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Sunday 19 Nov 2017

प्रतिभा दमन की संस्कृति


सर्वमित्रा सुरजन
साक्षी और सिंधु इन दो की बदौलत भारत रियो से खाली हाथ नहींलौटा, यह राहत खेलप्रेमियों को है, लेकिन उतना ही मलाल भी है कि हमने लंदन ओलंपिक से आगे बढऩे की जो उम्मीदें बांधी थीं, वह व्यर्थ गईं। दरअसल बरसों के सूखे के बाद बीजिंग में स्वर्ण समेत तीन पदक और फिर लंदन में छह पदक हासिल करने पर भारत के खेलप्रेमियों को लगा कि अब भारतीय खिलाड़ी भी ओलंपिक जैसे मंच पर अपना हुनर दिखा सकते हैं। और यह महज खुशफहमी नहींहै। सचमुच बीते एक-डेढ़ दशक में भारतीय खिलाडिय़ों ने विश्व मंच पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। कुश्ती, बाक्सिंग, बैडमिंटन, तीरंदाजी, टेनिस, तैराकी, नौकायान, गोल्फ, हाकी कई खेलों में वैश्विक प्रतिस्पद्र्धाओं में हमारे खिलाडिय़ों की उपलब्धियां दर्ज हैं। राष्ट्र्रमंडल खेलों, एशियाई खेलों में भारत ने कई पदक बटोरे हैं। इसके बावजूद कड़वी हकीकत यह है कि जब बात ओलंपिक की हो, तो हम बहुत छोटे-छोटे देशों से भी काफी पीछे हैं। अगर इस बार साक्षी मलिक का कांस्य और पी.वी. सिंधु का रजत पदक नहींहोता तो पदक तालिका में भारत के नाम के आगे शून्य ही लिखा होता। उम्मीदें बहुत से खिलाडिय़ों से थीं, कई पदक तक पहुंचते-पहुंचते चूक गए, लेकिन इस सच को बदला नहींजा सकता कि जो जीता वही सिकंदर।
भारत के खराब प्रदर्शन के कारणों की समीक्षा रियो ओलंपिक के आगाज के साथ ही प्रारंभ हो गई थी, जो सही भी है। जब तक हम अपनी खामियों का विश्लेषण नहींकरेंगे, तब तक उसे सुधारेंगे कैसे। यह कहा जाता है कि भारत में खेल संस्कृति विकसित नहींहै। यह बात काफी हद तक सही है। पहले पढ़ाई करो, फिर खेलो, यह दबाव बच्चों पर शुरु से रहता है। क्योंकि हमारे देश में खेल आधारित आजीविका की आश्वस्ति नहींहै। यूं तो पढ़े-लिखे लोग भी बेरोजगार रहते हैं, लेकिन उनके पास कहने को रहता है कि कितनी डिग्रियां उनके पास हैं। जबकि एक खिलाड़ी के पास उसके खेल के अलावा कोई पहचान न हो, तो जीवनयापन कठिन हो जाता है। हालांकि क्रिकेट इसमें अपवाद है। भारत में क्रिकेट का अच्छा-खासा बाजार है, और क्रिकेटर बनने पर धन कमाने की गुंजाइश भी काफी है, इसलिए क्रिकेट को करियर बनाने में खास अड़चनें नहींआतीं, पर यह बात अन्य खेलों पर लागू नहींहोती। एक बड़ी कमी यह गिनाई जा रही है कि भारत में प्रति व्यक्ति खेलों पर जितना निवेश होता है, वह अमरीका जैसे देशों के मुकाबले बहुत कम है। खेलसंघों पर राजनीतिक दबाव, राजनेताओं और अफसरों का वर्चस्व, खेल जानकारों की सलाहों को अनसुना करना, उभरती प्रतिभाओं को संसाधन, सुविधाएं, प्रशिक्षण उपलब्ध न कराना आदि कुछ और प्रमुख कमियां मानी जा रही हैं, जिनसे असहमत नहींहुआ जा सकता। यह स्पष्ट नजर आता है कि जब कोई खिलाड़ी अपने दम पर कोई उपलब्धि हासिल कर लेता है, तो उस पर सौगातों की बरसात होती है, लेकिन जब वह जूझ रहा होता है तो उसका हाथ थामने कोई नहींआता। लेकिन यह विडंबना केवल खेल नहींबल्कि हर क्षेत्र की है। 125 करोड़ देशवासी बोल-बोल कर हम मानो अपनी जनसँख्या का शक्ति प्रदर्शन करना चाहते हैं, किंतु यह नहींदेखना चाहते कि इन 125 करोड़ लोगों में कितने लोग बस जिंदा हैं, क्योंकि वे सांस ले रहे हैं, उसके अलावा उनके पास न सपने देखने की गुंजाइश है, न पूरा करने की। सुखी, संपन्न मध्यमवर्ग दूसरे देशों की उपलब्धियों को देख-देखकर वैसी ही चाहतें पाल लेता है कि हम भी आस्कर, बुकर, ग्रैमी, मैग्सेसे और नोबेल पुरस्कार हासिल करें। हमारे देश में ऐसी प्रतिभाएं हैं जो इन पुरस्कारों से कहींज्यादा प्राप्त करने के काबिल हैं, किंतु उन्हें पनपने का अवसर ही कहां दिया जाता है। नैतिकता, धर्म, संस्कृति के नाम पर खूब राजनीति होती है और कहींफिल्में कांटी-छांटी जाती हैं, कहींकिताबों की प्रतियां जलाई जाती हैं, कहींशोधप्रबंध में बेईमानी की जाती है। जबकि जिन देशों की तरह हम बनना चाहते हैं वहां शायद ही कहींफिल्मकारों, लेखकों, शोधार्थियों, छात्रों, वैज्ञानिकों, समाजसेवियों को इस कदर राजनीति का शिकार होना पड़ता है, जितना भारत में। शासन और सरकार से विरोध करने का खामियाजा तो पूरी दुनिया में लोगों को किसी न किसी रूप में भुगतना पड़ता है, लेकिन फिर भी यह माहौल नहींबनता कि वे फिल्में बनाना छोड़ दें या लिखना छोड़ दें या खेलना छोड़ दें।
रियो ओलंपिक में इस बार सबसे बड़ा दल भेजकर भारत ने यह मान लिया कि पदक भी इस बार सबसे ज्यादा आ जाएंगे। लेकिन हमने यह आंका ही नहींकि हम कितने पानी में हैं। ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करना ही पर्याप्त नहींहोता, क्योंकि वहां जितने खिलाड़ी आते हैं, वे सब क्वालीफाई करके ही आते हैं। अन्य देशों के खिलाडिय़ों से मुकाबले के लिए जो तैयारी अपेक्षित है, वह हमारी नहींथी, यह स्वीकार कर अगले ओलंपिक की तैयारी करें, तो ही बेहतर है। साक्षी और सिंधु के अलावा बहुत से खिलाडिय़ों से उम्मीद है कि वे टोक्यो से पदक लाएंगे। यह लक्ष्य पूरा भी होगा, बशर्ते उन्हें विज्ञापनों के मायाजाल और ब्रांड एंबेसडर बनाने में समय न व्यर्थ किया जाए। हम जिन देशों जैसा बनना चाहता हैं, वहां ऐसा नहींहोता। अगर होता तो सोचिए अमरीका, इंग्लैंड, चीन कितने लोगों को ब्रांड एंबेसडर बनाते और क्या फेल्प्स और बोल्ट पदक जीतने का रिकार्ड बना पाते।