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Monday 18 Jun 2018

उत्सव अंक की सूचना

सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहां?
जिंदगानी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहां?
राहुल सांकृत्यायन ने तीसरी कक्षा में इस्माइल मेरठी की ये पंक्तियां पढ़ी और उसे आत्मसात कर लिया। घुमक्कड़ी उनके लिए वृत्ति नहींजीवन का मूलमंत्र बन गयी। आज भी ये पंक्तियां सैलानियों के लिए आदर्श का काम करती हैं। यात्रा करना मानव की अभिन्न आदतों में शामिल है। कभी रोमांच के लिए, कभी जिज्ञासा के लिए, कभी मौज के लिए, कभी शिक्षा के लिए इंसान एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करता रहा और मानव सभ्यता के विकास का साक्षी बनता रहा। इब्नेबतूता, कोलंबस, ह्वेनसांग, फाह्यïान और इनके जैसे तमाम यात्रियों के वृत्तांतों से हमारा इतिहास, हमारी संस्कृति का लेखा-जोखा लिखा गया। भारत में तो यात्राओं की परंपरा ही रही है। व्यापार के लिए, धर्म के लिए, अध्ययन के लिए और जीवन के अंतिम पड़ाव पर मोक्ष के लिए लोग यात्राओं पर निकलते रहे हैं। जीवन कितना नीरस होता, अगर हम अपने ही दायरों में कैद रहते और जानने की कोशिश ही नहीं करते कि देश-दुनिया में जीवन के कितने रंग बिखरे हुए हैं। कूपमंडूक जैसी उपमाएं इस नीरसता को दर्शाने के लिए ही गढ़ी गई हैं। संचार क्रांति के कारण कूपमंडूकता तो दूर हो रही है, यातायात के साधनों के विस्तार और पर्यटन के उद्योग में बदलने के साथ-साथ यात्राएं करना भी आसान हो गया है। लोग अब देश ही नहीं विदेशों में भी भ्रमण के लिए जा रहे हैं और नए-नए अनुभवों से संपन्न हो रहे हैं। नवंबर 2016 में प्रकाश्य अक्षरपर्व मनुष्य की इस घुमक्कड़ी प्रवृत्ति का उत्सव मनाएगा। उत्सव अंक यात्रा वृत्तांतों पर आधारित होगा। लेखकोंं, पाठकों से अनुरोध है कि वे इस विशेषांक के लिए अपनी रचनाएं प्रेषित करें। स्थान की सीमा को ध्यान में रखते हुए रचनाएं अधिकतम 2 हजार शब्दों में ही भेजें। रचना भेजने की अंतिम तिथि 15 अक्टूबर 2016 है। उम्मीद है हमेशा की तरह आपका सहयोग हमें प्राप्त होगा।

रचनाएं ई-मेल के जरिए aksharparv@gmail.com पर और डाक के जरिए- 506, आईएनएस भवन, रफी मार्ग, नई दिल्ली-1 पर भेजें।
संपादक