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Tuesday 20 Feb 2018

अक्षर पर्व का जून अंक वैश्विक आतंकवाद और धर्म के नाम पर की जा रही हिंसा पर एक समग्र विश्लेषण से परिपूर्ण विशिष्ट संग्रहणीय अंक है।

सुसंस्कृति परिहार
19 स्टाफ क्वाटर्स, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजाति विश्वविद्यालय लालपुर ,जिला -अनूपपुर (मप्र) मो. 9179891183
अक्षर पर्व का जून अंक वैश्विक आतंकवाद और धर्म के नाम पर की जा रही हिंसा पर एक समग्र विश्लेषण से परिपूर्ण विशिष्ट संग्रहणीय अंक है। बुद्धिजीवियों की भूमिका पर प्रश्नावली के जरिये आपका प्रयास मार्गदर्शन करता है। रमाकांत जी के प्रश्न समीचीन हैं। चंचल चौहान और मणिमोहन जी के मत से मैं पूर्णत: सहमत हूं । वास्तव में यह अन्तर्राष्ट्रीय पूंजी का ही खेल चल रहा है। इला कुमार, निर्मला भुराडिय़ा के विचार भी सही पड़ताल करते हैं। अनूप सेठी का यह कहना कि आतंकवाद ने एक तरह से धर्म को अगुआ कर लिया है विचारणीय है । कुल मिलाकर ,रचना वार्षिकी का यह अंक एक महत्वपूर्ण वैचारिकी अंक है। सम्पादक जी को बधाई । सर्वमित्रा जी के पन्ने की कमी जरुर अखरी। अक्षरपर्व का जुलाई अंक का आवरण पृष्ठ माटी की जिस वेदना को समेटे है वह कहानी पंक लेपन में आषाढ़ के हर्ष और वैभव को चरमोत्कर्ष पर ले जाकर आदिवासी महिलाओं के दर्द को विस्तार देता है। कहानी लेखिका रजनी शर्मा ने जिस ताजगी और जीवंतता से लिखा है वह सराहनीय है। बांग्ला कहानी सहयात्री का कैनवास भी प्रभावित करता है। कांतिकुमार और मधुरेश के संस्मरण अंक की जान हैं। संवेदहीन सलमान, देवदास का स्त्री पाठ, प्रेमचंद का दलित विमर्श भी पठनीय और विचारणीय हैं। देवताले जी की पुस्तक खुद पर निगरानी का वक्त की समीक्षा बहुत कुछ कह जाती है।