे संशोधित कर कह सकते हैं कि मुक्तिबोध परसाई के लिए लिखते थे और परसाई आम जनता के लिए।
प्रेमचंद और परसाई को पढऩा इसलिए भी रुचिकर होता है कि उनकी रचनाएं एक लंबा समय बीत जाने के बाद भी अप्रासंगिक नहीं हुई हैं। वे अपने वर्तमान से हमारा साक्षात्कार करवाती है। मैंने ऊपर प्रेमचंद जी की जिन पांच कहानियों का जिक्र किया उनमें से एक भी कहानी ऐसी नहीं है जो आज की परिस्थितियों पर घटित न होती हो। यही पांच क्यों, उनकी समस्त तीन सौ कहानियों में इस प्रासंगिकता का परिचय मिलता है। दृश्य विधान में अवश्य कहीं अंतर हो सकता है, लेकिन सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियां और मनुष्य के मनोभाव तो वही के वही हैं। आज जब मैं इन कहानियों पर चर्चा कर रहा था तो गुल्ली डंडा की बात करते हुए मुझे अनायास चेखोव की कहानी एक क्लर्क की मौत (शायद यही शीर्षक था) का स्मरण हो आया। एक क्लर्क इस दहशत में मर जाता है कि थिएटर में सामने की पंक्ति में बैठे अफसर पर उसकी छींक का छींटा न पड़ गया हो। गुल्ली डंडा का गया एक वर्गविभेदी समाज व्यवस्था में जी रहा है, जहां वह अफसर बन गए बचपन के दोस्त के साथ गुल्ली डंडा खेलने का अभिनय करते हारते जाता है। कौन जाने धोखे से जीत गए तो नाराज होकर साहब क्या कर बैठे! परीक्षा कहानी अपने आप प्लेटो के ‘फिलासफर किंग’ की याद दिलाती है।
मेरा अभीष्ट यहां प्रेमचंद की रचनाओं की व्याख्या करना नहीं है, किन्तु मेरा कहना यही है कि यदि हिन्दी के प्रति आम जनता में अनुराग उत्पन्न करना चाहते हैं तो इसकी शुरूआत के लिए प्रेमचंद से बेहतर और कोई लेखक नहीं है। आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि इस वर्ष छत्तीसगढ़ में सौ से अधिक स्थानों पर 31 जुलाई और उसके आसपास प्रेमचंद जयंती मनाई गई। मेरे पास खबरें हैं कि अनेक स्कूलों में जयंती का आयोजन हुआ तो विद्यार्थियों के साथ-साथ गांव के लोगों को भी न्यौता दिया गया कि वे आएं और विद्यार्थियों के मुख से कथा सम्राट की रचनाओं का पाठ सुनें। कई स्थानों पर ऐसे आयोजन पंचायत भवन में भी हुए। इस तरह का वातावरण बन रहा है वह मन में उत्साह जगाता है। कुछ वर्ष पूर्व मैं बिहार में बेगूसराय के पास गोदरगवां नामक गांव गया था, जहां गांव के प्रगतिशील सोच के लोग बरसों से विप्लवी पुस्तकालय चला रहे हैं जिसका अपना भवन है। एक छोटे से गांव में हिन्दी की हजारों पुस्तकों के साथ अंग्रेजी की भी पुस्तकें देखना एक तरह से आठवां आश्चर्य ही था। लेकिन फिर मुझे याद आता है कि एक समय मेरे अपने गांव से लेकर उन शहरों तक जहां मैं रहा हूं ऐसे पुस्तकालय और वाचनालय थे जिनका संचालन अधिकतर जनसहयोग से होता था। धीरे-धीरे कर न जाने कब वे पुस्तकालय बंद हो गए।
एक बार फिर आवश्यक है कि अपनी आने वाली पीढिय़ों को सुशिक्षित करने के लिए जनता आगे आए और नए सिरे से पुस्तकालय प्रारंभ करे। रायपुर में नगर निगम ने एक नया पुस्तकालय बना दिया है किन्तु एक सदी पुराना आनंद समाज पुस्तकालय अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। यह विरोधाभास इसलिए है क्योंकि समाज में भाषा व साहित्य के प्रति जो सजगता एवं सम्मान होना चाहिए उसमें शिथिलता आ गई है। हमारे लेखक मित्र तो देश के कोने-कोने में फैले हुए हैं। अगर वे इस तरफ थोड़ा ध्यान दें तो स्थिति बदलते देर न लगेगी। यदि एक लेखक होने के नाते वे समाज में समादृत हैं तो कोई वजह नहीं कि जनता उनकी अपील पर आगे न आए। यह आदर्श स्थिति अगर दूर के ढोल जैसी है तब भी रायपुर के मेरे कॉलेज ने जो प्रयोग किया है वैसे छोटे-छोटे प्रयत्न अन्य स्थानों में भी करने में शायद बहुत दिक्कत नहीं आना चाहिए।
बहुत पहले हमने पढ़ा था कि देवकीनंदन खत्री के तिलस्मी उपन्यास चंद्रकांता, भूतनाथ इत्यादि को पढऩे के लिए लोगों ने हिन्दी सीखी थी। फिर आगे चलकर यह भी जाना कि बंबईया फिल्में देखकर लोगों ने हिन्दी सीखी। माध्यम की लोकप्रियता भाषा और साहित्य के प्रति रुचि जागृत करने में कैसे सहायक हो सकती है इसके ये दो उदाहरण हैं। मैं प्रेमचंद और परसाई की बात फिर करूंगा। इनकी रचनाएं भाषा के कारण लोकप्रिय हो सकती हैं वहीं इनमें जो विचार वैभव है वह पाठक को कई दृष्टियों से समृद्ध करने में सक्षम हैं। आज के समय की जो जटिलताएं और चुनौतियां हैं, उन्हें समझने में, उनका सामना करने में और सफल होने में ये रचनाएं एक धारदार औजार की तरह हमारे काम आएंगी। इन्हीं शब्दों के साथ हिन्दी दिवस पर शुभकामनाएं।